मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

देश को गुलाम बनाए रखने में ब्राह्मणग्रंथों का बहुत बड़ा योगदान है।

 
उदाहरण के लिए-
ऐतरेय ब्राह्मण (3/24/27) - वही नारी उत्तम है जो पुत्र को जन्म दे। (35/5/2/47) पत्नी एक से अधिक पति ग्रहण नहीं कर सकती, लेकिन पति चाहे कितनी भी पत्नियां रखे। आपस्तब (1/10/51/52) बोधयान धर्म सूत्र (2/4/6) शतपथ ब्राह्मण (5/2/3/14) जो नारी अपुत्रा है उसे त्याग देना चाहिए। तैत्तिरीय संहिता (6/6/4/3) पत्नी आजादी की हकदार नहीं है। शतपथ ब्राह्मण (9/6) केवल सुन्दर पत्नी ही अपने पति का प्रेम पाने की अधिकारिणी है। बृहदारण्यक उपनिषद् (6/4/7) यदि पत्नी सम्भोग के लिए तैयार न हो तो उसे खुश करने का प्रयास करो। यदि फिर भी न माने तो उसे पीट-पीट कर वश में करो। मैत्रायणी संहिता (3/8/3) नारी अशुभ है। यज्ञ के समय नारी, कुत्ते व शूद्र को नहीं देखना चाहिए। अर्थात् नारी और शूद्र कुत्ते के समान हैं। (1/10/11) नारी तो एक पात्र (बरतन) समान है। महाभारत (12/40/1) नारी शॆ बढ़कर अशुभ कुछ नहीं है। इनके प्रति मन में कोई ममता नहीं होनी चाहिए। (6/33/32) पिछले जन्मों के पाप से नारी का जन्म होता है । मनुस्मृति (100) पृथ्वी पर जो भी कुछ है वह ब्राह्मण का है। मनुस्मृति (101) दूसरे लोग ब्राह्मणों की दया के कारण सब पदार्थों का भोग करते हैं। मनुस्मृति (11-11-127) मनु ने ब्राह्मण को संपत्ति प्राप्त करने के लिए विशेष अधिकार दिया है। वह तीनों वर्णों से बलपूर्वक धन छीन सकता है अथवा चोरी कर सकता है। मनुस्मृति (4/165 - 4/166) जान बूझकर क्रोध से जो ब्राह्मण को तिनके से भी मारता है वह इक्कीस जन्मों तक बिल्ली योनि में पैदा होता है। मनुस्मृति (5/35) जो मांस नहीं खाएगा वह इक्कीस बार पशु योनि में पैदा होगा । मनुस्मृति (64 श्लोक) अछूत जातियों के छूने पर स्नान करना चाहिए। गौतम धर्म सूत्र (2-3-4) यदि शूद्र किसी वेद को पढ़ते सुन ले तो उसके कानों में पिंघला हुआ शीशा या लाख डाल देनी चाहिए। मनुस्मृति (8/21-22) ब्राह्मण चाहे अयोग्य हो उसे न्यायाधीश बनाया जाए नहीं तो राज मुसीबत में फंस जाएगा।
यदि कोई ब्राह्मण को दुर्वचन कहेगा तो वे मृत्युदण्ड के अधिकारी हैं। मनुस्मृति (8/270) यदि कोई ब्राह्मण पर आक्षपे करे तो उसकी जीभ काट कर दण्ड दें। मनुस्मृति (5/157) विधवा का विवाह करना घोर पाप है। विष्णुस्मृति में स्त्री को सती होने के लिए उकसाया गया है तो 'शंख स्मृति' में दहेज देने के लिए प्रेरित किया गया है। 'देवल स्मृति' में किसी को भी बाहर देश जाने की मनाही है। 'बृहदहरित स्मृति' में बौद्ध भिक्षु तथा मुण्डे हुए सिर वालों को देखने की मनाही है। 'गरुड़ पुराण' पूरे का पूरा अंधविश्वास का पुलिंदा है जिसमें ब्राह्मण को गाय दान करने तथा उसके हाथ मृतकों का गंगा में पिण्डदान करने के लिए कहा गया है। कहने का अर्थ है कि इस पुराण में ब्राह्मणों की रोजी-रोटी का पूरा प्रबन्ध किया गया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि यह ब्राह्मण साहित्य इस देश को कितना पीछे ले गया और भारत की गुलामी की एक बड़ा कारण रहा। इस पर एक अंग्रेज इतिहासकार एडमंड बर्क लिखते हैं, 'हिन्दू समाज क्योंकि आर्थिक तौर पर भ्रष्ट और अन्यायी था। अतः वे अपने देश को स्वतन्त्र नहीं रख पाए और भारत को सदियों तक गुलामी के कष्ट भोगने पड़े।' इस सम्बन्ध में भारतवर्ष के महान् विचारक तथा विद्वान् स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, 'एक देश जहां लाखों लोगों को खाने को कुछ नहीं, जहां कुछ हजार व्यक्ति तथा ब्राह्मण गरीबों का खून चूसते हैं। हिन्दुस्तान एक देश नहीं, जिंदा नरक है। यह धर्म और मौत का नाच है।' स्कन्द पुराण की तो पूरी शिक्षा ही देशद्रोही है। कहते हैं कि नारी के विधवा होने पर उसके बाल काट दो, सफेद कपड़े पहना दो और उसको खाना केवल इतना दो कि वह जीवित रह सके। उसका पुनः विवाह करना पाप है। ऐसे नियमों को पौराणिक ब्राह्मणों ने हमारी राजपूत जैसी जातियों से मनवाया, इसी कारण सती प्रथा का प्रचलन हुआ। विधवा औरत ने सोचा कि इससे अच्छा तो पति के साथ ही जलकर मरना

देश की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई को शिक्षक दिवस पर हमारा नमन।


5 सितंबर शिक्षक दिवस 


शिक्षक दिवस पर शत शत नमन।सावित्री बाई फुले भारत देश की पहली महिला शिक्षक।जिसने धर्म के ठेकेदारों पाखंडी पुजारियों ओर मोलवियों के धर्म विरोधी समाज विरोधी करार दिए जाने के बाद लोगो के ताने सुनते हुए सार्वजनिक अपमान सहते हुए महिला शिक्षा के कार्य को आगे बढ़ाया। सावित्री देवी फूले ने पुरूष प्रधान देश की महिलाओ को सम्मान जनक जीवन जीने की बुनियाद की नीव रखी थी 
हम नमन करना चाहते इनके पति ज्योतिबा फुले को जिन्होंने पहले अपनी पत्नी को पढ़ाया इस देश मे लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला।

देश की पहली शिक्षिका

यह घटना सन् 1853 ई. की है। उस समय लड़कियों की शिक्षा-दीक्षा पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता था। ऐसे में तीन जुलाई 1853 को पूना में ज्योतिबा फूले ने लड़कियों को शिक्षा प्रदान करने के लिए एक स्कूल खोला। लेकिन समस्या यह थी कि बालिकाओं को पढ़ाने के लिए स्कूल में शिक्षक की जगह शिक्षिका ही होनी चाहिए। उस समय एक शिक्षिका तलाश करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण काम था। जो लड़कियां थोड़ा-बहुत पढ़ी-लिखी भी थीं, वे भी घर के अंदर ही रहती थीं। ज्योतिबा फूले को जब शिक्षिका के रूप में कोई महिला नहीं मिली तो उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई फूले को इस काम के लिए राजी कर लिया।


ऐसे समय में जब लड़कियों को पढ़ाना ही गलत समझा जाता था, सावित्री बाई ने शिक्षिका बनने का फैसला कर अपने लिए मुसीबतें खड़ी कर लीं। पूरा समाज सावित्री के इस निर्णय से हिल गया। अपने को समाज का ठेकेदार मानने वालों ने उनकी बहुत निंदा की। उन्हें धमकी तक दी गई। जब वह स्कूल जाने के लिए निकलतीं तो लोग उन पर टीका-टिप्पणी करते, उन्हें तरह-तरह से परेशान करते, उन पर पत्थर फेंकते। लेकिन सावित्री बाई इन घटनाओं से बिल्कुल नहीं घबराईं। वह नियमित रूप से स्कूल जाती रहीं और आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाईं। आज उन्हें देश की प्रथम शिक्षिका के रूप में जाना जाता है।\\


