सोमवार, 6 मई 2019

अंबेडकर यानि जंग

अंबेडकर यानि जंग

सात करोड़ जनता असहाय हुई। जुल्म और बनावटी बेइन्साफी के खिलाफ आजीवन ईमान से जूझनेवाले जुझारू बहादुर चले गए। पाँच हजार वर्षों तक पाँच करोड़ लोगों को हिन्दू समाज द्वारा किए गए छल का मुँहतोड़ और जंगी जवाब अंबेडकर थे। अंबेडकर यानि जंग, यकीनन जंग। उनके जिस्म के जर्रे-जर्रे से जंग जाहीर होती थी। अंबेडकर जुल्म के वास्ते बनी वज्र की मुट्ठी थे। अंबेडकर बनावटी और जालसाजी को कलम करने वाली गदा थे। अंबेडकर यानि जन्मभेद और नाबराबरी पर छोड़ा गया सुदर्शन चक्र। 

अंबेडकर जुर्म और वर्णशाही के आतंकियों को फाड़ने वाला शेर का नाखून थे। अंबेडकर यानि वतनदार और सियासतदारों के खिलाफ छेड़ा गया संग्राम। अंबेडकर ने रब, मजहब, जातिभेदों के फंदो और बंदगी के खिलाफ रण बिगुल फूंकने वाले बुद्ध जैसे रहबरों को अपनाया। गिरी हुई औरतों को ऊपर उठाने वाले फुले को खत्म करने के लिए हिन्दू समाज ने भाड़े के हत्यारे भेजे। कबीर के हाथ पांव बाँधकर पानी में डुबो दिया गया, हाथी के पैरों तले रौंदा गया और फिर मरने के बाद हिन्दू और मुसलमानों को उनके बारे में इतना प्यार होने लगा कि उनके लाश का हक हासिल करने के लिए एक-दूसरे का सिर फोड़ने तक पर तुल गए। भगवान बुद्ध के खून के प्यासों ने भी उन्मत्त नालागिरी हाथी और देवदत्त जैसे कातिलों को छोड़े बिना चैन नहीं ली। मुद्दत में और उसके बाद भी जिन्हें दुःख, दर्द और छल का हलाहल पीना पड़ा ऐसे रहबरों के अंबेडकर सच्चे शागीर्द थे। हिन्दू समाज और कांग्रेस की सियासत के जरिए अंबेडकर का जितना अपमान, जितनी बुराई और जितनी धोखाधड़ी हुई शायद ही किसी के साथ हुई होगी।

टूटूंगा, सहूंगा, मरूंगा पर झुकूंगा नहीं, इस जिद से उन्होंने बगावत का जिहाद छेड़ दिया था। कुत्ते बिल्लियों से भी गिरा बर्ताव करने वाले तुम्हारे मजहब में मैं नहीं जिऊंगा। इंसान और इंसान के बीच हराकत का जहर फैलाने वाले तुम्हारे स्मृति-ग्रंथों को जला दूँगा। इस कदर सीना ठोककर वे सनातनी हिन्दुओं को आगाह करते थे। इसपर हिन्दू लोग उनपर गुस्सा हुए। उनको लगा अंबेडकर मोहम्मद गजनबी से भी बहुत बड़ा खतरनाक हमलावर है। धर्म अख्तियार करने की पुकार करने के बाद उनका खून करने के इरादे से एक हिन्दू लीडर “लॉर्ड कूर्त कोटी” के पास गया लेकिन डॉ. कूर्त कोटी ने उसको कहा- “खबरदार जो तुम अंबेडकर पर हमला करने चले हो, अंबेडकर के हर खून के कतरे से दस-दस अंबेडकर पैदा होंगे।” उनके धर्मान्तरण की घोषणा हिन्दू धर्म के विनाश की घोषणा नहीं थी। वह हिन्दू धर्म को चेतावनी थी। 

वर्णव्यवस्था हिन्दू धर्म और भारत के गिरावट की असली जड़ है, यह उनके लफ्ज थे। उन्होंने एक बार कहा था-“अगर किसी दुश्मन का बदला लेना ही होता तो पाँच साल के अंदर इस देश को मैं तबाह कर दिया होता। लेकिन इस देश के इतिहास में गद्दार की हैसियत से खलनायक दर्ज होना मेरे ख्वाब में न था। मुझे इस बात का बहुत गर्व है कि तमाम उम्र में मैने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे मुझपर कोई कलंक या लांछन आए”।

गांधी के खून से सने हुए हाथ किसी गोडसे के ही हो सकते हैं, किसी ब्राह्मण के ही हो सकते हैं, औरों के नहीं। नौ करोड़ मुसलमानों को खुश करने के लिए कांग्रेस ने इस भूमि के तीन टुकड़े कर डाले, लेकिन सात करोड़ अछूतों की मोहब्बत को हासिल करने के लिए कागजी कानून बनाने के अलावा कांग्रेस ने कुछ भी नहीं किया। तब भी देश को आजादी मिलते ही संविधान समिति में अंबेडकर ने अखंड हम वतन देश और एक जमाति संगठन का नारा बुलंद किया। मैं जो बोलूं या लिखूं वो हकीकत नहीं है, ऐसा कहने की हिमाकत रब में भी नहीं, ऐसा जोश और भरोसा उनके दिलों-दिमाग पर हमेशा मौजूद रहता था।

 हिन्दू धर्म में पैदा होना मेरे वश की बात नहीं थी, लेकिन उसमें मरूंगा नहीं यह बदले की भावना से नहीं बल्कि उम्मीद और हमदर्दी रखने वाले दिल की अंदरूनी पुकार थी। इन लफ्जों से इंसान आज भी सबक सीख ले तो आज भी संसार को बैचेनी और नाबराबरी से अमन और भाईचारे का जीवन देने वाले बुद्ध को खुल्लमखुल्ला अख्तियार करने वाले इंसान के रास्ते में कौन हरकत करने का साहस करेगा…!


