सोमवार, 25 सितंबर 2017

नाकाम हुई थी जापानी बुलेट ट्रेन?

ताइवान में क्यों नाकाम हुई थी जापानी बुलेट ट्रेन?
18 सितंबर 2017भारत में पिछले हफ़्ते बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया गया. इस बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की प्रासंगिकता को लेकर भारत में काफ़ी बहस हो रही है. क्या भारत में बुलेट ट्रेन कामयाब रहेगी? इससे पहले ताइवान में जापानी बुलेट ट्रेन नाकाम रही थी. जब भारत ने जापान से इस समझौते पर आख़िरी मुहर लगाई तो क्या ताइवान की नाकामी उसके जेहन में रही होगी? ताइवान ने 90 के दशक में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया था. पहली बार पांच जनवरी 2007 को यहां बुलेट ट्रेन दौड़ी. हालांकि सात साल बाद ही इस प्रोजेक्ट को ज़मीन पर उतारने वाली कंपनी दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गई. ताइवान में बुलेट ट्रेन की नाकामी को लेकर निक्केई एशियन रिव्यू ने पांच नवंबर 2015 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. एशियाई देशों में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के कॉन्ट्रैक्ट को हासिल करने के लिए चीन और जापान में होड़ जैसी स्थिति रहती है. भारत में भी जब बुलेट ट्रेन की बात चली तो जापान के साथ चीन ने भी दिलचस्पी दिखाई थी. निक्केई ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''ताइवान ने जापानी बुलेट ट्रेन सिस्टम के आधार हाई स्पीड रेल को शुरू किया था. दुख की बात यह है कि इसे भारी नुक़सान उठाना पड़ा. ताइवानी हाई स्पीड रेल ऑपरेटर ने हाल ही में वहां की सरकार से बेलआउट पैकेज लेने का फ़ैसला किया है ताकि इस इसे संकट की निकाला जा सके.''
जब 2007 में ताइवान में बुलेट ट्रेन शुरू हुई तो उत्तर में द्विपीय शहर ताइपेई को दक्षिणी शहर काओसिउंग को जोड़ा गया था. यह डेढ़ घंटे से भी कम की यात्रा थी. ताइवान में बुलेट ट्रेन को लाने में सात जापानी कंपनियों के समूह ने मदद की थी. इसमें ट्रेडिंग हाउस मित्सुई ऐंड को., मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज दोनों ने साथ मिलकर काम किया था. ताइवान में जब यह रेल आई तो इसे लेकर वहां काफ़ी गर्व था लेकिन कुछ ही सालों में यह वित्तीय संकट में फंस गई. ताइवान में बुलेट ट्रेन को उतारने में 14.6 अरब डॉलर की लागत लगी थी. पर्यवेक्षकों का मानना है कि कंपनी शुरू से ही नुक़सान में रही. दूसरी तरफ़ निक्केई एशियन रिव्यू से जापानी कंपनी के एक प्रतिनिधि ने कहा कि इस परियोजना से जल्द फ़ायदा आसान नहीं था. आख़िर ताइवान में बुलेट ट्रेन नाकाम होने की वजह क्या रही? इस बुलेट ट्रेन से सफ़र करने वाले पैसेंजरों की संख्या काफ़ी कम रही. कंपनी की बैलेंस शीट पर सबसे ज़्यादा असर इसी से पड़ा. कंस्लटेंसी सर्वे के नतीजों और दूसरे आंकड़ों के मुताबिक कंपनी को 2008 में एक दिन में दो लाख 40 हज़ार पैसेंजर की उम्मीद थी. 2014 में हर दिन एक लाख तीस हज़ार पैसेंजर ही आए जो को अनुमान से काफ़ी कम है. कंपनी को बुलेट ट्रेन में लागत के बदले भारी ब्याज चुकाना पड़ा जिसे मुनाफ़े से संतुलित नहीं किया जा सका.

भारत के बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में जापान क़रीब 80 फ़ीसदी मदद कर रहा है. इस रकम पर भारत को 0.1 फ़ीसदी का ब्याज देना है. हालांकि भारत और ताइवान के प्रोजेक्ट की तुलना नहीं की जा सकती. अहमदाबाद और मुंबई का रूट इंडस्ट्री से भरा और व्यावसायिक इलाक़ा है. जापान को ब्याज 15 साल बाद चुकाना है और दर काफ़ी कम भी है.

बुधवार, 13 सितंबर 2017

बाबासाहब की नजर में बुद्ध

 बुद्ध की मूर्ति को लेकर डा.अम्बेडकर और भन्ते आनंद कौशल्यायन जी के बीच हुए वार्तालाप का एक महत्वपूर्ण वाकिया भन्ते आनंद कौसल्यायन जीने अपनी किताब में दिया है। वह वाकिया ऐसा है कि, एक बार भन्ते आनंद कौशल्यायन जी बाबासाहब डा.अम्बेडकर को दादर (मुंबई) में एक कार्यक्रम में लेकर गये। दोनों के बीच धर्म के विषय पर चर्चा चल रही थी कि तभी बाबासाहब ने
भन्ते आनंद कौशल्यायन जी से एक सवाल किया कि, ‘भन्ते! आपको बुद्ध की कौन-सी मूर्ति पसंद है?’

    तब भन्ते आनंद कौशल्यायन जी ने बड़े ही श्रद्धाभाव से जवाब दिया कि ‘ध्यान साधना में लीन बुद्ध की मूर्ति मुझे अधिक पसंद है।’ तब डा.अम्बेडकर ने भन्ते जी से अपने दिल की बात बताते हुए कहा कि, ‘भन्ते! मुझे ध्यान साधना में लीन बुद्ध की मूर्ति बिल्कुल पसंद नहीं है। मैं उस बुद्ध की मूर्ति को अधिक पसंद करता हूँ जो हाथ में भिक्षापात्र लेकर चारिका कर रहे हैं’ और इसके पीछे के कारण को स्पष्ट करते हुए डा.अम्बेडकर ने भन्ते जी को तथागत बुद्ध का वह महत्वपूर्ण संदेश याद दिलाया जिसमें बुद्ध अपने पहले प्रवचन में पंचवग्गीय भिक्खुओं से कहते हैं कि ‘चरथं भिक्खव्वे चारिकं, बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय। लोकानु कंपाय, अत्तानु हिताय, आदि कल्याण, मध्य कल्याण, अंत कल्याण’ अर्थात, जो बहुजनों  के कल्याण के लिए, बहुजनों के सुख के लिए तथा बहुजनों का प्रारंभ कल्याणकारी हो, मध्ये कल्याणकारी हो और अंत भी कल्याणकारी हो इसके लिए प्रतिदिन चारिका करता है, प्रतिदिन मार्गदर्शन करता है, ऐसा प्रतिदिन भ्रमण करनेवाला प्रचारक बुद्ध मुझे अधिक पसंद है। 
    इस उदाहरण से हमें यह ध्यान में आएगा कि बाबासाहब डा.अम्बेडकर कोई भी बात श्रद्धावान उपासक बनकर स्वीकार नहीं करते थे, बल्कि उसकी छानबीन  कर योजनाबद्ध तरिके से अपनाते थे। जो विचार स्वीकार करने योग्य है, जो विचार कालसंगत है वह विचार बाबासाहब ने स्वीकार किया। साथ ही जो कालबाह्य विचार है उसे कदापि स्वीकार नहीं किया। हमेशा उस विचार पर असहमति जतायी। बाबासाहब डा.अम्बेडकर ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि तथागत बुद्ध को भी यही सिद्धांत मान्य था। 
    बाबासाहब डा.अम्बेडकर लिखते हैं, “बुद्ध के संबंध में लिखनेवालो में से अधिकांश लोगों ने न केवल इसी कल्पना का प्रचार किया है कि बुद्ध ने सिर्फ एक ही शिक्षा दी है और वह है अहिंसा की शिक्षा। यह बहुत बड़ी गलती है। यह सच है कि बुद्ध ने अहिंसा की शिक्षा दी है। मैं उसके महत्व को कम नहीं करना चाहता हूँ। क्योंकि वह एक महान सिद्धान्त है। उस पर अमल किए बगैर संसार को बचाया नहीं जा सकता। मैं जिस बात पर बल देना चाहता हूँ वह यह कि अहिंसा के अतिरिक्त बुद्ध ने और बहुत-सी बातों की शिक्षा दी है। अपने धर्म के अंग के तौर पर उन्होंने सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक, राजनैतिक स्वतंत्रता की शिक्षा दी है। उन्होंने समानता की शिक्षा दी। न केवल पुरुष के बीच समानता की बल्कि पुरुष और स्त्री के बीच समानता की भी शिक्षा दी। बुद्ध की तुलना में अन्य कोई ऐसे धर्म संस्थापक को खोजना कठिन होगा कि जिसकी शिक्षा लोगों के सामाजिक जीवन के इतने सारे पहलुओं को स्पर्श करती हो और जिसके सिद्धान्त इतने आधुनिक हो और जिसका मुख्य उद्देश्य इंसान को इसी धरती पर इसी जीवन में विमुक्ति दिलाना हो, न कि मृत्यु के बाद स्वर्ग का वादा करना।”
    तर्कसंगत और अनुभव पर आधारित धम्म के संबंध में डा.अम्बेडकर लिखते हैं, “महानिर्वाणसुत्त” मेें आनंद को संबोधित कर तथागत बुद्ध ने बताया कि, उनका धर्म तर्कसंगत और अनुभव पर आधारित है और उनके अनुयायियों को चाहिए कि वे इस शिक्षा को केवल इस कारण सही और स्वीकारणीय माने कि वह उन (बुद्ध) से प्राप्त हुई है। यह शिक्षा तर्कसंगत और अनुभव पर आधारित होने से यदि किसी समय और किसी विशेष स्थिति में वह लागू नहीं होती हो, तो वे (अनुयायी) चाहे तो उसमें सुधार कर सकते हैं, या गैर लागू शिक्षा को त्याग भी सकते हैं। बुद्ध चाहते थे कि उनके धम्म पर भूतकाल के मूर्दा बोझ न लादे जाए। वे चाहते थे कि उनका धम्म सदाबहार रहे और सभी समय काम आये। यही कारण था कि जरुरत पड़ने पर अपने अनुयायियों को उन्होंने अपनी शिक्षा में समयानुकूल काट-छाँट करने की स्वतंत्रता दे रखी है। ऐसा करने का साहस अन्य किसी भी धर्म-संस्थापक ने नहीं दिखाया। वे ऐसी स्वतंत्रता देने से ड़रते थे। क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि अनुयायियों को अपनी शिक्षा में सुधार करने की स्वतंत्रता देने से कहीं वे उसका इस्तेमाल अपने बने-बनाये ढ़ाँचे को गिराने में न करे। बुद्ध को ऐसा ड़र नहीं था। उन्हें अपनी शिक्षा की नींव पर पूरा भरोसा था। वे भलि-भाँति जानते थे कि सबसे भयंकर मूर्तिभंजक भरी उनके धम्म के आंतरिक हिस्से को नष्ट नहीं कर पाएगा।”
    चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था के संबंध में विश्‍लेषण करते हुए बाबासाहब डा.अम्बेडकर लिखते हैं, “हिन्दू धर्म का अधिकृत दर्शन असमानता पर आधारित है, क्योंकि हिन्दू धर्म का चातुर्वर्ण्य का सिद्धान्त इस असमानता का ठोस रुप है। इसके विपरीत बुद्ध समानता के समर्थक थे। वे चातुर्वर्ण्य के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने न केवल उसके विरुद्ध प्रचार किया और न ही केवल उसके खिलाफ संघर्ष छेड़ा, बल्कि उसे जड़ से उखाड़ फेंकने की हमेशा कोशिश की। हिन्दू धर्म की शिक्षा के अनुसार न केवल शूद्र को, परंतू नारी को भी धर्मोपदेशक बनन का अधिकार नहीं था। न वे सन्यास ले सकते थे और न उन्हें ईश्‍वर बनने का कोई अधिकार था। न वे सन्यास ले सकते थे और न ईश्‍वर तक पहुँच सकते थे। बुद्ध ने दूसरी ओर शूद्रों को भी भिक्खु संघ में शामिल किया। उन्होंने नारी को भिक्खुनी बनने की अनुज्ञा दी। उन्होंने ऐसा क्यों किया? लगता है कि बुद्ध के द्वारा उठाये गये इन कदमों का वास्तविक महत्व बहुत कम लोग समझ पाये हैं। इसका उत्तर यही है कि असमानता की शिक्षा को नष्ट करने के लिए बुद्ध बिल्कुल ठोस कदम उठाना चाहते थे। बुद्ध द्वारा किये गये इन आघातों के कारण ही हिन्दू धर्म को अपने सिद्धान्तों में काफी परिवर्तन करने पड़े। हिन्दू धर्म ने हिंसा का त्याग किया। वह वेदों के अपौरुषेय होने का दावा भी छोड़ देने पर राजी था। चातुर्वर्ण्य के मामले में दोने में से कोई भी झुकने के लिए तैयार नहीं था। बुद्ध चातुर्वर्ण्य की शिक्षा के खिलाफ अपना दावा छोडने के लिए तैयार नहीं थे। यही कारण है कि ब्राह्मण जैन धर्म की अपेक्षा बुद्ध धम्म के विरुद्ध अधिक घृणा और शत्रुता जताता है। हिन्दू धर्म को चातुर्वर्ण्य के खिलाफ किए गये बुद्ध के तर्कों का लोहा मानना ही पड़ा। वह, चातुर्वर्ण्य ने बुद्ध धम्म की दलीलों की शक्ति के सामने झुककर नहीं माना, बल्कि चातुर्वर्ण्य के लिए एक नया दार्शनिक तर्क ढ़ूँढकर माना। यह नया दार्शनिक तर्क ‘भगवद गीता’ में मिलता है। कोई भी व्यक्ति भरोसे के साथ यह नहीं कह सकता कि भगवद् गीता की शिक्षा क्या है? लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि ‘भगवद् गीता’ चातुर्वर्ण्य के सिद्धान्त का समर्थन करती है। वास्तविकता को मद्देनजर रखते हुए ऐसा लगता है कि इसके लिखे जाने का यही प्रमुख कारण होगा और भगवद् गीता इसका समर्थन कैसे करती है? ‘भगवद् गीता’ में कृष्ण ने कहा है कि ईश्‍वर के होने के नाते उसने चातुर्वर्ण्य का निर्माण गुण-कर्म के अनुसार किया है। इसका अर्थ यह है कि यह सिद्धान्त नया है। पुराना सिद्धान्त विभिन्न था। पुराने सिद्धान्त के अनुसार चातुर्वर्ण्य का सिद्धान्त वेदों पर आधारित था। चूँकि वेद अपौरुषेय यानी अपतनशील थे, इसलिए उनपर आधारित चातुर्वर्ण्य होने के इस सिद्धान्त को बुद्ध के हमलों ने तोड़ देने के कारण चातुर्वर्ण्य की पुरानी नींव टूट चुकी थी। यह बहुत स्वाभाविक बात है कि हिन्दू धर्म, जो चातुर्वर्ण्य के सिद्धान्त को त्यागना नहीं चाहता था, क्योंकि वह उसे अपनी आत्मा मानता था। अपने सिद्धान्त को न्याय संगत बनाने हेतू किसी नये और अधिक प्रभावशाली आधार की तलाश करें, जैसा कि भगवद् गीता सुझाती है। लेकिन भगवद् गीता में चातुर्वर्ण्य के न्याय संगत होने के लिए कृष्ण ने दिया हुआ यह नया तर्क कहा तक ठिक है? लगभग सभी हिन्दुओं का यह तर्क बिल्कुल न्याय संगत नजर आता है। इसलिए वे उसे खंडन करने योग्य नहीं समझते। यदि चातुर्वर्ण्य केवल वेदों पर टिका होता, तो मुझे विश्‍वास है कि वह कब का समाप्त हो चुका होता। स्पष्ट है कि ‘गीता’ के इस झुठे और शरारतपूर्ण सिद्धान्त ने चातुर्वर्ण्य को, जो जाति-व्यवस्था की जड़ है, हमेशा जिन्दा रहने का मौका दिया। गीता के इस सिद्धान्त की मूल कल्पना सांख्य दर्शन से ली गयी है। उसमें कोई असलियत नहीं है। चातुर्वर्ण्य को न्याय ठहराने में उसका इस्तेमाल करने के श्रीकृष्ण का असली कौशल छिपा हुआ है।”
    बुद्ध कहते थे कि यह दुनिया परिवर्तनशील है। दुनिया परिवर्तनशील है और यदि मनुष्य परिवर्तनशिल नहीं होगा तो दुनिया मनुष्य के लिए रुकनेवाली नहीं है। दुनिया आगे निकल जाएगी। जिन्हें परिवर्तन अमान्य होगा वह पीछे छूट जाएगा। इसलिए जो लोग पीछे नहीं रहना चाहते उन्हें परिवर्तन के साथ अपना कदम आगे बढ़ाना होगा। यह सिद्धांत बाबासाहब डा.अम्बेडकर ने निर्धारित किया और इसे लागू करने की उन्होेंने योजना बनायी। इस बात को वे स्वयं तक सिमित नहीं रखना चाहते थे बल्कि समूचे समाज के लिए लागू करना चाहते थे