*हम सभी जानते हैं कि भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन (5 सितंबर) भारत में ‘शिक्षक दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है। आज के दिन हम महिलाओं को शिक्षित करने का बीड़ा उठाने वाली शिक्षा का अलख जगाने वाली ज्ञान की देवी भारत की पहली शिक्षिका माता सावित्रीबाई फुले को भी याद करते हैं।*

सावित्री बाई फुले ने अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ पुणे में महिलाओं के लिए पहला स्कूल शुरू किया। ये बात 1848 की है, ऐसा समय जब महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलना भी गलत समझा जाता था। सावित्री बाई ने शिक्षा के अपने इस अभियान में जात-पात और वर्ग भेद को आड़े नहीं आने दिया और सभी महिलाओं को समान शिक्षा देने के लिए समाज के तानों और प्रताड़ना को दरकिनार करते हुए इस चुनौती को स्वीकार किया।

यही नहीं, सावित्री बाई ने विधवाओं के मुंडन जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ़ अभियान चला कर उनके पुनर्विवाह कराने की पहल की। लेकिन यह बेहद दुःख कि बात है कि सावित्री बाई के इतने क्रांतिकारी और मानववादी कार्यों पर देश के सत्ताधीशों ने अनदेखी करते हुए उनके योगदान को भुला कर भूतपूर्व राष्ट्रपति के जन्मदिवस को शिक्षक दिवस घोषित कर दिया।

*सावित्री बाई की नारीवादी सोच थी, इस वजह से उन्होंने शिक्षा के साथ जाति और महिलाओं के साथ होने वाले भेद भाव को संबोधित किया। हिंसा सहने वाली औरतों के लिए सावित्री बाई ने एक केंद्र भी खोला जहां वे उन महिलाओं को शरण देती थीं जिनके साथ बलात्कार हुआ था और जो अपने बच्चों को कहीं जन्म नहीं दे सकती थीं। उनकी याद में पुणे विश्वविद्यालय का नाम ‘सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय’ रखा गया है*

*उनके बारे में दस खास बातें....* 

1. इनका जन्‍म 3 जनवरी, 1831 में दलित परिवार में हुआ था.

2. 1840 में 9 साल की उम्र में सावित्रीबाई की शादी 13 साल के ज्‍योतिराव फुले से हुई.

3. सावित्रीबाई फुले ने अपने पति क्रांतिकारी नेता ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले. उन्‍होंने पहला और अठारहवां स्कूल भी पुणे में ही खोला.

4. सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला अध्यापक-नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता थीं.

5. उन्‍होंने 28 जनवरी 1853 को गर्भवती बलात्‍कार पीडि़तों के लिए बाल हत्‍या प्रतिबंधक गृह की स्‍थापना की.

6. सावित्रीबाई ने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर काम किया.

7. सावित्रीबाई फुले ने आत्महत्या करने जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में डिलवरी करवा उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया. दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर इन्होंने डॉक्टर बनाया.

8. महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु सन् 1890 में हुई. तब सावित्रीबाई ने उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिये संकल्प लिया.
9. सावित्रीबाई की मृत्यु 10 मार्च 1897 को प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान हुई.
10. उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता. उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों को फेंकने की बात करती हैं...

जाओ जाकर पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती

काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो

*ज्ञान के बिना सब खो जाता है, ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है!!*

*इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो!!*

दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो, तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है

*इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो, ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो.*

*नोट =(विद्यालय में शिक्षक ही माता-पिता –विद्यालय में शिक्षक ही माता-पिता के समान होते हैं वे बच्चों को अपनी प्रिय संतान के समान मानते हैं  उन पर बच्चों को संस्कारित करने का दायित्व होता है इसलिए वे अच्छे कुंभकार के समान बच्चों की बुरी आदतों पर चोट करते हैं तथा अच्छी बातों की प्रशंसा करते हैं  शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों की बुरी आदतों का समर्थन न करें, अपितु उन्हें उचित मार्ग पर लाने का प्रयास करें*

*शिक्षक का दायित्व, पढ़ाना, दिशा-निर्देशन, सत्य्कार्यों की प्रेरणा – शिक्षकों का दायित्व केवल पुस्तकें पढ़ाना नहीं है  अपना विषय पढ़ाना उनका प्रथम धर्म है उन्हें चाहिए कि वे अपने विषय को सरस और सरल ढंग से बच्चों को पढाएँ  उनका दूसरा दय्तिव है – बच्चों को सही दिशा बताना  अच्छे-बुरे की पहचान करना तीसरा दायित्व है – बच्चों को शुभ कर्मों की प्रेरणा देना)*


ब्राह्मण धर्म के भडवे बाबा रामदेव और

पिछले दिनों ब्राह्मण धर्म के भडवे बाबा रामदेव ने कुछ ऐसे ब्यान दिए जो मूलनिवासियों के खिलाफ और ब्राह्मणवादियों के पक्ष में थे. राम कृष्ण का पूरा नाम राम कृष्ण यादव है. जिस से पता चलता है कि रामदेव खुद यादव अर्थात एक शुद्र मूलनिवासी है. रामदेव ने कहा “राहुल दलित बस्ती में पि‍कनि‍क और हनीमून मनाने जाते हैं। “ रामदेव ब्राह्मण धर्म की भड़वागिरी करते करते यह भूल गया है कि वो खुद एक शुद्र या दलित है. क्या रामदेव अपनी माता और बहनों के बारे भी ऐसी ही सोच रखता है? क्या रामदेव अपने अनुयायियों को भी यही सब करने की सलाह देता है? लगता है रामदेव को दलितों पर होने वाले अत्याचारों और उनके शोषण से आत्मशांति प्राप्त होती है. रामदेव के पास मनुवाद और ब्राह्मणवादी पाषाण संस्कृति(देव संस्कृति; जिस में पत्थर को भगवान बना कर लोगों का शोषण किया जाता है) को बढावा देने का समय है लेकिन जंतर मंतर पर बैठी उसकी बहनों के प्रति उसकी कोई जिमेवारी नहीं है. रामदेव का यह ब्यान रामदेव को पूरी तरह ब्राह्मणों का भड़वा साबित करता है. दूसरे ब्यान में रामदेव ने कहा कि “मैं खुद कुवारा हूँ तो दूसरों की पत्नी को रख कर क्या करूँगा” और ब्राह्मणवादी पार्टी बीजेपी के प्रधान मत्री पद के उम्मीदवार नरेद्र मोदी का समर्थन कर रहा है. मोदी भी ब्राह्मणवाद का ही एक समर्थक है जो ब्राह्मणों की राजनैतिक पार्टी बीजेपी को जितवा कर देश पर ब्राह्मणवादी सता स्थापित करने में ब्राह्मणों का सहयोग कर रहा है. नरेंद्र मोदी भी कोई दूध का धुला हुआ नहीं है मोदी खुद शुद्र मूलनिवासी होकर देश के मूलनिवासी शूद्रों के खिलाफ ब्राह्मणवादियों के लिए भड़वागिरी कर रहा है. यह दोनों एक नेता और दूसरा मनुवादी ब्राह्मणों का भड़वा; ब्राह्मणों के चाटुकार बन कर दलित समाज के लोगों के साथ धोखा कर रहे है. दोनों ही मूलनिवासियों की भावनाओं से खेल कर ब्राह्मणों का अनुयायी बनाये रखना चाहते है, जोकि मूलनिवासी शूद्रों के खिलाफ एक बहुत बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है. ताकि कोई भी शुद्र देश के शीर्ष पदों तक ना पहुँच सके. आज रामदेव और मोदी दोनों भुलाये बैठे है कि ब्राह्मणवादी कभी किसी शुद्र के तो क्या अपनो के भी नहीं हो सके. स्वामी विवेकानंद ने जब शुद्र समाज के हितों के लिए आवाज उठाई तो उनको ब्राह्मणों ने मार डाला. मोहन दास गाँधी ने जब दलित और मुस्लिमों के हित में आवाज उठाई तो ब्राह्मणवादियों ने गाँधी तक को मार डाला, और बाद में जश्न भी बनाया. ज्यादा जानकारी के लिए हमार लेख “आर एस एस, पटेल और बीजेपी” पढ़े. आज नहीं तो कल मोदी और रामदेव के साथ भी यही सब होगा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी. नरेंद्र मोदी और रामदेव के पास संभलने का भी समय नहीं होगा. अब प्रश्न उठता है क्या मूलनिवासी समाज के लोगों को नरेंद्र मोदी और रामदेव जैसे भड़वों का साथ देना चाहिए? ब्राह्मणवादी कभी भी मूलनिवासियों के हितों के बारे नहीं सोचते. आज तक ब्राह्मणवादियों ने मूलनिवासियों को हर जगह में दबाए रखा है. जब भी कोई शुद्र आगे बढ़ने की कोशिश करता है ब्राह्मणवादी किसी ना किसी तरह उस शुद्र को रोकने का प्रयास करते है या उनको मार डालते है. इतिहास गवाह है ब्राह्मणवादियों ने हर एक उस शुद्र का जीना हरम कर दिया. बाबा साहब अम्बेडकर, ज्योतिबा राव फुले, कांशीराम रविदास आदि ऐसे उदाहरण है जिनको झुठलाया नहीं जा सकता. मूलनिवासियों को ऐसे शुद्र द्रोही बाबाओं और नेताओं का बहिष्कार करना चाहिए जो हर पल हर घडी मूलनिवासियों के खिलाफ षड्यंत्र रचते रहते है. ताकि मूलनिवासियों समाज के लोगों को ब्राह्मणवादियों और ब्राह्मण धर्म और राजनीति का अनुसरण करने से रोका जा सके. आखिर कब तक शुद्र या मूलनिवासी समाज के लोग ऐसे मूलनिवासी शूद्रों के बहकावे में आकर ब्राह्मणवाद के शिकार होते रहेंगे? इसलिए मूलनिवासी समाज के लोगों से शुद्र संघ अपील करता है कि ऐसे दोगले और भड़वे लोगों के बहकावे में ना आये और मूलनिवासियों के हित में सोचे. हमारा यह सन्देश हर मूलनिवासी तक पहुंचाए और मूलनिवासी समाज के हित में हमारे प्रयासों को सार्थक बनाये.

