रविवार, 26 जनवरी 2020

भारतीय संविधान से जुड़े कुछ खास पहलू


देहरादून में छपी थी संविधान की पहली कॉपी, इटैलिक स्टाइल में हाथों से हुई थी लिखावट
26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जाता है. बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भारतीय संविधान का मसौदा तैयार किया था और 26 नवंबर 1949 को इसे भारतीय संविधान सभा के समक्ष लाया गया. इसी दिन संविधान सभा ने इसे अपना लिया था.
आज देश 73वां संविधान दिवस मना रहा है. संविधान बनाने में किन लोगों का योगदान था ये तो सब जानते हैं, लेकिन संविधान की छपाई कहां हुई ये किसी को नहीं पता. आज हम आपको संविधान की छपाई से जुड़ी कई रोचक जानकारी देने जा रहे हैं. भारत के संविधान को प्रकाशित करने में देहरादून स्थित सर्वे ऑफ इंडिया का अहम योगदान रहा है. भारत का संविधान लिखित ही नहीं बल्कि हस्तलिखित भी था. यह मसौदा सर्वे ऑफ इंडिया की लिखने वाली समिति ने हिंदी, अंग्रेजी में हाथ से लिखकर टेलीग्राफ किया था. जिसमें कोई भी टाइपिंग और प्रिंटिंग शामिल नहीं थी. जिसकी एक प्रति देहरादून स्थित सर्वे ऑफ इंडिया में सुरक्षित रखी गई है, जबकि हाथ से लिखी गई मूल संविधान की प्रति को नई दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में रखा गया है.
भारत के संविधान की मूल प्रति को देहरादून स्थित सर्वे ऑफ इंडिया में हाथों से लिखा गया है. संविधान को दिल्ली निवासी प्रेम बिहारी नारायण ने इसे इटैलिक स्टाइल में लिखा था. इसके साथ ही शांति निकेतन के कलाकारों ने हर पन्ने को सजाया और संवारा था. जिसके बाद सर्वे ऑफ इंडिया में ही संविधान के हर पन्ने को टेलीग्राफ कर फोटो लिथोग्राफिक तकनीक के माध्यम से प्रकाशित किया गया था.
संविधान बनाने को लेकर साल 1946 में संविधान सभा की स्थापना हुई थी, जिसमें 389 सदस्य थे. उस सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई, जिसमें वरिष्ठतम सांसद डॉ सच्चिदानंद सिन्हा प्रोविजनल प्रेसिडेंट थे. इसके बाद 11 दिसंबर 1946 को ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थाई चेयरमैन चुना गया. साल 1947 में देश के विभाजन के बाद संविधान सभा के सदस्यों की संख्या घटकर 299 हो गयी थी. संविधान सभा की स्थापना के बाद 2 साल 11 महीने और 18 दिन बाद संविधान का ढांचा 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत किया गया. जिसके बाद हस्तलिखित संविधान पर 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के 284 संसद सदस्यों ने हस्ताक्षर किए थे. वहीं 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया. संविधान में 465 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं जो 22 भागों में विभाजित हैं. जिसमे अभी तक 100 से ज्यादा बार संसोधन किया जा चुका है
भारतीय संविधान के 70 साल पूरे, जानिए इससे जुड़े कुछ खास पहलू

संविधान भारत का सर्वोच्च विधान है। यह दुनिया का न सिर्फ सबसे लंबा हस्तलिखित दस्तावेज है, बल्कि इसके निर्माताओं ने कई देशों की उन अच्छाइयों को भी इसके भीतर समेटा, जिससे भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में मजबूत बन सके। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को मंजूरी दी थी। आज उस मंजूरी के 70 साल पूरे हो गए हैं। इस मौके पर आपको रूबरू करवाते हैं भारतीय संविधान के कुछ खास और अनजाने पहलुओं से...