त्याग, बलिदान और साहस की प्रेरणा - माता रमाबाई भीमराव आंबेडकर

त्याग, बलिदान और साहस की प्रेरणा - 
माता रमाबाई भीमराव आंबेडकर


इनकी ७८ वी पुण्यतिथी पर समस्त बहुजन समाज परिवार द्वारा 
विनम्र अभिवादन व कोटी कोटी नमन


माता रमाई का जन्म महाराष्ट्र के दापोली के निकट वानाड गावं में ७ फरवरी  1898 में हुआ था. पिता का नाम भीकू वालंगकर था. रमाई के बचपन का नाम रामी था. रामी के माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था. रामी की दो बहने और एक भाई था. भाई का नाम शंकर था. बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने के कारण रामी और उसके भाई-बहन अपने मामा और चाचा के साथ मुंबई में रहने लगे थे. रामी का विवाह 9 वर्ष की उम्र में सुभेदार रामजी सकपाल के सुपुत्र भीमराव आंबेडकर से सन 1906 में  हुआ था. भीमराव की उम्र उस समय 14 वर्ष थी. तब, वह 5 वी कक्षा में पढ़ रहे थे.शादी के बाद रामी का नाम रमाबाई हो गया था.  

भले ही डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को पर्याप्त अच्छा वेतन मिलता था परंतु फिर भी वह कठीण संकोच के साथ व्यय किया करते थे. वहर परेल (मुंबई) में इम्प्रूवमेन्ट ट्रस्ट की चाल में एक मजदूर-मुहल्ले में, दो कमरो में, जो एक दुसरे के सामने थे रहते थे. वह वेतन का एक निश्चित भाग घर के खर्चे के लिए अपनी पत्नी रमाई को देते थे. माता रमाई जो एक कर्तव्यपरायण, स्वाभिमानी, गंभीर और बुद्धिजीवी महिला थी, घर की बहुत ही सुनियोजित ढंग से देखभाल करती थी. माता रमाईने प्रत्येक कठिनाई का सामना किया. उसने निर्धनता और अभावग्रस्त दिन भी बहुत साहस के साथ व्यत्तित किये. माता रमाई ने कठिनाईयां और संकट हंसते हंसते सहन किये. परंतु जीवन संघर्ष में साहस कभी नहीं हारा. माता रमाई अपने परिवार के अतिरिक्त अपने जेठ के परिवार की भी देखभाल किया करती थी. रमाताई संतोष,सहयोग और सहनशीलता की मूर्ति थी.

डा. आंबेडकर प्राय: घर से बाहर रहते थे.वे जो कुछ कमाते थे,उसे वे रमा को सौप देते और जब आवश्यकता होती, उतना मांग लेते थे.रमाताई  घर खर्च चलाने में बहुत ही किफ़ायत बरतती और कुछ पैसा जमा भी करती थी. क्योंकि, उसे मालूम था कि डा. आंबेडकर को उच्च शिक्षा के लिए पैसे की जरुरत होगी. रमाताई  सदाचारी और धार्मिक प्रवृति की गृहणी थी. उसे पंढरपुर जाने की बहुत इच्छा रही.महाराष्ट्र के पंढरपुर में विठ्ठल-रुक्मनी का प्रसिध्द मंदिर है.मगर,तब,हिन्दू-मंदिरों में अछूतों के प्रवेश की मनाही थी.आंबेडकर, रमा को समझाते थे कि ऐसे मन्दिरों में जाने से उनका उध्दार नहीं हो सकता जहाँ, उन्हें अन्दर जाने की मनाही हो. कभी-कभार माता रमाई धार्मिक रीतीयों को संपन्न करने पर हठ कर बैठती थी, जैसे कि आज भी बहुत सी महिलाए धार्मिक मामलों के संबंध में बड़ा कठौर रवैया अपना लेती है. उनके लिये  कोई चांद पर पहुंचता है तो भले ही पहुंचे, परंतु उन्होंने उसी सदियों पुरानी लकीरों को ही पीटते जाना है. भारत में महिलाएं मानसिक दासता की श्रृंखलाओं में जकडी हुई है. पुरोहितवाद-बादरी, मौलाना, ब्राम्हण इन श्रृंखलाओं को टूटने ही नहीं देना चाहते क्योंकि उनका हलवा माण्डा तभी गर्म रह सकता है यदि महिलाए अनपढ और रुढ़िवाद से ग्रस्त रहे. पुरोहितवाद की शृंखलाओं को छिन्न भिन्न करने वाले बाबासाहब डॉ. आंबेडकर ने पुरोहितवाद का अस्तित्त्व मिटाने के लिए आगे चलकर बहुत ही मौलिक काम किया.

