बुधवार, 1 मई 2019

खामोश चुनाव आयोग

खामोश चुनाव आयोग

"इस बाबत सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टीस फैजल ने भारतीय चुनाव आयोग के अधिकार संबंधित एक फैसला दिया है और यह फैसला आम सहमति से दिया गया है. फैसले में कहा गया है कि ‘‘चुनाव आयोग को अनियंत्रित अधिकार नहीं दिये जाने चाहिए. मगर, ऐसा किया गया है. अनियंत्रित अधिकार मिलने की वजह से चुनाव आयोग गबन का काम कर रहा है"


राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने खुद को शक्तिहीन और लाचार बताकर यह साबित करने की कोशिश की है कि पार्टियों और नेताओं के आगे आयोग बेबस हो गया है. परन्तु, इतना भर कहकर चुनाव आयोग छुटकारा नहीं पा सकता है. क्या यह बात वाकयी सत्य है कि चुनाव आयोग शक्तिहीन है? क्या यह बात सही नहीं मानी जा सकती है? हकीकत में चुनाव आयोग को उसकी शक्ति से ज्यादा अधिकार मिला हुआ है, यह बात पूरे दावे के साथ कहा जा सकता है. इस बाबत सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टीस फैजल ने भारतीय चुनाव आयोग के अधिकार संबंधित एक फैसला दिया है और यह फैसला आम सहमति से दिया गया है. फैसले में कहा गया है कि ‘‘चुनाव आयोग को अनियंत्रित अधिकार नहीं दिये जाने चाहिए. मगर, ऐसा किया गया है. अनियंत्रित अधिकार मिलने की वजह से चुनाव आयोग गबन का काम कर रहा है’’

बताते चलें कि नेताओं की हेड स्पीच के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि, आयोग शक्तिविहीन है. आयोग के अनुसार, उन्हें नोटिस भेजने और जवाब मांगने का सीमित अधिकार है. आयोग के ही अनुसार नेताओं के खिलाफ सिर्फ केस ही दर्ज कराया जा सकता है. वे ना तो किसी नेता को अयोग्य करार दे सकता है और ना ही पार्टी की मान्यता रद्द कर सकता है. चुनाव आयोग ने मेनका गाँधी, योगी आदित्यनाथ, आजम खान सहित कई नेताओं के खिलाफ आचार-संहिता के उल्लंघन के तहत कार्रवाई की गई है. इसके बाद भी नेताओं द्वारा अनुपालन नहीं किया जा रहा है. इससे तो यही साबित होता है कि चुनाव आयोग के पास केवल पोजिशन है, पॉवर नेताओं के पास है. जबकि, ऐसा नहीं है. चुनाव आयोग के पास वो पॉवर संविधान में मिला हुआ है जो पॉवर किसी को नहीं है. कुल मिलाकर चुनाव आयोग जानबूझकर अपने आपको बेबस साबित करने की कोशिश कर रहा है. 

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग दोनों को भारत के संविधान से शक्तियाँ मिली हैं. पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि वह चुनाव आयोग के लिए थानेदार की भूमिका नहीं निभा सकता. बाम्बे हाईकोर्ट में सोशल मीडिया कम्पनियों के खिलाफ सुनवाई हो रही है, जिसमें चुनाव आयोग भी पार्टी है. हाईकोर्ट ने इस बारे में 29 मार्च को एक आदेश पारित किया, जिसके पैरा-14 में चुनाव आयोग की शक्तियों का उल्लेख है. सुप्रीम कोर्ट ने एडीआर मामले में चुनाव आयोग की शक्तियों का विश्लेषण करते हुए कहा था कि संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत चुनाव आयोग को असीमित शक्तियाँ मिली हुई हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करता है तो फिर चुनाव आयोग अनुच्छेद-324 के तहत अपनी शक्तियों और अधिकार क्षेत्र के बारे में क्यो भ्रमित है? अगर चुनाव आयोग चाहे तो संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल चुनाव को निष्पक्ष, पारदर्शी बनाने के लिए कर सकता है. अगर, स्वतंत्र अधिकार मिलने के बाद भी चुनाव आयोग अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर रहा है तो इससे साफ जाहिर होता है कि चुनाव आयोग लाचार और बेबस नहीं है, सरकार के दबाव में है.

इसके कई उदाहरण सामने है. पहला ही उदाहरण यह है कि चुनावों की घोषणा के बाद चुनाव आयोग ने सरकारी वेबसाइटों से मंत्रियों की फोटो हटाने का आदेश जारी किया था. इसके बावजूद राज्य और केन्द्र के मंत्रियों के सरकारी सोशल मीडिया एकाउंट जैसे फेसबुक और ट्वीटर पर कोई रोक नहीं लगाई गई. 2009 के चुनावों के बाद सोशल मीडिया का भारत में इस्तेमाल बढ़ा है. हमारे प्रतिवेदन पर चुनाव आयोग ने अक्टूबर 2013 में सोशल मीडिया के लिए आचार संहिता जारी तो किया लेकिन, 2014 के आम चुनावों में उन नियमों को पूरी तरह से लागू नहीं किया गया. दूसरा उदाहरण, 2019 का आम चुनाव सभी पार्टियों द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से लड़ा जा रहा है. कांग्रेस, भाजपा जैसी सभी पार्टियों ने आईटी सेल और वार रुम बनाये हैं. तकनीकी के नये दौर में चुनाव आयोग पार्टियों के आईटी सेल और वार रूम पर अंकुश लगाने की बजाए, लाचारी दिखाते हुए सोशल मीडिया कम्पनियों के लिए ऐच्छिक कोड बना दिया गया. जिन नेताओं पर बंदिश लगी है, उन्हें टीवी और सोशल मीडिया के माध्यम से ज्यादा प्रचार करने का मौका मिल रहा है.

इसके अलावा नेताओं द्वारा पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर चुनाव प्रचार किया जाता है तो फिर उनके बयानों के लिए आयोग पार्टी और उम्मीदवारों की जवाबदेही क्यों नहीं तय कर ही है? छुटपुट अपराधों के लिए आम जनता को गिरफ्तार कर लिया जाता है तो फिर लोकतन्त्र को संकट में डालने वाले नेताओं के खिलाफ एफआईआर की औपचारिकता मात्र क्यों की जाती है? जबकि चुनाव आयोग द्वारा ही राजनीतिक दलों का रजिस्ट्रेशन किया जाता है. तो क्या ऐसे नेताओं की नफरत और हेट स्पीच से लोकतन्त्र को बचाने के लिए आयोग दलों की मान्यता रद्द नहीं कर सकता है? कर सकता है. मगर, आयोग खुद ही एक राजनीतिक पार्टी का रोल निभा रहा है. 

भय, भूख और भ्रष्टाचार से त्रस्त झारखंड

भय, भूख और भ्रष्टाचार से त्रस्त झारखंड

अंदर-अंदर ही सुलग रहा मोदी सरकार के खिलाफ गुस्सा

राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

एक जिंदा इंसान के लिए ‘‘रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा’’ की जरूरत होती है. अगर इन मौलिक आवश्यकताओं को खत्म कर दिए जाय तो एक इंसान के जीवन में कुछ नहीं रह जायेगा. कांग्रेस और बीजेपी इन्हीं मौलिक आवश्यकताओं को विगत कई सालों से खत्म करती जा रही हैं. इसका विभत्स नजारा झारखंड में देखने को मिला है. जहाँ भय, भूख और भ्रष्टाचार से त्राही-त्राही मची हुई है. इसी बीच एक और बात सुनने को मिली है कि वहाँ की जनता में डर है कि अगर वे बीजेपी के खिलाफ बोलेंगे तो उनपर हमला हो सकता है, किसी झूठे मुकदमे में फंसाए जा सकते हैं. परन्तु, अंदर ही अंदर मोदी के खिलाफ नफरत की आग सुलग रही है.

गौरतलब है कि झारखंड की हालत इतनी भयंकर बन चुकी है कि भूख, भय और भ्रष्टाचार के अलावा कोई मुख्य मुद्दा ही नहीं है. शहरों में लोगों के पास नौकरी हो सकती है, लेकिन गाँवों में महिला-पुरुष दोनों की कोई आमदनी है ही नहीं. वे काम की तलाश में इधर-उधर भटक रहे हैं. कई जिलों में खेती भी ठप्प पड़ी है. तमाम दावों और वादों के बावजूद सरकार सिंचाई नेटवर्क बनाने में नाकाम रही है. अब काम नहीं होगा, खेती नहीं होगी, तो गरीब क्या करेगा? बच्चों को कैसे पालेगा? सरकारी राशन भी बहुत लोगों को नहीं मिलता. बहुत लोगों के पास आधार नहीं है, जिनके पास है तो बायोमेट्रिक काम नहीं करता है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि पानी की जबरदस्त कमी से पूरा राज्य जूझ रहा है. यहाँ तक कि शहरों में भी कभी-कभार ही पानी मिल रहा है. इसके बाद भी पानी जमा करने की कोई व्यवस्था है नहीं. सरकार ने जल भंडारण की कुछ इकाइयाँ बनाई थी, लेकिन उनका निर्माण इतना घटिया था कि वे भरभराकर गिर चुकी हैं. झारखंड में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत इतनी ज्यादा खस्ता हो चुकी है कि लोग लंबे समय से अपनी मांगों के लिए आंदोलन कर रहे हैं. 