स्त्री विरोधी संघ



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ घोर दलित विरोधी, मज़दूर विरोधी, कम्युनिस्ट विरोधी, तर्कशीलता विरोधी, मुसलमानों और ईसाइयों आदि विरोधी संगठन तो है ही, बल्कि यह संगठन घोर स्त्री विरोधी भी है, जो औरत को मर्द की आज्ञाकारी और बच्चों की देखभाल करने वाली किसी दासी से अधिक कुछ नहीं समझता और हिन्दु उच्च जाति के मर्दवादी अहं को पोषित करता है। इस कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सांगठनिक ढाँचे में इसके पूरे इतिहास के दौरान किसी पद पर तो दूर की बात, बल्कि संगठन में भी कोई स्त्री नहीं रही (दलित भी संघ में कोई पद नहीं हासिल कर सकते)। संघ सैद्धान्तिक तौर पर औरत-मर्द के बीच की ग़ैर-बराबरी, जिसमें कि मर्द का औरत पर प्रभुत्व हो, को मानता है और अपने व्यवहार में भी इसे लागू करता है। इस कारण संघ ने 1936 में औरतों का एक भिन्न संगठन ‘राष्ट्र सेविका समिति’ बनाया था। इसकी स्थापना के समय, जिस स्त्री लक्ष्मीबाई केलकर, ने यह संगठन संघ के आदेश पर स्थापित किया था, उसने एक बार हेडगेवार से सवाल पूछा था कि आरएसएस में ही औरतों और मर्दों को इकट्ठा शामिल क्यों नहीं किया जा सकता? लेकिन हेडगवार इस विचार के सख्त खि़लाफ़ थे और प्राचीन भारतीय संस्कृति और वेदों की दुहाई देकर केलकर को सहमत करवा लिया था।

*कहने को यह ‘राष्ट्र सेविका समिति’ है, लेकिन इसे कण्ट्रोल आरएसएस करता है। आरएसएस के ज़्यादातर मर्द अपनी औरतों को इस समिति में भेजते हैं, ताकि औरतों को “संस्कार” सिखाये जा सकें। संस्कार सिखाये जाने से संघ का मतलब औरतों को पति की जी-हज़ूरी, बच्चे और घर की देखभाल आदि संस्कारों की शिक्षा से है। इसके बिना यह समिति औरतों को कोई भी अधिकार देने के हक़ में नहीं है, क्योंकि संघ को यह स्वीकार नहीं।*

राष्ट्र सेविका समिति के पर्दे के पीछे छुपे हुए संघ के औरत विरोधी विचारों को अक्टूबर 2016 में हुए राष्ट्रीय सेविका समिति के एक ट्रेनिंग कैम्प (ऐसे कैम्पों में भी वही संस्कार सिखाये जाते हैं) के कुछ उदाहरणों से देखा जा सकता है। दिल्ली में हुए इस कैम्प में मुख्य मेहमान के रूप में मोहन भागवत आये थे। उनके एक घण्टे के भाषण में आरएसएस की औरत सम्बन्धी पूरी सोच देखी जा सकती है। *भागवत के भाषण में समाज में स्त्री की बुरी हालत और उसकी समस्याओं, उस पर होते घरेलू दमन, बलात्कार, छेड़-छाड़ आदि से सम्बन्धित या इनके हल सम्बन्धी कोई बात नहीं आयी। वैसे भागवत अगर हल की बात करते भी तो अपनी वही पुरानी बात दोहराते कि ”औरतें लक्ष्मण रेखा पार करेंगी तो बलात्कार तो होगा ही”। उनका कहना था कि जब तक भारत की मातृ-शक्ति (स्त्री शक्ति नहीं कहता, क्योंकि इनके लिए औरत बस माँ और पत्नी आदि रूपों में एक दासी है) सक्रिय होकर आगे नहीं आती तब तक भारत अपनी ताक़त और शुद्ध गौरव द्वारा विश्व के दिशा-निर्देशन का काम नहीं कर सकता। यहाँ आगे आने और सक्रि‍य होने से भागवत का मतलब एक संस्कारी औरत बनकर घर, बाल-बच्चे और पति की देख-रेख के लिए आगे आने के सिवा और कुछ नहीं है।* आगे वह औरतों को आदेश के लहजे में कहते हैं कि औरतों की मुख्य और केन्द्रीय भूमिका बच्चों को संस्कार देना है, जिससे समाज और राष्ट्र को ताक़त मिलेगी और हमारी कुटुम्ब व्यवस्था विश्व का ध्यान खींचेगी। यह था इस ट्रेनिंग का केन्द्रीय अर्थ।

नवम्बर 2016 में समिति की जनरल सेक्रेटरी सीता आनन्दनम ने औरतों की विभिन्न शाखाएँ होने के बारे में कहा था – ”हमारी संस्कृति औरत-मर्द की इकट्ठी शाखाओं की आज्ञा नहीं देती, इस कारण हमारी अलग शाखाएँ हैं।” इस सवाल पर कि हिन्दु औरतों को जायदाद में हिस्सा क्यों नहीं मिलता भले ही देश की प्रत्येक औरत का यह महत्वपूर्ण अधिकार काग़ज़ों में दिया हुआ है, उन्होंने कहा – हमारी रीतियों और औरतों में एक सन्तुलन होना चाहिए जो शास्त्रों के अनुसार हो। इससे परिवार टूट जायेंगे और भाई बहनों के विरुद्ध हो जायेंगे। यही नहीं बल्कि उन्होंने यह तक कह दिया कि ”विवाहित सम्बन्ध में रेप नाम की कोई चीज़ नहीं है। विवाह एक पवित्र रिश्ता है। सहअस्तित्व ज़रूर सुख की ओर ले जायेगा। अगर हम सुख के इस संकल्प को समझने के योग्य हो गये तो हर चीज़ सीधी हो जायेगी।” (इण्डियन एक्सप्रेस, 11 नवम्बर 2016) ऐसा लगता था, जैसे सीता आनन्दनम के मुँह से गोलवलकर बोल रहे हों। असल में राष्ट्र सेविका समिति आज भी गोलवलकर की किताब ‘बंच ऑफ़ थॉट्स’ के उन विचारों पर कायम हैं – ”औरतें पूरी तरह माएँ हैं और उन्हें बच्चों के पीछे-पीछे रहना चाहिए।” यानी संघ औरत को इंसान मानने के लिए तैयार नहीं, जिसकी अपनी भी कुछ इच्छाएँ होती हैं। वे भी अपने पैरों पर खड़े होना चाहती हैं, अपनी इच्छा से हँसना और खेलना चाहती हैं। वे भी सपनों के पँख लगाकर जीवन के आकाश में आज़ादी से उड़ना चाहती हैं। लेकिन संघ उनके पँख काटकर उनको पिंजरे में बन्द कर देना चाहता है।