बाबासाहब डॉ. आंबेडकर जब अमेरिका में थे, उस समय रमाबाई ने बहुत कठिण दिन व्यतीत किये. पति विदेश में हो और खर्च भी सीमित हों, ऐसी स्थिती में कठिनाईयां पेश आनी एक साधारण सी बात थी. रमाबाई ने यह कठिण समय भी बिना किसी शिकवा-शिकायत के बड़ी वीरता से हंसते हंसते काट लिया. बाबासाहब प्रेम से रमाबाई को "रमो" कहकर पुकारा करते थे. दिसंबर १९४० में डाक्टर बाबासाहब बडेकर ने जो पुस्तक "थॉट्स ऑफ पाकिस्तान" लिखी व पुस्तक उन्होंने अपनी पत्नी "रमो" को ही भेंट की. भेंट के शब्द इस प्रकार थे. ( मै यह पुस्तक) "रमो को उसके मन की सात्विकता, मानसिक सदवृत्ति, सदाचार की पवित्रता और मेरे साथ दुःख झेलने में, अभाव व परेशानी के दिनों में जब कि हमारा कोई सहायक न था, अतीव सहनशीलता और सहमति दिखाने की प्रशंसा स्वरुप भेंट करता हूं.."उपरोक्त शब्दों से स्पष्ट है कि माता रमाई ने बाबासाहब डॉ. आंबेडकर का किस प्रकार संकटों के दिनों में साथ दिया और बाबासाहब के दिल में उनके लिए कितना सत्कार और प्रेम था. 

बाबासाहब डॉ. आंबडेकर जब अमेरिका गए तो माता रमाई गर्भवती थी. उसने एक लड़के (रमेश) को जन्म दिया. परंतु वह बाल्यावस्था में ही चल बसा. बाबासाहब के लौटने के बाद एक अन्य लड़का गंगाधर उत्पन्न हुआ.. परंतु उसका भी बाल्यकाल में देहावसान हो गया. उनका इकलौता बेटा (यशवंत) ही था. परंतु उसका भी स्वास्थ्य खराब रहता था. माता रमाई यशवंत की बीमारी के कारण पर्याप्त चिंतातूर रहती थी, परंतु फिर भी वह इस बात का पुरा विचार रखती थी, कि बाबासाहब डॉ. आंबेडकर के कामों में कोई विघ्न न आए औरउनकी पढ़ाई खराब न हो. माता रमाई अपने पति के प्रयत्न से कुछ लिखना पढ़ना भी सीख गई थी. साधारणतः महापुरुषों के जीवन में यह एक सुखद बात होती रही है कि उन्हें जीवन साथी बहुत ही साधारण और अच्छे मिलते रहे. बाबासाहब भी ऐसे ही भाग्यसाली महापुरुषों में से एक थे, जिन्हें रमाबाई जैसी बहुत ही नेक और आज्ञाकारी जीवन साथी मिली.

इस मध्य बाबासाहब आंबेडकर के सबसे छोटे बच्चे ने जन्म लिया. उसका नाम राजरत्न रखा गया. वह अपने इस पुत्र से बहुत लाड-प्यार करते थे. राजरत्न के पहले माता रमाई ने एक कन्या को जन्म दिया, जो बाल्य काल में ही चल बसी थी. मात रमाई का स्वास्थ्य खराब रहने लगा. इसलिए उन्हें दोनों लड़कों यशव्त और राजरत्न सहीत वायु परिवर्तन के लिए धारवाड भेज दिया गया. बाबासाहब की ओर से अपने मित्र श्री दत्तोबा पवार को १६ अगस्त १९२६ को लिए एक पत्र से पता लगता है कि राजरत्न भी शीघ्र ही चल बसा. श्री दत्तोबा पवार को लिखा पत्र बहुत दर्द भरा है. उसमें एक पिता का अपनी संतान के वियोग का दुःख स्पष्ट दिखाई देता है.

पत्र में डाक्टर बाबासाहब आँबेडकर लिखते है -

"हम चार सुन्दर रुपवान और शुभ बच्चे दफन कर चुके हैं. इन में से तीन पुत्र थे और एक पुत्री. यदि वे जीवित रहते तो भविष्य उन का होता. उन की मृत्यू का विचार करके हृदय बैठ जाता है. हम बस अब जीवन ही व्यतित कर रहे है. जिस प्रकार सिर से बादल निकल जाता है, उसी प्रकार हमारे दिन झटपट बीतते जा रहे हैं. बच्चों के निधन से हमारे जीवन का आनंद ही जाता रहा और जिस प्रकार बाईबल में लिखा है, "तुम धरती का आनंद हो. यदि वह धरती कोत्याग जाय तो फिर धरती आनंदपूर्ण कैसे रहेगी?" मैं अपने परिक्त जीवन में बार-बार अनुभव करता हूं. पुत्र की मृत्यू से मेरा जीवन बस ऐसे ही रह गया है, जैसे तृणकांटों से भरा हुआ कोई उपपन. बस अब मेरा मन इतना भर आया है की और अधिक नहीं लिख सकता..."