गौरतलब है कि झारखंड के सभी 24 जिले किसी न किसी तरह नक्सल समस्या से भी ग्रस्त हैं. एक और चुनाव विश्लेषक बताते हैं कि, अगर गाँव वाले नक्सलियों की मदद नहीं करेंगे तो गांव में रह नहीं पाएंगे, और अगर उनकी मदद करें तो पुलिस परेशान करती है. वे बताते हैं कि हाल ही में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ऐलान किया कि 2023 तक झारखंड से नक्सल समस्या को खत्म कर दिया जाएगा, लेकिन इसका उलटा असर हुआ है और राज्य में नक्सलियों की तादाद बढ़ रही है।

शहरों का चुनावी माहौल कुछ अलग ही अंदाज में है. जैसे ही आप शहर से बाहर निकलते हैं, तस्वीर बदल जाती है. झारखंड में मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार के खिलाफ एक अंदरूनी लहर सी है. दरअसल जनता और सरकारी कर्मचारियों में सरकार को लेकर जबरदस्त गुस्सा है. ये सब मोदी समर्थक हुआ करते थे, लेकिन बीएसएनल की हालत के बाद इन्हें भी चिंता सताने लगी है. बैंक कर्मचारी, सेल के कर्मचारी, सबके मन में आशंका है कि कहीं उनकी हालत भी बीएसएनएल जैसी न हो जाए. इसके अलावा झारखंड के आदिवासियों, कुम्हार, कहार, बढ़ई, लोहार, धनुक आदि ओबीसी के छोटे तबकों में भी गुस्सा है. सत्ता दल के खिलाफ मुस्लिमों और ईसाइयों की नाराजगी तो जगजाहिर है. झारखंड में बीते सालों में कम से कम 17 मॉब लिंचिंग की घटनाएं हुई है, जिनमें 11 लोगों की जान गई. इनमें से 9 मुसलमान थे और दो आदिवासी. ऐसे में यह सारे समुदाय बीजेपी के खिलाफ लामबंद हो गये हैं.
 
अब यदि संविधान की अनुसूची 5-6 की बात करें तो आदिवासी बहुल राज्यों में आदिवासी की स्वायत्त शासन होना चाहिए. यानी इन राज्यों में गैरआदिवासी मुख्यमंत्री नहीं बन सकता है. दूसरी बात यह है आदिवासी बहुल राज्यों में कोई गौरआदिवासी उनकी जमीनें भी नहीं खरीद सकता है. परन्तु सरकारों की गलत नीतियों के कारण गैरआदिवासी बड़े-बड़े उद्योगपति उनके जमीनों पर जबरदस्ती कब्जा कर रहे हैं और उनको आदिवासियों को जल, जंगल और जमीनों से भगा रहे हैं.  यही मुख्य कारण है कि मध्यम प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में संविधान की 5-6वीं अनुसूची लागू नहीं है. जिसका दुष्परिणाम है कि आज आदिवासियों को नक्सलावाद के नाम पर मारा जा रहा है. जो आदिवासी अपने अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहे हैं उन आदिवासियों को नक्सलवाद के नाम पर चुन-चुनकर मारा जा रहा है. आज जिस तरह से आदिवासियों को नक्सलावाद के नाम पर मारा जा रहा है उस तरह से लग रहा है कि आने वाला समय आदिवासियों को लिए और ज्यादा भयानक होने वाला है. इसलिए समय रहते हुए आदिवासियों को अपने अधिकार के लिए राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद् के साथ मिलकर संघर्ष करने की जरूरत है. पूरे देश में मात्र राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद् ही एक ऐसा संगठन है जो आदिवासियों के हक एवं अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है.

खतरे में बेटियों का अस्तित्व

खतरे में बेटियों का अस्तित्व

 बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारों के बीच भी भेदभाव से मर रही हैं लड़कियां


राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

हमारा पुरुष प्रधान समाज विज्ञान और विकासवाद के इस तथ्य को शायद ही स्वीकार करे कि लड़कियाँ और महिलायें, लड़कों और पुरुषों की अपेक्षा शारीरिक और मानसिक तौर पर अधिक मजबूत होती हैं. लडकियाँ अधिक जीवट वाली होती हैं और कठिन परिस्थितियों को भी अपेक्षाकृत अधिक आसानी से पार करती हैं. लेकिन, नए अनुसंधान बताते हैं कि विकासवाद के इस तथ्य को भी हमारा समाज भेदभाव के कारण अब झूठा साबित करने पर तुला हुआ है.



बीएमजे ग्लोबल हेल्थ नामक जर्नल के नवीनतम अंक में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार लड़कों और लड़कियों में भेदभाव के कारण पाँच वर्ष से कम उम्र की लड़कियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है. यह भेदभाव इतना गहरा है कि जीव विज्ञान द्वारा लड़कियों में प्रदत्त मजबूती भी बेकार हो चली है. इस अध्ययन को लंदन स्थित क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी की विशेषज्ञ वलेन्तीना गैल की अगुवाई में एक दल ने किया है. इस दल के अनुसार दुनिया भर में प्राकृतिक कारणों से अभी भी पाँच साल से कम उम्र में लड़कों की अधिक मौतें होतीं हैं, लेकिन यह अंतर गरीब देशों में लगातार कम होता जा रहा है.

प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल अकैडमी ऑफ साइंसेज के 8 जनवरी 2018 के अंक में प्रकाशित साउदर्न यूनिवर्सिटी ऑफ डेनमार्क की वर्जिनिया जरुली के एक शोध पत्र के अनुसार महिलायें और लड़कियाँ अधिक जीवट वाली और जुझारू होती हैं और यहाँ तक कि प्राकृतिक आपदा के समय भी इनकी मृत्यु दर कम रहती है. प्राकृतिक आपदा के समय भूख, प्यास, स्वास्थ्य पर काबू पाने वाली लड़कियों के साथ हम किस कदर का भेदभाव करते होंगे, इसे एक बार तो सोच कर देखिये!

लड़कियों की परवरिश में जितना भेदभाव हमारे देश में है, उतना शायद और कहीं नहीं है. ‘‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’’ जैसे नारे तो लगातार दिए जाते हैं, लेकिन लड़कियों की हालत में कहीं से सुधार होता नहीं दिखाई देता है. भ्रूण हत्या के द्वारा बहुत सारी लड़कियाँ पैदा होने के पहले ही मार दी जाती हैं. जो पैदा होती हैं, उनमें भी अधिकतर प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर भेदभाव का शिकार होती हैं. इसी भेदभाव के कारण प्रति वर्ष पाँच वर्ष से कम उम्र की 239000 लड़कियों को मार दिया जाता है. ध्यान रहे कि यह संख्या भ्रूण-हत्या से अलग है. अप्रैल, 2016 में एक साक्षात्कार के दौरान महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने बताया था कि भारत में हरेक दिन 2000 से अधिक लड़कियाँ भ्रूण में ही मार दी जाती हैं.

लांसेट के वर्ष 2011 के अध्ययन के अनुसार 1980 से 2000 के बीच कुल 1 करोड़ 20 लाख लड़कियों की हत्या पैदा होने से पहले कर दी गयी. इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वर्ष 2011 में प्रति 1000 पुरुष पर मात्र 914 महिलायें थीं. यह एक सोचा-समझा सामूहिक नरसंहार है, जिसे कोई नहीं देखता है. यह अध्ययन ऑस्ट्रिया स्थित इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस के दल ने किया है और इसे लांसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित किया गया है. अध्ययन के अनुसार यह अतिरिक्त मृत्यु दर भारत में औसतन 18.5 प्रति हजार जन्म है. देश के कुल 640 जिलों में से लगभग 90 प्रतिशत जिलों में यह समस्या है, लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश में समस्या विकराल है.

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, मेघालय और नागालैंड में लड़कियों की यह अतिरिक्त मृत्यु दर प्रति हजार जन्म में 20 या उससे भी अधिक है. इस सन्दर्भ में सबसे बदतर हालत उत्तर प्रदेश का है, जहाँ यह दर 30 से भी ऊपर है. अध्ययन की सह-लेखक क्रिस्तिफी गिलमोतो के अनुसार भारत में लैंगिक असमानता इस हद तक है कि आप लड़कियों को केवल पैदा होने से ही नहीं रोकते, बल्कि पैदा होने के बाद भी परवरिश, खान-पान, टीकाकरण, शिक्षा, चिकित्सा इत्यादि में भी भेदभाव करते हैं. स्पष्ट तौर पर लड़कियों का लालन-पालन लड़कों की तुलना में उपेक्षित ही रहता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत उन देशों में से एक है जहाँ टीकाकरण में भी लड़के और लड़कियों में भेदभाव बरता जाता है. इस रिपोर्ट का एक दिलचस्प पहलू यह है कि सवर्णों में यह भेदभाव अधिक है. अध्ययन के आँकड़े बताते हैं कि अनुसूचित जाति, अनु.जनजाति या फिर मुसलमानों की संख्या भले ही अधिक है, लेकिन उनमें बहुत ही कम भेदभाव किया जाता है जिससे उनमें मृत्यु दर कम है. 

यह, अपने तरह की पहली रिपोर्ट है, जिससे इतना तो समझा जा सकता है कि थोड़ा सा ध्यान देकर और बिना भेदभाव के अगर लड़कियों की परवरिश की जाए तो प्रतिवर्ष 2,39,000 लड़कियों को अकाल मृत्यु से बचाया जा सकता है. हैरानी की बात है कि लड़कियाँ अधिक मजबूत और विपत्तियों को अधिक सहने की क्षमता रखती हैं. अगर बेटियों को बचाया नहीं गया तो न केवल बेटियों का अस्तित्व खत्म हो जायेगा, बल्कि संसार की संरचना भी खत्म हो जायेगी. हाँ इसके लिए सभी लोगों को पहल करना होगा. किसी को सरकार और गैर-सरकारी संगठनों के भरोसे नहीं रहना होगा. वर्ना रोज नए नारे गढ़े जाते रहेंगे और लड़कियाँ मरती रहेंगी.

रोजी-रोटी का सवाल

रोजी-रोटी का सवाल 


राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

चुनावी मौसम का रंग पूरी तरह से चढ़ गया है. सारी पार्टियाँ जनता से लोकलुभावन वायदे और घोषणाएं कर रही हैं. चुनावी समर वायदों और नारों से पटा पड़ा है. पुलवामा और राष्ट्रवाद के बीच रोजीरोटी का सवाल भी चुनावी बहसों के केंद्र में आ गया है. भाजपा के राष्ट्रवाद के सामने कांग्रेस ने न्याय (न्यूनतम आय योजना) का दांव खेला है. इस योजना के तहत साल में कम से कम 72,000 रुपये की न्यूनतम आय 20 प्रतिशत गरीब परिवारों के लिए सुनिश्चित करने की घोषणा की है.