इन फासिस्टों का असली गुरु हिटलर भी यही कहता था कि जर्मन औरतों का एक ही काम है, जर्मन फौज के लिए श्रेष्ठ सैनिकों की माँएँ बनना।


मज़दूर बिगुल,अगस्त 2017 अंक मे प्रकाशित

जातिगत जनगणना


१)अगर जातिगत जनगणना हो जाती है तो यह पता चल जाएगा की किस जात की कितनी संख्या है ,और उसको उस अनुपात में आरक्षण द्वारा सरकारी नौकरी दे दी जायेगी ,ताकि सभी जातियों की बेरोजगारी दूर की जा सके !!
२)जातिगत जनगणना से यह जानकारी मिल जायेगी की कौन सी जात कितनी पढ़ी लिखी है और कौन से जात में कितने अनपढ़ है ताकि उन जातियों को विशेष रूप से एजुकेशन लेने के लिए प्रेरित किया जाय और उनकी अशिक्षा दूर की जा सके !!
३)जातिगत जनगणना से OBC की सही आबादी मालुम हो जायेगी ताकि बार बार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बैठे ब्राह्मण यह न बोल सके की हमें ओबीसी की सही आबादी नहीं मालुम है इसलिए उनको रिजर्वेशन कितना दिया जाय यह हम नहीं कह सकते
4)जातिगत जनगणना से तह भी पता चल जाएगा की किस जातियों में कितने IAS IPS IRS IFS कितने टीचर कितने लेक्चरर कितने vice चांसलर है और कितने झाड़ू खाते में है कितने टेम्परेरी है कितने परमानेंट जॉब वाले है ताकि सारी असलियत सामने आ जाए की कौन सी जात का कब्ज्जा कहा है और कौन सी जात कहा कहा से गायब है !!

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५)जातिगत जनगणना से सबसे ज्यादा फायदा 52% से जयादा आबादी वाले ओबीसी को होगा क्योकि संख्या मालूम होने पर ही वो उसी अनुपात में भारत के बजट में अपनी भागीदारी माग पायेगा ,मतलब अगर 20 लाख करोड़ का बजट है तो उसके हिस्से में 11 लाख करोड़ रुपये आयेंगे
६)जातिगत जनगणना से यह भी पता चल जाएगा की कौन सी जातियों में महिलाए ज्यादा है और कौन सी जातियों में महिलाए कम है ,किस जात में बूढ़े ज्यादा है किस जात में बच्चे ज्यादा है ताकि उस हिसाब से कन्या भ्रूण ह्त्या ,बच्चो का कुपोषण रोका जा सके
7) जातिगत जनगणना में यह भी पता चल जाएगा की किस जात के पास पक्का मकान है और किस जात के लोग फुटपाथ पर सोकर जीवन बिता रहे है ताकि गरीब और पिछड़ी जातियों को पक्के मकानों का बंदोबस्त किया जा सके
८) जातिगत जनगणना में यह भी पता चल जाएगा की किस जात के पास कितनी खेती है कितनी प्रोपर्टी है और कौन सी जात भुखमरी से मर रही है ताकि उन जातियों की दशा सुधारने के लिए अलग से बजट का प्रावधान किया जा सके
९)जातिगत जनगणना से सभी जातियों को आर्थिक सामाजिक भौगोलिक स्तिथि का सही आकलन हो पायेगा
१०) जातिगत जनगणना भारत में समानता स्थापित कर सभी लोगो को उनकी सभी प्राकृतिक और भौगोलिक संपदाओ में बराबर की भागीदारी सुनिश्चित करेगा !!
SC, ST और OBC क्या आप जानते है – इसी देश मे सन् 1932 के पहले आपको ही (जो भारत देश का मूल निवासी है ) मतदान करने का अधिकार नही था ! दोस्तों मतदान करने का अधिकार सिर्फ देश के नागरीक को होता है ! अर्थात हम इस देश के मूल निवासी होकर भी इस भारत देश के नागरीक नही थे ! सन १९१८ से लेकर १९३२ तक बाबासाहेब के १३ साल के अथक परीश्रम से भारतीय मूलनिवासी एस सी , एस टी , ओबीसी समाज को सामाजिक और राजनितिक प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ , मतदान करने का अधिकार प्राप्त हुआ ! गौरतलब होकी अन्य समुदाय , जैसे की मुस्लिम – सिख- क्रिश्चन इनको १९०६ मे ही मतदान अधिकार , सामाजिक और राजनितिक अधिकार मिला था ! भारत देश मे आये विदेशी आर्य ब्राम्हण- मुस्लिम – क्रिश्चन इनको अधिकार था मतदान करने का , पर वही इसी देश के एस सी-एस टी – ओबीसी (जो भारत देश का मूल निवासी है ) उसे ही मतदान करने का अधिकार नही था ! लगातार १३ साल मनुवादी ताकतो से , ब्रिटिशो से , गाँधी से , काँग्रेस से , लड़ झगड़कर बहुत संघर्ष करके बाबासाहेब जी ने हमे , इस देश के मुल निवासीयो को , अंतत: १९३२ मे ‘भारतीय नागरीकता ‘ का , Indian Citizen का गौरव प्राप्त करके दिया !! अपने ही देश के जल- संसाधन , हवा , जमीन , जंगल पर हमारा अधिकार नही था ! हमे शिक्षा का अधिकार नही था ! एक भारतीय नागरीक होने से हमे यह सब संविधानिक अधिकार मिले है ! मेरे sc st obc nt vjnt bc sbc mbc maratha भाईयो , आज छाती फुला के , सर ऊँचा करके , तुम जो कहते हो ” हम सब भारतीय है , इस देश के निवासी है ” , यह कहने की ताकत , यह अधिकार , सिर्फ और सिर्फ बाबासाहेब और उनके लिखित संविधान की वजह से आपको मिला है । कोटी कोटी प्रणाम महामानव बाबासाहेब जी को ** आधुनिक मनु औलाद गाँधी , पूना पैक्ट समझौते मे हमसे हमारा यह सामाजिक अधिकार भी छीनना चाहता था , जो की बाबासाहेब जी ने होने नही दिया ! ” मूल निवासी sc st obc की Indian Citizenship की पहचान, अधिकार “, बाबासाहेब जी के अनेक उपलब्धियो मे से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है , जिसे अब भुनाना – गिनाना- प्रसार प्रचारीत करना होगा ! जय भीम जय मूलनिवासी मित्रो इस सचाई को देश के मूलनिवासी समाज के प्रत्येक सदस्य तक पहुचना हमारी जिम्मेदारी हे।