बाबासाहब का पारिवारिक जीवन उत्तरोत्तर दुःखपूर्ण होता जा रहा था. उनकी पत्नी रमाबाई प्रायः बीमार रहती थी. वायु-परिवर्तन के लिए वह उसे धारवाड भी ले गये. परंतु कोई अन्तर न पड़ा. बाबासाहब के तीन पुत्र और एक पुत्री देह त्याग चुके थे. बाबासाहब बहुत उदास रहते थे. २७ मई १९३५ को तो उन पर शोक और दुःख का पर्वत ही टुट पड़ा. उस दिन नृशंस मृत्यु ने उन से उन की पत्नी रमाबाई को छीन लिया. दस हजार से अधिक लोग रमाबाई की अर्थी के साथ गए. डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की उस समय की मानसिक अवस्था अवर्णनीय थी. बाबासाहब का अपनी पत्नी के साथ अगाध प्रेम था. बाबसाहब को विश्वविख्यात महापुरुष बनाने में रमाबाई का ही साथ था. रमाबाई ने अतीव निर्धनता में भी बड़े संतोष और धैर्य से घर का निर्वाह किया और प्रत्येक कठिणाई के समय बाबासाहब का साहस बढ़ाया. उन्हें रमाबाई के निधन का इतना धक्का पहुंचा कि उन्होंने अपने बाल मुंडवा लिये, उन्होंने भगवे वस्त्र धारण कर लिये और वह गृह त्याग के लिए साधुओं का सा व्यवहार अपनाने लगे थे. वह बहुत उदास, दुःखी और परेशान रहते थे. वह जीवन साथी जो गरीबी और दुःखों के समय में उनके साथ मिलकर संकटों से जूझता रहा था और अब जब की कुछ सुख पाने का समय आया तो वह सदा के लिए बिछुड़ गया.

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्षा बहन मायावतीजी ने अपने शासनकाल में माता रमाई के त्याग, बलिदान और साहस से प्रेरणा लेते हुए माता रमाई के नाम पर अनेक योजनाओं का शिलान्यास किया.. बल्कि माता रमाई के नाम पर अनेक योजनाएं अंमल में भी लाई.. और देश के सबसे बड़े स्मारक में बाबासाहब डॉ. आंबडेकर के साथ माता रमाई की भी प्रतिमा स्थापित की.. ताकि यहां आनेवाली महिलाओं को माता रमाई के कार्यों से कुछ प्रेरणा मिल सके..

राजर्षी छत्रपति शाहूजी महाराज : आरक्षण के पितामह, बहुजनों के उद्धारक छत्रपति शाहूजी महाराज के 97वें स्मृति दिवस पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से कोटि-कोटि नमन!

राजर्षी छत्रपति शाहूजी महाराज

♦ आरक्षण के पितामह, बहुजनों के उद्धारक छत्रपति शाहूजी महाराज के 97वें स्मृति दिवस पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से कोटि-कोटि नमन!






राजर्षी छत्रपति शाहूजी महाराज के जीवन पर राष्ट्रपति जोतिराव फुले का काफी प्रभाव था. छत्रपति शाहूजी महाराज बॉम्बे स्टेट के निकट कोल्हापुर संस्थान के शूद्र (कुर्मी) जाति के राजा थे. शूद्र-अतिशूद्र के लिए शिक्षा के दरवाजे खोलकर मुक्ति की राह दिखाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था. 

सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म 26 जून 1874 को कोल्हापुर में हुआ था. उनके पिता का नाम श्रीमंत जयसिंह राव आबासाहब घाटगे तथा उनकी माता का नाम राधाबाई साहिबा था. शाहूजी के जन्म का नाम यशवंतराव था. आबासाहब, यशवंतराव के दादा थे. चौथे शिवाजी का अंत होने के बाद शिवाजी महाराज की पत्नी महारानी आनंदी बाई साहिबा ने 1884 में यशवंत राव को गोद ले लिया था. इसके बाद यशवंतराव का नाम शाहू छत्रपति रखा गया था. इन्हें कोल्हापुर संस्थान का वारिस भी बना दिया गया था. शाहूजी महाराज की शिक्षा राजकोट में स्थापित राजकुमार कॉलेज में हुई.

राजकोट की शिक्षा समाप्त करके शाहूजी को आगे की शिक्षा पाने के लिए 1890 से 1894 तक धारबाड़ में रखा गया. शाहूजी महाराज ने अंग्रेजी, इतिहास और राज्य कारोबार चलाने की शिक्षा ग्रहण की. अप्रैल 1897 में राजा शाहूजी का विवाह खानविलकर की कन्या श्रीमंत लक्ष्मीबाई से संपन्न हुआ. विवाह के समय लक्ष्मीबाई की उम्र महज 11 वर्ष की ही थी. जब छत्रपति शाहूजी महाराज की आयु 20 वर्ष थी तब इन्होंने करवीर (कोल्हापुर) संस्थान के अधिकार ग्रहण करके सत्ता की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली तथा शासन करने लगे. 