शब्दों की संख्या
संविधान के अंग्रेजी संस्करण कुल 21,17,369 शब्द हैं।

देहरादून में हुई थी संविधान की छपाई
महान दस्तावेज संविधान की छपाई का काम देहरादून स्थित सर्वे ऑफ इंण्डिया को सौंपा गया, जिसने इसे करीब पांच साल में पूरा किया। तब संविधान की एक हजार प्रतियों प्रकाशित हुई थीं। उस प्रकाशन की एक प्रति संसद के पुस्तकालय में तो एक प्रति आज भी देहरादून में सुरक्षित है।

एक हजार साल की मियाद वाले कागज की शीट पर हुआ लेखन
संविधान की पांडुलिपि एक हजार साल तक बचे रहने वाले सूक्ष्मीजीवी रोधक चर्मपत्र की शीट पर लिखी गई। इसका आकार 45.7 सेमी × 58.4 सेमी है।  पांडुलिपि में 234 पृष्ठ शामिल थे, जिसका वजन 13 किलो था।

पहले मसौदे में हुए थे 2000 संशोधन
संविधान सभा में बहस और चर्चा के लिए जो मसौदा रखा गया, उसमें करीब 2000 संशोधन किए गए थे।

26 नवंबर को तैयार हुआ था आखिरी मसौदा
संविधान सभा के कुल 11 सत्र हुए। 11वां सत्र 14-26 नवंबर तक चला। 26 नवंबर 1949 को हमारे संविधान का आखिरी मसौदा बनकर तैयार हुआ था।

24 नवंबर 1949 को 284 लोगों ने किए थे संविधान पर दस्तखत
जो संविधान बनकर तैयार हुआ, उस पर संविधान सभा के 284 सदस्यों ने 24 नवंबर 1949 को कॉन्स्टीट्यूशन हॉल में दस्तखत किए थे। इनमें 15 महिला सदस्य थीं। संविधान सभा में 8 मुख्य समितियां एवं 15 अन्य समितियां थी। डा.बीआर अम्बेडकर ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन थे। संविधान सभा ने 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन में कुल 114 दिन बैठक की। संविधान में 465 अनुच्छेद, तथा 12 अनुसूचियां हैं। ये 22 भागों में विभाजित है। हस्तलिखित संविधान पर 24 जनवरी 1950 को 284 संसद सदस्यों ने साइन किए। 
26 जनवरी को लागू करने के पीछे था खास मकसद
वैसे तो संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को ही संविधान को पारित कर दिया था लेकिन इसे लागू  करने के लिए जानबूझकर 26 जनवरी 1950 की तारीख चुनी गई क्योंकि इसी दिन 1930 में पूर्ण स्वराज की घोषणा हुई थी। इसकी याद में ही संविधान भी 26 जनवरी को ही प्रभावी किया गया।

हीलियम गैस से भरे कांच के शोकेस में रखीं हैं मूल प्रतियां
संविधान को हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में लिखवाया गया। इनकी मूल प्रतियां संसद भवन के पुस्तकालय में हीलियम गैस से भरे कांच के शोकेस में रखी हुई हैं। इस शोकेश को राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला और अमेरिका के गेटी संरक्षण संस्थान द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया था। संविधान की मूल प्रति को अपने हाथों से उकेरा था, उस समय के प्रख्यात कैलिग्राफर (सुलेखक) प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने। कैलिग्राफी रायजादा को पारिवारिक विरासत में मिली थी। उनके दादा भी यही काम करते थे। 

रायजादा ने इटेलिक शैली में बेहद खूबसूरती से संविधान लिखा, जिसमें उन्होंने एक भी त्रुटि नहीं की। खास बात यह है कि रायजादा ने तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरु से साफ कह दिया कि वो संविधान लिखने के लिए एक भी पैसा नहीं लेंगे। बस हर एक पन्ने पर उनका नाम और अंतिम पृष्ठ पर स्वयं के साथ उनके दादा का नाम लिखने की इजाजत दी जाए, जिसे नेहरू ने मान लिया। रायजादा को सुलेख के लिए सरकार ने संविधान भवन में अलग से कक्ष उपलब्ध कराया। रायजादा के सुलेख और संविधान के हरेक पन्ने को संवारने का काम शांतिनिकेतन के कलाकारों ने किया। इनमें नन्द लाल बोस और उनके शिष्य प्रमुख थे।


देहरादून में यहां हुई थी संविधान की छपाई


  • देश आजाद होने के बाद भारत को मिला था अपना संविधान
    • देहरादून के सर्वे ऑफ इंडिया में छपी थीं पहली 1 हजार प्रतियां

