मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

मेरा जीवन संघर्ष ही मेरा संदेश है : डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर

मेरा जीवन संघर्ष ही मेरा संदेश है : डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर


मेरी जय-जयकार करने के बजाए, मेरे अधूरे कारवां को पूरा करने के लिए जान की बाजी लगा दो...!
विश्वरत्न, संविधान निर्माता, सिंबल ऑफ नॉलेज, नारी मुक्तिदाता, डॉ.बाबासाहब अंबेडकर जी के 129वीं जयंती पर देश के 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजन समाज को दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से हार्दिक बधाई!
मोहिनी राज
चन्दौली (उत्तर प्रदेश)
आज डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर की 129वीं जयन्ती है. लॉकडाउन को ध्यान में रखते हुए हर घर-घर में बाबासाहब अम्बेडकर की जयंती मानाई जा रही है. बहुत खुशी की बात है. लेकिन, जयंती मनाने के पीछे क्या उदेश्य है, इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए. हमारे सभी महापुरूषों का उदेश्य मूलनिवासी बहुजन समाज को ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्त करना था. कुछ हद तक हमारे महापुरूषों का उदेश्य पूरा हुआ, लेकिन, अभी बहुत ज्यादा बाकी है, जिसे पूरा करना होगा. और उसे पूरा करने के लिए ही डॉ.बाबासाहब ने कहा था कि ‘‘मेरी जय-जयकार करने के बजाए, मेरे अधूरे कारवां को पूरा करने के लिए जान की बाजी लगा दो, मेरा जीवन संघर्ष ही मेरा संदेश है ’’ इसे हमें ही पूरा करना है. इसलिए हमें इस उदेश्य को ध्यान में रखते हुए जयन्ती मनानी है. आज इस मौके पर सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि देश में हर साल महापुरूषों की जयन्ती या स्मृति दिवस मनायी जाती हैं, लेकिन महापुरूषों की जयन्ती मनाने के पीछे कोई उदेश्य नहीं दिखाई दे रहा है, जबकि जयन्ती मनाने के पीछे उदेश्य होना चाहिए. क्योंकि, आज के इस मौके पर जो बातें प्रासंगिक है उसे बताना बहुत ही आवश्यक है.

किसी भी महापुरूषों की जन्म जयन्ती या स्मृति दिवस मनाने से पहले कुछ निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

पहला-किसकी जयन्ती मनायी जानी चाहिए?
दूसरा-जयन्ती क्यों मनायी जानी चाहिए?
तीसरा-जयन्ती के पीछे उद्ेश्य क्या है?
चौथा-जयन्ती कैसे मनायी जानी चाहिए?
पाँचवां-वर्तमान में जयन्ती कैसे मनायी जा रही है?

पहली बात :- किसकी जयन्ती मनायी जानी चाहिए? जिन लोगों ने हमारे मानवीय अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष किया, जिन लोगों ने हमारे अधिकार के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया, ऐसे लोगों की जयन्ती मनायी जानी चाहिए।
दूसरी बात :- जयन्ती क्यों मनायी जानी चाहिए? हमें जयन्ती इसलिए मनायी जानी चाहिए कि ताकि हम अपने महापुरूषों के इतिहास को जान सकें, उनके जीवन संघर्ष को जान सकें, उनकी विरासत रूपी विचारधारा को समाज में प्रस्थापित कर सकें और उनके द्वारा बताए गये मार्गों पर चल सके, इसलिए हमें जयन्ती मनायी जानी चाहिए।
तीसरी बात :- जयन्ती के पीछे उद्श्य क्या है? जयन्ती के पीछे यह उद्श्य होना चाहिए कि हमारे महापुरूषों ने कौन-कौन से मानवीय मूल्यों के लिए संघर्ष किया? वह अधूरा है या पूरा हो गया है? अगर वह पूरा हुआ तो कितना पूरा हुआ और कितना अधूरा है? जो पूरा हुआ वह कैसे पूरा हुआ? जो अधूरा है वह कैसे पूरा होगा? और उसे कौन पूरा करेगा? जिन महापुरूषों ने संघर्ष किया उन महापुरूषों का किन-किन लोगों ने साथ सहयोग किया? किन-किन लोगों ने विरोध किया? किन-किन लोगों ने महापुरूषों के साथ धोखेबाजी किया? किसने अपमानित किया? किसने षड्यंत्र किया? किसने महापुरूषों की हत्याएं की? और महापुरूषों की हत्या करने के बाद किसने उनकी विचारधारा को नष्ट किया? आदि बातों पर चिंतन-मनन करना, विचार करना और निर्णय लेना, निर्णय लेने के बाद उसपर अमल करना जयन्ती के पीछे मुख्य उदे्श्य होना चाहिए।
चौथी बात :- जयन्ती कैसे मनायी जानी चाहिए? आज कल प्रायः यही देखा जा रहा है कि 365 दिन में एक दिन खूब जय, जयकारी करते हैं और 364 दिन घर में बैठे रहते हैं. 364 दिन तक उनको न तो महापुरूषों से मतलब रहता है और न ही समाज से ही मतलब रहता है। एक दिन महापुरूषों की जयन्ती मनाकर 365 दिन तक घर में बैठे नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज को जागृत करना चाहिए, उनकी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। उनकी विचारधारा को समाज में प्रस्थापित करना चाहिए और उनके उद्ेश्य को पूरा करने के लिए संघर्ष करना चाहिए, इस तरह से जयन्ती मनायी जानी चाहिए।
पाँचवीं बात :- वर्तमान में जयन्ती कैसे मनायी जा रही है? आज कल महापुरूषों की जयन्ती जातिगत रूप से मनायी जा रही हैं। जैसे संत रविदास और डॉ.बाबसाहब अम्बेडकर की जयन्ती चमार मनाते हैं। तथागत बुद्ध, सम्राट अशोक और लेलिन बाबू जगदेव सिंह कुशवाहा की जयन्ती कुशवाहा मनाते हैं। पेरियार ललई सिंह यादव की जयन्ती अहिर मनाते हैं, राष्ट्र संत गाडगे बाबा की जयन्ती धोबी मनाते हैं, पेरियार रामासामी नायकर की जयन्ती गडे़री मनाते हैं, राष्ट्रपिता जोतिराव फुले की जयन्ती माली और कयूम अंसारी की जयन्ती मुसलमान मनाते हैं, जबकि इन सभी महापुरूषों ने जाति, विषमता, भेदभाव को खत्म करने के लिए जीवनभर संघर्ष किया। जान कुर्बान कर दिया और हम उन्हीं महापुरूषों को जातियों में बाँधकर जयन्ती मनाते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें महापुरूषों को जातियों में बांधकर नहीं, जातिवाद, भेदभाव और विषमता को त्यागकर, सभी जातियों को मिलकर सभी महापुरूषों की जयन्ती मनानी चाहिए, चाहे महापुरूष बहुजन समाज के किसी भी जाति से हों।
दूसरी बात, आज खूब धूमधाम से डीजे के साथ नाचते-गाते हुए उत्सव और त्योहार के रूप में महापुरूषों की जयन्ती मनायी जा रही हैं, जिसमें करोड़ों रूपये हर साल खर्च हो जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि केवल बाबासाहब अम्बेडकर की जयन्ती पर पूरे भारत में हर साल 75 करोड़ रूपया खर्च होता है? यह आँकड़ा 10 साल पुराना है, आज करीब अरबों रूपये होगा। यह कितनी चिंताजनक बात है कि हम केवल उनकी जय-जयकार के लिए अरबों रूपये हर साल खर्च कर देते हैं, मगर उनके अधूरे काम को पूरा करने के लिए एक रूपया भी नहीं खर्च करते हैं। आज जिस तरह से जयन्ती मनायी जा रही है उस तरह से सभी मानवीय साधन बर्बाद हो रहे हैं।