1894 में शाहूजी महाराज का जब राज्यभिषेक समारोह हुआ तो उनके शूद्र होने की वजह से ब्राह्मणों ने पैर के अँगूठे से उनका राजतिलक किया. इससे उन्हें बहुत पीड़ा हुई. आमतौर पर सभी राजाओं की छवि जनता की आमदनी को करों के माध्यम से हड़पने एवं जबरन वसूली की थी, लेकिन छत्रपति शाहू ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने सबसे से बड़ा काम राज व्यवस्था में परिवर्तन करके किया. उनका मानना था कि संस्थान की वृद्धि में उन्नति के लिए प्रशासन में हर जाति के लोगों की सहभागिता जरूरी है. उस समय उनके प्रशासन में ज्यादातर ब्राह्मण जाति के लोग ही थे, जबकि बहुजन समाज के सिर्फ 11 अधिकारी थे. ब्राह्मणों ने एक चाल के तहत बहुजन समाज को शिक्षा से दूर रखा था, ताकि पढ़-लिखकर ये सरकारों में शामिल न हो सकें.



शाहूजी महाराज इस बात से चिंतित रहते थे, उन्होंने प्रशासन में ब्राह्मणों के इस एकाधिकार को समाप्त करने के लिए तथा बहुजन समाज की भागीदारी के लिए आरक्षण कानून बनाया. इस क्रान्तिकारी कानून के अंतर्गत बहुजन समाज के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था थी. यह देश में आरक्षण की पहली व्यवस्था थी. क्योंकि उस समय बहुजन समाज के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद थे. उन्हें तिरस्कार की जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया जाता था.

शाहूजी के जीवन पर राष्ट्रपिता जोतिराव फुले का काफी प्रम्भाव था. फुले के देहांत के बाद महाराष्ट्र में चले सत्यशोधक समाज आन्दोलन का कारवाँ चलाने वाला कोई नेता नहीं था. 1910 से 1911 तक शाहूजी महाराज ने इस सत्यशोधक समाज आन्दोलन का अध्ययन किया. 1911 में राजा शाहूजी महाराज ने अपने संस्थान में सत्य शोधक समाज की स्थापना की. कोल्हापुर संस्थान में शाहू महाराज ने जगह-जगह गाँव-गाँव में सत्यशोधक समाज की शाखाएँ स्थापित की. 

18 अप्रैल 1901 में मराठा स्टूडेंट्स इंस्टीट्यूट एवं विक्टोरिया मराठा बोर्डिंग संस्थान की स्थापना की और 47 हजार रूपये खर्च करके इमारत बनवाई. 1904 में जैन हॉस्टल, 1906 में मॉमेडन हॉस्टल और 1908 में अस्पृश्य मिल क्लार्क हॉस्टल जैसी संस्था का निर्माण करके शाहूजी महाराज ने शिक्षा फैलाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया जो मील का पत्थर साबित हुआ. अज्ञानी और पिछड़े बहुजन समाज को ज्ञानी, संपन्न एवं उन्नत बनाने हेतु छत्रपति शाहूजी महाराज ने अपने जीवन का एक-एक क्षण समर्पित कर दिया. अंततः 06 मई 1922 को केवल 48 वर्ष की आयु में बहुजन समाज के हितकारी राजा छत्रपति शाहूजी महाराज का परिनिर्वाण हो गया. आज छत्रपति शाहूजी महाराज के जीवन संघर्ष से मूलनिवासी बहुजन समाज को प्रेरणा लेकर निश्चित रूप से समाज में काम करना चाहिए और उनके क्रांतिकारी विचारों को जन-जनतक पहुँचाने का काम करना चाहिए. आरक्षण के पितामह, बहुजनों के उद्धारक छत्रपति शाहूजी महाराज के 97वें स्मृति दिवस पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से कोटि-कोटि नमन!

सामाजिक क्रांति के महान योद्धा-छत्रपति शाहूजी महाराज

सामाजिक क्रांति के महान योद्धा-छत्रपति शाहूजी महाराज



‘‘वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते’’-राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज

राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म 26 जुलाई, 1874 ई. को हुआ था. उनके पिता का नाम श्रीमंत जयसिंह राव आबासाहब घाटगे था. छत्रपति छत्रपति शाहूजी महाराज का बचपन का नाम ‘यशवंतराव’ था. छत्रपति शिवाजी महाराज (प्रथम) के दूसरे पुत्र के वंशज शिवाजी चतुर्थ कोल्हापुर में राज्य करते थे. ब्रिटिश षडयंत्र और अपने ब्राह्मण दीवान की गद्दारी की वजह से जब शिवाजी चतुर्थ का कत्ल हुआ तो उनकी विधवा आनंदीबाई ने अपने जागीरदार जयसिंह राव आबासाहेब घाटगे के पुत्र यशवंतराव को मार्च, 1884 ई. में गोद ले लिया. बाल्य-अवस्था में ही यशवंतराव को साहू महाराज की हैसियत से कोल्हापुर रियासत की राजगद्दी को सम्भालना पड़ा. यद्यपि राज्य का नियंत्रण उनके हाथ में काफी समय बाद अर्थात् 2 अप्रैल, सन 1894 में आया था.