    देश इस साल अपना 73वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. ये दिन भारत का संविधान लागू होने की खुशी से जुड़ा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में संविधान से जुड़ा एक बड़ा इतिहास मौजूद है.
    आजादी मिलने के बाद देश के संविधान का लिखित पुलिंदा तैयार करने के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति ने इसका मसौदा तैयार किया. दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने स्वीकार भी कर लिया. इसके बाद इस ऐतिहासिक संविधान की प्रति को छापने की जिम्मेदारी सर्वे ऑफ इंडिया को दी गई. जहां संविधान की पहली एक हजार प्रतियां छापी गईं. भारत के संविधान की छापी गई वही पहली कॉपी आज भी सर्वे ऑफ इंडिया में मौजूद है. हम सभी जानते हैं की 15 अगस्त 1947 को हमें आजादी मिली, लेकिन देश को चलाने के लिए हमारे पास कोई संविधान नहीं था.
    स्वतंत्र गणराज्य बनाने और कानून बनाने के लिए 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा संविधान को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे लागू कर दिया गया. अब बारी थी संविधान को छापने की, जिसके लिए उस समय सर्वे ऑफ इंडिया देहरादून को चुना गया. खास बात ये है कि संविधान की पहली कॉपी को हाथ से लिखा गया था और प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने इसे हाथ से लिखा था और कागज के चारों तरफ डिजाइन भी किया था.
    सर्वे ऑफ इंडिया में आज भी वो मशीन है, जिन मशीनों से सबसे पहले संविधान को प्रिंट किया गया था. ये मशीने आधुनिक युग में आज बूढ़ी हो गई हैं लेकिन ये धरोहर हैं हमारे देश की. देहरादून के सर्वे ऑफ इंडिया में सबसे पहले प्रिंट करने वाली मशीनों के साथ ही संविधान की वो प्रति भी मौजूद है. जिसे सबसे पहले छापा गया था. जिसको सर्वे ऑफ इंडिया ने संजो कर रखा है. एनपीजी (नॉर्थ प्रिंटिंग ग्रुप) और निदेशक मानचित्र, अभिलेख एंव प्रसारण केंद्र कर्नल राकेश सिंह ने बताया कि हमारे संविधान की ये पहली प्रिंट की गई कॉपी हमारे पास है. जिसे बहुत संजो कर रखते हैं ताकि ये सीलन और किसी भी वजह से खराब न हो. यही नहीं कर्नल राकेश सिंह कहते हैं कि उन्हें इस बात का गर्व है कि देश के संविधान की पहली कॉपी सर्वे ऑफ इंडिया में छपी और आज भी संस्थान इसका रखरखाव कर रहा है. यादों के तौर पर संविधान की पहली प्रिंट की गई प्रति आज भी सर्वे ऑफ इंडिया में रखी गई है और हाथ से लिखी गई मूल प्रति दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में मौजूद है.