पूना पैक्ट के ज्वाईंट इलेक्टोरेट ने सच्चा प्रतिनिधिक लोकतंत्र समाप्त किया-एक बहस - वामन मेश्राम


        यह जो संयुक्त निर्वाचन है, यह गांधी जी के द्वारा अनुसूचित जाति के लोगों के उपर थोपा गया षड्यंत्र है।इस समझने के लिए हमें तुलनात्मक तरीके से समझना होगा। ये जो भी ब्राह्मणों के संगठन है, इसे देश के आधुनिक काल में ब्राह्मणों ने संगठन बनाए। कांग्रेस का संगठन ब्राह्मणों ने बनाया। कम्युनिष्टों का संगठन भी ब्राह्मणों ने बनाया। उस समय के समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी का संगठन फैजाबाद के आचार्य नरेन्द्रदेव ने बनाया जो ब्राह्मण थे और अच्यूत पटवर्धन पूना के ब्राह्मण थे। अशोक मेहता गुजरात के ब्राह्मण थे। बहुत सारे लोगों को इतिहास की जानकारी नहीं है। ये जो समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी बनाई गई थी। महाराष्ट्र में प्रजा समाजवादी पार्टी सन्त जोशी नामक ब्राह्मण ने बनाई थी। कांग्रेस का संगठन ब्राह्मणों ने बनाया, कम्युनिष्टो का संगठन ब्राह्मणों ने बनाया, सोशलिस्ट का संगठन ब्राह्मणों ने बनाया, हिन्दू महासभा का संगठन ब्राह्मणों ने बनाया, राष्ट्र सेवादल का संगठन ब्राह्मण ने बनाया, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संगठन ब्राह्मणों ने बनाया और हर जगह पहल ब्राह्मणों की है। ब्राह्मण लोगों ने योजना बनाकर पहल की और बाकी के जो द्विज जाति के लोग जिसे उ.प्र. में राजपूत कहे जा सकते है, वे ब्राह्मणों के संगठन में शामिल हुए और उनके पिछलग्गू हुए। 3.5 प्रतिशत ब्राह्मणों के 4 राष्ट्रीय स्तर की रिकागनाईज पार्टियाँ है। 6 प्रतिशत क्षत्रिय है। देशभर में उनकी एक भी राष्ट्रीय पार्टी नहीं है। वैश्यों की भी यहीं स्थिति है। 
         अभी केजरीवाल जो हरियाण का वैश्य जो हिसार जिले का है। पहली बार ऐसा हुआ के बीजेपी और कांग्रेस से जो लोग दुखी है, उनके लिए तो ब्राह्मणों ने एक और सप्लीमेन्ट्री (पूरक) योजना बनाया कि लोग अगर कांग्रेस से दुखी है, बीजेपी से भी दुखी है तो तीसरी पार्टी भी द्विजों की होनी चाहिए। उन्होंने ऐसा योजना बनाकर किया। यहां तक कि केजरीवाल ने अन्ना हजारे का इस्तेमाल किया। यह भी बात अब प्रमाणित हो गई। क्योंकि अन्ना-हजारे द्विज नहीं है। वह कुर्मी जाति का है और बाबा रामदेव अहिर (यादव) है। तो उन लोगों का इस्तेमाल इन लोगों ने किया। ये सारे ब्राह्मणों के संगठन है। यह उदाहरण मैंने यह संयुक्त निर्वाचन प्रणाली समझाने के लिए दिया। जब यह ब्राह्मणों के नीचे लगने वालों के संगठन होते है। तो ये क्या करते है? ये एससी के आदमी को यदि बाबा साहब अम्बेडकर ने पष्थक निर्वाचन हासिल किया था जो उसमें एससी के लोगों को ही वोट देना और एससी के लोगों का ही चुनाव क्षेत्र होता, तो केवल एससी के लोगों को वोट देने का अधिकार होता और चुनाव भी लड़ने का अधिकार होता। तब एससी में जो सबसे लड़ाकू होता, वहीं चुनकर जाता है। लेकिन हुआ क्या? गांधी जी ने पूना-पैक्ट किया और एससी के लोगों के उपर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली थोप दिया। परिणाम क्या हुआ? ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, का नेतष्त्व क्या करते है? वे एससी में किसी एक आदमी को नामित करते है। ये जो ब्राह्मणों की पार्टियाँ है, जिसका सपोर्ट क्षत्रिय और वैश्य कर रहे है। उन्हें नामित करने के बाद ये सारे मिलकर मनी, मीडिया और माफिया की मदद से जो एससी का आदमी ब्राह्मणों द्वारा नामित है उसे चुनावकर लाते है। यदि एससी का आदमी ब्राह्मणों द्वारा नामित किया हुआ आदमी चुनवाकर लाया जाता है तो विधानसभा में ब्राह्मणों की तरफ देखकर बोलेगा अभी तो देखकर बोलने का भी मामला नहीं है कि विधानसभा में कौन बोलना चाहिए और कौन नहीं विधानसभा में बोलना चाहिए। ये पार्टी के सांसदीय दल का जो नेता होता है, वह निर्धारित करते है। उन्हें समय ही बोलने के लिए नहीं दिया जाता है। ये जो लोग है, ये नामित लोग है। संयुक्त निर्वाचन प्रणाली में वास्तविक प्रतिनिधित्व समाप्त कर दिया गया और नोमिनेटेड प्रतिनिधित्व लागू कर दिया गया। जिसको नामित किया गया है, वह प्रतिनिधि नहीं है जिस समाज और जाति में वह पैदा हुआ। बल्कि जिसने उसको नामित किया वह उसका और उसके पार्टी का प्रतिनिधि है। उसे यह कहा जाता है कि यदि किसी एससी के एम.पी या एम.एल. पार्टी हाईकमान के पास कोई सामाजिक मुद्दा लेकर गये तो उसको बोलते है कि आपका कोई व्यक्तिगत मामला है, आपको पेट्रोल पम्प चाहिए। पेट्रोल पम्प है तो गैस एजेन्सी या सी.एन.जी पम्प वाला पम्प ले लो, मगर समाज की बात मत करो। यदि किसी एम.एल.ए, एमपी. ने ज्यादा दबाव बनाया तो कहते है कि क्या आपको अगले चुनाव में टिकट नहीं चाहिए तो वो अपनी औकात पर आ जाते है। वह दुबारा जाता ही नहीं है। यदि इसके बाद भी वह आ गया तो आने से पहले ही उसकी फाइल तैयार करते है। पहले उसे वह फाइल पढ़ने के लिए देते है कि तुमने ये अवैध काम किया, ये भ्रष्टाचार किया, ये ऐसे किये, वह वैसे किये तो उसे बोलने से पहले ही डरा देते है। वह फाइल देते है। जिससे वह बोलना ही भूल जाता है। और नमस्कार बोल करके वह वापस चला जाता है। ये संयुक्त निर्वाचन से ऐसा हुआ है। 
        संयुक्त निर्वाचन में इसे नामित कर देते है। ये एससी का आदमी है इसे नामित करके, चुनवाकर लाते है। ऐसा हो रहा है और इससे वास्तविक प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया। इसके बाद एसटी आ गया। एसटी को तो पता हीं नहीं है, एससी को तो कम से कम पता है। ये पूना पैक्ट आदिवासियों को लागू कर दिया गया जबकि आदिवासियों ने मांग भी नहीं किया फिर भी लागू कर दिया। पांचवी और छवीं अनुसूची की वजह से आदिवासी अपने क्षेत्र में स्वायत शासन गठित करने का जो अधिकार उन्हें मिला था कि संसद और विधानसभा में जो भी कानून पास किया जायेगा, आदिवासी इलाके में लागू करने से पहले आदिवासियों से सहमति लेनी होगी। सहमति लिए बगैर उस इलाके में संसद, विधानसभा द्वारा पास किया गया कानून भी लागू नहीं होगा। इतना बड़ा अधिकार आदिवासियों को पांचवी और छठी अनुसूची में दिया गया है। यदि आदिवासियों के इलाके में मान लो कि कोयले की खदान है। यह खदान किसे देना है? इसकी सहमति जब तक आदिवासी की नहीं होगी, उसका आवंटन नहीं होगा। वह प्रोविजन इस पांचवी और छंवी अनुसूची में है। इसे समाप्त करने के लिए आदिवासियों की मांग न होते हुए भी उन पर संयुक्त निर्वाचन लागू कर दिया गया। जिस तरह से एससी में चममे, दलाल और भड़वे पैदा किये, उसी तरह से आदिवासियों में भी पैदा कर दिये गये और आदिवासियों में वास्तविक प्रतिनिधित्व समाप्त कर दिया गया। उसके बाद ओबीसी की ले लो। ओबीसी में संयुक्त निर्वाचन कानूनन लागू नहीं है। इन लोगों ने दूसरा रास्ता निकाला कि ओबीसी पार्टी लेबल (स्तर) पर लागू कर दिया। जो पंचायत राज कानून है, जिसे राजीव गांधी ने बनाया, यह निचले स्तर पर जैसे ग्राम पंचायत है, तालुका पंचायत है, नगर पंचायत है, जिला पंचायत है, नगर पालिका है, महानगर पालिका है और उसमें पंचायत राज कानून लागू किया। एससी और एसटी को जो संयुक्त निर्वाचन लागू है, वह ओबीसी को पंचायत राज में लागू कर दिया। पंचायत राज में ओबीसी का नेतष्त्व समाप्त कर दिया। ओबीसी में निम्न स्तर पर दलाल और भड़वे पैदा करवा दिया। वे जो दलाल और भड़वे पैदा कर दिये गये, वे ब्राह्मणों की पार्टी को वोट देने के लिए, उसके बदले में उनको कमीशन मिलता है। फिर इस तरह से एक जुगाड़ बिठाया गया है कि आपको टिकट दिया जायेगा, तो इसके लिए जुगाड़ आप को एम.एल.ए और एम.पी के लिए करना होगा। आपको पंचायत, तालुका पंचायत के लिए दिया जाएगा। निम्न स्तर पर आपको क्या लूटना है? हम नहीं पूछेगें। विधानसभा में लोकसभा में उनको आपको चुनकर लाना है। ये कोई काल्पनिक बात नहीं है। ऐसा हो रहा है। पूना पैक्ट ओबीसी में भी लागू कर दिया गया है। 
       2010 में साढ़े आठ 52 प्रतिशत ओबीसी के लोगों की जाति आधारित गिनती होनी चाहिए, जब यह मामला हमने उठाया तो उस समय साढ़े आठ मुख्यमंत्री ओबीसी के थे। किसी मुख्यमंत्री ने जिस मंत्रिमण्डल का वह प्रमुख था। कागज में रेगुलेशन तक पारित नहीं किया कि ओबीसी की जातिआधारित गिनती होनी चाहिए। सबसे धाकड़ आदमी ओबीसी का नरेन्द्र मोदी माना जाता है। उसने भी यह काम नहीं किया। और न ही वह कर सकता है। उसे किसी ओबीसी के व्यक्ति ने पूछा कि नरेन्द्र जी आप ऐसा क्यों नहीं कर रहे हो? तो नरेन्द्र मोदी ने कहा आप मुझे अकेले में मिलो। जब वह आदमी अकेले में मिला तो नरेन्द्र मोदी ने कहा कि क्या तुम मुझे मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते हो? तो आदमी ने कहा कि मैं ग्राम पंचायत का सदस्य भी नहीं हूँ, नरेन्द्र भाई मैं कैसे आपको हटा सकता हूँ? तो मोदी ने कहा कि मैं जानता हूँ कि तुम नहीं हटा सकते। लेकिन जब जाति आधारित गिनती के लिए मैं बोलूंगा तो आरएसएस के लोग क्या मुझे छोड़ेगें? क्या मुझे मुख्यमंत्री पदपर रखेगें? ये बात जिस ओबीसी के कार्यकर्ता ने बताया वह महेन्द्र भाई हमारा कार्यकर्ता है। उसने हमसे बताया कि नरेन्द्र मोदी ने ऐसा कहा। नरेन्द्र मोदी ओबीसी का होकर भी गुजरात के अन्दर ओबीसी के लिए कुछ नहीें कर रहा है। प्रधानमंत्री बनने के बाद वह देश में कुछ करने वाला है क्या? हाँ अपने प्रधानमंत्री के कार्यालय के समाने एक चाय की दुकान खुलवा सकता है। इसके अलावा और कुछ नहीं करवा सकता है। उसके लिए प्रधानमंत्री के अनुमति की क्या जरूरत है। हाँ, उसके लिए तो एक चार बाई चार का का ठेला ले लो, चीनी और चायपत्ती खरीद लो और किसी भी चौराहे पर बिना किसी किराये का खड़ी कर दो। दुकान चल जाती है। उसके लिए किसी की परमीशन की कोई जरूरत नहीं है। उस समय साढ़े आठ मुख्यमंत्री थे। उनमें से किसी ने योजना आयोग को चिट्ठी नहीं लिखी, जनगणना कमीशन को कोई चिट्ठी नहीं लिखी, प्रधानमंत्री को कोई चिट्ठी नहीं लिखी और अखबार में किसी मुख्यमंत्री ने बयान तक नहीं दिया। नितीश कुमार ने एक अखबार में बयान दिया था। वह भी दबी जबान से, वह भी दुबारा हमेशा के लिए भूल गया। उनकी बीजेपी के समर्थन के बिना सरकार चल रही है। तो अभी जनगणना कर सकता है। लेकिन वह उसकी औकात नहीं है, नहीं कर सकता। ये सारे उदाहरण इस बात को सिद्ध करते हेै कि ये सब मुख्यमंत्री ओबीसी के हैं, लेकिन ये ओबीसी के वास्तविक प्रतिनिधि नहीं है। 