How 52% Obc can Kick Brahmins out of India

Who are OBC(other backward caste). Obc are same as Shudra(4th class) created from the feet of Brahman.Yadav,Ahir,verma,etc are OBC they have huge population(52%) in india but they are fooled by Brahmin that they are Hindu. Its time for Obc to destroy Brahmins Cult(Hindu Dharma) so that we can kick all brahminist invaders out of our country. Stop donating single rupee to Brahmin’s temple stop believing Brahmin’s tale. This is a great same that you have been created from the feet of Brahma..Convert to different religion and kick brahmin out of India. Have you ever seen Rss head brahmin Mohan Bhagwat saying against caste-system?No,they are using you to scare Muslim and dalit. But when you OBC will join with Muslim and Dalit,then brahmin will have no Power left because OBC are 52% in india. OBC are shudra.
funny-durga-sexy-hindu-007 funny-dog-sex-india-marriage-hindu3 babaji-nude-hindu-sexy-indian-godlook this Bhardwaj brahmin terrorist threatning indian constitution because he is thinking Hindus are majority.But if 52% shudra OBC stand up together and say that we dont believe in Brahmin’s Brahma and convert to different religion,then this brahmin Bhardwaj will run like a rat.Brahmin only 3% in india but all MP,ops,ias are brahmin.
अगर जो कोई भी “हिन्दू” यानी हरामखोर नही है तो निम्न चार तथ्यों में से एक तथ्य को इंडिया की दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार मान लेगा लेकिन शर्त है कि वो शख्स “हिन्दू” यानी कमीना ना हो:–नोट—-[१] एक कडुवा तथ्य “कानून या संविधान कितना भी अच्छा क्यूँ ना हो यदि उसे लागू करने वाला बेईमान -भ्रष्ट यानी जन्म आधारित मेरिट [योग्यता] जैसे किसी सिद्धांत यानी हिंदुत्व को मानने वाला उन सभी अच्छे से अच्छे कानून एवं संविधान को असफल कर देगा”….[२] संसदीय प्रणाली वाले सभी लोकतांत्रिक देशों में उस लोकतांत्रिक राष्ट्र के शासन-प्रशासन को लोकतांत्रिक तरीके से संचालन हेतु ४ खम्भे यानी {ऐ} विधायिका {बी} कार्यपालिका {सी} न्यायपालिका & {डी} मीडिया जैसे कुल ४ खम्भों की अनिवार्य आवश्यकता है, [१] —पहला तथ्य–>विधायिका= लोकतांत्रिक राष्ट्र के सभी नागरिकों के लिए जनहित को मुख्य बिंदु रखते हुए केवल & केवल “नीति-नियम-कानून बनाने का ही कार्य” के लिए जिम्मेदार है.[२] —दुसरा तथ्य–>कार्यपालिका= कार्यपालिका, विधायिकआ द्वारा बनाये सभी नीतियों, नियमों एवं कानून के प्रावधानों को संविधान के दायरे में एवं संविधान के प्रावधान अनुसार इसका कार्य केवल & केवल उन सभी नीतियों -नियमों व कानूनों का जनहित में इम्प्लीमेंटेशन इन्स्युर करती है.[३]—तीसरा तथ्य–> मीडिया= विधायिका के बनाये नियम-नीति -कानूनों का जनहित के कार्यों की हकीकत द्वारा लोकतांत्रिक राष्ट्र के सभी नागरिकों एक लोकतांत्रिक नागरिक होने का मजबूत एहसास दिलाते हुए केवल & केवल “वैचारिक =बौद्धिक स्तर” पर नागरिकों को अच्छे वोटर के रूप में जागरूक करने के साथ-2 उनके मनोरंजन का साधन भी प्रदान सुनिश्चित किये जाने हेतु उक्त सभी कार्यवाही को अपने-२ मीडिया की ताकत से मुसलमानों के खिलाफ भड़काने-उकसाने का कार्य करती है.
[४]—चौथा तथ्य–> न्यायपालिका= वकील, जजेज एवं पुलिस [जांच एजेंसिया] एक साथ मिलकर केवल & केवल “भ्रष्टाचार एवं अपराध के आरोपी” को भारतीय संविधान के प्रावधानो के तहत “न्याय” पूर्वक जजमेंट /आदेश सुनिश्चित करती है. उपरोक्त का निचोड़ “अपराध एवं भ्रष्टाचार” देश में अबाध गति से बढ़ता ही जा रहा है और बड़ा-२ & बड़ा से बड़ा भ्रष्टाचारी & खूंखार से खूंखार अपराधी पैसे के बदौलत बड़े-२ वकीलों को हायर करते हुए जांच एजेंसियों / पुलिसों को पैसा फेंकते हुए & जजेज को जुगाड़ टेक्नोलॉजी से सेट करते हुए उच्च न्यायपालिका से “क्लीन चिट” का सर्टिफिकेट प्राप्त कर लेती है जैसे की १९९२ का मुंबई मुम्बई ब्लास्ट का “आरोपी/ अपराधी” इस देश के वकील, जज एवं पुलिस को सेट ना कर पाने के कारण न्यायपालिका के द्वारा वो देश का बड़े लम्बे अरसे से “डॉन” डेक्लेअर है, जबकि २००२ का एक गंभीर आरोपी, वकील, जजेज & पुलिस को को मैनेज करके आज देश का प्रधानमंत्री बना घूम रहा है.