वहीं कम्युनिस्ट ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में न्यूनतम आय 18,000 रुपये प्रतिमाह तक करने की घोषणा की है, लेकिन सवाल ये है कि जिस बंगाल पर कम्युनिस्टों का 40 साल एकछत्र राज रहा है वहाँ अब भी न्यूनतम आय मात्र 245 रुपये क्यों है? केरल में कम्युनिस्टों की हुकूमत है वहाँ न्यूनतम मजदूरी से आधी दरों पर मनरेगा में मजदूरी क्यों दी जाती है? यही सवाल कांग्रेस पर भी वाजिब है आखिर उसने अपने हुकूमत में गरीबों के साथ न्याय क्यों नहीं किया? न्यूनतम आय को सुनिश्चत क्यों नहीं किया? जो उसे अब न्याय करने की जरूरत पड़ रही है.

भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में किसानों की आय वर्ष 2022 तक दोगुनी करने का संकल्प लिया है और हर एक को पक्का घर देने का वायदा भी किया है. गौरतलब ये है कि जो सरकार न्यूनतम मजदूरी नहीं दे पाई क्या वह पक्का घर दे सकती है? घोषणा पत्र में आगे दर्ज है कि हर भारतीय का बैंक में एकाउंट होगा, लेकिन बेरोजगार नौजवान और बदहाल मजदूर इस एकाउंट का करेंगे क्या? भाजपा के वायदे और जमीनी हकीकत के बीच में बहुत चौड़ी खाई है. फिलहाल पार्टी चुनावी अभियान में राष्ट्रवाद के एजेंडे पर ही फोकस कर रही है. बहुजन मुक्ति पार्टी के अलावा किसी भी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में मजदूर को उचित मजदूरी का वायदा नहीं किया है. मजदूर इस चुनावी विमर्श से गायब है.

मजदूर जो खेत-खलियानों, कारखानों, घरों में काम करता है वह अब भी चुनावी मुद्दों में हाशिये पर ही दिख रहा है. मजदूरों की दुर्दशा चुनाव की गरमागर्म बहसों में नदारद हैं. जैसे मजदूरों को लेकर सरकार का कोई सरोकार ही नहीं है. सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक मनरेगा में मजदूरी और मजदूरों की आर्थिक स्थिति पर राजनीतिक गलियारों में कोई विमर्श नहीं हो रहा है. कांग्रेस ने न्याय योजना के साथ मनरेगा में 100 दिन की जगह 150 दिन तक रोजगार देने का वायदा अपने घोषणा पत्र में जरूर किया है, लेकिन यथार्थ के धरातल पर ये घोषणाएं टिक पाएंगी? ये बड़ा सवाल है. जबकि जमीनी सच्चाई कुछ और ही हकीकत बयां करती हैं. बीते एक अप्रैल को मनरेगा को पूरे देश में लागू किए हुए 11 साल गुजर चुके हैं, लेकिन मनरेगा में काम करने वाले मजदूर आज भी बदहाल हैं. इस तरह से न्यूनतम आय उनके लिए सुनहरे सपने जैसे हैं.

आज भी 33 राज्यों और केंद्र शाषित प्रदेशों में मनरेगा में मजदूरी ग्रामीण न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम है. कई राज्यों में ये आधा से थोड़ा ज्यादा है. अभी हाल ही में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मनरेगा में प्रतिदिन मजदूरी को बढ़ाने के लिए एक अधिसूचना भी जारी की है. जिसे चुनाव आयोग की भी मंज़ूरी मिल गयी है, लेकिन इसकी दरें एक से दो फीसदी बढ़कर ही सिमट कर रह गई हैं. बिहार में पहले मनरेगा मजदूरी 168 रुपये प्रतिदिन थी, वह बढ़कर मात्र 171 रुपये ही प्रतिदिन हो पाई है. जहाँ महंगाई बेतहाशा बढ़ रही है, वहीं मजदूरों की कमाई सिर्फ 2 से 3 रुपये एक साल में बढ़ती है, लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं है.

बिहार में आज न्यूनतम मजदूरी 268 रुपये है और मनरेगा की बढ़ी हुई मजदूरी न्यूनतम मजदूरी से अब भी 97 रुपये कम है. यानी मनरेगा मजदूरी न्यूनतम मजदूरी का केवल 63 प्रतिशत ही है.ये वही बिहार है जो समाजवाद की पहली प्रयोगशाला बना, जिसका सिद्वांत था कि वेतन में अधिक असमानता नहीं होनी चाहिए, लेकिन बिहार ने मजदूरों को कभी उसका सही मेहनाताना नहीं दिया गया. मज़दूरों के श्रम का शोषण सबसे अधिक किया गया और ये बादस्तूर जारी है. आज भी मनरेगा में सबसे कम मजदूरी बिहार और झारखंड में ही दी जाती है. मजदूरों को उनका हक दिए बिना ही सामाजिक न्याय का दावा किया जा रहा है.

मनरेगा में देश में औसत मजदूरी केवल 210 रुपये ही है जो आज की महंगाई के हिसाब से मुनासिब नहीं है. नगालैंड एकमात्र राज्य है जहाँ मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी न्यूनतम मजदूरी से अधिक है. सबसे अधिक मजदूरी हरियाणा में 284 रुपये है, लेकिन ये भी न्यूनतम मजदूरी से 55 रुपये कम है. वहीं केरल में न्यूनतम मजदूरी 600 रुपये है, लेकिन मनरेगा में केवल 271 रुपये प्रतिदिन ही मजदूरी है जो कि न्यूनतम मजदूरी का आधा भी नहीं है. देश के सबसे विकसित कहे जाने वाले गुजरात में भी मनरेगा की मजदूरी केवल 199 रुपये है, जो कि ग्राम पंचायत में अधिकृत न्यूनतम मजदूरी 312 रुपये से बहुत कम है. दिलचस्प बात ये है कि ये राज्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कर्मभूमि भी है. सरकार गुजरात में मजदूर को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दे रही है. फिर भी ये राज्य देश में विकास का मॉडल है. जहाँ मजदूरों के शोषण की अधिकारिक पुष्टि ख़ुद सरकारी आंकड़े कर रहें हैं. आख़रि मजदूर न्यूनतम मजदूरी से वंचित क्यों हैं? सरकार ख़ुद अपने बनाए हुए कानून को नहीं लागू कर रही है. ऐसे में जो मजदूर असंगठित या निजी क्षेत्रों में काम कर रहे हैं उनका शोषण तो स्वाभाविक है. 

गौरतलब है कि भारत में अलग-अलग तरह की आय निर्धारित की गई है न्यूनतम आय, मामूली आय और उचित आय. न्यूनतम आय में ऐसी आय को परिभाषित किया गया है, जो किसी भी व्यक्ति को जीवित रखने के लिए दी जाने वाली सबसे कम आय है. कई मजदूर नेताओं ने न्यूनतम आय के मानकों को ही सही नहीं माना है और इसमें कई खामियों को गिनाया गया है. न्यूनतम मजदूरी के अलावा मनरेगा में मजदूरी समय पर नहीं मिलना, रोज़गार मिलने के दिनों में लगातार कमी होना, जैसी चुनौतियाँ भी हैं, जिससे आम मजदूर जूझ रहा है. कई अध्ययनों की रिपोर्ट बताती है कि मनरेगा में साल में औसतन 50 दिन का भी रोजगार नहीं मिल पाता है. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ये आंकड़े और भी कम है.

देश में मज़दूरों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. पिछले कुछ दशकों में गरीब और अमीर के बीच की खाई और गहरी हुई है. भारत में संसाधन कुछ हाथों तक सीमित होता जा रहा है और बड़ी आबादी रोजमर्रा की बुनियादी चीजों से भी महरूम है. हाल के वर्षों में आए कृषि संकट ने इसे और ज्यादा भयावह बना दिया है. मज़दूर आज ख़ुद भूखे हैं. उसके शोषण की अधिकारिक पुष्टि ख़ुद सरकार कर रही है. जहाँ तय की गई न्यूनतम मजदूरी को सरकार ख़ुद नहीं मान रही है. किसी भी राष्ट्र के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा जहाँ करोड़ों मजदूरों की दुर्दशा राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा ही नहीं है.

मतदाताओं की चुप्पी

मतदाताओं की चुप्पी


लोकसभा चुनाव 2019 का चौथा चरण भी बीत गया शेष तीन चरण बाकी रह गया है. यानी आधा से ज्यादा चुनाव बीत चुका है. इस बार का चुनावी माहौल पिछले कई लोकसभा चुनाव से कुछ अलग दिखाई दे रहा है. इस चुनावी माहौल को देखते हुए मतदाता भी चुप्पी साध लिए हैं. रोचक बात यह है कि मतदाताओं की चुप्पी ही इस चुनाव की असली गुत्थी हैं. पर्चा दाखिला करने के बाद पार्टी प्रत्याशी ग्रामीण इलाकों में जोर-शोर से जनसंपर्क और जनसभाएं कर रहे हैं. एक एक दिन में दो या तीन जगह जनसभाएं की जा रही हैं. 
कांग्रेस के प्रत्याशी पाँच साल में किए गए विकास कार्य गिना रहे हैं, वहीं सपा प्रत्याशी यूपी सरकार की उपलब्धियाँ गिनाने में लगे हैं. भाजपा प्रत्याशी गुजरात मॉडल के आधार पर जनपद के लोगो को लुभा रहे हैं. उधर, बसपा प्रत्याशी माया सरकार के विकास की बात कर रहे हैं. छोटे दल के प्रत्याशी इस बार जिताने के बाद कार्य देखने की बात कह रहे हैं. उनका कहना है कि कार्य देख कर ही अगली बार हमें वोट कीजिएगा, लेकिन ग्रामीणांचल के मतदाता कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं. जो भी प्रत्याशी उनके क्षेत्र में जाता है उसकी जय शुरू कर देते हैं. 


राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

ऐसी परिस्थितियों में उम्मीदवार भी परेशान हैं कि इस बार जनता का मन क्या है? यही हाल शहरी क्षेत्रों का भी बना हुआ है. शहरी मतदाता को लेकर भी उम्मीदवारों के माथे पर चिंता की लकीरें कम नहीं हैं. हालात चाहे जो भी हों, लेकिन कोई भी प्रत्याशी अपने को एक दूसरे से कम नहीं आंक रहा है. ग्रामीण क्षेत्र में कुछ जगह प्रत्याशियों का विरोध भी देखने को मिल रहा है. कहीं प्रत्याशियों को काले झंडे दिखाए जा रहे हैं तो कहीं उनपर हमले भी किये जा रहे हैं. परिणाम चाहे जो भी हो, लेकिन जनता इस बार कुछ अच्छा करने की सोच रही है. अब देखना यह होगा कि जनता विकास करने के लिए किसे चुनती है और किसे बाहर का रास्ता दिखाती है.

बता दें कि जब लोगों से यह पूछा जाता है कि वोट किसे देंगे? तो हर दूसरे वोटर का जवाब होता है, अभी तय नहीं किया है और जब पूछा जाता है कि हवा किसकी है? तो जवाब होता है, इस बार वैसी तो कोई हवा दिख नहीं रही है!  इस बार के चुनाव में और पिछली बार के चुनाव में भी यह सवाल आम रहा कि विपक्ष का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है? जवाब किसी के पास नहीं है. इसलिए नहीं कि यहाँ अमेरिका की तरह दो पार्टियों का मुकाबला नहीं है. यहाँ भी है, मगर यहाँ की राजनीति इतनी गंदी हो चुकी है, जिसका अनुमान लगाना मुश्किल है. भलाई चुप रहने में ही है, मुँह खोलकर कौन जाये गाली सुनने. वोट भी दो और बत्तमीज नेताओं की गाली भी सुने? इस चुनावी दौर में नेताओं की बत्तमीजी इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि जनता को भी गाली देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. 

एक तरफ अपने आप को चौकीदार कहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए की कमान संभाली है तो दूसरी ओर यूपीए का परचम फैलाने की जिम्मेदारी राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने अपने कंधे पर उठाई है. वही, महागठंबंधन को मजबूत करने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के बड़े चेहरे जैसे अखिलेश यादव, मायावती, तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल ने भी अपने-अपने स्तर से चुनावी समीकरण बना रखी हैं. भारत की 17वीं लोकसभा का गठन सात चरणों में होना है, जिसमें से चार चरण बीत चुके हैं. भारत की कुल आबादी में से 90 करोड़ लोगों को आगामी केंद्र सरकार को तय करना है. इनमें से लगभग डेढ़ करोड़ लोग पहली बार मतदान कर रहे हैं, जिनमे से अधिकतर मतदाता युवा हैं. ऐसे में भारत की युवा पीढ़ी को भी सरकार से कुछ उपेक्षाएँ होंगी, कुछ आशाएँ होंगी, परन्तु अधिकतर समय यह आशाएं सिर्फ चुनावी वादें बनकर मैनिफेस्टो पर ही छपकर रह जाती हैं.

कुल मिलाकर असलियत यही है कि मतदाताओं की चुप्पी ही इस चुनाव की असली गुत्थी हैं. जब लोगों से यह पूछा जाता है कि किसे वोट देंगे तो हर दूसरे वोटर का जवाब होता है, अभी तय नहीं किया है और जब पूछा जाता है कि हवा किसकी है तो जवाब होता है, इस बार वैसी तो कोई हवा दिख नहीं रही. यही सवाल अगर भाजपा समर्थक से पूछा जाए तो जवाब 300 तो छोड़िए 400 सीट के पार भी पहुँच जाता है और हवा तो छोड़िए लहर और सुनामी चलने लगती है! अब पता नहीं जमीनी सच्चाई क्या है, लेकिन, इतना जरूर है कि इस बार मतदाता सोच समझकर ही वोट करना चाहते हैं. मतदाताओं की चुप्पी इस बात का पुख्ता सबूत है. 23 मई को यह भी साफ हो जायेगा कि सेहरा किसके सिर पर बंधेगा.

चुनाव आयोग ईवीएम घोटाले में शामिल है-वामन मेश्राम

लोकतंत्र बचाने के लिए बहुजन क्रांति मोर्चा का जेल भरो आंदोलन


आंदोलन पर एक नजर
♦ 23 मई 2019 से अनिश्चित काल के लिए भारत बंद
♦ जेल भरो आंदोलन में 22 राजनैतिक पार्टियों का नैतिक समर्थन
♦ सैकड़ों सामाजिक संगठन आंदोलन में शामिल, गये जेल

आंदोलन की प्रमुख मांगें
♦ वीवीपैट की पर्ची का 100 प्रतिशत गिनती होनी चाहिए
♦ सुप्रीम कोर्ट ने हमारे साथ अन्याय किया है, हमें न्याय चाहिए
♦ इलेक्शन कंडक्ट रूल 56-सी, 56-डी और 49-एम रद्द करो

जेल में जलाया इलेक्शन कंडक्ट रूल की प्रतियाँ




आवाहन
आंदोलन में साथ देने वाले देश के सभी लोगों से आवाहन करता हूँ कि ‘चुनाव आयोग ने जो इलेक्शन कंडक्ट रूल 56-सी, 56-डी और 49-एम’ बनाया है, यह मौलिक अधिकारों का हनन कर कर रहा है. इसलिए अपने-अपने राज्यों, तहसीलों और जिलों में इस रूल को एक जहग इकट्ठा होकर अपने महापुरूषों की प्रतिमा के सामने 23 मई तक लगातार जलाने का काम करेंगे. 

पुणे/दै.मू.ब्यूरो
चुनाव आयोग ईवीएम घोटाले में शामिल है. ईवीएम घोटाला को छिपाने के लिए आयोग ने षड्यंत्र किया और संविधान के मौलिक आधिकार के खिलाफ 56-सी, 56-डी और 49-एम नामक इलेक्शन कंडक्ट रूल बनाया. अगर यह रूल नहीं बनया होता तो मैन्युअली रिकाउंटिंग की मांग होती, अगर मैन्युअली रिकाउंटिंग की मांग होती तो ईवीएम घोटाला पकड़ में आ जाता. घोटाला पकड़ में ना आये, इसलिए इस घोटाले को छिपाने के लिए चुनाव आयोग ने इलेक्शन कंडक्ट रूल बनाया है. यह बात मंगलवार 30 अप्रैल 2019 को बहुजन क्रांति मोर्चा द्वारा जेल भरो आंदोलन में ईवीएम के खिलाफ गिरफ्तारी देते हुए वामन मेश्राम ने कही.
गौरलतब है कि ईवीएम के खिलाफ बहुजन क्रांति मोर्चा के द्वारा मंगलवार 30 अप्रैल को देशव्यापी जेल भरो आंदोलन किया गया, जो ऐतिहासिक सफलता के साथ संपन्न हुआ. यह जेल भरो आंदोलन उन राज्यों, जिलों में किया गया था जिन राज्यों, जिलों में चुनाव समाप्त हो गया है. 
ईवीएम के खिलाफ वामन मेश्राम ने दी गिरफ्तारी


बता दें कि पूना रेलवे स्टेशन के पास पुलिस थाने में ईवीएम के खिलाफ गिरफ्तारी देते हुए वामन मेश्रान ने कहा कि हमने कई बार सुप्रीम कोर्ट में ईवीएम के खिलाफ केस दायर किया. और हमने सुप्रीम कोर्ट के ही 8 अक्टूबर 2013 के आदेश को ध्यान में रखते हुए केस किया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि ईवीएम में वीवीपैट मशीन लगाये, निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र रूप से चुनाव नहीं हो सकता है. दूसरा आदेश था कि विवाद की स्थिति में वीवीपैट से निकलने वाली पर्ची की 100 प्रतिशत गिनती होनी चाहिए. 
वामन मेश्राम ने कहा इस बात को ध्यान में रखते हुए हमने मांग की थी कि पेपर ट्रेल मशीन से निकलने वाली पर्ची की 100 प्रतिशत गिनती की जाय. यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया हुआ है, फिर भी चुनाव आयोग इस पर अमल करने का काम नहीं कर रहा है. बल्कि चुनाव आयोग ने  षड्यंत्र किया और वीवीपैट से निकलने वाली पर्ची की गिनती के लिए कोई मांग न करे, इसलिए 2013 में आयोग ने 56-सी, 56-डी और 49-एम तीन इलेक्शन कंडक्ट रूल बना दिया. 
राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

रूल 56-सी के अनुसार जो पार्टियाँ दूसरे नंबर हैं केवल वहीं पार्टियाँ रिकाउंटिंग की मांग कर सकती हैं, तीसरे या चौथे नंबर की पार्टियाँ मांग नहीं कर सकती हैं. इसके अलावा रूल 49-एम के अनुसार किसी को भी ईवीएम या वीवीपैट के खिलाफ आयोग से शिकायत करने का अधिकार नहीं है. यदि कोई शिकायत करता है तो उसे 6 महीने तक जेल की सजा का प्रावधान किया.
वामन मेश्राम ने कहा कि यह इलेक्शन कंडक्ट रूल संविधान के आर्टिकल 13 के अनुसार मौलिक अधिकारों का घोर उलंघन करता है. बाबासाहब ने लिखा है कि मौलिक अधिकार का उलंघन कोई कानून या परम्परा आदि सहित कुछ भी मौलिक अधिकार का उलंघन करता है तो उसे शून्य घोषित किया जाता है. जब हमने सुप्रीम कोर्ट में लिखित केस किया कि वीवीपैट पर्ची की गिनती होनी चाहिए तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलेक्शन कंडक्ट रूल जारी रहेगा. इस तरह से हमारे साथ अन्याय किया गया है. 
अंत में वामन मेश्राम ने कहा कि इसके विरोध में आज हम लोग 30 अप्रैल 2019 को जेल भरो आन्दोलन कर रहे है. इसके अलावा हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरोध में चुनाव आयोग ने जो इलेक्शन कंडक्ट रुल बनाये हैं वे संविधान विरोधी है. यह रुल फ्री, फेयर और ट्रांसपरेंट चुनाव के विरोध में है. यह रुल फंडामेंटल राइट के विरोध में है. इसलिए इलेक्शन कंडक्ट रुल 56-सी, 56-डी और 49-एम को आज हम जेल भरो आन्दोलन में इसे जला रहा हूँ. आने वाले समय में हम इस लड़ाई को आगे तक जारी रखेंगे.