छत्रपति शाहूजी महाराज का विवाह बड़ौदा के मराठा सरदार खानवीकर की बेटी लक्ष्मीबाई से हुआ था. शाहूजी महाराज की शिक्षा राजकोट के ‘राजकुमार महाविद्यालय’ और धारवाड़ में हुई थी. वे 1894 ई. में कोल्हापुर रियासत के राजा बने. उन्होंने देखा कि जातिवाद के कारण समाज का एक वर्ग पिस रहा है तो उन्होंने अछूतों के उद्धार के लिए योजना बनाई और उस पर अमल आरंभ किया. छत्रपति शाहूजी महाराज ने अछूत और पिछड़ी जाति के लोगों के लिए विद्यालय खोले और छात्रावास बनवाए. इससे उनमें शिक्षा का प्रचार हुआ और सामाजिक स्थिति बदलने लगी. परन्तु, उच्च वर्ग के लोगों ने इसका विरोध किया. वे छत्रपति शाहूजी महाराज को अपना शत्रु समझने लगे. उनके पुरोहित तक ने यह कह दिया कि आप शूद्र हैं और शूद्र को वेद के मंत्र सुनने का अधिकार नहीं है. छत्रपति शाहूजी महाराज ने इस सारे विरोध का डट कर सामना किया.

छत्रपति शाहूजी महाराज हर दिन बड़े सबेरे ही पास की नदी में स्नान करने जाया करते थे. परम्परा से चली आ रही प्रथा के अनुसार, इस दौरान ब्राह्मण पंडित मंत्रोच्चार किया करता था. एक दिन बंबई से पधारे प्रसिद्ध समाज सुधारक राजाराम शास्त्री भागवत भी उनके साथ हो लिए थे. महाराजा कोल्हापुर के स्नान के दौरान ब्राह्मण पंडित द्वारा मंत्रोच्चार किये गए श्लोक को सुनकर राजाराम शास्त्री अचम्भित रह गए. पूछे जाने पर ब्राह्मण पंडित ने कहा कि, चूँकि महाराजा शूद्र हैं, इसलिए वे वैदिक मंत्रोच्चार न कर पौराणिक मंत्रोच्चार करते हैं. ब्राह्मण पंडित की बातें शाहूजी महाराज को अपमानजनक लगीं. उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया. महाराज शाहूजी के सिपहसालारों ने एक प्रसिद्ध ब्राह्मण पंडित नारायण भट्ट सेवेकरी को महाराजा का यज्ञोपवीत संस्कार करने को राजी किया. यह सन 1901 की घटना है. जब यह खबर कोल्हापुर के ब्राह्मणों को हुई तो वे बड़े कुपित हुए. उन्होंने नारायण भट्ट पर कई तरह की पाबंदी लगाने की धमकी दी. तब इस मामले पर शाहूजी महाराज ने राजपुरोहित से सलाह ली, किंतु राजपुरोहित ने भी इस दिशा में कुछ करने में अपनी असमर्थता प्रगट कर दी. इस पर छत्रपति शाहूजी महाराज ने गुस्सा होकर राज पुरोहित को बर्खास्त कर दिया.

सन 1902 के मध्य में साहू महाराज इंग्लैण्ड गए हुए थे. उन्होंने वहीं से एक आदेश जारी कर कोल्हापुर के अंतर्गत शासन-प्रशासन के 50 प्रतिशत पद पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिये. महाराज के इस आदेश से कोल्हापुर के ब्राह्मणों पर जैसे गाज गिर गयी. उल्लेखनीय है कि सन 1894 में जब शाहूजी महाराज ने राज्य की बागडोर सम्भाली थी, उस समय कोल्हापुर के सामान्य प्रशासन में कुल 71 पदों में से 60 पर ब्राह्मण अधिकारी नियुक्त थे. इसी प्रकार लिपिकीय पद के 500 पदों में से मात्र 10 पर गैर-ब्राह्मण थे. शाहूजी महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों को अवसर उपलब्ध कराने के कारण सन 1912 में 95 पदों में से ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या अब 35 रह गई थी. सन 1903 में शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर स्थित शंकराचार्य मठ की सम्पत्ति जप्त करने का आदेश दिया. दरअसल, मठ को राज्य के खजाने से भारी मदद दी जाती थी. कोल्हापुर के पूर्व महाराजा द्वारा अगस्त, 1863 में प्रसारित एक आदेश के अनुसार, कोल्हापुर स्थित मठ के शंकराचार्य को अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति से पहले महाराजा से अनुमति लेनी आवश्यक थी, परन्तु तत्कालीन शंकराचार्य उक्त आदेश को दरकिनार करते हुए संकेश्वर मठ में रहने चले गए थे, जो कोल्हापुर रियासत के बाहर था.

23 फरवरी, 1903 को शंकराचार्य ने अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति की थी. यह नए शंकराचार्य लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के करीबी थे. 10 जुलाई, 1905 को इन्हीं शंकराचार्य ने घोषणा की कि ‘चूँकि कोल्हापुर भोसले वंश की जागीर रही है, जो कि क्षत्रिय घराना था. इसलिए राजगद्दी के उत्तराधिकारी छत्रपति शाहूजी महाराज स्वाभविक रूप से क्षत्रिय हैं.