गणपती का रहस्य




लोकशाही व्यवस्था में देश का प्रमुख राष्ट्रपति होता है, उसी प्रकार प्राचीन भारत में गण व्यवस्था होती थी और उस गण व्यवस्था का प्रमुख "गणपति" होता था।
"गणपति बाप्पा मोरया" अर्थात  मौर्य राजाओ में गणपती "चन्द्रगुप्त मोरया"
मूलनिवासीयों के राजाओं का कार्यकाल ई.पू.
1~चन्द्रगुप्त मौर्य 323~299 ई.पू.
2~बिन्दुसार 299~274 ई.पू.
3~सम्राट अशोक 274~138 ई.पू.
4~कृंणाल मौर्य। 238~231 ई.पू.
5~दशरथ मौर्य 231~223 ई.पू.
6~सम्प्रति मौर्य 223~215 ई.पू.
7~शाली शुक्त 215~203 ई.पू.
8~देव वर्मा मौर्य 203~196 ई.पू.
9~सत्यधनु मौर्य 196~190 ई.पू.
10~बृहद्रथ मौर्य 190~184 ई.पू.
इस मौर्य शासन से पहले प्राचीन भारत में एक राज घराने में "सिद्धार्थ गौतम" नामक राजकुमार का जन्म हुआ था। वही आगे चल कर "शाक्य गण" का प्रमुख हुआ। कालांतर में सिद्धार्थ ने बुद्धत्व प्राप्त किया। अब सच्चे गणपति और काल्पनिक गणपति के बीच में का फर्क समझ लेते है...कूछ चालाक ब्राहमणों ने सच्चे गणपति को काल्पनिक गणपति बनाया। शाक्य गण का प्रमुख इस नाते से लोग "बुद्ध "को गण का पति अर्थात गणपति कहने लगे थे। उसी प्रकार जब बुद्ध लोगों को धर्म का सन्देश देते थे तब उनके संदेशों में दो शब्दों का मुलभुत रूप से उल्लेख होता था, वे शब्द है, चित्त यानि शरीर (मन) और मल्ल यानि मल (अशुद्धी) तुम्हारे शरीर व मन से मल निकाल देने पर तुम शुद्ध हो जाओगे और दुःख से मुक्त हो जाओगे। ऐसा बुद्ध कहते थे।
इसी संकल्पना को विकृत कर, ब्राह्मणों ने काल्पनिक पार्वती के शरीर से मल निकालकर एक बालक (अर्थात गणपति) के जन्म की कहानी को प्रस्तुत कर दी। गौतम बुद्ध नागवंशी थे। पाली भाषा में "नाग "का अर्थ " हाथी "होता है। अर्थात बुद्ध हाथी वंश के थे।
इसलिए इस नए जन्मे बालक (सिद्धार्थ) को हाथी के स्वरुप में बताया गया है। अर्थात, हाथी बुद्ध के जन्म का प्रतीक है और हाथी बौद्ध धर्म का भी प्रतीक है। इस सत्य को छुपाने के लिए, ब्राहमणों ने काल्पनिक पार्वती के काल्पनिक पुत्र को हाथी की गर्दन लगाई, किसी अन्य प्राणी जैसे शेर, बैल, घोडा, चूहा की गर्दन नहीं लगाईं......!!!
जगत में दुःख है, यह बात दुनिया में सबसे पहले बताने वाला बुद्ध ही था और दुःख को दूर कर सुखी होने के लिए अष्टांगिक मार्ग भी बुद्ध ने ही बताया। अष्टांगिक  मार्ग का अवलम्ब करने से दुःख नष्ट होता है। यह बुद्ध ने सिद्ध कर दिखाया। यह आठ नियम या सिद्धांत विनय से सम्बंधित है। इसलिए, बुद्ध को 'विनायक' कहा गया और आठ मार्गो पर विनयशील होने से अष्टविनायक  भी बुद्ध को ही कहा गया। अर्थात, अष्टांगिक मार्ग से अष्टविनायक होकर दुःख को नष्ट कर सुख की प्राप्ति करवाने वाला बुद्ध था। इसलिए, बुद्ध को लोग 'सुखकर्ता और दुखहर्ता' कहने लगे।
इस सत्य को दबाने के लिए ब्राहमणों ने काल्पनिक गणपति को अष्टविनायक भी कहा और सुखकर्ता दुखहर्ता भी कहा। इसका मतलब यह है की, गणपति दूसरा तीसरा कोई नहीं है, बल्कि, तथागत बुद्ध ही गणपति है। ब्राहमणों ने बुद्ध अस्तित्व को नष्ट करने के लिए काल्पनिक गणपति का निर्माण किया। बौद्ध-ग्रंथों का ब्राह्मणीकरण करते समय ,उन्होंने कई गलतियां की, जिससे ब्राह्मणों की बदमाशी उजागर होती है।
वे गलतियां इस प्रकार है
शिव शंकर जब देवों का देव है, तो उन्हें गणपति का सर धड से अलग करते समय उन्हें, यह पता क्यों नहीं चला कि वह उसका ही पुत्र है? जब गणपति देव था, तो उसे यह कैसे पता नहीं चला की, जिसे वह रोक रहा है वह उसका ही बाप है? शंकर को यह कैसे पता नहीं चला की, बिना उसकी अनुपस्थिति में उसकी बीवी गर्भवती कैसे हो गयी, जब्कि वह नौकरों की सुरक्षा में थी। अगर पार्वती शरीर के मैल से बालक बना सकती है, तो वह उसी मैल से बालक का सिर क्यों नही बना पाई? खैर ये कहें की पार्वती नहा कर आई थी। लेकिन, जीवन मृत्यु का शाप वरदान देने वाले शंकर की शक्ति कहाँ गई थी ? शंकर ने एक निष्पाप हाथी की जान क्यों ली ? सोचे की क्या किसी छोटे से (बालक) की गर्दन में हाथी का सिर फिट कैसे बैठ गया ? अफसोस है कि परशुराम ने गणेश का दांत भी तौड दिया, मगर सभी जौडना भूल गये!
आगे कृतयुग में गणपति का वाहन सिंह था और उसके १० हाथ थे। त्रेतायुग में उसका वाहन मोर था और छ: हाथ थे। द्वापरयुग मेंउसका वाहन मूषक अर्थात चूहा था और चार हाथ थे। अगर अलग अलग युग में वह हाथ और शरीर कम ज्यादा कर सकता था। तो, उसने खुद के सिर का निर्माण क्यों नहीं किया ? प्राणी हत्या से जन्मे गणपति को सुखकर्ता, दुखहर्ता कैसे कहा जा सकता है ? जब्कि विघटन गणेश व शिव के बीच हो गया था।

शिव पुराण के अनुसार पार्वती ने बनाए मैल के गोले पर गंगा का पानी गिराया और गणेश  का जन्म हो गया । गणेश =गण+ईश यानी गण व मालकिन का अंश, गण के ईश्वर से गणपति कर दिया
ब्रम्हवैवर्त पुराण ने तो हद ही कर दिया है
पार्वती वह मैल का गोला ब्रह्मदेव के पास ले जाती है और उसे जिन्दा करने के लिए विनती करती है, तब उस पर ब्रह्मदेव अपने वीर्य का छिडकाव करता है और उस गोले का सर्वप्रथम  "मलेश" नाम का  गणपति बनता है।
फिर मल+ईश= मल,गन्दगी के ईश्वर कहलाता है।

अब प्रश्न यह है कि, गणपती शंकर का पुत्र था या ब्रह्मदेव का...? या दोनों का? गणपति विवाहित है, ऋद्धी और सिद्धी दो पत्नियाँ  थीं। यह ब्रह्मदेव की दोनों लड़कियां उसकी दो पत्नियाँ है। अर्थात, ब्रह्मदेव के वीर्य से जन्म लेने पर गणपती ने अपनी ही बहनों के साथ शादी क्यों की .?