52 प्रतिशत ओबीसी में भी संयुक्त निर्वाचन प्रणाली लागू कर दिया गया है। अब माइनॉरिटी की बात ले लो। माईनॉरिटी में सबसे बड़ी माइनॉरिटी मुसलमानों की है। इसी तरह से सभी माइनारिटी की दशा है। मुसलमानों का आजकल जो कांगे्रस की तरफ से प्रतिनिधित्व करते है। जैसे गुलाम नवी आजाद। मैनें कभी मुसलमानों की समस्याओं पर उन्हें बोलते हुए नहीं सुना। शायद ही मुसलमानों को मालूम हो, लेकिन मैंने अभी तक नहीं सुना। बीजेपी ने सैयद शाहनवाज हुसैन नाम का एक आदमी रखा है। जब कांग्रेस के लोग आरएसएस पर टीका-टिप्पणी करते है तो उसका जवाब देने के लिए सैयद शाहनवाज हुसैन को भेज देते हैं। मुसलमानों के लिए जब कोई मामला आता है तो उसके लिए प्रवीण तोगड़िया को भेज देते है कि ये मामला तेरा है, इसे तू देख ले। इस तरह से ओबीसी और माइनॉरिटी में भी संयुक्त निर्वाचन लागू कर दिया गया है। इस प्रकार एससी/एसटी/ओबीसी और माइनोरिटी के 85 प्रतिशत लोगों को वास्तविक प्रतिनिधित्व के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। नोमिनेटेड प्रतिनिधित्व, वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं होता है। इसका दूसरी तरफ परिणाम हुआ कि पार्टियां ब्राह्मणों की है। एससी, एसटी और ओबीसी के लोग उन पार्टियों से टिकट मांगते है। इस प्रकार उन लोगों ने हमारे लोगों को मागने वाला बना रखा है। बीजेपी, कांग्रेस और कम्युनिस्ट आदि पार्टियों के सामने हमारी औकात मांगने वाला है। हाँ थोड़ा सा एम.पी स्तर का मांगने वाला, एम.एल.ए स्तर का मांगने वाला तथा सफारी और टाई लगाकर मांगने वाला है। मांगने वाले की क्वालिटी थोड़ा ऊँची है। जैसे पहले कोई धोती पहनकर ब्राह्मणों को चाय-पानी पीलाता था, अब कोई सफारी और टाई पहन कर ब्राह्मण को पानी पिला दे तो क्या ब्राह्मण को कोई दुख होगा? उसे खुशी होगी कि सफारी और टाई पहनकर चपरासी सेवा कर रहा है। इस प्रकार एससी, एसटी और ओबीसी को उन ब्राह्मणों के पार्टियों से टिकट मांगनी पड़ती है। पार्टी ब्राह्मणों की है, इसलिए वैश्य लोगों को भी ब्राह्मणों से टिकट मांगना पड़ता है। क्षत्रियों को भी ब्राह्मणों से टिकट मांगना पड़ता है। ब्राह्मणों की पार्टियाँ है। अत: केवल ब्राह्मणों को इस देश में टिकट नहीं मांगना पड़ता है। यह इस देश की कड़वी सच्चाई है। दूसरी तरफ सारे प्रतिनिधित्व पर ब्राह्मणों ने कैंजा कर लिया है। जैसे विधायिका पर, कार्यपालिका पर, न्यायपालिका पर, मीडिया पर, गवर्नर पर, मीलिट्री पर, सेक्रेटरी पर, सचिवालय पर, वायसचान्सलर पर तथा सारी लोकत्रांतिक संस्थाओं पर ब्राह्मणों ने कैंजा कर लिया। इन सारी संस्थाओं पर ब्राह्मणों के कैंजा होने से हम कह सकते है कि इस देश में लोकतंत्र नहीं ब्राह्मणतंत्र आ गया हैं। ब्राह्मणतंत्र क्या है? प्रतिनिधित्व विहीन लोकतंत्र ही ब्राह्मणतंत्र है। ये सारा का सारा कारण संयुक्त निर्वाचन प्रणाली ने पैदा किया है। यह संयुक्त निर्वाचन प्रणाली का जन्मदाता मोहन दास करमचन्द गांधी है। इसका अर्थ है कि मोहन दास करमचन्द गांधी द्वारा कांग्रेस (जो ब्राह्मणों की पार्टी है) के माध्यम से इस देश में लोकतंत्र का सत्यानाश किया गया है। इसके लिए किसी और आदमी को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है। इसके लिए पूरा का पूरा मोहनदास करमचन्द गांधी जिम्मेदार है। इसीलिए कहते रहते है कि गांधी हमारे सर पर बिठाया गया है। हम उसे उतारने की कोशिश कर रहे है। इसके पहले कि हम गांधी को सिर से उतार दें, अन्ना हजारे नाम का दूसरा गांधी हमारे सिर पर बिठाया जा रहा है। अभी पहला ही पूरी तरह से नहीं उतार पाया है और दूसरा बैठा रहे हैं। वह गांधी तो कम से कम बैरिस्टर था लेकिन दूसरा गांधी तो सातवीं फेल है। इस प्रकार संयुक्त निर्वाचन प्रणाली ने इस देश की वास्तविक लोकतंत्र को समाप्त किया है। इसका सबसे भंयकर परिणाम यह है कि सच्चा लोकतंत्र को संयुक्त निर्वाचन प्रणाली ने समाप्त कर दिया है। यदि सच्चा लोकतंत्र होता तो हमारा सच्चा प्रतिनिधि पार्लियामेन्ट और विधानसभा में हमारी गरीबी, दरिद्रता, मानसिक दरिद्रता, शिक्षा की दरिद्रता और सभी किस्म की समस्याओं के विरोध में लड़ता। यदि वह लड़ता तो हमारी सभी समस्याओं का समाधान होता। अगर हमारी दरिद्रता है, हमारी भुखमरी है, और भुखमरी से हम मर रहे है, असहाय हो गये है हम लाचार हो गये है। हम निराश हो गये है, हम कुछ करने के लायक नहीं है हम प्रतिकार विहीन है तो ये सारा का सारा प्रतिनिधित्व विहीन लोकतंत्र का परिणाम है। 
        मैं तो कहता हूँ कि जो एससी, एसटी और ओबीसी का आदमी उच्च न्यायलय में वकील है, उनको यह समझ में नहीं आता है, वकीलों का हमने संगठन बनाया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील उधर आये थे। मैं उन लोगों को कहा कि आप लोगों को क्या ये पता है? आप लोगों को हमें बताना चाहिए, मैं तो वकील भी नहीं हूँ। चलो बताने की छोड़ो, उन्हें पता भी है कि नहीं देश की गवर्नेन्स का जो तरीका है, वह कैसे बनाया जाता है? हमारे लोगों को पता हीं नहीं है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकील जो संवैधानिक मामले देखते है, उनको ये पता होना चाहिए था, मगर उनको भी पता नहीं है। बाकी लोगों का क्या पता होगा? इस देश में जो अशिक्षा, बेरोजगारी और भुखमरी ये सारी समस्यायें हैं। इन समस्याओं का जड़ सच्चा प्रतिनिधित्व का नहीं होना है। संसद में कोई बोलता ही नहीं है। 
        बाबा साहब अम्बेडकर का तजुर्बा था। उन्होंने कहा कि उनके सामने लोग जाते थे और संसद में नहीं बोलते थे। इसलिए उन्होंने अंग्रेजी में एक जगह कहा कि वे केवल जम्हाई लेने के लिए ही संसद में मुँह खोलते है, अन्यथा खोलते ही नहीं है। ये बाबा साहब का तजुर्बा है। मैं अपना तजुर्बा बताता हूँ कि अगर जम्हाई लेना प्राकष्तिक कार्य नहीं होता तो इसके लिए भी नहीं खोलते। मजबूरी में खोलना पड़ता है, नहीं तो वे इसके लिए भी वे मुँह नहीं खोलते। उन्हें मुँह इस प्रकार प्रतिनिधित्व विहीन लोकतंत्र ने ब्राह्मणतंत्र निर्माण किया गया। इस ब्राह्मणतंत्र को निर्माण करने का श्रेय गांधी जी को जाता है। यह सारी सत्यानाशी के लिए गांधीजी जिम्मेवार है। जिस गांधीजी को हमारे देश के बहुत सारे लोग सिर पर ढो रहे है, वहीं गांधी आपके दुर्दशा और सारी समस्याओं का कारण है। इस देश में यदि लोकतंत्र अर्थहीन हो गया है तो उसके लिए गांधीजी जिम्मेवार हैं, पूना पैक्ट जिम्मेवार है, संयुक्त निर्वाचन प्रणाली जिम्मेवार है। यदि इस देश में एससी की कोई स्वतंत्रत आन्दोलन नहीं चल रहा है और उस स्वतंत्र आन्दोलन को दबा दिया गया है, या खत्म कर दिया गया है तो उसके लिए संयुक्त निर्वाचन प्रणाली जिम्मेदार है। इसने दलाल और भड़वों को पैदा किया है। जिनको हमारे अनपढ़ लोगों ने अपना सच्चा नेता माना लिया है। जो लड़ाई लड़ने वाले लोग थे, उनका समर्थन करने के बजाए अनपढ़ लोगों ने दलालों का समर्थन किया। परिणामत: एससी, एसटी, ओबीसी और माइनॉरिटी का स्वतंत्रत आन्दोलन समाप्त हो गया। अशिक्षित लोग दलालों को अपना नेता मानने लगे। एम.एल.ए और एम.पी जो दलाल हैं, उन्हें अपना नेता मानकर, लड़ने वालों लोगों का समर्थन करना बन्द कर दिया। यही आज भी हो रहा है। मैं उनका हल जानता हूँ। इस समस्या का समाधान हमने ढूढ़ निकाला है। आने वाले समय में हम इसे लागू करेंगे। मगर ये आज की परिस्थिति है। 
       वर्तमान व्यवस्था में हमारे समस्या का समाधान नहीं है। इसलिए हम लोगों को इसे समाप्त करना होगा। क्योंकि इसने हमारे स्वतंत्र आन्दोलन को समाप्त कर दिया। दूसरा इसने हमारे अन्दर नेतष्त्वहीनता पैदा की। क्योंकि दलालों को हमने नेता माना। दलाल नेता नहीं बन सकता, लेकिन नेता हमनें मान लिया। इसलिए समाज में नेतष्त्वहीनता निर्माण हो गई। जो समाज नेतष्त्वहीन हो जाता है, तो वह भीड़ में रूपान्तरित हो जाता है, फिर भीड़ को चलाने के लिए यानि भेड़-बकरियों को चराने के लिए किसी योग्यता या पढ़ा-लिखा होने की जरूरत नहीं है। जैसे भीड़ को आप जिधर ले जाना चाहते हो आप उधर ले जा सकते हो। ये हो रहा है। इस देश की जनता को ही नहीं, इस देश को भी दरिद्र बनाया गया। अगर मान लोग ब्राह्मण हमारे लोगों को भुखमरी के कगार पर नहीं पहुँचाएंगा तो हमारे लोग वोट बेचने के लिए कैसे तैयार होंगे? अगर हमारे लोग वोट बेचने को तैयार नहीं होंगे तो अल्पसंख्यक ब्राह्मणों को बहुसंख्यक बहुजनों के उपर राज करने का अवसर कैसे प्राप्त होगा? इसलिए ब्राह्मण हमारे लोगों को दरिद्र बनाते है और भुखमरी के कगार पर पहुँचा देते है। फिर भी कोई एससी, एसटी, ओबीसी और माइनॉरिटी एमपी और एमएलए उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठा सकता है। क्योंकि वो वास्तविक प्रतिनिधि नहीं है। इसने एक और भंयकर परिणाम किया कि गुलाम भारत में जोतिरवा फुले के आन्दोलन में ब्राह्मणवाद को विरोध करने की भावना थी। जोतिराव फुले, शाहूजी महाराज, पेरियार और बाबा साहब के समय लोगों के अन्दर विद्रोह की भावना थी अर्थात् गुलाम भारत में विद्रोह की भावना थी मगर आजाद भारत में विद्रोह की भावना समाप्त हो गई। ये भयंकर परिणाम है। मैं जानता हूँ, क्योंकि देश में लोगों के अन्दर विद्रोह की भावना पैदा किये बगैर कोई आन्दोलन निर्माण होने वाला नहीं है। विद्रोह की भावना से समझौता करने के लिए मजबूर कर दिया गया है। देश में एससी, एसटी और ओबीसी के लोगों पर अत्याचार होता है, तो उनके एम.एल.ए और एम.पी. उनके उपर अत्याचार करने वालों के समर्थन में पुलिस चौकी थानों में फोन करते है। इसलिए उनके विरोध में कुछ भी कार्यवाही नहीं होता है। इसलिए अत्याचार बढ़ रहा है। ये सारे के सारे मामले संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के माध्यम से प्रतिनिधित्व विहीन लोकतंत्र की वजह से निर्माण हुए। भारत में वास्तविक लोकतंत्र को समाप्त कर दिया गया है। इसका कारण संयुक्त निर्वाचन प्रणली है हमारे कितने पढ़े-लिखे लोगों को ये पता है? इसलिए जानकारी के लिए यह विषय रखा गया था। क्योंकि जानने के बाद मन में प्रतिक्रिया और विद्रोह पैदा हो सकते है। इसलिए हमारे तरफ से कोशिश हो रही हैं कि पहले जाने, क्योंकि जाने बगैर ही कई किस्म का हम एक्शन प्लान बनाते है। इससे कोई सफलता मिलने वाली नहीं है। इसलिए हम लोगों को ज्यादा समय लग रहा है।     
       अभी भी हमारे लोग दलाल-भड़वों का समर्थन करने का काम करते है। एससी, एसटी और ओबीसी के कर्मचारी और पढ़े-लिखे लोग तथा यूनियन चलाने वाले लोग ऐसा करते रहते है। ये एम.एल.ए और एम.पी. चमचा है और ये कर्मचारी एम. एल.ए और एम.पी. का चमचा है अर्थात कर्मचारी चमचों का चमचा है। क्योंकि हमारा एससी/एसटी/ओबीसी का कर्मचारी चमचे एम.एल.ए, एम.पी. के पीछे-पीछे, पीछे-पीछे घूमता रहता है। इस प्रकार जो चमचा हमारी समस्या का समाधान नहीं कर सकता है। जब तक आप उसके पीछे-पीछे घूमते रहेंगे तब तक आपकी किसी भी समस्या का समाधान होने वाला नहीं होगा। समाधान कहीं और है। चमचों के पीछे घूमने में समाधान नहीं है। ये चमचा बनाने का काम भी भयंकर परिणाम में आता है। ये बहुत सारी बातें है। इसलिए हमारे पुरखों द्वारा चलाए गये स्वाभिमानी, स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर स्वतंत्र आन्दोलन को निर्माण करने से पहले सत्यानाश करने के कारण जानना होगा। क्योंकि इसे जाने बगैर आन्दोलन पुर्ननिर्माण करना संभव नहीं है।  -वामन मेश्राम, राष्ट्रिय अध्यक्ष, बामसेफ