    मुझे संविधान प्यारा है


    जब देश मे संविधान नहीं था तब चमार के घर चमार, लोहार के घर लोहार, अहीर के घर अहीर, मांझी के घर मांझी, नाई के घर नाई, धोबी के घर धोबी, सुनार के घर सुनार, तेली के घर तेली, कुम्भार के घर कुम्भार और मोची के घर मोची जन्म लेता था. लेकिन, संविधान बनने के बाद चमार के घर चमार नहीं डॉक्टर, वकील, अध्यापक, कमांडेंट, मैनेजर और आईएएस, आईपीएस जैसे अधिकारी जन्म लेने लगा. लोहार के घर लोहार नहीं, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, कमांडेंट, मैनेजर और आईएएस, आईपीएस जैसे अधिकारी जन्म लेने लगा. अहीर के घर अहीर नहीं, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, कमांडेंट, मैनेजर और आईएएस, आईपीएस जैसे अधिकारी जन्म लेने लगा. मांझी के घर मांझी नहीं, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, कमांडेंट, मैनेजर और आईएएस, आईपीएस जैसे अधिकारी जन्म लेने लगा. धोबी के घर धोबी नहीं, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, कमांडेंट, मैनेजर और आईएएस, आईपीएस जैसे अधिकारी जन्म लेने लगा. सुनार के घर सुनार नहीं, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, कमांडेंट, मैनेजर और आईएएस, आईपीएस जैसे अधिकारी जन्म लेने लगा. तेली के घर तेली नहीं, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, कमांडेंट, मैनेजर और आईएएस, आईपीएस जैसे अधिकारी जन्म लेने लगा. कुम्भार के घर कुम्भार नहीं, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, कमांडेंट, मैनेजर और आईएएस, आईपीएस जैसे अधिकारी जन्म लेने लगा और मोची के घर मोची नहीं, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, कमांडेंट, मैनेजर और आईएएस, आईपीएस जैसे अधिकारी जन्म लेने लगा.
    यह तमाम उदाहरण आपके बीच मे मौजूद है, यदि यकीन नहीं है तो अपने बड़ो से पूछ सकते हैं. इसका जवाब हाँ में ही मिलेगा. इसलिए संविधान हमारे लिए सबसे ज्यादा प्यारा है. अब आपको तय करना है कि आप किस व्यवस्था को पसंद करेंगे? मानवता की संवैधानिक व्यवस्था या जानवरों की जाति व्यवस्था? एक कटु सत्य यह भी है कि ब्राह्मण एवं तत्सम उच्च जाति के लोग संविधान को समाप्त करके मनुस्मृति लागू करने के लिए रात दिन प्रयास कर रहे हैं और इसी संविधान के बदौलत उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन होने वाले मूलनिवासी बहुजन समाज के कुछ लोग उनका साथ दे रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए एक संदेश है कि जो गलती आप कर रहे हैं इस गलती का खामियाजा हो सकता है कि आपको न भुगतना पड़े, लेकिन आने वाली आपकी हमारी पीढ़ी को भुगतना तय है. उस वक्त अपने पीढ़ी पर तरस खाने के लिए शायद आप जिंदा ना रहें. इसलिए समय रहते हुए सकर्त हो जाएं और संविधान को खत्म कर मनुस्मृति लागू करने वाली मनुवादी ताकतों से संविधान बचाने के लिए जान की बाजी लगा दें, इसी में हमारी और आपकी आने वाली पीढ़ियों की भलाई है. एक बात और कहना चाहती हूं कि मूलनिवासी बहुजन समाज को शिक्षा का अधिकार दिलाने के लिए डॉ.बाबसाहब अम्बेडकर ने कितना संघर्ष किया. शिक्षा को लेकर बाबासाहब कहते थे कि ‘‘शिक्षा वो शेरनी का दूध है तो पीयेगा र्गुरायेगा’’ शिक्षा लेकर ही बाबासाहब हम मूलनिवासी बहुजनों को सभी मानवीय अधिकार दिला सके. इसलिए शिक्षा का महत्व बताते हुए बाबासाहब ने शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया. लेकिन आज हम शिक्षा को दरकिनार कर ब्राह्मणों द्वारा रचित पाखंडवाद में लिप्त है. अगर, मंदिर में जाने से समस्या हल होतीं तो योगी मंदिर छोड़कर विधानसभा में नहीं आता. अब आपको सोचना है और विचार करना है कि आप क्या करते हैं?
    मोहिनी राज
    चन्दौली, उ.प्र.

    भारतीय संविधान के बारे में एक नजर...


    भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक 09 दिसंबर 1946 को पूर्वान्ह 11 बजे से नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन हॉल में हुई, जिसे अब संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष के नाम से जाना जाता है. उसी दिन डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष मनोनीत किया गया तथा 11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष, बंगाली क्रिश्चियन डॉ. हरेन्द्र कुमार मुखर्जी को संविधान सभा का उपाध्यक्ष तथा सर बेनेगल नरसिहं राव को संवैधानिक सलाहकार चुना गया. बाद में 16 जुलाई 1948 को राव बहादुर वंगल तिरुवेंकटाचारी कृष्णमाचारी को भी द्वितीय उपाध्यक्ष चुना गया. संविधान सभा के कुल 389 सदस्य थे, किन्तु भारत-पाक विभाजन के समय 324 और बाद में 299 ही रह गये. संविधान सभा की कुल 15 महिला सदस्यों में से एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य बेगम कुदेसिया ऐजाज रसूल (1908-2001) थीं जो विधान सभा क्षेत्र संडीला, जनपद हरदोई से चार बार विधायक व उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहीं तथा उन्हें वर्ष 2000 में पद्म भूषण से पुरुस्कृत किया गया. 