श्रमिक अधिकारों के रक्षक डॉ.आंबेडकर

श्रमिक अधिकारों के रक्षक डॉ.आंबेडकर 

राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

ब्राह्मणों की इस व्यवस्था में कभी-कभी कम उपलब्धियों वाले लोग इतिहास के नायक बना दिए जाते हैं और महानायकों को उनकी वास्तविक जगह मिलने में सदियाँ लग जाती हैं. ऐसे ही महानायकों में नारायण मेघाजी लोखण्डे और डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर भी शामिल हैं. भारत में 21वीं सदी अंबेडकर की सदी के रूप में अपनी पहचान धीरे-धीरे कायम कर रही हैं. उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के नए-नए आयाम सामने आ रहे हैं. उनके व्यक्तित्व का एक बड़ा आयाम मजदूर एवं किसान नेता का है.
बहुत कम लोग इस तथ्य से परिचित हैं कि उन्होंने ‘‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’’ की स्थापना की थी, उसके टिकट पर वे निर्वाचित हुए थे और 7 नवंबर 1938 को एक लाख से ज्यादा मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व भी डॉ. आंबेडकर ने किया था. इस हड़ताल के बाद सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मजदूरों का आह्वान किया कि मजदूर मौजूदा लेजिस्लेटिव काउंसिल में अपने प्रतिनिधियों को चुनकर सत्ता अपने हाथों में ले लें.


इस हड़ताल का आह्वान उनके द्वारा स्थापित इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी ने किया था, जिसकी स्थापना 15 अगस्त 1936 को डॉ. आंबेडकर ने की थी. 7 नवंबर की हड़ताल से पहले 6 नवंबर, 1938 को लेबर पार्टी द्वारा बुलाई गई मीटिंग में बड़ी संख्या में मजदूरों ने हिस्सा लिया. अंबेडकर स्वयं खुली कार से श्रमिक क्षेत्रों का भ्रमण कर हड़ताल सफल बनाने की अपील कर रहे थे. जुलूस के दौरान ब्रिटिश पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें दो लोग घायल हुए. मुंबई में हड़ताल पूरी तरह सफल रही. इसके साथ अहमदाबाद, अमंलनेर, चालीस गाँव, पूना, धुलिया में हड़ताल आंशिक तौर पर सफल रही. यह हड़ताल डॉ.अंबेडकर ने मजदूरों के हड़ताल करने के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए बुलाई थी. सितंबर 1938 में बम्बई विधानमंडल में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने औद्योगिक विवाद विधेयक प्रस्तुत किया था. इस विधेयक के तहत कांग्रेसी सरकार ने हड़ताल को आपराधिक कार्रवाई की श्रेणी में डालने का प्रस्ताव किया था. अंबेडकर ने विधानमंडल में इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि ‘हड़ताल करना सिविल अपराध है, फौजदारी गुनाह नहीं. किसी भी आदमी से उसकी इच्छा के विरूद्ध काम लेना किसी भी दृष्टि से उसे दास बनाने से कम नहीं माना जा सकता है, श्रमिक को हड़ताल के लिए दंड देना उसे गुलाम बनाने जैसा है.

उन्होंने कहा कि यह (हड़ताल) एक मौलिक स्वतंत्रता है, जिस पर वह किसी भी सूरत में अंकुश नहीं लगने देंगे. उन्होंने कांग्रेसी सरकार से कहा कि यदि स्वतंत्रता कांग्रेसी नेताओं का अधिकार है, तो हड़ताल भी श्रमिकों का पवित्र अधिकार है. अंबेडकर के विरोध के बावजूद कांग्रेस ने बहुमत का फायदा उठाकर इस बिल को पास करा लिया. इसे ‘काले विधेयक’ के नाम से पुकारा गया. इसी विधेयक के विरोध में अंबेडकर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने 7 नवंबर 1938 की हड़ताल बुलाई थी. इसके पहले 12 जनवरी 1938 को इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के बैनर तले ही अंबेडकर ने किसानों के संघर्ष का नेतृत्व किया. इस दिन ठाणे, कोलाबा, रत्नागीरि, सातारा और नासिक जिलों के 20,000 किसान प्रदर्शन के लिए बम्बई में जमा हुए थे. जुलूस का नेतृत्व अंबेडकर ने खुद संभाला. किसानों के इस जुलूस की मुख्य मांग वतन प्रथा और खोटी प्रथाओं का खात्मा था. 17 सितम्बर, 1937 को उन्होंने महारों को अधीनता की स्थिति में रखने के लिए चली आ रही ‘वतन प्रथा’ खत्म करने के लिए एक विधेयक पेश किया था. वतन प्रथा के तहत थोड़ी सी जमीन के बदले महारों को पूरे गाँव के लिए श्रम करना पड़ता था और अन्य सेवा देनी पड़ती थी. एक तरह से वे पूरे गाँव के बंधुआ मजदूर होते थे.

इस विधेयक में यह भी प्रावधान था कि महारों को उस जमीन से बेदखल न किया जाए, जो गाँव की सेवा के बदले में भुगतान के तौर पर उन्हें मिली हुई थी. शाहूजी महराज ने अपने कोल्हापुर राज्य में 1918 में ही कानून बनाकर ‘वतनदारी’ प्रथा का अंत कर दिया था तथा भूमि सुधार लागू कर महारों को भू-स्वामी बनने का हक दिलाया. इस आदेश से महारों की आर्थिक गुलामी काफी हद तक दूर हो गई.
डॉ.अंबेडकर ने खोटी व्यवस्था खत्म करने के लिए भी एक विधेयक प्रस्तुत किया था. इस व्यवस्था के तहत एक बिचौलिया अधिकारी लगान वसूल करता था. इसी बिचौलिए को खोट कहा जाता था. ये खोट स्थानीय राजा की तरह व्यवहार करने लगे थे. राजस्व का एक बड़ा हिस्सा ये अपने पास रख लेते थे. ये खोट अक्सर सवर्ण जातियों ब्राह्मणों के ही होते थे.
बाम्बे प्रेसीडेंसी के लेजिस्लेटिव काउंसिल में कांग्रेस पार्टी के पास भारी बहुमत था. उसने डॉ.अंबेडकर की वतन व्यवस्था और खोट व्यवस्था के खात्मे के विधेयकों को पास नहीं होने दिया. इसका कारण यह था कि कांग्रेस के नेतृत्व पर पूरी तरह उन ब्राह्मणों या मराठों का नेतृत्व था, जिन्हें वतन प्रथा और खोट व्यवस्था का सबसे अधिका फायदा मिलता था. वे किसी भी तरह से अपने इस वर्चस्व और शोषण-उत्पीड़न के अधिकार को छोड़ने को तैयार नहीं थे. किसानों के इस संघर्ष में अस्पृश्यों के साथ मराठी कुनबी समुदाय भी शामिल था.

मजदूरों और किसानों के इस संघर्ष का नेतृत्व करते हुए डॉ.अंबेडकर ने सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों का भी सहयोग लिया. लेकिन, यह सहयोग ज्यादा दिन नहीं चल पाया. क्योंकि, कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट पूँजीवाद को तो दुश्मन मानते थे. लेकिन, वे ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष करने को बिल्कुल ही तैयार नहीं थे. जबकि डॉ.अंबेडकर ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद दोनों को भारत के मेहनतकशों का दुश्मन मानते थे. 12-23 फरवरी 1938 को मनमाड़ में अस्पृश्य रेलवे कामगार परिषद् की अध्यक्षता करते हुए डॉ.अंबेडकर ने कहा कि भारतीय मजदूर वर्ग ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद दोनों का शिकार है और इन दोनों व्यवस्थाओं पर एक ही सामाजिक समूह का वर्चस्व है. उन्होंने सभा में उपस्थित अस्पृश्य कामगारों से कहा कि कांग्रेस, सोशलिस्ट और वामपंथी तीनों अस्पृश्य कामगारों के विशेष दुश्मन ब्राह्मणवाद से संघर्ष करने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने अस्पृश्यों के कामगार यूनियन से अपनी पार्टी इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का समर्थन करने का आह्वान किया.

ब्रिटिश संसद द्वारा अगस्त 1935 में पारित भारत सरकार अधिनियम के तहत विभिन्न प्रांतों और केंद्र में भारतीयों के स्वायत्त शासन का प्रावधान किया गया था. इसी अधिनिय के तहत 1937 में चुनाव हुए. इन्हीं चुनावों में भाग लेने के लिए डॉ.अंबेडकर ने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन किया था. बाम्बे प्रेसीडेंसी में इस पार्टी ने 17 उम्मीदवार मैदान उतारे, जिसमें 13 उम्मीदवार अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीटों पर खड़े किए गए थे, जिनमें 11 सीटों पर उन्हें विजय मिली, जिसमें खुद डॉ.अंबेडकर भी शामिल थे. बाकी चार उम्मीदवार अनारक्षित सामान्य सीट पर खड़े किए गए थे, जिसमें तीन पर विजयी मिली. मध्य प्रांत और बिहार में पार्टी को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 20 सीटों में से तीन पर विजय मिली. इस चुनाव मे बाम्बे प्रेसीडेंसी में कांग्रेस पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था. मुस्लिम लीग के बाद बाम्बे प्रेसीडेंसी में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी थी. 
भारत के इतिहास में अगर सबसे पहले श्रमिकों को हक देने का किसी ने कार्य किया है तो बाबसाहब डॉ.भीमराव अंबेडकर ने किया है. इसके पहले श्रमिकों पर अंतहीन अत्याचार होता था. 12 घंटे, 15 घंटे, 18 घंटे तक उनसे काम लिया जाता था, मगर बाबासाहब ने संविधान में एक प्रावधान किया कि उनके लिए नियम बनाए और उनके हक के लिए बाबासाहब ने संविधान के जरिये जो कार्य किया जिससे पूरा देश ही नहीं बल्कि, पूरा विश्व बाबासाहब के सामने नतमस्तक है.

डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर के इस पहलू को हमारे भारतीय इतिहासकार और मजदूरों के समर्थक लोग न जाने क्यों दरकिनार करते आये हैं. जबकी मजदूर वर्ग के लिए की गई उनकी कई पहलकदमियाँ भारत के मजदूर आंदोलन के लिए बेमिसाल है. विदेश से अपनी पढ़ाई पूरी करके आने के बाद उन्होंने अपने काम की शुरुआत मजदूरों के लिए काम करने से की. अम्बेडकर ने 1936 में ‘इंडिपेन्डेंट लेबर पार्टी’ की स्थापना की. इस पार्टी का उदघोषणा पत्र मजदूरों, किसानों, अनुसूचित जातियों और निम्न मध्य वर्ग के अधिकारों की हिमायत करने वाला घोषणा-पत्र था.
डॉ.अम्बेडकर का मानना था कि भारत में मजदूर वर्ग में अनुसूचित जाति एक बड़ी तादात में शामिल हैं. इस वजह से मजदूरों के बीच भेद-भाव की खाई मौजूद है. मजदूर वर्ग के संघर्ष और जाति के खात्मे के संबंध में जाति आधारित भारतीय समाज की संरचना के बारे में उन्होंने कहा था कि वर्ण व्यवस्था केवल श्रम का ही विभाजन नहीं है, यह श्रमिकों का भी विभाजन है. उनका मानना था कि अनुसूचित जातियों को भी मजदूर वर्ग के रूप में एकत्रित होना चाहिए. मगर, ये एकता मजदूरों के बीच मौजूद जाति की खाई को मिटा कर ही संभव हो सकती है. जाति और वर्ग के सामंजस्य के सम्बन्ध में बाबासाहब की यह सोच बेहद क्रांतिकारी है, क्योंकि यह भारतीय समाज की सामाजिक संरचना की सही और वास्तविक समझ की ओर ले जाने वाली कोशिश है.

डॉ.अम्बेडकर का मानना था कि भारत में मजदूरों के दो बड़े दुशमन हैं-पहला ब्राह्मणवाद और दूसरा पूँजीवाद. ब्रह्मणवाद से उनका तात्पर्य स्वतंत्रता, समता और भाईचारे की भावना को नकारने वाली विचारधारा से है. बाबासाहब ट्रेड यूनियन के घनघोर समर्थक थे. उनकी राय में भारत में ट्रेड यूनियन की सबसे ज्यादा जरूरत है, मगर वे मानते थे कि भारत का ट्रेड यूनियन अपना मुख्य उद्देश्य खो चुका है. उनका मानना था की जब तक ट्रेड यूनियनवाद सरकार पर कब्जा करने को अपना लक्ष्य नहीं बनाता तब तक ट्रेड यूनियन बहुत ही कम मजदूरों का भला कर पाएंगी और ट्रेड यूनियन नेताओं की लगातार झगड़ेबाजी का अड्डा बनी रहेंगी.
डॉ.अम्बेडकर पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने मजदूरों के हड़ताल करने के अधिकार को स्वतंत्रता का अधिकार माना और कहा कि मजदूरों को हड़ताल का अधिकार न देने का अर्थ है मजदूरों से उनकी इच्छा के विरुद्ध काम लेना और उन्हें गुलाम बना देना. 1938 में जब बम्बई प्रांत की सरकार मजदूरों के हड़ताल के अधिकार के विरूद्ध ट्रेड डिस्प्यूट बिल पास करना चाह रही थी तब बाबासाहब ने खुलकर इसका विरोध किया. 1942 में तत्कालीन वायसराय ने अम्बेडकर को अपनी कार्यकारिणी के लिए नियुक्त किया और उन्हें श्रम विभाग का कार्य सौंपा दिया.

बाबासाहब डॉ.अम्बेडकर ने 1946 में श्रम सदस्य की हैसियत से केंन्द्रीय असेम्बली में न्यूनतम मजदूरी निर्धारण सम्बन्धी एक बिल पेश किया, जो 1948 में जाकर ‘न्यूनतम मजदूरी कानून’ बना. उन्होंने ट्रेड डिस्प्यूट एक्ट में सशोधन करके सभी यूनियनों को मान्यता देने की आवश्यक्ता पर जोर दिया और उन्होंने 1946 में लेबर ब्यूरो की स्थापना भी की.
हैरान करने वाली बात तो यह है कि बहुत ही कम लोग इस बात को जानते हैं कि डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर भारत में सफाई कामगारों के संगठित आंदोलन के जनक हैं. उन्होंने बम्बई और दिल्ली में सफाई कर्मचारियों के कई संगठन स्थापित किए. बम्बई म्युनिसिपल कामगार यूनियन की स्थापना बाबासाहब ने ही की थी. डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर नए भारत के निर्माण में मजदूरों की महती भूमिका को स्वीकार करते थे. उनका मानना था कि भारत को स्वराज्य मिल जाना ही काफी नहीं है, बल्कि यह स्वराज्य शोषितों, मजदूरों और पिछड़ों को मिलना चाहिए. इसके लिए मजदूरों को अपनी भूमिका निभानी होगी. बता दें कि आज भी यदि आप 12-14 घण्ट के बजाए 8 घण्टे काम करते हैं और बड़ी आसानी से छुट्टी भी ले लेते हैं तो यह सिफ व सिफ डॉ.बाबसाहब अम्बेडकर की देन है.

जनता से जबरन टैक्स वसूली


जनता से जबरन टैक्स वसूली
राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

केंद्र की मोदी सरकार ने कृषि कल्याण सेस खत्म किए जाने के बाद भी इसके तहत जनता से 1300 करोड़ रुपये से ज्यादा का टैक्स वसूल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अगर यह बात आरटीआई में नहीं आयी होती तो शायद इसका खुलासा भी नहीं हुआ होता. वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने के लिए वित्त मंत्रालय द्वारा धीरे-धीरे कई सारे सेस खत्म कर दिए गए थे. कृषि कल्याण सेस को भी एक जुलाई, 2017 से खत्म कर दिया गया था. हालांकि वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के ‘सिस्टम और डेटा प्रबंधन के निदेशालय जनरल’ ने आरटीआई आवेदन के तहत जानकारी दी है कि एक जुलाई, 2017 के बाद 1340.55 करोड़ रुपये का स्वच्छ भारत सेस वसूला गया है.

वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने 6 मार्च, 2018 को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि एक जुलाई, 2017 से स्वच्छ भारत सेस और कृषि कल्याण सेस खत्म कर दिया गया है. इसके अलावा वित्त मंत्रालय द्वारा 7 जून,2017 को जारी एक प्रेस रिलीज में भी बताया गया है कि जीएसटी को लागू करने के लिए एक जुलाई, 2017 से कृषि कल्याण सेस समेत कई सारे सेस खत्म किए जा रहे हैं. हालांकि, सिस्टम और डेटा प्रबंधन के निदेशालय जनरल द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक एक जुलाई 2017 से लेकर जनवरी 2019 तक में 1340.55 करोड़ का कृषि कल्याण सेस वसूला गया है. कृषि कल्याण सेस खत्म किए जाने के बाद भी इसके तहत पैसा वसूलना सरकार पर गंभीर सवाल खड़ा करता है.


बता दें कि साल 2016 में कृषि कल्याण सेस लागू किया गया है. इसके तहत सभी सेवाओं पर 0.5 फीसदी का सेस लगता है. सरकार का कहना है कि कृषि योजनाओं की फंडिंग और कृषि सुधार के लिए संबंधित पहल को बढ़ावा देने के लिए इस सेस को लागू किया गया था. आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक साल 2016 से लेकर अब तक में कुल 10,502.34 करोड़ का कृषि कल्याण सेस वसूला गया है. इसमें से वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान 7572.08 करोड़, 2017-18 के दौरान 2779.79 करोड़ और 2018-19 के दौरान जनवरी 2019 तक में 150.48 करोड़ वसूला गया है. कृषि कल्याण सेस की ही तरह स्वच्छ भारत सेस को भी बंद करने के बाद भी इसके तहत टैक्स वसूला जा रहा है. रिपोर्ट ने यह खुलासा किया था कि स्वच्छ भारत सेस बंद करने के बाद भी इसके तहत करीब 2,100 करोड़ वसूल लिए गए हैं. खास बात यह है कि सरकार ने अभी तक यह जानकारी नहीं दी है कि जो पैसे स्वच्छ भारत सेस बंद करने के बाद भी वसूले गए हैं, उन्हें किन कामों में खर्च किया गया है.
कृषि मंत्रालय ने बताया कि साल 2016-17 और 2017-18 के दौरान कृषि कल्याण सेस के तहत जो पैसे प्राप्त हुए थे उन्हें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और किसानों को लोन पर सब्सिडी देने में खर्च किया गया है. हालांकि मंत्रालय ने इस बात की कोई जानकारी नहीं दी कि आखिर जो पैसे कृषि कल्याण सेस को बंद किए जाने के बाद वसूला गया, उन्हें किन कामों में खर्च किया गया.

हैरानी की बात ये है कि कृषि मंत्रालय ने एक अन्य आरटीआई के जवाब में बताया कि उन्होंने 2016-17 और 2017-18 के बीच कृषि कल्याण कोष का 12,512.67 करोड़ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में खर्च कर दिया, जबकि कृषि कल्याण सेस के तहत अभी तक 10,502.34 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं. इसके अलावा मंत्रालय इस बात की भी स्पष्ट जानकारी देने में असफल रहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किन कामों में कृषि कल्याण राशि को खर्च किया गया. मंत्रालय ने इस संबंध में कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी. कृषि कल्याण सेस पर सरकार द्वारा संसद में दिए गए जवाबों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि अधिकतर जवाबों में सरकार ने आधी अधूरी और अस्पष्ट जानकारी दी है.