सौगन्धि का परिणय इस संगीत सूत्र के तीसरे अध्याय में गणपति का उल्लेख कामवासना(sex) के असुरों में से छठवां असुर जैसा उल्लेख किया है। चन्द्रगुप्त मोर्य के मोर्य वंश का गणपति हुआ था। इसलिए ब्राहमणों ने *"गणपति बाप्पा मोरया"*  की घोषणाएँ कर दी ......
मोरया शब्द के बारे में ब्राह्मणों के इतिहास में कोई उत्तर नहीं है...
कर्नाटक में चन्द्रगुप्त मोर्य ने जैन धर्म का प्रचार किया था। इसलिए उस क्षेत्र में कई लोग खुद के नाम के साथ  मोरया नाम लगाते हैं । महाराष्ट्र में मोरे सरनेम भी मोर्य वंश का ही अपभ्रंश है।
संत तुकाराम  मोरे थे.. इस सत्य को छुपाने के लिए ब्राह्मणों ने यह अफवाह फैलाई की १४ वीं सदी में, एक मोरया नामक गोसवि हुआ और उसके नाम पर से मोरया शब्द गणपती से जुड़ गया! ब्राह्मण लोग भी झूठ पर झूठ की सीमा लांघ देते हैं!!
संत तुकाराम महाराज , शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज की हत्या करने के बाद ब्राह्मणों ने शिवशाही को पेशवाई में बदल डाला और बौद्ध गुफाओं और विहारो की जगह पर कब्जा क़र, वहां पर काल्पनिक देवी देवता को बिठाना शुरू किया ।
कार्ला की बुद्ध गुफा में बुद्ध माता महामाया को ब्राह्मणी *"एकविरा देवी"* का स्वरुप दिया,
जुन्नर के लेन्याद्रि बुद्ध गुफा में गणेश को बिठाकर उसे काल्पनिक अष्टविनायक गणपती का प्रमुख स्थल बता दिया, शेलारवाडी, पुणे की लेणी में शिवलिंग बिठाकर, कब्जा कर लिया ..आदि
इसके प्रमाण हैं.. सत्य इतिहास यह है कि, संपूर्ण प्राचीन भारत बौद्धमय था। अशोक सम्राट ने बुद्ध के बाद सारे भारत को बौद्धमय बनाया था। लेकिन ब्राम्हण समाज ने अशोक के वंश को ख़त्म कर बौद्ध धर्म में मनुवादी ब्राह्मणों ने मनगढ़ंत विचार और इतिहास की मिलावट की और 33 कोटि देवताओं को अवतरित कर दिया और एक दूसरे का अवतार घोषित कर दिया।
भारत महाद्वीप  में वास्तव में शाक्य गण के गणपति हुए हैं और, उसी गणपति शब्द का ब्राह्मणों ने ब्राह्मणीकरण करके, समाज में झूठे गणेश में  गणपती को जन्म दे दिया हैं।  इस झूठे काल्पनिक गणेश उर्फ गणपती के नाम पर सम्पूर्ण समाज को अन्धश्रद्धा में डूबो दिया और त्यौहार उत्सव के नाम पर ब्राह्मणों ने समाज से धन दौलत लूटना व अवतरित देवी देवताओं के मन्दिरों के नाम पर जगह-जगह भूमि पर कब्जे करना शुरु कर दिया। शिवाजी महाराज महाराष्ट्र के कूर्मि अर्थात मराठा (शुद्र) मूलनिवासी राजा थे । शिवाजी महाराज की हत्या ब्राह्मणों ने ज़हर दे कर  की। जिसका बदला संभाजी महाराज ने अनेक ब्राह्मणों को हाथी के पैर के नीचे कूचलवा कर, मरवा  दिया था। इससे आहत होकर ब्राह्मणों ने छल-कपट  से संभाजी महाराज को औरंगज़ेब के हाथों में पकड़वा दिया और पूना शहर के चौराहे पर  मनुस्मृति के मुताबिक जीभ-सर कटवा कर उन्हें मार डाला। उस दिन ब्राह्मणों ने उनके पेशवा राज्य में, उत्सव के रूप में शक्कर बाटकर, उस दिन को गुढीपाडवा त्यौहार का नाम दिया ।
इस तरह ब्राह्मणों ने शिवाजी और संभाजी महाराज दोनों का क़त्ल किया और मराठा वंश को खत्म कर स्वयं पेशवा ब्राह्मण शासन करने लगे। शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद महात्मा ज्योतिराव फुले ने रायगढ़ में उनकी समाधि ढूंढ़ निकाली थी और जून 1869 में शिवाजी महाराज के शान में "पेवाडा " लिखा। महात्मा ज्योतिराव फूले ने 1874 में महाराष्ट्र के बहुजनो के लिए पहली बार शिवाजी जयंती (शिव जयंती) मनाई। बहुजनों को जागृत करने के लिए फुले जी ने "शिवजयंती उत्सव" को, हर साल दस दिन तक मनाना चालू किया। महाराष्ट्र में महात्मा ज्योतिराव फूले द्वारा बहुजन शुद्रो~अतिशुद्रों में "शिव जयंती "के प्रभाव और जागृति के कारण ब्राह्मण डरने लगे। इसलिए, रत्नागिरी (महाराष्ट्र) के बाल गंगाधर तिलक नामक कट्टर ब्राह्मण ने "शिव जयंती" से बहुजनों में बढ़ती जागृति और प्रभाव को ख़त्म करने के लिए, विरोध स्वरूप गंगाधर-तिलक ने सन् 1893-94 में गणपति महोत्सव का सार्वजानिक आयोजन किया । क्या 1893~94 से पहले महाराष्ट्र में गणोंत्सव मनाया जाता था.? उत्तर -बिलकुल नहीं!
इसका कोई भी प्रमाण इतिहास में  उपलब्ध नहीं है 
ब्राह्मणों के मुताबिक भगवान् शंकर का ठिकाना हिमालय मे उत्तर भारत के आसपास है, तो उन्होंने *गणेश (शंकर पुत्र)* को महाराष्ट्र में ज्यादा प्रचलित क्यों कारवाया....
उत्तर भारत में क्यों नहीं ? इसका मुख्य कारण यह है कि, शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज की हत्या ब्राह्मणों ने की थी। इस बात का ब्राह्मणों को डर था की, अगर इस तथ्य का पता मूलनिवासियो को चलेंगा तो ब्राह्मणों का अंत निश्चित् है । इसलिए, ब्राह्मणों ने महाराष्ट्र में महात्मा ज्योतिबा फूले के शिव जयंती उत्सव से जागृत हो रहेे मूलनिवासी शुद्रो को शिवाजी व संभाजी महाराज की हत्या ब्राह्मणों द्वारा हुई है, यह पता ना चले, इसके लिए, उनका ध्यान डाइवर्ट करने के हेतु उन्होंने "शिव जयंती" महोत्सव के विरोध में गणपति महोत्सव को महाराष्ट्रा में सार्वजनिक कर दिया । इसी तरह भारत के विभिन्न धर्मों, ग्रंथों व देवी देवताओं  का, मनुवादी ब्राह्मणों ने मनघडंत  ब्राह्मणीकरण कर दिया। भारत के अन्य धर्मों,  समुदायों के देवता, महात्माओं को विष्णु व शिव का अवतार और संत, ऋषि मुनियों को ब्राह्मण की औलाद बताकर प्रचार-प्रसार किया। जिस किसी व्यक्ति ने इनके ब्राह्मणीकरण का विरोध किया उन्हें संत तुकाराम, स्वामी दयानंद, कुलबर्गी, रैदास आदि की तरह मरवा दिया गया। हर मूलनिवासियों के त्यौहारों में  मनघडंत कथाएँ बनाकर, मनुवादी ब्राह्मणों ने काल्पनिक व अवतारवादी देवी देवता व त्यौहार घूसेड दिये।  सामाजिक रुप से अमर्यादित,घृणित व अपमानित रिश्ते-नाते,  लोग व कुकृत्यों को ,मनुवादियों ने देवी देवता के नाम पर महिमा-मंडन कर पूजनीय बना दिया


जब शिव पार्वती के पुत्र गणेश का सर कटा  तो वह मर गया ठीक उसी प्रकार जब हथनी के बच्चे का सर काटा तो वह भी मर गया |जब दोनो मर गये तो हाथी का सर जोड़ने पर जिंदा कैसे हो गये जबकी प्राण किसी मे नही है ? वह प्राण किसका था ? वह प्राण किसके पास था ?? वह प्राण कहाँ और कैसे रखा था ? जब दो  मरे हुए को जोड़कर जिंदा किया जा सकता है तो गणेश के वास्तविक रूप को ही क्यो नही जोड़ा गया ?  बिल्कुल सीधा व सधारण सा प्रश्न है  , जिसका जवाब न किसी ने दिया और न ही दिया जाना सम्भव है | अगर ये सवाल पढ़कर आप लोगो बुरा लगा तो हाथ जोड़कर माफी माँगता हूँ , परन्तु आप एक बार ईष्या , द्वेश, जलन, को छोड़कर ईमानदारी से विचार करना और अपनी अन्तरात्मा से जवाब माँगना !! सच्चाई की झलक जरूर दिखाई देगी जबकी पुराण तो गप्प और झूठ के आधार पर लिखा गया है | इसलिए तो कहता हूँ पुराण मे विज्ञान , ना बाबा ना! पुराण मे तो केवल मानने वाली बात है वैज्ञानिक नही। कुछ अन्य विचारनीय प्रश्न :
१. हाथी का रूधिर वर्ग ( ब्लड ग्रुप ) मानव से कैसे संयोग कर सकता है ??
२. हाथी की माँसपेशियो के साथ मनुष्य का संयोग कैसे हो सकता है ??
३. किस विज्ञान से हाथी के मस्तक के साथ मनुष्य के धड़ का संयोग सम्भव है ??
४. हाथी के चर्म की मोटाई ज्यादा और मनुष्य का सधारण फिर संयोग कैसा ??
ये शायद पाखंडी हिन्दू धर्म के ठेकेदारों और पंडित का विज्ञान हो सकता है  केवल पाखंडी पंडित के विज्ञान मे ही कुछ भी सम्भव है | क्योकी वहाँ मानने वाली बात है और अगर आप इसपर सवाल कर दे तो आपको मुस्लमान की उपाधी मिलती है जैसे कुरान पर सवाल करने वालो पर मुस्लमान गुमराह या काफिर की उपाधी देते है | इन सवालो को कम से कम दस हिन्दू धर्म के ठेकेदारों और पंडितो से पूछा पर जवाब किसी के पास नही | सभी का एक ही जवाब था यह सब श्रद्धा की बाते है | हमारे पूर्वजो ने माना है और पूजा है |
(गनेश) वह किसी शिव पार्वती का बेटा नही , उसके हाथ पैर नही , उसका पसंदीदा भोजन लड्डू नही, चूहे की सवारी नही | ए सब अंधविश्वास पाखंड आडंबर हैं और मनगढ कहानी है
मैल से बालक पैदा हुआ , फिर गर्दन कटी , फिर हाथी की नई खोपड़ी जुड़ी . . .फिर उस गणेश ने खूब शरारत की .खेला कूदा , चूहे की सवारी भी की ..और कुछ सालों बाद जवान भी हुआ . . . .फिर धूमधाम से उसकी शादी भी हुई उसके बाद उसके बाद फिर उसके बाद! अरे फिर उसके बाद क्या हुआ ? अरे जब बच्चा बड़ा हुआफिर जवान हुआ तो बूढा भी हुआ ही होगा उसके बच्चे उसके नाती पोते भी हुए ही होंगे अरे तो फिर गणेश का क्या हुआ? और ये जितने भी भारतीये भगवान  हैं उनका क्या हुआ आज कल कर क्या रहे हैं वे सब? सीधी सी बात . लेखक ने जहां तक कथा कहानी लिखी . . .वहीं तक हमें पढने को मिली .लिखाई बंद कहानी अंत काल्पनिक कहानियों का कैसा परिवार कैसी पूरी कहानियां . . . .एक बच्चा पैदा हुआ ..उसे हवन पूजन करवा कर Shaktiman बनाया गया वो शैतानों को मारता था,,कपाला जैकाल किल्विश को मारता था,, जनता को खतरे से बचाता था फिर उसकी शादी गीता विश्वास से हो गई .अरे फिर उसके बाद क्या हुआ?
shaktiman बूढा हुआ कि नहीं?
उसके बच्चे पोते नाती हुए कि नहीं ?
अरे मूर्खों . Director ने कहानी यहीं पर बंदकर दी . .script खत्म कहानी भी खत्म . . . .
Shaktiman कोई वास्तविक पात्र थोड़ी था जो उसकी आगे की कहानी लिखी जाती . . . . ....
यही हाल भारत के शिव गणेश पार्वती विश्नू ब्राह्म्मा नामक काल्पनिक पात्रों का भी है . . ..
इसमे मेरे मंन मे कुछ सवाल है।
1 इतना मैंल पार्वती पर कहा से आया।
2 गनेश की मृत्यु कब ओर कहा हुई
3 इसको पानी मे ही क्यों डुबाया जाता है ओर जब भी डूबता है तो 10_20 को क्यों लेकर डूबता है ये। क्या ऐसा भी कोई भगवान होता है जो भक्तो को मरवाता है।
4 ये कोनसी जगाहा रहता था।
5 इसने चुहे पे कितने देश की सवारी की या भारत देश मे ही कहा कहा घूम लीया।
6 इसको हाथी का मुह कैसे लगा उस हाथी का blood group क्या था
7 इसको भारत के बाहर कोई भी क्यों नही जानता।
कोईभी सवाल का जवाब दे सकता है।
अगर नही दे सकता तो तो इसको भी गप्प समज के जल प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण को बचाये तथा अपना कीमती वक्त बचाकर पढ़ाई या अपना काम करे
शौजन्य अंधविस्वास की कैद रिटर्न