संत कबीर और दलित-विमर्श (संत कबीर दास जयंती पर विशेष )


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कबीर का काव्य भारतीय संस्कृति की परम्परा में एक अनमोल कड़ी है। आज का जागरूक लेखक कबीर की निर्भीकता, सामाजिक अन्याय के प्रति उनकी तीव्र विरोध की भावना और उनके स्वर की सहज सच्चाई और निर्मलता को अपना अमूल्य उतराधिकार समझता है।कबीर न तो मात्र सामाजिक सुधारवादी थे और न ही धर्म के नाम पर विभेदवादी। वह आध्यात्मिकता की सार्वभौम आधारभूमि पर सामाजिक क्रांति के मसीहा थे। कबीर की वाणी में अस्वीकार का स्वर उन्हें प्रासंगिक बनाता है और आज से जोड़ता है। इस वर्ष 23 जून, 2013 को संत कबीर दास जयंती मनायी जा रही है, आप सभी को इस महती पर्व की हार्दिक बधाई ।
कबीर मानववादी विचारधारा के प्रति गहन आस्थावान थे। वह युग अमानवीयता का था , इसलिए कबीर ने मानवता से परिपूर्ण भावनाओं, सम्वेदनाओं व् चेतना को जागृत करने का प्रयास किया।हकीकत तो यह है की कबीर वर्गसंघर्ष के विरोधी थे। वे समाज में व्याप्त शोषक-शोषित का भेद मिटाना चाहते थे। जातिप्रथा का विरोध करके वे मानवजाति को एक दूसरे के समीप लाना चाहते थे।
एक बूंद एकै मल मूत्र, एक चम् एक गूदा।
एक जोति थैं सब उत्पन्ना, कौन बाम्हन कौन सूदा।।
मनुष्य की इस स्पष्ट दिखने वाली समानता को नकारकर उनमें धर्म और जाति-वर्ण के नाम पर भेदभाव स्थापित करने के लिए जो जो जिम्मेदार नजर आते हैं कबीर उन सबका डटकर विरोध करते हैं। चाहे वह वेद हो या कुरान , मन्दिर हो या मस्जिद , पंडित हो या मौलवी।
सामाजिक न्याय की मांग है की समाज में जन्म परम्परा अथवा विरासत के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए, वर्ण सभी को उनकी योग्यता और श्रम के आधार पर प्रगति करने के अवसर मिलना चाहिए। सभी को समान समझना चाहिए और किसी को अधिकार से वंचित नही किया जाए। किसी भी प्रकार की वेशभूषा अथवा विशेष ग्रहण करने, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का कोई लाभ नहीं। सन्त कबीर कहते हैं –
वैष्णव भया तो क्या भया बूझा नहीं विवेक।
छाया तिलक बनाय कर दराधिया लोक अनेक।।
कबीर का समाज-दर्शन अथवा आदर्श समाज विषयक उनकी मान्यताएँ ठोस यथार्थ का आधार लेकर खडी हैं। अपने समय के सामन्ती समाज में जिस प्रकार का शोषण दमन और उत्पीडन उन्होंने देखा-सुना था, उनके मूल में उन्हें सामन्ती स्वार्थ एवम धार्मिक पाखण्डवाद दिखाई दिया जिसकी पुष्टि दार्शनिक सिद्धान्तों की भ्रामक व्यवस्था से की जाती थी और जिसका व्यक्त रूप बाह्याचार एवम कर्मकाण्ड थे। कबीर ने समाज व्यवस्था सत्यता, सहजता, समता और सदाचार पर आश्रित करना चाहा जिसके परिणाम स्वरूप कथनी और करनी के अन्तर को उन्होंने सामाजिक विकृतियों का मूलाधार माना और सत्याग्रह पर अवस्थित आदर्श मानव समाज की नीवं रखी।
डॉ एम फिरोज खान का निष्कर्ष है कि, “यह सच्चाई निर्विवाद है कि कबीर आवाम की वाणी के उद्घोषक हैं। उनकी वाणी का स्फुरण धर्म, वर्ग, रंग, नस्ल, समाज, आचरण, नैतिकता और व्यवहार आदि सभी क्षेत्र में हुआ है। यह स्फुरण किसी विशेष वर्ग, भू -भाग या देश के लिए नही अपितु मानव मात्र के लिए है। उन्होंने आवाम को गिराकर एकत्व स्थापित करने का प्रयास किया है। इसके लिए जितने शक्तिशाली प्रहार की आवश्यकता थी उसे करने में चुके नहीं। बेखौफ होकर , जहाँ तक जाना सम्भव था वहां तक जाकर असत्य का प्रतिछेदन करते हुए सत्य के शोधन के माध्यम से समाजों को प्रेम के सूत्र में बांधने का प्रयास किया। वस्तुत: प्रेम पर आधरित वैचारिक क्रांति उनका प्रमुख हथियार था। दरअसल कबीर साहब का मुख्य लक्ष्य मानव कल्याण की प्रतिष्ठा थी और इसके लिए वह युगानुकुल जैसे भी प्रयत्न सम्भव थे उनको प्रयोग करने में हिचकिचाये नहीं। उनके निडर व्यक्तित्व से जन्मे विश्वास की यही शक्ति उनको हर युग और प्रत्येक समाज में प्रासंगिक बनाए हुए है।”
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जब हम कबीर और वर्तमान दलित-विमर्श के सन्दर्भ में बात करते है तो एक और पहलु हमे ध्यान रखना पडता हैं जिसे ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में इस ढंग से कहा गया है, “निर्गुण धारा के कवियों विशेष रूप से कबीर और रैदास की रचनाओं में अंतर्निहित सामाजिक विद्रोह दलित लेख्कों के लिए प्रेरणादायक है। उससे दलित लेखक ऊर्जा करते हैं, लेकिन वह दलित लेखन का आदर्श नहीं हैं।” इसके लिए एक तर्क यह भी दिया जा सकता है की जैसे गाँधी और अन्य विचारको के जातपात सम्बन्धी चिन्तन उतना परिपक्व नही है जितना की डॉ भीम राव अम्बेडकर जी का है। दलित-मुक्ति के लिए डॉ भीम राव अम्बेडकर का चिन्तन अति आवश्यक हैं क्यूंकि यह समस्या को गहराई से छूता है और संघर्ष को सकारात्मक दिशा देता है। आज के दलित लेखन के लिए सामाजिक और राजनितिक दृष्टिकोण ज्यादा आवश्यक है न की धार्मिक दृष्टिकोण। फिर भी कबीर और अन्य संतों की वाणी नैतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। जिसका एक उदाहरण निम्नलिखित है जिसमे बताया गया है की गुणवान-चालाक, ढोंगी और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो निस्वार्थ भाव से हो :
गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय।
कबीर प्रीति सो जानिये, इंसे न्यारी होय।।
यह एक दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है की भारतीय समाज में जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक, राजनैतिक और संस्कृतिक अधिकारों से वंचित रखा गया। उसी सताए हुए समाज की पीड़ा की अभिव्यक्ति का साहित्य दलित-साहित्य है। सन अस्सी के दशक के बाद ही यह साहित्य मुखर रूप में हमारे सामने आया है। इस साहित्य का विकास भारत में बड़ी तेजी से हो रहा है। दलित लेखकों में प्रमुख रूप से धर्मवीर, जयप्रकाश कदर्म, ओमप्रकाश वाल्मीकि , सत्य प्रकाश, निरा परमार , सुशीला टाक भोरे, कँवल भारती , रमणिका गुप्ता आदि का नाम लिया जा सकता है। इसी परम्परा में बहुत सी अन्य कड़ियाँ भी जुडती जा रही हैं। अक्सर दलित रचनाओं पर कच्चेपन और अपरिपक्वता का दोष लगाया जाता है जिसका प्रमुख कारण यह की अक्सर साहित्य लिखते समय साहित्यिक सौन्दर्य निर्माण में वे विचार और आदर्श छुट जाते है जो की दलित विमर्श और दलित संघर्ष के लिए अति आवश्यक है। संघर्ष को दिशा देने वाला साहित्य ही वास्तव में आज की हमारी आवश्यकता है
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पूना पैकट: दलित गुलामी का दस्तावेज़