वित्त मंत्रालय में राज्यमंत्री संतोष कुमार गंगवार ने 28 जुलाई, 2017 को एक सवाल के जवाब में बताया कि साल 2016-17 के दौरान 8273.53 करोड़ रुपये का कृषि कल्याण सेस वसूला गया था और 2017-18 के दौरान मई 2017 तक 861.51 करोड़ का कृषि कल्याण सेस वसूला गया था. हालांकि, इस संबंध में आरटीआई के तहत प्राप्त किए गए आँकड़े बिल्कुल अलग हैं. मंत्रालय ने आरटीआई के जवाब में बताया है कि 2016-17 के दौरान 7572.08 करोड़ रुपये, 2017-18 के दौरान मई 2017 तक 849.81 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे. वित्त राज्य मंत्री ने भी ये स्पष्ट जानकारी नहीं दी कि कृषि कल्याण सेस की राशि को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किन कामों में खर्च किया जाएगा. इससे से साबित होता है कि सरकार ने देश की जनता के साथ घोर धोखेबाजी की है. अब जनता को चाहिए कि ऐसे धोखेबाज सरकार को इस चुनाव में सबक सिखाए.
—राजकुमार दैनिक मूलनिवासी नायक

मंगलवार, 12 मार्च 2019

मीडिया का बहिष्कार

मीडिया का बहिष्कार


मीडिया हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं का एक अग्रणी चेहरा है. इन पांच सालों में गोदी मीडिया बनने की प्रक्रिया तेज ही हुई है, कम नहीं हुई. एक मालिक के हाथों में पचासों चैनल आ गए हैं और पुराने मालिकों पर दबाव डालकर उनके सारे चैनलों के सुर बदल दिए गए हैं. राजनीति और कारोबारी पैसे के घाल-मेल से रातों-रात चैनल खड़े किए जा रहे हैं.
अगर सारे चैनल या 90 फीसदी चैनल एक ही मालिक के हो गए और वह किसी सरकार से झुक गया तब क्या होगा? विपक्ष को गोदी मीडिया की खास समझ नहीं है, उसे लगता है कि इस मंच का वह भी इस्तेमाल कर सकता है और इस चक्कर में वह मीडिया को सरकार के तलुए चाटते रहने की मान्यता देते आया है.
चैनलों में ऐसे राजनीतिक संपादक और एंकर पैदा किए गए हैं जो पूरी निर्लज्जता के साथ सरकार की वकालत कर रहे हैं. उन्हें सरकार की नीतियों में कमी नजर नहीं आती. वे प्रधानमंत्री के बयानों और नीतियों का स्वागत करने की जल्दी में रहते हैं. कई चैनलों में यही मुख्य चेहरा और आवाज हैं. कुछ जगहों पर इन्हें वैकल्पिक आवाज और चेहरे के रूप में मान्यता दी गई है. कुछ चालाक चैनलों ने इस विविधता को लेकर विज्ञापन भी बना दिया है. मगर यह विविधता नहीं है, बल्कि विविधता के नाम पर व्यापक रूप से प्रोपेगैंडा की एकरूपता को ही कायम करना है. जो अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ललाट से लेकर चरणों तक में समर्पित होता है.
आपको तय करना है कि गोदी मीडिया की बहसों में जाकर उसके प्रोपेगैंडा को मान्यता देनी है या नहीं, मेरे हिसाब से तो आपको इन बहसों में नहीं जाना चाहिए. 100 प्रतिशत बहिष्कार करें. ऐसा करने से चैनलों में बहस का स्पेस कम होगा और ग्राउंड रिपोर्टिंग का स्पेस बढ़ेगा. आपके इतना भर कर देने से लोकतंत्र और जनता का भला हो जाएगा.

रविवार, 10 मार्च 2019

कर्ज में डूबता देश

कर्ज में डूबता देश

♦ 3000 करोड़ की मूर्ति, 1 लाख करोड़ की बुलेट ट्रेन, क्या यह उस देश की सबसे पहली जरूरतें हैं, जहां छह करोड़ बच्चे कुपोषण (भुखमरी) के शिकार हैं, शिक्षकों के दस लाख पद खाली हैं, सवा तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और 20 करोड़ लोग रोज भूखे सोते हैं?


कर्जदार सरकारें देश की आजादी को सुरक्षित नहीं रख सकती हैं, क्योंकि तब कर्ज देने वाला नीतियों पर नियंत्रण रखता है. माध्यम वर्ग को आयकर में थोड़ी छूट और मिली, 12 करोड़ किसानों को हर रोज 16.50 रुपये मिलेंगे, क्योंकि वे पिछले दिनों कमर कस के बाहर निकल आए थे.
2030 तक नदियों को साफ करने का वायदा, 2030 में सबको पीनी का साफ पानी मिलने का सुखद स्वप्नय बहुत लोगों ने तालियां बजायीं और सोचा कि यह विकासवादी बजट आ गया है. हम सब अपने-अपने हित, अपने-अपने सुख पाल रहे हैं. मुझे जो मिला, मैं उससे खुश हो गया और दाएं-बाएं देखना, यह सवाल पूछना छोड़ दिया कि सरकार का पैसा कहां से आ रहा है और कहां जा रहा है?

हम सब अर्थव्यवस्था के विध्वंस में भागीदार बन रहे हैं. सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपये जनता को देकर, खुद 7 लाख करोड़ रुपये के कर्ज लेने का अधिकार पा लिया और इससे भी ऊपर समाज की प्राथमिकताओं के क्रम को बिगाड़ने का भय किसी को सरकार कभी नहीं बताती कि वह क्यों कर्ज ले रही है और इसका आने वाली पीढ़ियों पर क्या असर पड़ेगा?

लोकतंत्र में चुनाव बहुत महत्वपूर्ण कारक होता है, परंतु भारत में चुनाव भविष्य की संभावनाओं को आज ही बंदी बना देने के काम आने लगे हैं. समाज को गुलाम बना लेने के लिए राजनीतिक विचारधारा को राज्य पर नियंत्रण चाहिए, यह नियंत्रण चुनाव से हासिल होता है.

सत्ता में आने के बाद राजनीतिक दल के काम के दो विभाग होते हैं- एक विभाग होता है समाज को अपनी विचारधारा और चरित्र के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया चलाना और इससे होने वाले वाले नुकसान की राजनीतिक आर्थिक नीति से भरपाई करने की कोशिश करते रहना.
वर्ष 1991 से जनवरी 2019 तक 28 साल गुजर गए हैं, हर साल नित नई चुनौतियों का सामना भारत कर रहा है. जरा सोचिए कि आर्थिक विकास के दावे के साथ लागू की गई उदारवादी-निजीकरण की नीतियों का आज परिणाम यह है कि भारत इस अवधि में सबसे ज्यादा बेरोजगारी के संकट में फंस गया है आज 10 करोड़ लोग काम की तलाश में हैं.

आखिर क्या बदला है इन 28 सालों में? आर्थिक नीति का सबसे अहम पहलू होता है कि सरकार की आय और व्यय का स्वरूप क्या है? क्या वह वास्तव में आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ रहा रही या आर्थिक संसाधनों के लिए सरकार खुद भी बाजार और निजी क्षेत्र पर निर्भर होती जा रही है? सच तो यह है कि भारत की सरकार का विकास के गुब्बारे में लोक ऋण (यानी भारत सरकार द्वारा बाजार, प्रतिभूतियों, लोगों की जमा और बचत, विदेशी ऋण) की हवा भरी हुई है. अब हमें यह पूछना होगा कि भारत आर्थिक विकास कर रहा है, किन्तु क्या भारत आत्मनिर्भर हो रहा है? क्या भारत सरकार आज लोक हित में कोई भी नीति बाजार के दबाव के बिना बना सकती है? बुलेट ट्रेन से लेकर शौचालय बनाने और शिक्षा तक सरकार निजी क्षेत्र और वित्तीय संस्थाओं पर निर्भर है.

अंतर्राष्ट्रीय संस्था ऑक्सफेम के मुतबिक असमानता को खत्म करने की प्रतिबद्धता रखने वाले 157 देशों की सूची में भारत का स्थान 147 है. स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर लोक व्यय के मामले में इसका स्थान 151 है. मजदूरों के हकों की सुरक्षा में भारत 141 वें स्थान पर है. ताजा हालात ये हैं कि वर्ष 2017-18 में भारत के अरबपतियों की कमाई में हर रोज 2200 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ भारत के 13.6 करोड़ लोग वर्ष 2004 से लगातार कर्ज में फंसे हुए हैं.

भारत की 77.4 प्रतिशत सम्पदा 10 प्रतिशत अमीर लोगों के हाथ में है. इतना ही नहीं इनमें भी गजब की उठापटक है. भारत की 51.53 प्रतिशत संपदा पर भारत के 1 प्रतिशत सबसे अमीर लोगों का कब्जा है, जबकि आर्थिक स्थिति के आधार पर नीचे की पायदान पर रहने वाले 60 प्रतिशत लोगों के पास देश की केवल 4.8 प्रतिशत सम्पदा है. थोड़ा और जानते हैं. भारत से 9 सबसे अमीर लोगों के पास जितनी सम्पत्ति है, वह भारत के निचले पायदान पर रहने वाले 50 प्रतिशत लोगों के बराबर है. 

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए सरकार के इस कार्यकाल के आखिरी बजट में अगले दशक के लिए दस सूत्रीय एजेंडा दिया गया, जिसमें नदी, आसमान, स्वास्थ्य, उद्योग आदि की बात कही गई है, लेकिन इसमें यह नहीं कहा गया कि सरकार पूंजी के केंद्रीयकरण और नव-उपनिवेशवादी कारनामों पर अंकुश लगाएगी. एक जगह पर समता शब्द का भी उपयोग किया गया है, किन्तु क्या समानता के लिए कोई पहल की जा रही है?

अगले पांच साल में 5 ट्रिलियन और दस साल में दस ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था बनाने का सपना देखा गया है. अर्थव्यवस्था तो बढ़ ही जाएगी, परन्तु यह भी तय है कि इन नीतियों के चलते 10 ट्रिलियन डॉलर की उस अर्थव्यवस्था का संचालन संविधान, संसद, सरकार और लोक से नहीं, बल्कि 10 सबसे अमीर परिवारों से होगाय जो अर्थव्यवस्था पर इतना नियंत्रण जमा लेंगे कि कोई भी सरकार सिर्फ और सिर्फ उनके मुताबिक काम करे. जरा सोचिये एक तरफ तो कुछ परिवार अमीर से अमीर होते गए, परन्तु दूसरी तरफ भारत की सरकार खुद भी कर्ज के दलदल में फंसती चली गई.