    आज से 73 साल पहले 29 अगस्त 1947 को भारत का संविधान बनाने वाली प्रारूप समिति/मसौदा समिति का गठन किया गया था, जिसमें स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री व भारतरत्न बाबासाहेब डॉ.बीआर अम्बेडकर अध्यक्ष तथा 06 अन्य सदस्यों सहित कुल 07 लोग थे. जिनमें पहला डॉ.बीआर अम्बेडकर, दूसरा अल्लादी कृष्णा स्वामी अय्यर, तीसरा एन. गोपाल स्वामी आयंगर, चौथा कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, पांचवाँ सैयद मुहम्मद सादुल्ला, छठां एन. माधवराज (बीएल मित्तर के स्थान पर) और सातवां टीटी कृष्णमाचारी (डीपी खेतान के स्थान पर) शामिल थे. यह भी जान लें कि बीएल. मित्तर ने 13 अक्टूबर 1947 को मसौदा समिति से त्यागपत्र दे दिया तो उनके स्थान पर एन. माधवराव को 05 दिसंबर 1947 को लिया गया तथा डीपी. खेतान की मृत्युपरांत उनका स्थान 05 फरवरी 1949 को टीटी. कृष्णमाचारी द्वारा भरा गया था. लेकिन, इनमें से भी अचानक एक की मृत्यु हो गई, एक सदस्य अमेरिका में जाकर रहने लगे और एक सदस्य ऐसे जिनको सरकारी काम काज से ही अवकाश नहीं मिल पाया था. इनके अतिरिक्त दो सदस्य ऐसे थे जो अपना स्वास्थय ठीक न रहने के कारण वे सदा दिल्ली से बाहर रहते थे. इस प्रकार संविधान निर्मात्री समिति के पाँच ऐसे थे जो समिति के कार्यों में सहयोग नहीं दे पाये थे.
    डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ही एक ऐसे सदस्य थे जिन्होंने अपने कंधों पर ही संविधान निर्माण का कार्यभार संभाला था. यह भी जान लें कि संविधान प्रारूप समिति की बैठकें 114 दिन तक चली.  और संविधान सभा के कुल 11 सत्र हुए, जिसमें पहला सत्र 09 से 23 दिसंबर 1946, दूसरा सत्र 20 से 25 जनवरी 1947, तीसरा सत्र 28 अप्रैल से 02 मई 1947, चौथा सत्र 14 से 31 जुलाई 1947, पांचवां सत्र 14 से 30 अगस्त 1947, छठा सत्र 27 जनवरी 1948, सातवां सत्र 04 दिसंबर 1948 से 8 जनवरी 1949, आठवां सत्र 16 मई से 16 जून 1949, नौवां सत्र 30 जुलाई से 18 सितंबर 1949, दशवां सत्र 06 से 17 अक्टूबर 1949 और 14 से 26 नवंबर 1949 ग्यारहवां सत्र  संपन्न हुआ. अंतिम सत्र के अंतिम दिन संविधान को अंगीकार/पारित किया गया. उसके बाद एक बार फिर 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की बैठक बुलायी गई, जिसमें 284 सदस्य उपस्थित हुए और उन्होंने भारतीय संविधान पर हस्ताक्षर किए तथा उसी दिन डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और प्रो.केटी शाह में राष्ट्रपति पद के लिए हुए मुकाबले में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद प्रथम राष्ट्रपति बने और 26 जनवरी 1950 को संविधान अमल में लाया गया.