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भारतीय हिन्दू समाज में जाति को आधारशिला माना गया है . इस में श्रेणीबद्ध असमानता के ढांचे में अछूत सबसे निचले स्तर पर हैं जिन्हें 1935 तक सरकारी तौर पर ‘ डिप्रेस्ड क्लासेज’ कहा जाता था. गांधीजी ने उन्हें ‘हरिजन’ के नाम से पुरस्कृत किया था जिसे अधिकतर अछूतों ने स्वीकार नहीं किया था. अब उन्होंने अपने लिए ‘दलित’ नाम स्वयम चुना है जो उनकी पददलित स्थिति का परिचायक है. वर्तमान में वे भारत की कुल आबादी का लगभग छठा भाग (16.20 %) तथा कुल हिन्दू आबादी का पांचवा भाग (20.13 %) हैं. अछूत सदियों से हिन्दू समाज में सभी प्रकार के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक व शैक्षिक अधिकारों से वंचित रहे हैं और काफी हद तक आज भी हैं.
दलित कई प्रकार की वंचनाओं एवं निर्योग्यताओं को झेलते रहे हैं. उनका हिन्दू समाज एवं राजनीति में बराबरी का दर्जा पाने के संघर्ष का एक लम्बा इतिहास रहा है. जब श्री. ई. एस. मान्तेग्यु, सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया, ने पार्लियामेंट में 1917 में यह महत्वपूर्ण घोषणा की कि ‘”अंग्रेजी सरकार का अंतिम लक्ष्य भारत को डोमिनियन स्टेट्स देना है तो दलितों ने बम्बई में दो मीटिंगें कर के अपना मांग पत्र वाइसराय तथा भारत भ्रमण पर भारत आये सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया को दिया. परिणामस्वरूप निम्न जातियों को बिभिन्न प्रान्तों में अपनी समस्यायों को 1919 के भारतीय संवैधानिक सुधारों के पूर्व भ्रमण कर रहे कमिशन को पेश करने का मौका मिला.
तदोपरांत विभिन्न कमिशनों , कांफ्रेंसों एवं कौंसिलों का एक लम्बा एवं जटिल सिलसिला चला. सन 1918 में मान्तेग्यु चैमस्फोर्ड रिपोर्ट के बाद 1924 में मद्दीमान कमेटी रिपोर्ट आई जिसमें कौंसलों में डिप्रेस्ड क्लासेज के अति अल्प प्रतिनिधित्व और उसे बढ़ाने के उपायों के बारे में बात कही गयी. साईमन कमीशन (1928) ने स्वीकार किया कि डिप्रेस्ड क्लासेज को पर्याप्त प्रातिनिधित्व दिया जाना चाहिए. सन 1930 से 1932 एक लन्दन में तीन गोलमेज़ कान्फ्रेंसें हुयीं जिन में अन्य अल्प संख्यकों के साथ साथ दलितों के भी भारत के भावी संविधान के निर्माण में अपना मत देने के अधिकार को मान्यता मिली. यह एक ऐतहासिक एवं निर्णयकारी परिघटना थी . इन गोलमेज़ कांफ्रेंसों में डॉ. बी. आर. आंबेडकर तथा राव बहादुर आर. श्रीनिवासन द्वारा दलितों के प्रभावकारी प्रतिनिधित्व एवं ज़ोरदार प्रस्तुति के कारण 17 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश सरकार द्वारा घोषित ‘कमिनुअल अवार्ड’ में दलितों को पृथक निर्वाचन का स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकार मिला. इस अवार्ड से दलितों को आरक्षित सीटों पर पृथक निर्वाचन द्वारा अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार मिला और साथ ही सामान्य जाति के निर्वाचन क्षेत्रों में सवर्णों को चुनने हेतु दो वोट का अधिकार भी प्राप्त हुआ. इस प्रकार भारत के इतिहास में अछूतों को पहली वार राजनैतिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रप्त हुआ जो उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता था.
उक्त अवार्ड द्वारा दलितों को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट,1919 में अल्प संख्यकों के रूप में मिली मान्यता के आधार पर अन्य अल्प संख्यकों – मुसलमानों, सिक्खों, ऐंग्लो इंडियनज तथा कुछ अन्य के साथ साथ पृथक निर्वाचन के रूप में प्रांतीय विधायकाओं एवं केन्द्रीय एसेम्बली हेतु अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार मिला तथा उन सभी के लिए सीटों की संख्य निश्चित की गयी. इसमें अछूतों के लिए 78 सीटें विशेष निर्वाचन क्षेत्रों के रूप में आरक्षित की गयीं.
गाँधी जी ने उक्त अवार्ड की घोषणा होने पर यरवदा (पूना) जेल में 18 अगस्त, 1932 को दलितों को मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरोध में 20 सितम्बर, 1932 से आमरण अनशन करने की घोषणा कर दी. गाँधी जी का मत था कि इससे अछूत हिन्दू समाज से अलग हो जायेंगे जिससे हिन्दू समाज व हिन्दू धर्म विघटित हो जायेगा. यह ज्ञातव्य है कि उन्होंने मुसलमानों, सिक्खों व ऐंग्लो- इंडियनज को मिले उसी अधिकार का कोई विरोध नहीं किया था. गाँधी जी ने इस अंदेशे को लेकर 18 अगस्त, 1932 को तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री, श्री रेम्ज़े मैकडोनाल्ड को एक पत्र भेज कर दलितों को दिए गए पृथक निर्वाचन के अधिकार को समाप्त करके संयुक्त मताधिकार की व्यवस्था करने तथा हिन्दू समाज को विघटन से बचाने की अपील की. इसके उत्तर में ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने अपने पत्र दिनांकित 8 सितम्बर, 1932 में अंकित किया , ” ब्रिटिश सरकार की योजना के अंतर्गत दलित वर्ग हिन्दू समाज के अंग बने रहेंगे और वे हिन्दू निर्वाचन के लिए समान रूप से मतदान करेंगे, परन्तु ऐसी व्यवस्था प्रथम 20 वर्षों तक रहेगी तथा हिन्दू समाज का अंग रहते हुए उनके लिए सीमित संख्या में विशेष निर्वाचन क्षेत्र होंगे ताकि उनके अधिकारों और हितों की रक्षा हो सके. वर्तमान स्थिति में ऐसा करना नितांत आवश्यक हो गया है. जहाँ जहाँ विशेष निर्वाचन क्षेत्र होंगे वहां वहां सामान्य हिन्दुओं के निर्वाचन क्षेत्रों में दलित वर्गों को मत देने से वंचित नहीं किया जायेगा. इस प्रकार दलितों के लिए दो मतों का अधिकार होगा – एक विशेष निर्वाचन क्षेत्र के अपने सदस्य के लिए और दूसरा हिन्दू समाज के सामान्य सदस्य के लिए. हम ने जानबूझ कर – जिसे आप ने अछूतों के लिए सम्प्रदायक निर्वाचन कहा है ,उसके विपरीत फैसला दिया है. दलित वर्ग के मतदाता सामान्य अथवा हिन्दू निर्वाचन क्षेत्रों में सवर्ण उमीदवार को मत दे सकेंगे तथा सवर्ण हिन्दू मतदाता दलित वर्ग के उमीदवार को उसके निर्वाचन क्षेत्र में मतदान क़र सकेंगे. इस प्रकार हिन्दू समाज की एकता को सुरक्षित रखा गया है.” कुछ अन्य तर्क देने के बाद उन्होंने गाँधी जी से आमरण अनशन छोड़ने का आग्रह किया था.
परन्तु गाँधी जी ने प्रत्युत्तर में आमरण अनशन को अपना पुनीत धर्म मानते हुए कहा कि दलित वर्गों को केवल दोहरे मतदान का अधिकार देने से उन्हें तथा हिन्दू समाज को छिन्न – भिन्न होने से नहीं रोका जा सकता. उन्होंने आगे कहा, ” मेरी समझ में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था करना हिन्दू धर्म को बर्बाद करने का इंजेक्शन लगाना है. इस से दलित वर्गों का कोई लाभ नहीं होगा.” गंधी जी ने इसी प्रकार के तर्क दूसरी और तीसरी गोल मेज़ कांफ्रेंस में भी दिए थे जिसके प्रत्युत्तर में डॉ. आंबेडकर ने गाँधी जी के दलितों के भी अकेले प्रतिनिधि और उनके शुभ चिन्तक होने के दावे को नकारते हुए उनसे दलितों के राजनीतिक अधिकारों का विरोध न करने का अनुरोध किया था. उन्होंने यह भी कहा था कि फिलहाल दलित केवल स्वतन्त्र राजनीतिक अधिकारों की ही मांग कर रहे हैं न कि हिन्दुओं से अलग हो अलग देश बनाने की. परन्तु गाँधी जी का सवर्ण हिन्दुओं के हित को सुरक्षित रखने और अछूतों को हिन्दू समाज का गुलाम बनाये रखने का स्वार्थ था. यही कारण था कि उन्होंने सभी तथ्यों व तर्कों को नकारते हुए 20 सितम्बर, 1932 को अछूतों के पृथक निर्वाचन के अधिकार के विरुद्ध आमरण अनशन शुरू कर दिया. यह एक विकट स्थिति थी. एक तरफ गाँधी जी के पक्ष में एक विशाल शक्तिशाली हिन्दू समुदाय था, दूसरी तरफ डॉ. आंबेडकर और अछूत समाज. अंतत भारी दबाव एवं अछूतों के संभव जनसंहार के भय तथा गाँधी जी की जान बचाने के उद्देश्य से डॉ. आंबेडकर तथा उनके साथियों को दलितों के पृथक निर्वाचन के अधिकार की बलि देनी पड़ी और सवर्ण हिन्दुओं से 24 सितम्बर , 1932 को तथाकथित पूना पैक्ट करना पड़ा. इस प्रकार अछूतों को गाँधी जी की जिद्द के कारण अपनी राजनैतिक आज़ादी के अधिकार को खोना पड़ा.
यद्यपि पूना पैक्ट के अनुसार दलितों के लिए ‘ कम्युनल अवार्ड ‘ में सुरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा कर 78 से 151 हो गयी परन्तु संयुक्त निर्वाचन के कारण उनसे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने का अधिकार छिन्न गया जिसके दुष्परिणाम आज तक दलित समाज झेल रहा है. पूना पैकट के प्रावधानों को गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट, 1935 में शामिल करने के बाद सन 1937 में प्रथम चुनाव संपन्न हुआ जिसमें गाँधी जी के दलित प्रतिनिधियों को कांग्रेस द्वारा कोई भी दखल न देने के दिए गए आश्वासन के बावजूद कांग्रेस ने 151 में से 78 सीटें हथिया लीं क्योंकि संयुक्त निर्वाचन प्रणाली में दलित पुनः सवर्ण वोटों पर निर्भर हो गए थे . गाँधी जी और कांग्रेस के इस छल से खिन्न होकर डॉ. आंबेडकर ने कहा था, ” पूना पैकट में दलितों के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है.”
कम्युनल अवार्ड के माध्यम से अछूतों को जो पृथक निर्वाचन के रूप में अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने और दोहरे वोट के अधिकार से सवर्ण हिन्दुओं की भी दलितों पर निर्भरता से दलितों का स्वंतत्र राजनीतिक अस्तित्व सुरक्षित रह सकता था परन्तु पूना पैक्ट करने की विवशता ने दलितों को फिर से स्वर्ण हिन्दुओं का गुलाम बना दिया. इस व्यवस्था से आरक्षित सीटों पर जो सांसद या विधायक चुने जाते हैं वे वास्तव में दलितों द्वारा न चुने जा कर विभिन्न राजनैतिक पार्टियों एवं सवर्णों द्वारा चुने जाते हैं जिन्हें उन का गुलाम/ बंधुआ बन कर रहना पड़ता है. सभी राजनैतिक पार्टियाँ गुलाम मानसिकता वाले ऐसे प्रतिनिधियों पर कड़ा नियंत्रण रखती हैं और पार्टी लाइन से हट कर किसी भी दलित मुद्दे को उठाने या उस पर बोलने की इजाजत नहीं देतीं. यही कारण है कि लोकसभा तथा विधान सभायों में दलित प्रतिनिधियों कि स्थिति महाभारत के भीष्म पितामह जैसी रहती है जिस ने यह पूछने पर कि ” जब कौरवों के दरबार में द्रौपदी का चीर हरण हो रहा था तो आप क्यों नहीं बोले?” इस पर उन का उत्तर था, ” मैंने कौरवों का नमक खाया था.”
वास्तव में कम्युनल अवार्ड से दलितों को स्वंतत्र राजनैतिक अधिकार प्राप्त हुए थे जिससे वे अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनने के लिए सक्षम हो गए थे और वे उनकी आवाज़ बन सकते थे. इस के साथ ही दोहरे वोट के अधिकार के कारण सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में सवर्ण हिन्दू भी उन पर निर्भर रहते और दलितों को नाराज़ करने की हिम्मत नहीं करते. इस से हिन्दू समाज में एक नया समीकरण बन सकता था जो दलित मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करता. परन्तु गाँधी जी ने हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म के विघटित होने की झूठी दुहाई दे कर तथा आमरण अनशन का अनैतिक हथकंडा अपना कर दलितों की राजनीतिक स्वतंत्रता का हनन कर लिया जिस कारण दलित सवर्णों के फिर से राजनीतिक गुलाम बन गए. वास्तव में गाँधी जी की चाल काफी हद तक राजनीतिक भी थी जो कि बाद में उनके एक अवसर पर सरदार पटेल को कही गयी इस बात से भी स्पष्ट है:
” अछूतों के अलग मताधिकार के परिणामों से मैं भयभीत हो उठता हूँ. दूसरे वर्गों के लिए अलग निर्वाचन अधिकार के बावजूद भी मेरे पास उनसे सौदा करने की गुंजाइश रहेगी परन्तु मेरे पास अछूतों से सौदा करने का कोई साधन नहीं रहेगा. वे नहीं जानते कि पृथक निर्वाचन हिन्दुओं को इतना बाँट देगा कि उसका अंजाम खून खराबा होगा. अछूत गुंडे मुसलमान गुंडों से मिल जायेंगे और हिन्दुओं को मारेंगे. क्या अंग्रेजी सरकार को इस का कोई अंदाज़ा नहीं है? मैं ऐसा नहीं सोचता.” (महादेव देसाई, डायरी, पृष्ट 301, प्रथम खंड).
गाँधी जी के इस सत्य कथन से आप गाँधी जी द्वारा अछूतों को पूना पैक्ट करने के लिए बाध्य करने के असली उद्देश्य का अंदाज़ा लगा सकते हैं.
दलितों की संयुक्त मताधिकार व्यवस्था के कारण सवर्ण हिन्दुओं पर निर्भरता के फलस्वरूप दलितों की कोई भी राजनैतिक पार्टी पनप नहीं पा रही है चाहे वह डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी ही क्यों न हो. इसी कारण डॉ. आंबेडकर को भी दो वार चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा क्योंकि आरक्षित सीटों पर सवर्ण वोट ही निर्णायक होता है. इसी कारण सवर्ण पार्टियाँ ही अधिकतर आरक्षित सीटें जीतती हैं. पूना पैक्ट के इन्हीं दुष्परिणामों के कारण ही डॉ. आंबेडकर ने संविधान में राजनैतिक आरक्षण को केवल 10 वर्ष तक ही जारी रखने की बात कही थी. परन्तु विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ इसे दलितों के हित में नहीं बल्कि अपने स्वार्थ के लिए अब तक लगातार 10-10 वर्ष तक बढाती चली आ रही हैं क्योकि इस से उन्हें अपने मनपसंद और गुलाम दलित सांसद और विधायक चुनने की सुविधा रहती है.
सवर्ण हिन्दू राजनीतिक पार्टियाँ दलित नेताओं को खरीद लेती हैं और दलित पार्टियाँ कमज़ोर हो कर टूट जाती हैं. यही कारण है की उत्तर भारत में तथाकथित दलितों की कही जाने वाली बहुजन समाज पार्टी भी ब्राह्मणों और बनियों के पीछे घूम रही है और ” हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है” जैसे नारों को स्वीकार करने के लिए वाध्य है. अब तो उसका रूपान्तार्ण बहुजन से सर्वजन में हो गया है. इन परिस्थितयों के कारण दलितों का बहुत अहित हुआ है वे राजनीतिक तौर प़र सवर्णों के गुलाम बन कर रह गए हैं. अतः इस सन्दर्भ में पूना पैक्ट के औचित्य की समीक्षा करना समीचीन होगा. क्या दलितों को पृथक निर्वाचन की मांग पुनः उठाने के बारे में नहीं सोचना चाहिए ?
यद्यपि पूना पैक्ट की शर्तों में छुआ-छूत को समाप्त करने, सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने तथा दलितों की शिक्षा के लिए बजट का प्रावधान करने की बात थी परन्तु आजादी के 65 वर्ष बाद भी उनके किर्यान्वयन की स्थिति दयनीय ही है. डॉ. आंबेडकर ने अपने इन अंदेशों को पूना पैक्ट के अनुमोदन हेतु बुलाई गयी 25 सितम्बर , 1932 को बम्बई में सवर्ण हिन्दुओं की बहुत बड़ी मीटिंग में व्यक्त करते हुए कहा था, ” हमारी एक ही चिंता है. क्या हिन्दुओं की भावी पीढियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी ? ” इस पर सभी सवर्ण हिन्दुओं ने एक स्वर में कहा था, ” हाँ, हम करेंगे.” डॉ. आंबेडकर ने यह भीं कहा था, ” हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिन्दू सम्प्रदाय एक संघटित समूह नहीं है बल्कि विभिन्न सम्प्रदायों की फेडरेशन है. मैं आशा और विश्वास करता हूँ कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा एक सम्मानजनक भावना से काम करेंगे.” क्या आज सवर्ण हिन्दुओं को अपने पूर्वजों द्वारा दलितों के साथ किये गए इस समझौते को ईमानदारी से लागू करने के बारे में थोडा बहुत आत्म चिंतन नहीं करना चाहिए. यदि वे इस समझौते को ईमानदारी से लागू करने में अपना अहित देखते हैं तो क्या उन्हें दलितों के पृथक निर्वाचन का राजनैतिक अधिकार लौटा नहीं देना चाहिए?