मंत्री ब्राह्मण हो और राजा भी ब्राह्मण या क्षत्रिय हो तो भी किसी को कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन, राजा की कुर्सी पर वैश्य या फिर शूद्र शख्स बैठा हो तो दिक्कत होती थी. छत्रपति शाहूजी महाराज क्षत्रिय नहीं, शूद्र मानी गयी जातियों में आते थे. कोल्हापुर रियासत के शासन-प्रशासन में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व निःसंदेह उनकी अभिनव पहल थी. छत्रपति शाहूजी महाराज ने सिर्फ यही नहीं किया, अपितु उन्होंने पिछड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों मराठा, महार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ईसाई, मुस्लिम और जैन सभी के लिए अलग-अलग सरकारी संस्थाएँ खोलने की पहल की. शाहूजी महाराज ने उनके लिए स्कूल और छात्रावास खोलने के आदेश जारी किये. जातियों के आधार पर स्कूल और छात्रावास असहज लग सकते हैं, किंतु निःसंदेह यह अनूठी पहल थी उन जातियों को शिक्षित करने के लिए, जो सदियों से उपेक्षित थीं. 

उन्होंने अछूत-पिछड़ी जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए खास प्रयास किये थे. उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई. शाहूजी महाराज के प्रयासों का परिणाम उनके शासन में ही दिखने लग गया था. स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले पिछड़ी जातियों के लड़के-लड़कियों की संख्या में उल्लेखनीय प्रगति हुई थी. कोल्हापुर के महाराजा के तौर पर शाहूजी महाराज ने सभी जाति और वर्गों के लिए काम किया.

बता दें कि छत्रपति शाहूजी महाराज के कार्यों से उनके विरोधी भयभीत थे और उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दे रहे थे. इस पर उन्होंने कहा था कि ‘‘वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते’’ राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज ने 15 जनवरी, 1919 के अपने आदेश में कहा था कि ‘‘उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी अछूत-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये. उनका स्पष्ट कहना था कि छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जायेगा. उच्च जातियों को अछूत जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए. जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है’’

15 अप्रैल, 1920 को नासिक में ‘उदोजी विद्यार्थी’ छात्रावास की नींव का पत्थर रखते हुए छत्रपति शाहूजी महाराज ने कहा था कि ‘‘जातिवाद का अंत जरूरी है, जाति को समर्थन देना अपराध है. हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है. जाति आधारित संगठनों के निहित स्वार्थ होते हैं. निश्चित रूप से ऐसे संगठनों को अपनी शक्ति का उपयोग जातियों को मजबूत करने के बजाय इनके खात्मे में करना चाहिए’’ 

छत्रपति शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर की नगरपालिका के चुनाव में अछूतों के लिए भी सीटें आरक्षित की थी. यह पहला मौका था की राज्य नगरपालिका का अध्यक्ष अस्पृश्य जाति से चुनकर आया था. उन्होंने हमेशा ही सभी जाति वर्गों के लोगों को समानता की नजर से देखा. शाहूजी महाराज ने जब देखा कि अछूत-पिछड़ी जाति के छात्रों की राज्य के स्कूल-कॉलेजों में पर्याप्त संख्या हैं, तब उन्होंने एक आदेश से इनके लिए खुलवाये गए पृथक स्कूल और छात्रावासों को बंद करा करवा दिया और उन्हें सामान्य व उच्च जाति के छात्रों के साथ ही पढ़ने की सुविधा प्रदान की.

छत्रपति शाहूजी महाराज ही थे, जिन्होंने ‘भारतीय संविधान’ के निर्माण में महत्त्वपूर्व भूमिका निभाने वाले डॉ. भीमराव अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए विलायत भेजने में अहम भूमिका अदा की थी. महाराजाधिराज को बालक भीमराव की तीक्ष्ण बुद्धि के बारे में पता चला तो वे खुद बालक भीमराव का पता लगाकर मुम्बई की सीमेंट परेल चाल में उनसे मिलने गए, ताकि उन्हें किसी सहायता की आवश्यकता हो तो दी जा सके. शाहूजी महाराज ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर के ‘मूकनायक’ समाचार पत्र के प्रकाशन में भी सहायता की. महाराजा के राज्य में कोल्हापुर के अन्दर ही अछूत-पिछड़ी जातियों के दर्जनों समाचार पत्र और पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं. सदियों से जिन लोगों को अपनी बात कहने का हक नहीं था, महाराजा के शासन-प्रशासन ने उन्हें बोलने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी थी. मूलनिवासी बहुजनों पर दुःखों का पहाड़ उस समय टूट पड़ा जब 10 मई, 1922 को राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज नामक चमचमाता सूरज हमेशा-हमेशा के लिए डूब गया. 
राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

आंबेडकर का संघर्ष और उनकी पत्रकारिता

आंबेडकर का संघर्ष और उनकी पत्रकारिता



‘मूकनायक’ और ‘बहिष्कृत समाज’ जैसी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन-संपदान कर एक दौर में डॉ आंबेडकर ने पत्रकारिता को अपने लक्ष्य का साधन बनाया. डॉ. आंबेडकर ने 31 जनवरी, 1920 को “मूकनायक” नामक पत्रिका को शुरू किया. इस पत्रिका के अग्रलेखों में आंबेडकर ने शोषित-वंचितों के तत्कालीन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को बड़ी निर्भीकता से उजागर किया. यह पत्रिका उन मूक-शोषित-वंचितों, दबे-कुचले लोगों की आवाज बनकर उभरी जो सदियों से सवर्णों का अन्याय और शोषण चुपचाप सहन कर रहे थे.