    संविधान निर्माण में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा. इसके साथ ही संविधान निर्माण कार्य पर कुल 63 लाख 96 हजार 729 रूपये का खर्च आया था. साथ ही संविधान के निर्माण कार्य में कुल 7635 सूचनाओं पर चर्चा की गई. जब संविधान बन गया तब एक एक प्रति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद एवं पंडित जवाहर लाल नेहरू को दी. उन्हें संविधान सरल अच्छा लगा, सभी लोग डॉ. भीमराव अम्बेडकर की तारीफ करने लगे व बधाईयाँ देने लगे. एक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें डॉ.राजेन्द्र प्रसाद ने कहा डॉ. भीमराव अम्बेडकर अस्वस्थ थे, फिर भी बड़ी लगनए मन व मेहनत से काम किया, वे सचमुच बधाई के पात्र हैं. डॉ.भीमराव अम्बेडकर संविधान के शिल्पकार हैं, नया संविधान इनकी देन है. इतिहास में इनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा, वे महापुरूष हैं. जब तक भारत का नाम रहेगा, तब तक अम्बेडकर का नाम भी भारतीय संविधान में हमेशा जुड़ा रहेगा. ऐसा संविधान शायद दूसरा कोई नहीं बना पाता, हम इनके आभारी रहेंगे. 26 जनवरी सन् 1950 के दिन यह नया संविधान भारतीय जनता पर लागू किया गया. उस दिन गणतंत्र दिवस का समारोह मनाया गया, वही संविधान आज भी लागू है.
    राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

    रविवार, 5 जनवरी 2020

    कब फुटेगा बीजेपी के पाप का घड़ा...?


    सरवन कुमार

    (भारत मुक्त मोर्चा, चन्दौली)

    बीजेपी द्वारा महाराष्ट्र में जबरदस्ती सरकार बनाने बाद के अब महाराष्ट्र सहित अन्य प्रदेश के क्षेत्रिय पार्टियाँ भी सुर अलाप रही हैं कि ‘कब फुटेगा बीजेपी के पाप का घड़ा...?’ चूंकि, बीजेपी केवल महाराष्ट्र में ही जबदस्ती सरकार नहीं बनाई है, बल्कि इसके पहले भी भाजपा ने गोवा, मेघालय और मणिपुर में भी कर चुकी है. गोवा, मेघालय और मणीपुर में बीजेपी का बहुमत नहीं था, फिर तीनों राज्यों में बीजेपी की सरकार डंके की चोट पर चल रही है. ठीक यही हस्र महाराष्ट्र में भी होगा. भले ही महाराष्ट्र में बीजेपी को बहुमत नहीं है. लेकिन, बीजेपी धोखेबाजी, छलबाजी के बहुमत हाशिल कर लेगी. अगर, कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना को लगता है कि बीजेपी बहुमत हाशिल नहीं कर सकती है तो यह उनकी भूल नहीं है. क्योंकि, कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना भी जानती है कि बीजेपी क्या करने वाली है. महाराष्ट्र में बीजेपी की ताजपोशी के बाद जिस तरह से कयास लगाए जा रहे हैं उस तरह से एक बात तो साफ बिल्कुल साफ हो गई है कि बीजेपी को महाराष्ट्र में ताजपोशी का स्रेय केवल कांग्रेस का जाता है. कुछ भी बीजेपी द्वारा जबरदस्ती सरकार बनाने के बाद सभी पार्टियाँ एक तरह से बिलबिला उठी हैं. इसके बाद भी कोई बीजेपी का बाल बांका नहीं कर सकता है. अगर, बीजेपी के पाप का घड़ा फोड़ना है तो सबसे पहले ईवीएम को खत्म करना होगा और सभी क्षेत्रिय दलों को कांग्रेस का साथ छोड़ना होगा. यदि सभी क्षेत्रिय पार्टियाँ ईवीएम को खत्म करने और कांग्रेस के खेमे से अलग होने में कामयाब होती हैं तो सौ प्रतिशत गारंटी है कि न केवल बीजेपी का, बल्कि साथ ही कांग्रेस के भी पाप का घड़ा फूट जोयगा.