"मायावती जितनी छोटी है, उतनी ही खोटी है !


मान्यवर कांशीराम जी के निकट सहयोगी रहे C. L. Chumber जी की वॉल से ...

शहीदे आजम साहब कांशीराम जी को हैदराबाद से अगवा किया गया था और 10 सितंबर, 2003 को हैदराबाद के निजाम अस्पताल लाया गया। यह खबर फैला दी गई कि उन्हें दिमागी बीमारी है। इसके बाद उन्हें विमान से दिल्ली लाया गया, जिसका वीडियो डीडी न्यूज़ चैनल पर दिखाई गई थीं। मैंने खुद वे तस्वीरें देखी थीं। मैं हैरान रह गया ! उन्हें भारत के सबसे बड़े अस्पताल दिल्ली के ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट लाया गया। इसके बाद उन्हें इंडो-आर्यन के उस बत्रा हॉस्पीटल में कैद करके रखा गया, जिसका उद्घाटन लालकृष्ण आडवाणी ने ही किया था। देश के सबसे बड़े अस्पताल से हटाकर उन्हें इस छोटे अस्पताल में क्यों लाया गया था ? आडवाणी और मायावती दोनों के मसूरी हिल स्टेशन पर पास-पास ही होटल हैं। मायावती ने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर तक को कांशीराम जी से मिलने और उनकी सेहत के बारे में पूछने का अनुमति नहीं दी। क्यों ? उन्होंने साहब कांशीराम की माता और उनके परिजनों को भी उनसे क्यों नहीं मिलने दिया ?
हमने जम्मू, लुधियाना, हरिद्वार, अंबाला और जयपुर की अक्टूबर 2005 की मायावती की रैलियों में कांशीराम जी को लाने की मांग की लेकिन उन्होंने इन्कार कर दिया। क्यों ? क्यों उन्होंने दिसंबर, 2005 में कांशीराम की माता जी के निधन पर उनकी चिता को मुखाग्नि देने का मौका कांशीराम जी को नहीं दिया ? सितंबर, 2002 में जम्मू के अखनूर में बसपा की रैली में मायावती की मौजूदगी में अपनी चुनावी सभा में कांशीराम जी क्यों रोते हुए बोले थे, "मायावती जितनी छोटी है, उतनी ही खोटी है ! ये बड़ों-बड़ों को अपनी उंगली पर नचाती है!" साहब कांशीराम और मायावती के बीच आई इस दरार को मनुवादी मीडिया ने सनसनीखेज खबर के रूप में क्यों नहीं दिखाया ? मैं खुद उस रैली में मौजूद था, लेकिन जब मैं सूमो कार से यात्रा कर रहा था, तभी मायावती के चमचों ने मुझे कांशीराम जी से अलग कर दिया था..ऐसा क्यों...?
(Sahib Kanshi Ram and Miss Mayawati 's last photo on last rally on 28th Aug. , 2003 at Lucknow !)

rajkumar mulnivasi


गौरी लंकेश के आखिरी संपादकीय का खुलासा, किसने और क्यों की उनकी हत्या?


गौरी लंकेश के आखिरी संपादकीय का खुलासा,
किसने और क्यों की उनकी हत्या?


गौरी लंकेश नाम है पत्रिका का। 16 पन्नों की यह पत्रिका हर हफ्ते निकलती है। 15 रुपये कीमत होती है। 13 सितंबर का अंक गौरी लंकेश के लिए आखिरी साबित हुआ। हमने अपने मित्र की मदद से उनके आखिरी संपादकीय का हिन्दी में अनुवाद किया है ताकि आपको पता चल सके कि कन्नडा में लिखने वाली इस पत्रकार की लिखावट कैसी थी, उसकी धार कैसी थी। हर अंक में गौरी ‘कंडा हागे’ नाम से कालम लिखती थीं। कंडा हागे का मतलब होता है जैसा मैने देखा। उनका संपादकीय पत्रिका के तीसरे पन्ने पर छपता था। इस बार का संपादकीय फेक न्यूज पर था और उसका टाइटल था- फेक न्यूज के जमाने में-
इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है। झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं। झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी। अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी। उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया। फैलाने वाले संघ के लोग थे। ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाजिट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं। पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं। संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया। ये झूठ इतना जोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है। ये सब झूठ है।
इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा च्व्ैज्ब्।त्क्.प्छ नाम की वेबसाइट पर। यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है। इसका काम हर दिन फेक न्यूज बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है। 11 अगस्त को च्व्ैज्ब्।त्क्.प्छ में एक हेडिंग लगाई गई। कर्नाटक में तालिबान सरकार। इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई। संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए। जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज रहते हैं उन लोगों ने इस फेक न्यूज को अपना हथियार बना लिया। सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बगैर सोचे समझे इसे सही मान लिया। अपने कान, नाक और भेजे का इस्तेमाल नहीं किया।
पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सजा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायर होने लगी। इस ढोंगी बाबा के साथ मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा। इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए। इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाजू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई। यह तस्वीर फोटोशाप थी। असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया। शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी।
एक्चुअली, पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फेक न्यूज प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था। अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है। पहले इस तरह के फेक न्यूज ही चलती रहती थी लेकिन अब फेक न्यूज के साथ साथ असली न्यूज भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं।
उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को खूब वायरल हुआ। धू्रव राठी ने उसका विश्लेषण किया था। धु्रव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है। पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17 अगस्ता के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज्यादा लोगों तक पहुंच गया। (गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगेे, झूठ ही बोलेंगे)। धु्रव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिय’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं। उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी। अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हजार नए करदाता जुड़े हैं। तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है।
आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है। मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है। उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं। उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रजी टीवी चैनलों ने खबर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है। वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30 लाख बढ़ गया। उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं। बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं। संघ का ही काम करते हैं। जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया। जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए। इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे।
आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फेक न्यूज की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं। धु्रव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं। प्रतीक सिन्हा ंसजदमूे.पद नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं। होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है। साथ ही साथ ज्भ्म्ॅप्म्त्म्.प्छए ैब्त्व्स्स्.प्छए छम्ॅैस्।न्छक्त्ल्.ब्व्डए ज्भ्म्फन्प्छज्.ब्व्ड जैसी वेबसाइट भी सक्रिय हैं। मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फेक न्यूज की सच्चाई को उजागर किया है। इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं। इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना।
कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में जोरदार बारिश हुई। उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया। कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है। बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है। संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मजाक उड़ाना। जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था। लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है।
हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए। एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी। दूसरे फोटो में एक महीला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है। बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया। पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे। दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी। सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फेक न्यूज फैलाने में माहिर हैं। उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे। फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है। अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है, उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है। प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के जरिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी। पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है। पाकिस्तान का है जहाँ एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है।
इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है। यह सवाल पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई। बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर कब्जा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था। मगर फोटोशाप के जरिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे। लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया। ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मजाक उड़ाया।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक तस्वीर साझा की। लिखा कि भारत 50,000 किलोमीटर रास्तों पर सरकार ने तीस लाख एल ई डी बल्ब लगा दिए हैं। मगर जो तस्वीर उन्होंने लगाई वो फेक निकली। भारत की नहीं, 2009 में जापान की तस्वीर की थी। इसी गोयल ने पहले भी एक ट्वीट किया था कि कोयले की आपूर्ति में सरकार ने 25,900 करोड़ की बचत की है। उस ट्वीट की तस्वीर भी झूठी निकली।
छत्तीसगढ़ के पी डब्ल्यू डी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया। अपनी सरकार की कामयाबी बताई। उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले। बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है।
ऐसे फेक न्यूज फैलाने में हमारे कर्नाटक के आर एस एस और बीजेपी लीडर भी कुछ कम नहीं हैं। कर्नाटक के सांसद प्रताप सिम्हा ने एक रिपोर्ट शेयर किया, कहा कि ये टाइम्स आफ इंडिय मे आया है। उसकी हेडलाइन ये थी कि हिन्दू लड़की को मुसलमान ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दुनिया भर को नैतिकता का ज्ञान देने वाले प्रताप सिम्हा ने सच्चाई जानने की जरा भी कोशिश नहीं की। किसी भी अखबार ने इस न्यूज को नहीं छापा था बल्कि फोटोशाप के जरिए किसी दूसरे न्यूज में हेडलाइन लगा दिया गया था और हिन्दू मुस्लिम रंग दिया गया। इसके लिए टाइम्स आफ इंडिया का नाम इस्तमाल किया गया। जब हंगामा हुआ कि ये तो फेक न्यूज है तो सांसद ने डिलिट कर दिया मगर माफी नहीं मांगी। सांप्रादायीक झूठ फैलाने पर कोई पछतावा जाहिर नहीं किया।
जैसा कि मेरे दोस्त वासु ने इस बार के कॉलम में लिखा है, मैंने भी एक बिना समझे एक फेक न्यूज शेयर कर दिया। पिछले रविवार पटना की अपनी रैली की तस्वीर लालू यादव ने फोटोशाप करके साझा कर दी। थोड़ी देर में दोस्त शशिधर ने बताया कि ये फोटो फर्जी है। नकली है। मैंने तुरंत हटाया और गलती भी मानी। यही नहीं फेक और असली तस्वीर दोनों को एक साथ ट्वीट किया। इस गलती के पीछे सांप्रदियाक रूप से भड़काने या प्रोपेगैंडा करने की मंशा नहीं थी। फासिस्टों के खिलाफ लोग जमा हो रहे थे, इसका संदेश देना ही मेरा मकसद था। फाइनली, जो भी फेक न्यूज को एक्सपोज करते हैं, उनको सलाम। मेरी खवाहिश है कि उनकी संख्या और भी ज्यादा हो।