*भारत दुनियां का एकमात्र ऐसा देश हैं जहाँ.....*


*कन्या दान होती हैं*

*मृत लोगो को भोजन खिलाया जाता हैं*

*जानवर को माँ कहाँ जाता हैं और उसी माँ का दूध बेचा जाता हैं और यदि ये माँ दूध न देवे तो इस माँ को ही बेच देते हैं इसके लाल*
*जानवर का पेशाब पिया जाता हैं*
*प्यासे को पानी पिलाने से पहले उसकी जाति पूछी जाती हैं*
*जानवरो के रूप में भगवान अवतार लेते रहे हैं*
*महामानवों को राक्षस की उपाधि दी जाती हैं*
*जिसकी पूजा करते हैं उसके दर्शन होने पर कत्ल करते हैं*
*माँ बाप के लिए वृद्ध आश्रम खोले जाते हैं और जानवरों को माँ बाप बनाकर पुज्वाया जाता हैं*
*ज्यादातर भगवान माँ के पेट से जन्म न लेकर जानवरो से पैदा हुए*
*यहाँ 33 करोड़ देवी देवता विराजमान हैं*
*लड़के को शादी के नाम पर बेचा जाता हैं लड़की पक्ष भुगतान करता हैं*
*अनपढ़ लोगो से ज्ञान लिया जाता हैं।।*
*इत्यादि ।*
*भारत ही ऐसा देश है जहाँ*
*मुसलमानों को हमेशा अपनी देशभक्ति का सबूत देना पड़ता है,*
*शूद्र को अपनी क़ाबलियत का,*
*और औरतो को अपने चरित्र का*


*- डॉ बी आर आम्बेडकर*


 *तीज*

कल मेरी पत्नी एवं उनकी सहेली तीज पर *हरितालिका तीज* व्रत कथा कह रही थी, मैं बगल में कम्प्यूटर पर काम करते हुये  सुन रहा था।
        पार्वती जी शिव जी से पूछती है कि आप जैसे वर हमें कई जन्म तक कैसे मिल सकता है तो शिव जी कहते हैं, तुम्हारी शादी तो विष्णु से तय हो चुकि थी, पर तुम अपने दोस्त के साथ यही व्रत आज के ही दिन की थी इसीलिए मैं तुम्हारा पति बन पाया।
         अब सभी औरतों के लिये इंस्पिरेशन, शिव जी एवं पार्वती के माध्यम से ब्राह्मणिक लूट एवं डर सुनिए।
     आज के दिन तीज करने से महिलाएं अखण्ड स्वभाग्यवती, कई जन्मों तक शिव जैसे वर एवं स्वर्ग प्राप्त करेगी।
           नहीं करने नरकगामी, पानी पीने पर मच्छली, फल खाने पर बन्दर, सो जाने पर अजगर, पति से झुठ बोलने पर मुर्गा, अनाज खाने पर सुअर, मांस खाने पर पिशाचिन, मक्खी इत्यादि का डर पैदा किया गया है।
           इसके बाद अब ब्राह्मणों को बांस के दौरी या पीतल बर्तन में भर कर अन्न, वस्त्र इत्यादि दान करें। न करने पर नरक गामी।
          यानि पूरा खेल *पुनर्जन्म* वो भी किसी भी जीव में, *स्वर्ग -नरक* एवं हर जन्म में वही *शिव जी जैसे रोमियो, राँझा, मजनू, महिवाल, फरहात पति* मिलने के आकांक्षा में होता है।
          हमें जानना चाहिये आज अन्न एवं पीतल का महत्व भले ही घट गया है, पर 40 साल पहले साधारण परिवार में दोनो शाम भोजन एवं पीतल का बर्तन पाना कठिन होता था, क्योंकि मिट्टी बर्तन में ही खाना बनता था। उटेंसिल के लिये बर्तन भी अंग्रेजों के बाद ही शुरू हुई थी।
          अब समझ आ गयी होगी कोई 18वीं सदी में पीतल उटेंसिल के बाद हीं ब्राह्मणों द्वारा किताब लिखी गयी। जिसमें भोजन एवं वस्त्र जो आम जन के लिये काफी कठिन थी, पर ब्राह्मणों को देना अनिवार्य बना दी गयी। नहीँ तो नरक एवं सुअर में अगला जन्म कन्फर्म।
            अब आज की बात:
        सुबह इन पतिव्रताओं की सहेली इंतजार में थी कि पंडित जी कब आयेंगे मिष्टान, कपड़े एवं पीतल वर्तन में अन्न लेने के लिये। मैंने मना किया ऐसा करने को। पर, कई औरतें खुद जाकर मन्दिर में दान कर चुकि थी।
       जब रास्ते से गुजर रहा था तो गोला रोड, पटना के शिव मंदिर पर नजर पड़ी, वहाँ मन्दिर का चबूतरा फल, पिरकिया, अनरसा, चावल, दाल, धोती कुर्ता से लदा था। आगे बढ़ने पर ऐसा हीं दृश्य कई मंदिरों में दिखी। वहाँ एक एक ब्राह्मण पुजारी के पास कई बोड़ें समान थे जो ढोने के लिये टेम्पू खोज रहे थे। ब्राह्मण बोल रहे थे अच्छा हुआ घर घर जाना नहीं पड़ता अब तो यहाँ ही महिलाएं सब समान पहुंचा देती हैं।
        यही धर्म का बिजिनेस है। यहाँ पढ़ कर भी लोग बाढ़ ग्रस्त को नहीं, नक्कारा ब्राह्मण को पेट भरने के लिये मन्दिरों में समान पहुचाने के लिये मारामारी हो रही है।
   यही है ब्राह्मणों द्वारा अपने बच्चों के लिये धर्म का जन्म जन्मांतर तक का व्यापार जो पुनर्जन्म का डर के द्वारा सुनिश्चित की गई है।