    अब एक नजर डालते हैं महाराष्ट्र की राजनीति पर...महाराष्ट्र की राजनीति शिवसेना, एनसीपी के बस की बात नहीं है. अगर, ये पार्टियाँ बीजेपी को मात देना चाहती हैं तो इनके आकाओं को बहुजन क्रांति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम का साथ समर्थन देकर उनसे राजनीति का गुर सिख लेना चाहिए. वर्ना इन क्षेत्रिय पार्टियों का अस्तित्व समाप्त होने वाला है. क्या महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना और एनसीपी को यह बात समझ में नहीं आई कि महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था? क्या यह बात समझ में नहीं आई कि जब महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा था तो राष्ट्रपति शासन हटाने की घोषणा कब हुई? अगर राष्ट्रपति शासन हटाने की घोषणा हुई तो केन्द्र सरकार ने इसे स्वीकार कब किया? इसी तरह से बीजेपी ने सरकार बनाने का दावा कब किया? और तो और राज्यपाल ने बीजेपी को आमंत्रित कब किया? जबकि, हकीकत यह है कि जब बीजेपी को लगा कि अब उसकी सरकार नहीं बनने वाली है तो उसने राष्ट्रपति शासन लागू करवा दिया. लेकिन, बीजेपी द्वारा जबरदस्ती सरकार बनाने से पहले यह घोषणा नहीं हुआ कि राष्ट्रपति शासन हटाया जा रहा है. एक तरफ देवेन्द्र फडणवीस और अजीत पवार शपथ ले रहे थे और दूसरी तरफ राष्ट्रपति शासन हटाने की बात चल रही थी. क्योंकि, रात तक पूरी तरह से साफ हो चुका था कि सुबह उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद का शपथ लेंगे. लेकिन, सुबह नजारा कुछ और ही देखने को मिला. एक और चौंकाने वाली बात यह है कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भजीते अजीत पवार उनके खेमे से कब बीजेपी के खेमे में चले गये, यह भी भनक उनको नहीं लग सकी? यह कैसी राजनीति है?

    अब आते हैं असल मुद्दे पर...आज जिस तरह से पूरे देश में माहौल है उससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में स्थिति बद से बदतर बन चुके हैं. देश में एससी, एसटी, ओबीसी और इनसे धर्म परिवर्तन करने वाले मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, लिंगायत और महिलाओं के साथ अन्याय, अत्याचार की घटनाएं हद से ज्यादा बढ़ चुकी हैं. कभी गोत्या के आरोप में एससी का कत्लेआम किया जा रहा है तो कभी फर्जी एंकाउंटर में ओबीसी को मारा जा रहा है. कभी मॉबलिंचिंग और आतंकवाद के आरोप में मुसलमानों को जेल और उनको मौत के घाट उतारा जा रहा है तो कभी नक्सलवाद के नाम पर आदिवासियों का नरसंहार किया जा रहा है. यही नहीं महिलाओं और बच्चियों के साथ अमानवीय और जघन्य अपराध के मामले में तो भारत अन्य देशों को पीछे छोड़ दिया है. इन सभी का जिम्मेदार केवल ईवीएम है. नाजायज ईवीएम नाजायज सरकार बना रही है और नाजायज सरकारें देश के मूलनिवासियों का नरसंहार कर रही हैं. इसलिए इसका केवल एक ही समाधान है ईवीएम का खात्मा. अगर ईवीएम खत्म हो गई तो आधे समस्याओं का समाधान हो सकता है. ईवीएम को खत्म करने के लिए ही वामन मेश्राम साहब दिन रात मेहनत कर रहे हैं. वामन मेश्राम साहब महाराष्ट्र के चुनाव के बाद ही बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना की राजनीति का आकलन करते हुए कहा था कि शिवसेना बीजेपी का साथ दे या ना दे सरकार बीजेपी की बनेगी. वह बात आज सच साबित हो गया. यह बस केवल ईवीएम की वजह से संभव हुआ है. ऐसा न हो इसलिए वामन मेश्राम साहब ईवीएम में खिलाफ 2019 से लेकर अब तक ईवीएम भंडाफोड़ परिर्वतन यात्रा के माध्यम से जनजागृति चला रहे हैं.

    अब सवाल खड़ा होता है कि बीजेपी के पाप का घड़ा कैसे फुटेगा और कौन फोड़ेगा? दरअसल, बीजेपी के पाप का घड़ा वामन मेश्राम साहब के अलावा कोई और नहीं फोड़ सकता है. वामन मेश्राम साहब के अलावा किसी में हिम्मत ही नहीं है. इसके लिए वामन मेश्राम अकेल लड़ रहे हैं. अगर सभी लोगों का साथ समर्थन मिल जाय तो बीजेपी और कांग्रेस के पाप का घड़ा फोड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. इसलिए एससी, एसटी, ओबीसी, मायनॉरिटी और मूलनिवासी बहुजन समाज के सभी क्षेत्रिय दलों को वामन मेश्राम साहब का साथ समर्थन देकर अपनी समस्याओं का समाधान करने की जरूरत है.