हालांकि इस पत्रिका के प्रकाशन में “शाहूजी महाराज” ने भी सहयोग किया था, यह पत्रिका महाराज के राज्य कोल्हापुर में ही प्रकाशित होती थी. चूंकि महाराज आंबेडकर की विद्वता से परिचित थे जिस वजह से वो उनसे विशेष स्नेह भी रखते थे. एक बार तो शाहूजी महाराज ने नागपुर में “अखिल भारतीय बहिष्कृत समाज परिषद” की सभा संबोधित करते हुऐ भी कह दिया था कि– “SC/ST को अब चिंता करने की जरूरत नहीं है, उन्हें आंबेडकर के रूप में ओजस्वी विद्वान नेता प्राप्त हो गया है.”
इसी सभा में आंबेडकर ने निर्भीकतापूर्वक दलितों को संबोधित करते हुए कहा था कि- “ऐसे कोई भी सवर्ण संगठन SC/ST के अधिकारों की वकालत करने के पात्र नहीं हैं जो दलितों द्वारा संचालित न हो. उन्होंने स्पष्टतः कहा था कि SC/ST ही SC/ST के संगठन चलाने के हकदार हैं और वे ही SC/ST की भलाई की बात सोच सकते हैं.”
जबकि इस सम्मेलन में गंगाधर चिटनवीस, शंकरराव चिटनवीस, बीके बोस, मिस्टर पंडित, डॉ. पराजंपे, कोठारी, श्रीपतराव शिंदे इत्यादि तथाकथित सवर्ण समाज-सुधारक भी मौजूद थे.
1920 में हुए इस त्रिदिवसीय सम्मेलन की कार्यवाही, भाषण, प्रस्तावों आदि का वृतांत भी 5 जून, 1920 को “मूकनायक” पत्रिका के दसवें अंक में प्रकाशित हुआ था.
इसके बाद सितम्बर, 1920 में डॉ. आंबेडकर अपनी अर्थशास्त्र और बैरिस्टरी की अधूरी पढ़ाई पूरी करने के लिये पुनः लंदन गए. तब उनके पास साढ़े आठ हजार रुपये थे. जिसमें 1500 रुपये शाहूजी महाराज ने उन्हें आर्थिक सहायता दी थी जबकि 7000 रुपये उन्होंने स्वंय एकत्रित किये थे.
लंदन पहुंचकर उन्होंने “लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस” में एमएससी और ग्रेज इन में बैरिस्टरी के लिए एडमिशन लिया. उसके बाद वो पूरे दिन बारी-बारी से लंदन विश्वविद्यालय पुस्तकालय, गोल्डस्मिथ अर्थशास्त्र पुस्तकालय, ब्रिटिश म्यूजियम पुस्तकालय व इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी में ही अध्ययन किया करते थे.
जून, 1921 में लंदन विश्वविद्यालय से उन्हें अर्थशास्त्र में एम.एस.सी. की डिग्री प्राप्त हुई. 1922-23 में वो कुछ माह जर्मनी के “बोन विश्वविद्यालय” में भी अर्थशास्त्र का अध्ययन करने गए. मार्च, 1923 में उन्होंने “रुपये की समस्या- इसके उद्गम और समाधान” पर डीएससी की डिग्री प्राप्त की.
डॉ. आंबेडकर का यह शोध विश्व के अर्थशास्त्रियों की दृष्टि से महान अर्थशास्त्रीय शोध था. दिसम्बर, 1923 में लंदन में पीएस किंग एंड कंपनी ने भी इसको प्रकाशित किया था. इसके अलावा उन्होंने 1923 में ही बैरिस्टरी की परीक्षा भी पास कर ली.
डॉ. आंबेडकर विदेश में रहते हुऐ भी शोषित-वंचितों के लिए बहुत चिंतित रहते थे, उन्होंने लंदन प्रवास में वहां के पुस्तकालयों में तमाम शूद्रों/अछूतों पर उपलब्ध सामग्री का ध्यानपूर्वक अवलोकन किया. यहां तक कि भारत के दलितों के संबंध में लंदन में भारत सचिव ईएस मॉन्टेग्यू से भी मिलकर उन्होंने विचार-विमर्श किया.
विदेश से अपनी शिक्षा पूर्ण करके जब वो वापस भारत आये तो उन्होंने फिर से शोषित-वंचितों के अधिकारों की लड़ाई लड़नी शुरु कर दी. 1927 में उन्होंने ‘बहिष्कृत भारत’ नामक एक अन्य पत्रिका भी निकालनी शुरू कर दी. इसमें उन्होंने अपने लेखों के जरिये सवर्णों द्वारा किये जाने वाले अमानवीय व्यवहार का कड़ा प्रतिकारकिया और लोगों को अन्याय का विरोध करने के लिए प्रेरित किया.
डॉ. आंबेडकर के सम्पूर्ण जीवन पर दृष्टि डाली जाये तो उनका सारा जीवन ही शोषित-वंचित के लिए समर्पित रहा है. शोषित-वंचितों के अधिकारों के लिऐ उनके संघर्ष ने पूरे भारत में नवजागरण का उद्घोष किया और वो मानवता की मिसाल बन गये.
राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)