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

आनुवंशिकी आर्यों की वापसी





नई दिल्ली/दै.मू.समाचार
01 अगस्त 2017  इंडिया टूडे
हमारे पूर्वज कहां से आए थे? यह एक जबरदस्त भावनात्मक और राजनैतिक मुद्दा हो सकता है। कई लोगों के लिए यह सवाल अहम है और आधुनिक जेनेटिक्स यानी आनुवंशिकी काफी हद तक इसका जवाब दे चुकी है। बीएमसी इवॉल्यूशनरी बायोलॉजी नामक जर्नल में हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक पर्चे ने भारतीय मीडिया में एक विवाद को जन्म दे डाला है। यह पर्चा भारतीय उपमहाद्वीप में भारोपीय विस्तार को रेखांकित करता है जिसका निर्णायक स्रोत पॉन्टिक-कैस्पियन क्षेत्र है। पर्चे की भाषा थोड़ी गूढ़ और विद्वतापूर्ण है। इसमें कहा गया है कि सभी आधुनिक भारतीयों के पूर्वजों की आनुवंशिकी इस बात के साक्ष्य दर्शाती है कि आज से 4,000-5,000 साल पहले उत्तरी ईरान और कैस्पियन क्षेत्र से जो आबादी उपमहाद्वीप की ओर आई थी, उसके साथ यहां का पर्याप्त सम्मिश्रण हुआ था। इस पर्चे पर बहस इसलिए गरम हो गई है क्योंकि वैदिक आर्यों के प्राचीन उद्भव को लेकर लंबे समय से चली आ रही एक राजनैतिक बहस को इसने फिर से ताजा कर दिया है।
दशकों तक इतिहासकारों, भाषाविदों और पुरातत्वविदों ने भारत के साथ आर्यों के संबंध पर बहस की है जिसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकला हैकृबल्कि उलटे हुआ यह है कि सारी दलीलें संघ परिवार की उग्र-राष्ट्रवादी राजनीति और सेकुलर तथा उदार विपक्ष के दो खांचों में बंटकर रह गई हैं। कई हिंदू राष्ट्रवादी इस विचार पर असहज हो जाते हैं कि भारतीयों की जड़ें इस उपमहाद्वीप के पावन भूगोल से बाहर भी हो सकती हैं। उसी तरह विजयी आक्रांताओं के रूप में वैदिक आर्यों और बाद में इस्लामिक तथा यूरोपीय साम्राज्यों के बीच की समांतर तुलनाओं को स्वीकारने में उदारपंथियों का भी पाखंड सामने आ जाता है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान जेनेटिक विज्ञान ने अपने निष्कर्ष इस संबंध में देने शुरू किए हैं जो कहीं ज्यादा पुख्ता तरीके से संकेत करते हैं कि 4,000 से 5,000 साल पहले कुछ लोगकृजो आर्य हो सकते हैंकृइस उपमहाद्वीप में आए होंगे। बहुत संभव है कि प्राचीन डीएनए शोध का क्षेत्र जल्द ही इस सवाल को हमेशा के लिए हल कर दे। बीएमसी का दस्तावेज इस दिशा में दशकों से चल रहे सिलसिलेवार शोधों का महज एक हिस्सा है जो हर नई प्रौद्योगिकीय तरक्की के साथ और ज्यादा सटीक होते जा रहे हैं। आधुनिक मनुष्यों के जेनेटिक मार्कर के पैटर्न को देखते हुए आनुवंशिकी विज्ञानियों ने हमारी नस्ल का एक वंशवृक्ष तैयार किया है। शोधकर्ता दसियों हजार साल पुराने अवशेषों की आनुवंशिकीय सामग्री का भी परीक्षण कर रहे हैं। इसी सामग्री ने आज अफ्रीका से बाहर के सभी मनुष्यों में निएंडरथल मानव की विरासत की मौजूदगी को पुष्ट किया है।
जेनेटिक विज्ञान के अगुआ चूंकि अमेरिकी शोधकर्ता हैं, लिहाजा पूछे जाने वाले सवालों में भी कुछ पूर्वाग्रहों को जगह मिल जाती है लेकिन जिस तरीके से इस क्षेत्र का लोकतंत्रीकरण हुआ है, उसने और ज्यादा विविध विषयों के अन्वेषण को सुगम बनाने का काम किया है जिनमें भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़े प्रश्न भी हैं। यूरोप केंद्रित विचारधाराओं का अपना प्रतिविमर्श रहा है। भारतीय राष्ट्रवादी बाल गंगाधर तिलक ने जहां 1903 में उस दौर के प्रवास से जुड़ी आस्थाओं के मद्देनजर द आर्कटिक होम इन द वेदाज की रचना की थी, वहीं आज की तारीख में कोनराड एल्स्ट जैसे भारतीय विषयों के पश्चिमी जानकार उस सिद्धांत को सिर के बल खड़ा करके आउट ऑफ  इंडिया विमर्श का प्रचार कर रहे हैं। ये दलीलें राजनीति और राष्ट्रवाद के दायरे से बाहर हैं। अर्थशास्त्री और लेखक संजीव सान्याल कहते हैं कि 1,500 ईपू. एकरेखीय आर्य आक्रमण या पलायन का विचार अब निर्णायक ढंग से गलत साबित हो चुका है। अपनी पुस्तक द ओशन ऑफ  चर्न में सान्याल लोगों की परस्पर आवाजाही पर जोर देते हैं, वे इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि पुरातत्व विज्ञान सिंधु घाटी की किसी भी सभ्यता को मध्य एशिया से नहीं बांधता और ऐसा लगता है कि वेद खुद दक्षिणी एशिया से बाहर के भूगोल से बेखबर थे।
दस साल पहले आप आनुवंशिकीय दृष्टिकोण से सान्याल की प्रस्थापनाओं का समर्थन कर सकते थे। उस वक्त तक माइटोकॉन्ड्रिया के आधार पर मातृवंश की पहचान ही निष्कर्ष का एक साधन हुआ करती थी। इसी से पता चलता था कि सारे मनुष्य अफ्रीका से निकलकर आए हैं। उसके आधार पर मिले साक्ष्य इस ओर ठोस रूप से इशारा करते हैं कि दक्षिण एशियाई आबादी की जड़ें अपने उपमहाद्वीप में ही हैं। दूसरे शोधकर्ता वाइ क्रोमोसोम के क्वयूटेशन के आधार पर पितृवंश की तलाश कर रहे थे। इन नतीजों से निकले साक्ष्य कहीं ज्यादा संदिग्ध थे। एक ज्यादा समान दक्षिण एशियाई वाइ वंशावली आर1ए1ए पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया में भी बहुत समान है। इस वंशावली की खोज करने वाल जेनेटिक विज्ञानी स्पेंसर वेल्स कहते हैं कि नब्बे के दशक के अंत में किया उनका काम इस बात का ठोस संकेत देता है कि 5,000 साल पहले पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के स्तेपी से भारत की ओर पर्याप्त पलायन हुआ था। वेल्स ने इसे भारोपीय भाषाएं बोलने वाले बंजारों के साथ जोड़ा था और वे मानते हैं कि हालिया नतीजे वही बात कह रहे हैं। जाहिर है, यह माइटोकॉन्ड्रिया के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों से हटकर है। आर1ए1ए चूंकि बहुत विविधतापूर्ण नहीं है इसलिए इस बात का बोध होना कठिन है कि उसकी उत्पत्ति कहां या कब हुई रही होगी। वेल्स को छोड़कर कई शोधकर्ताओं का कहना था कि आर1ए1ए हो सकता है, विशुद्ध दक्षिण एशियाई ही रहा हो।
आज हम पहले के मुकाबले आर1ए1ए के बारे में ज्यादा जानते हैं। पहले शोधकर्ता वाइ क्रोमोसोम पर कुछेक सौ मार्करों को देखते थे या फिर उन क्षेत्रों को जहां सघनता ज्यादा थी लेकिन आज तकरीबन पूरे वाइ क्रोमोसोम की ही सीक्वेंसिंग कर ली गई है। वेल्स के आरंभिक संशय को पुष्ट करते हुए आज कई शोधकर्ता मान रहे हैं कि आर1ए1ए ने यूरेशियाई स्तेपी से दक्षिण एशिया में 4,000 से 5,000 साल पहले प्रवेश किया होगा। आर1ए1ए के विविधतापूर्ण न होने की एक वजह यह है कि उसका हाल ही में बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ हैय क्वयूटेशनों को इकट्ठे हुए बहुत वक्त नहीं गुजरा है। संपूर्ण जीनोम विश्लेषण से हम पा सकते हैं कि पूर्वी यूरोपीय आर1ए1ए की वंशावली एक है जबकि इसके मध्य एशियाई और दक्षिण एशियाई संस्करण एक जैसे हैं। बीएमसी पर्चे के सहलेखक मार्टिन रिचर्ड्स कहते हैं, यह हाइ रेजॉल्यूशन हमें विस्तृत वंशावली सूचना और सटीक जेनेटिक डेटिंग मुहैया करवाता हैकृइसलिए हम देख पाते हैं कि वंशावलियां कब और कहां नई शाखाओं में परिवर्तित हो जाती हैं।
प्राचीन डीएनए ने आर1ए1ए की विभिन्न शाखाओं के बीच संबंधों पर भी प्रकाश डालने का काम किया है। मध्य एशिया के विलुप्त गड़रिये, स्कायथियन और उनके भौगोलिक परिजन स्रुबना लोग जो 3,750 साल पहले कैस्पियन सागर के उत्तर में रहा करते थे, उनमें भी यही वाइ वंशावली मिलती है। ध्यान देने वाली बात है कि स्कायथियनों और स्रुबना की आर1ए1ए वंशावली यूरोपियों से नहीं बल्कि मध्य एशियाई और दक्षिण एशियाई लोगों से मिलती है।
माइटोकॉन्ड्रिया के आधार पर मिले निष्कर्ष और वाइ क्रोमोसोम के आधार पर निकली वंशावली के बीच के विरोधाभास को भी अब हल कर लिया गया है। इसका जवाब यह है कि भारत में जो पलायन हुआ उसमें यौन संतुलन नहीं था। बीएमसी के पर्चे में यह एक अहम बिंदु हैं। रिचर्ड्स कहते हैं, ताम्र युग में पूर्वी यूरोप के स्तेपी क्षेत्र से खासकर नए लोगों के आगमन में बिल्कुल स्पष्ट लैंगिक झुकाव था (यूरोप में भी ऐसा ही मामला है जहां स्तेपी से पलायन करने वाले मुख्यतः पुरुष ही थे)।
आज हमारी समझदारी अकेले वाइ क्रोमोसोम या माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए अध्ययन तक सीमित नहीं है। आज जबकि पूरे के पूरे जीनोम का अध्ययन किया जा सकता है, वैज्ञानिकों ने दक्षिण एशिया के अतीत पर हमारी समझदारी को नई शक्ल दी है। 2013 में आनुवंशिकी विज्ञानी प्रिया मूरजानी और उनके सहयोगियों ने एक शोध प्रकाशित किया था जिसका निष्कर्ष था कि 2,000 से 4,000 साल पहले भारतीय उपमहाद्वीप में दो निहायत अलहदा आबादियों का मिश्रण हो रहा था। मूरजानी कहती हैं कि 4,000 साल पहले भारतीय उपमहाद्वीप में विशुद्ध और अमिश्रित एएनआइ और एएसआइ समूह मौजूद हुआ करते थे। पैतृक उत्तर भारतीयों को एएनआइ और पैतृक दक्षिण भारतीयों को एएसआइ कहते हैं। एएनआइ की आबादी आनुवंशिक स्तर पर पश्चिम एशियाइयों और यूरोपियों से मिलती थी। भारतीय मूल के इस मॉडल को विकसित करने वाले एक मौलिक शोधकर्ता निक पैटर्सन एएनआइ और यूरोपीय आबादियों के बीच जेनेटिक दूरी को इतना कम करके बताते हैं कि अगर आपको किसी की उत्पत्ति का पता नहीं है तो आप उसे यूरोपीय आबादी करार देंगे। दूसरी ओर, एएसआइ के कोई करीबी परिजन नहीं मिलते हैं। वे अंडमान के मूल निवासियों के सुदूर परिजन थे। मूरजानी यह भी बताती हैं कि हालिया अतीत में भले ही इन समूहों की नुमाइंदगी करने वाली गैर-मिश्रित आबादी रही हो लेकिन आज सभी दक्षिण एशियाई मूल निवासी दोनों से ही निकले हुए लगते हैं।