वर्तमान स्थिति में भारत में कुल 119 खरबपति हैं, जिनकी कुल सम्पत्ति 28 लाख करोड़ रुपये है. ऑक्सफेम के मुताबिक भारत में सरकार पूरे देश के लिए चिकित्सा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और जल आपूर्ति पर कुल 2.08 लाख करोड़ रुपये खर्च करती हैय इसके उलट अकेले मुकेश अंबानी की सम्पदा का मूल्य 2.80 लाख करोड़ रुपये है. हम सब लगातार आर्थिक विकास के पहलुओं से संदर्भ में सरकार के तरफ से एक वक्तव्य को बार-बार सुनते रहते हैं कि देश तरक्की कर रहा है. इसमें कोई शक नहीं है कि सड़कें बनी हैं, बिजली ज्यादा मिल रही है, अस्पताल भी ज्यादा बन गए हैं, इमारतें और भवन अब बहुतायत में हैं, लेकिन सवाल यह है कि ये जो हासिल है, वह कैसे हासिल हुआ है?

यह सब कुछ कितना स्थायी है? क्या एक व्यक्ति और सामाजिक प्राणी होने के नाते हम यह मानते हैं कि कर्जदार होकर सुविधाएं जुटा लेना एक अच्छी नीति है? कभी हमारी विकास दर 4 प्रतिशत हो जाती है, तो कभी 6 प्रतिशत, कभी 7 और 7.5 प्रतिशत. इसे ही वृद्धि दर (ग्रोथ रेट) भी कहा जाता है. वास्तव में यह वृद्धि दर होती क्या है? अर्थव्यवस्था के सालाना आकार और स्वरूप का आकलन उस राशि से किया जाता है, जितना वित्तीय लेन-देन उस साल में किया गयाय इसमें उत्पादन शामिल है.

दूसरे रूप में कहें तो सभी तरह के सामानों और वस्तुओं की खरीद-बिक्री, सेवाओं के शुल्क (वकील, डाक्टर, नल सुधरवाने, परामर्श लेने आदि), परिवहन, कृषि, उद्योग, खनन, बैंकिंग सरीखे क्षेत्रों में जितना लेन-देन का व्यापार होता है, उस राशि को जोड़कर यह देखा जाता है कि देश में कुल कितनी राशि का आर्थिक व्यवहार हुआ. यह उस साल का सकल घरेलू उत्पाद (यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट-जीडीपी) माना जाता है. इसमें बीमारी का ज्यादा महत्व है, स्वास्थ्य का नहीं. पहाड़ों को जितना ज्यादा छीला जाएगा, नदियों का जितना दोहन किया जाएगा, जितने ज्यादा दरख्त काटे जाएंगे, सकल घरेलू उत्पाद उतना ही तो बढ़ेगा.

वृद्धि दर केवल अर्थव्यवस्था के आकार को सांकेतिक रूप में प्रस्तुत करने के लिए गढ़ी गई अवधारणा है, जबकि विकास को मापने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक-लैंगिक बराबरी, सामाजिक स्वतंत्रता, शांति, संसाधनों का समान वितरण सरीखे पहलुओं का संज्ञान लिया जाना अनिवार्यता होती है. हम किसी भी स्तर पर उस अनिवार्यता का पालन नहीं करते हैं. हमारे पिछड़ेपन का स्तर यह है कि अब तक इन मानकों के आधार पर मानवीय विकास को हर साल मापने का कोई पैमाना हम विकसित ही नहीं कर पाए हैं.

यही कारण है कि भारत में पोषण और स्वास्थ्य से संबंधित अखिल भारतीय आंकड़े 8 से 10 साल में एक बार जारी होते है. मातृत्व मृत्यु के स्तर को 5 से 6 साल में एक बार जांचा जाता है. शिशु मृत्यु दर के आंकड़े 2 साल देरी से आते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मानवीय विकास के इन सूचकों का कोई खास महत्व वृद्धि दर में होता नहीं है. एक फरवरी 2019 को जब भारत के आम बजट के दस्तावेज जारी हुए, तो जरूरी था, उन पन्नों को पलटना, जिन्हें आम भारतीय पलटते नहीं हैं. यह देखना कि संसद में विकास की क्रांति की घोषणा को पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधन हैं कहां? क्या वास्तव में सरकार जिम्मेदारी और जवाबदेही के साथ आय-व्यय पर नियंत्रण रख रही है?
कर्जदार सरकार
वर्ष 2003 में भारत सरकार ने वित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन कानून लाया गया, जिसमें सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले लोक ऋण को सीमित रखने की मानक तय किए गए. वर्ष 2001-02 में भारत सरकार पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 61.4 प्रतिशत के बराबर का था. जो मार्च 2018 में घटकर 50.5 प्रतिशत पर आ गया. जब सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणा की खोखली और भ्रमित करने वाली है, तो वित्तीय घाटे और लोक ऋण के मानकों को किस हद तक विश्वसनीय मान जा सकता है?

जीडीपी के आंकड़ों में लगातार हेर-फेर हो रहे हैं, कोई नहीं जानता कि वास्तव में भारत की सही जीडीपी है कितनी? किन्तु लोक ऋण एक भौतिक सच्चाई है, कर्ज लिया गया है और कर्ज चुकाया जाना है और ब्याज चुकाया जा रहा है. ये सब प्रत्यक्ष है, किन्तु जीडीपी मृगतृष्णा है.

आधुनिक आर्थिक नीतियों को अपनाए जाने के ठीक पहले यानी वर्ष 1990-91 में भारत सरकार का खर्च 94,535 करोड़ रुपये का था. उस समय लोक ऋण 1.20 लाख करोड़ रुपये था. जिसमें से 20,850 करोड़ रुपये का व्यय ब्याज भुगतान के रूप में किया जाता था. हाल ही में पेश किया गए वित्तीय वर्ष 2019-20 के बजट का आकार 27.33 लाख करोड़ रुपये हो गया है यानी बजट का आकार 28 गुना बढ़ गया है. इसी अवधि में भारत सरकार पर लोक ऋण 82 गुना बढ़कर 97,97,818 करोड़ रुपये हो गया है. इसके साथ ही सरकार के कुल बजट में से 24 प्रतिशत का हिस्सा यानी 6,65,061 करोड़ रुपये केवल ब्याज के भुगतान में खर्च किए जाने लगे.
लोक ऋण का तेज़ी से बढ़ता तूफान

वर्ष 1950-51 में भारत सरकार पर कुल 3059 करोड़ रुपये का लोक ऋण था, जो वर्ष 2019-20 में बढ़कर 97.98 लाख करोड़ रुपये हुआ जा रहा है, यानी 320 गुना वृद्धि हुई है. इसी तरह आजादी के बाद उस वर्ष में ब्याज के रूप में 39 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था. वर्ष 2019-20 में भारत सरकार कर्ज के एवज में 6.65 लाख करोड़ रुपये के ब्याज का भुगतान करेगी. इस साल भारत सरकार का कुल व्यय 27.84 लाख करोड़ रुपये का है, जिसमें से 6.65 लाख करोड़ रुपये यानी 24 प्रतिशत राशि केवल ब्याज में जाएगी. एक तरफ तो राजस्व बढ़ाने के लिए भारत सरकार वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) लगा रही है, नोटबंदी कर रही है, पर फिर भी वर्ष 2019-20 के लिए उसे 7.03 लाख करोड़ रुपये का नया कर्ज लेना होगा. वर्ष 1997-98 में भारत सरकार पर कुल लोक ऋण 7.78 लाख करोड़ रुपये था, जो 13 गुना बढ़कर 97.98 लाख करोड़ रुपये तक पंहुच गया है. इसी तरह कर्ज के एवज में चुकाया जाने वाला ब्याज दस गुना बढ़ा है, जो 65,637 करोड़ से बढ़कर 6.65 लाख करोड़ रुपये हो गया. इन 23 सालों में भारत सरकार ने केवल ब्याज के रूप में 59.75 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया है.
राजग सरकार का कार्यकाल :-

वर्ष 1999 से वर्ष 2019 तक प्रस्तुत हुए बजटों के आधार पर अब तक यह माना जा सकता है कि चार सरकारों ने अपने कार्यकाल पूरे किए हैं. इन चार सरकारों में लोक ऋण बढ़ाने में सभी सरकारों ने भूमिका निभाई है.
1999 से 2003 तक अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 7.16 लाख करोड़ रुपये, फिर यूपीए (एक) ने 11.65 लाख करोड़ रुपये, यूपीए (दो) ने 21.39 लाख करोड़ रुपये और फिर वर्तमान एनडीए की सरकार ने लोक ऋण में 35.55 लाख करोड़ रुपये का भार बढ़ाया है. जब नरेंद्र मोदी की सरकार ने कार्यभार लिया था तब 65.42 लाख करोड़ रुपये का कर्ज सरकार पर था, जो उनके हालिया बजट प्रावधानों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2019 में 97.98 लाख करोड़ रुपये तक पंहुच रहा है. लोक ऋण से आर्थिक विकास की नीति आजाद भारत के नागरिकों की आजादी को छीन लेगी.


सच तो यह है कि भारत और लोकतंत्र, दोनों की ही प्राथमिकताएं बेठिकाने-बेठौर कर दी गई हैं. 3000 करोड़ रुपये की मूर्ति, 5000 करोड़ रुपये की धार्मिक योजना, 1 लाख करोड़ रुपये की बुलेट ट्रेन, क्या ये उस देश की सबसे पहली जरूरतें हैं, जहां छह करोड़ बच्चे कुपोषण (भुखमरी) के शिकार हैं, शिक्षकों के दस लाख पद खाली हैं, सवा तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और 20 करोड़ लोग रोज भूखे सोते हैं?