मूरजानी ने 2013 के अपने पर्चे में अनुमान लगाया था कि तमिलनाडु के दलित 40 फीसदी एएनआइ हैं (बाकी जाहिरा तौर पर एएसआइ)। पठान 70 फीसदी एएनआइ हैं, कश्मीरी पंडित 65 फीसदी एएनआइ जबकि उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण और क्षत्रिय 55 से 60 फीसदी एएनआइ हैं। जब एएनआइ और एएसआइ के मिश्रण की बात आती है तो इसे पता करने के दो नियम हैं। आप जितना ज्यादा उत्तर पश्चिम में जाएंगे, आपको उतने एएनआइ मिलेंगे। उच्च जातियों में ज्यादा एएनआइ पाए जाते हैं (बंगाली और मुंडा जनजाति पूर्वी एशियाई हैं जो न एएनआइ है और न ही एएसआइ)। ऐसे ही पैटर्न की उक्वमीद वाइ क्रोमोसोम की आर1ए1ए वंशावली से की जा सकती है जिसके बारे में आनुवंशिक विज्ञानियों का अंदाजा है कि वे मध्य एशिया से 4,000-5,000 साल पहले आए रहे होंगे। आबादी से जुड़ी आनुवंशिकी पर नजर रखने वाले भारतीय पर्यवेक्षकों ने इन निष्कर्षों को अपनी समझदारी में पिरोने का काम किया है। सान्याल कहते हैं कि भारतीय कई जेनेटिक धाराओं के मिश्रण हैं, खासकर एएनआइ और एएसआइ जो पाषाण युग से भारतीय उपमहाद्वीप में रह रहे हैं। मूरजानी कहती हैं कि उन्होंने अपने अध्ययन में पलायन की दिशा पर विशिष्ट काम नहीं किया है, लेकिन वे मानती हैं कि एएनआइ तक पलायन की दिशा भारत की ओर ही रही। वे ऐसा क्यों कह रही हैं? आइए, पहले आउट ऑफ इंडिया वाली प्रस्थापना में निहित दो बिंदुओं को संबोधित करते हैं। जैसा कि सान्याल कहते हैं, दक्षिणी एशिया और मध्य एशिया के बीच पुरातात्विक संबंध सूक्ष्म हैं। आर्यों को भारत से पहले का काल याद नहीं पड़ता, लेकिन पिछले 10 साल के दौरान प्राचीन डीएनए में हुई खोजों ने दिखाया है कि जहां कहीं पुरातत्वविदों को कोई पलायन नहीं दिखा, वहां बड़े पैमाने पर पलायन हुआ था। इसके भौतिक रिकॉर्ड अधूरे हैं लिहाजा इसे इतिहास के व्यापक चलन के साथ जोडना आसान नहीं है, लेकिन इसका एक अंश यह कहता है कि कुछ आबादी, जैसे बंजारे, अपने पीछे पुरातात्विक निशान नहीं छोड़ जाती। जहां तक भारतीय धार्मिक व मौखिक इतिहास की दलीलों का सवाल है, तो इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि यूनान के लोगों की भी स्मृति यूनान से पहले की नहीं है बावजूद इसके वे भारोपीय लोगों के जितने ही प्राचीन हैं। इस मामले में सांस्कृतिक स्मृतियों के आधार पर कोई फैसला इसीलिए नहीं दिया जा सकता। यही वजह है कि तमाम अनिश्चयों का एक ही समाधान हैकृप्राचीन डीएनए पांच हजार से दस हजार साल पहले यूरोप का निकटवर्ती पूर्व और यूरोप के नमूनों का परीक्षण दिखाता है कि पलायन के कुछ अध्यायों के बाद वह प्रभुत्वकारी जेनेटिक पैटर्न उभरा जिसे हम आज देख पाते हैं। हमारे पास यूरोप के निकटवर्ती पूर्व, मध्य एशिया और यूरोप के प्राचीन व्यक्तियों के पर्याप्त नमूने हैं जिनके आधार पर हम पाते हैं कि बीते दस हजार साल के दौरान आबादी में भारी बदलाव हुए हैं, तो क्या हम भारत को इससे कुछ अलग मान सकते हैं?
दक्षिण एशियाई जेनेटिक परिदृश्य की एक समझदारी कायम करने के लिए यह जानना जरूरी है कि पश्चिमी यूरेशिया की दो प्राचीन आबादियों की इस उपमहाद्वीप के लोगों से काफी निकटता है। पहली, पश्चिमी ईरान के आरंभिक किसान जो जागरोस में थे। उनकी विरासत आज समूचे यूरेशिया में पाई जाती है और भारत के कई आबादी समूहों के साथ उनकी समानताएं मिली हैं। दूसरे, ताम्र युग में पॉन्टिक स्तेपी निवासी यमना संस्कृति के गड़रिये जो 4,000 से 5,500 साल पहले मौजूद रहे। इनकी दक्षिण एशियाई लोगों से, खासकर उत्तर पश्चिमी क्षेत्र और ब्राह्मणों के साथ काफी ज्यादा समानता है। यमना संस्कृति ताम्र युग के बाद और कांस्य युग के शुरू में 4,000 से 2,300 ईस्वी पूर्व में पॉन्टिक स्तेपी में थी। यमना संस्कृति प्रोटो-इंडो-यूरोपिय के साथ जुड़ी है। हारवर्ड में डेविड राइश की प्रयोगशाला में शोधकर्ताओं ने इस बात का परीक्षण किया कि आखिर कौन से संभावित समूहों ने मिलकर दक्षिण एशियाइयों में एएनआई तत्व को जन्म दिया होगा। काफी सघन तुलना के बाद उन्होंने पाया कि एएनआइ का सबसे सही मॉडल पॉन्टिक गड़रियों और आदिम ईरानी किसानों के सक्विमश्रण के तौर पर बनता है।
दि ओशन ऑफ चर्न में कहा गया है कि विचार और मनुष्य, दोनों दिशाओं में आवाजाही करते हैं। पाइथागोरस और अफलातून के माध्यम से भारत के धार्मिक विचारों और फलसफे का पश्चिम पर प्रभाव पड़ा. इसके उलट भारतीय वर्णमाला की संभावित उत्पत्ति यूरोप के निकटवर्ती पूर्व में रही होगी जबकि इस्लाम और ईसाइयत, दोनों ने इसी उपमहाद्वीप में अपनी जड़ें जमाईं। यही हाल जीन्स का भी है। दक्षिण एशियाई जेनेटिक मार्कर थाईलैंड से लेकर बाली तक दक्षिण-पूर्वी एशिया में पाए जाते हैं। इसके उलट, बंगाली, असमिया और मुंडा लोगों की दक्षिण-पूर्वी विरासत उनके चेहरों और जीन्स में दिखती है और खासकर मुंडा के मामले में तो यह समानता उनकी भाषा से जाहिर होती है. जीन प्रवाह के इस विचार की हालांकि कुछ सीमाएं भी हैं।
भारत की विशिष्ट जेनेटिक विरासत एएसआइ की जड़ें भले उपमहाद्वीप में गहरी हों और इसका कहीं और की आबादी के साथ निकटवर्ती रिश्ता न हो लेकिन ईरान और अफगानिस्तान में कम अनुपात में ही सही, ये मिलती हैं। रोमा लोगों को अपवाद मान लें तो एएसआई की विरासत समूचे पश्चिमी यूरेशिया में अनुपस्थित है (रोमा खानाबदोश लोग हैं जो मुख्यतः यूरोम और 
अमेरिका में रहते हैं, वे मूलतः उत्तर भारत के राजस्थान, हरियाणा और पंजाब इलाके के रहने वाले थे)। इससे पता चलता है कि भारत के बाहर पश्चिम की ओर पलायन पिछले कुछ हजार वर्षों में बहुत कम हुआ था क्योंकि जैसा कि मूरजानी कहती हैं, भारत की सभी आबादियों की पिछले 4,000 साल में वंशावली एएसआइ की ही रही। कई जेनेटिक विज्ञानी अब मानते हैं कि नियोलिथिक और ताम्र युग में मध्य यूरेशिया व पश्चिमी एशिया से दक्षिण एशिया में बड़े पैमाने पर पलायन हुआ था और यही हमारे पास मौजूद आंकड़ों को समझाने का सबसे सहज मॉडल है। आउट ऑफ इंडिया वाला मॉडल सैद्धांतिक रूप से असंभव तो नहीं है लेकिन कई लोगों को यह संग्रहित डेटा की व्याख्या के लिहाज से दूर की कौड़ी जान पड़ता है। संभावनाओं के पार जाने के लिए हमें वापस उसी चीज पर लौटना होगा जिसने अतीत में हमें राह दिखाई हैरू प्राचीन डीनए. दुर्भाग्यवश, कायदे से दक्षिण एशिया का कोई प्राचीन डेटा उपलब्ध नहीं है। आज भी शोधकर्ता हरियाणा के राखीगढ़ी से जुटाए हड़प्पाकालीन नमूनों के आधार पर जेनेटिक नतीजे निकालने में जुटे हुए हैं। इनके नमूना परीक्षण के नतीजे आने के बाद प्रायिकताओं को दूर किया जा सकता है। इंडिया टुडे को पता चला है कि राखीगढ़ी से जुटाए नमूनों से निकले नतीजों का ऐलान इसी साल सितंबर में होना है।
सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के जेनेटिक विज्ञानियों के साथ मिलकर इस परियोजना पर काम करने वाले डेकन कॉलेज के एक पुरातत्वविद् डॉ.वसंत शिंदे राखीगढ़ी के नमूनों से निकले संकेत देने में थोड़ा संकोच बरतते हैं। वे कहते हैं, राजनैतिक रूप से यह बहुत संवेदनशील हैं। चूंकि ये नमूने जिन कब्रों से जुटाए गए, वे 2300 से 2500 ईसा पूर्व के हैंकृयानी वही अवधि जब मार्टिन रिचर्ड्स और उनके सहयोगी पॉन्टिक-कैस्पियन से भारत में व्यापक पलायन की बात करते हैंकृलिहाजा एक संभावना यह कायम रहती है कि राखीगढ़ी से आर1ए1ए डीएनए निकलेगा जो बहस का अंत नहीं कर पाएगा. यह तो केवल एक स्थल है, बाकी सैकड़ों स्थल यूरोप और यूरोप के निकटवर्ती पूर्व के हैं जहां से हमें आश्चर्यजनक नतीजे देखने को मिले हैं। एक वक्त ऐसा होगा जब हमारे पास दक्षिण एशिया से सैकड़ों नमूने होंगे और बेशक चौंकाने वाले नतीजे भी आएंगे।
जनसंख्या के इतिहास के जेनेटिक अध्ययन की दिशा अब पलायन की ओर मुड़ चुकी है लेकिन कुछ लोग अब भी निरंतरता के मॉडल को पकड़े बैठे हैं। ज्ञानेश्वर चौबे बीते 10 साल से मानव जेनेटिक्स पर अध्ययन कर रहे हैं और अपने निष्कर्ष प्रकाशित कर रहे हैं। भारतीय आबादी के इतिहास में उनका योगदान पर्याप्त है। वे आर्यों के व्यापक पलायन की अवधारणा से कतई विचलित नहीं हैं। इसकी बजाए वे मानते हैं कि प्रकाशित शोध ने दिखाया है कि इस पलायन (अगर हम मान भी लें तो) की जेनेटिक छाया न्यूनतम है। बिना प्राचीन डीएनए के हम जीवित मनुष्यों के बीच अंतर के आधार पर मोटी बातें कर सकते हैं, मसलन, अतीत के अवशेषों को आज जीवित लोगों के डेटा के आधार पर पुनर्संयोजित करना, हमारा सारा अनुमान अवधारणाओं पर आधारित है। चौबे नियोलिथिक ईरानी किसानों और ताम्र युग के पॉन्टिक गड़रियों के साथ आधुनिक भारतीयों के जेनेटिक साक्ष्य वाले आंकड़ों का खंडन नहीं करते। वे उसी समान संभाव्यता से यह दलील देते हैं कि जो समूह कांस्य युग या नियोलिथिक युग में भारत में रह रहे थे, हो सकता है कि उनकी वंशावली स्तेपी की आबादी या नियोलिथिक ईरानियों की आबादी से मेल खाती हो। अवधारणाओं को पुनर्संयोजित करते हुए वे इस बात से भी असहमति जताते हैं कि आर1ए1ए के इतिहास में कोई संशोधन किया जाना चाहिए।
वे कहते हैं कि बीएमसी के पर्चे से उन्होंने खुद को आर1, ए1ए के कारण ही अलग कर लिया था। भले कुछ लोगों को यह स्वीकार्य न हो, लेकिन चौबे की दलील का आधार डेटा और सैद्धांतिकी में निहित है, असहमति संभाव्यताओं पर है। जेनेटिक आंकड़ों के मामले में यह सामान्य बात है। बहुत जल्द ही प्राचीन डीएनए इन तमाम टकरावों का समाधान कर देगा, लेकिन यह मुद्दा बेहद राजनैतिक रंगत का है। कुछ चीजें फिर भी हम जानते हैं, जेनेटिक विज्ञानियों ने भारतीयों के जीनोम में जाति और क्षेत्र की विविधता की पुष्टि की है। ऐसा लगता है कि भारी पैमाने पर मिश्रण बीते 4,000 साल के दौरान हुआ है। उससे पहले अधिकांश उपमहाद्वीप ऐसे लोगों से भरा था जो आज जीवित लोगों से जेनेटिक रूप से बहुत भिन्न थे। शायद यह संयोग होकृया नहीं भीकृकि आर1,ए1ए पितृवंशीय लिंकेज जो कई भारतीय पुरुषों को योरोपियों और मध्य एशियाइयों के साथ बांधता है, वह काफी तेजी से विस्तृत होने लगता है जब एएनआइ और एएसआई के बीच दक्षिण एशिया में आखिरी सम्मिश्रण हो रहा होता है। कई ऐसी अहम जेनेटिक प्रयोगशालाएं जिन्होंने यूरोप और उसके निकटवर्ती पूर्व के इतिहास की हमारी समझ को प्राचीन डीएनए अध्ययन के रास्ते समृद्ध किया है, वे अब भारत की ओर देख रही हैं। बहुत दिन नहीं बचे हैं जब एक पुराने विवादास्पद सवाल का हल नए उपकरणों से होगा। अब आप कम से कम यह नहीं कह सकते कि भारतीय आर्यों के भारी संख्या में इस उपमहाद्वीप में आने की सैद्धांतिकी गलत है। उपमहाद्वीप के बाहर प्राचीन समूहों के साथ संपर्क बहुत संभावित है और कई जेनेटिक विज्ञानी अब पलायन और आबादी के कायाकल्प पर आधारित नजरिए का प्रसार कर रहे हैं जो यूरोप और निकटवर्ती पूर्व में एक मानक बन चुका है।
इसके बावजूद कुछ अहम संस्थानों में ऐसे विश्वसनीय वैज्ञानिक मौजूद हैं जो नए मॉडलों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। एक नई सहमति भले ही बन रही हो, लेकिन यह अब तक स्थापित नहीं हो सकी है। जेनेटिक विज्ञान एक मोटी झलक दे सकता है और इसमें त्रुटियों का आकार एक झटके में हजार साल आगे या पीछे का हो सकता है। यहां हर नई खोज व्यापक तस्वीर के विवरणों को थोड़ा और साफ करती है। हम जबरदस्त संक्रमण और महान बौद्धिक उबाल के दौर में हैं। यह उबाल राजनीति तक चला जाता है। जिस तरह आर्यों के आक्रमण का मूल मॉडल राजनीति-प्रेरित था, उसी तरह आउट ऑफ  इंडिया सैद्धांतिकी को भी राजनैतिक वैधता प्राप्त है। हकीकत यह है कि मानव इतिहास के ये मॉडल या तो सही हैं या फिर गलत. ये समझ में आएं या नहीं लेकिन तथ्य तो हमारे पास ही हैं। इन तथ्यों की राजनैतिक व्याख्या में बदलाव होता रहता है। मनुष्य परिवर्तनशील है, लेकिन प्रकृति अनंत है.फिलहाल हम अंधेरे में आईना देख रहे हैं। आने वाले कुछ वर्षों में यह बात शायद शीशे की तरह साफ हो जाएगी कि 4,000 साल पहले भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ नए लोग आए थे। आज अधिकतर प्रतिष्ठित शोधकर्ताओं के लिए यह आस्था का मामला है। एक सदी की सैद्धांतिकी और वैचारिकी ने हमें तथ्यों और प्रति-तथ्यों से समृद्ध किया है लेकिन हो सकता है कि जेनेटिक्स की खोह से निकला इतिहास हमारी रूढ़ और भव्य धारणाओं को चमत्कृत करके तोड़ दे। इस शोध का सबसे 
उत्साहजनक पहलू यही होगा कि सदियों पुराने तर्कों के साथ यह शोध कैसे अपना मेल बैठा पाता है।