अब सवाल यह है कि क्या हमारे महापुरूषों का यही आंदोलन था? क्या उनका यही अधूरा काम रह गया है? क्या हमारे महापुरूषों ने यही कहा था? हर महापुरूषों ने मरते समय यही कहा था कि हमारी जयन्ती मनाने, जय-जयकार करने के बजाय जो हमारा अधूरा काम रह गया है उसे पूरा करने के लिए जान की बाजी लगा दो। डीजे लगाने के लिए नहीं कहा था, लेकिन हम क्या कर रहे हैं? क्या हमारे और आपके नाम पर एक रूपया भी चन्दा मिलता है? नहीं, महापुरूषों के नाम पर मिलता है, मगर हम उसे इस्तेमाल कहाँ कर रहे हैं नाचने-गाने और जय-जयकार करने पर।

हमें महापुरूषों की जयन्ती इस तरह से नहीं मनानी चाहिए, बल्कि उनकी जयन्ती के अवसर समाज का इकट्ठा करना चाहिए, समाज में महापुरूषों के इतिहास और उनके जीवन संघर्ष को बताना चाहिए। महापुरूषों ने किसके लिए क्या किया यह बात समाज को बतानी चाहिए, महापुरूषों के विचारों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए, उनके बताए मार्ग पर चलने के लिए लोगों को प्रेरित करना चाहिए, जन-आंदोलन के लिए लोगों को तैयार करना चाहिए और उनके नाम पर मिलने वाले चन्दा को महापुरूषों के अधूरे काम को पूरा करने के लिए खर्च करना चाहिए।
ऐसा आप लोग करेंगे, इसी आशा और विश्वास के साथ जय मूलनिवासी

यह धरती तंग है तो तंग ही सही, आसमाँ पर रंग है बेरंग ही सही!
हम तो देश में समता, स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय चाहते हैं,
अगर विदेशी ब्राह्मण जंग चाहते हैं तो जंग ही सही!!

राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

मंगलवार, 31 मार्च 2020

जिंदगी का लॉकडाउन, भारत की रूह कंपा देने वाली तस्वीरें

लॉकडाउन से पूरे देश में हाहाकार, भारत के मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों का ये हाल कर दिया है, जानवर से भी बदतर जिंदगी बनाकर छोड़ दिया है.

आज पूरे देश में लॉकडाउन से हाहाकार मच गया है. इस लॉकडाउन ने तो जिंगदी का ही लॉकडाउन कर दिया है. देश में कोरोना का कहर है तो सड़कों पर गांवों का शहर बन गया है. एक भी मुख्य सड़क बची नहीं है जहां पर गांव जाने वाले गरीबों का रेला नहीं लगा है. हर सड़क पर गरीबी और लाचारी ही बिखरी पड़ी है. देश को लॉकडाउन करने से पहले गरीबों को गांवों तक पहुंचा दिया गया होता या फिर उनमें भरोसा जगा दिया गया होता कि आप जहां हैं, वही रहें, सरकार किसी को भूखा नहीं सोने देगी. तो क्या तब हालात अलग होते? लेकिन ऐसा नहीं किया गया. हां सरकार ने ऐलान तो बड़े पैकेज का किया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और उसका असर नाकाफी रहा. 
अब पूरे देश में लॉकडाउन होने के कारण सैकड़ों प्रवासी पैदल ही अपने घरों की ओर लौटने को मजबूर हैं. इन लौटने वालों में भारत के मस्तक से गुजरती तकलीफ और वेदना की लकीरें दिखती हैं. भूख और गरीबी की अटूट जंजीरें, बिलखते बच्चे, तड़पती माताएं और छटपटाते पिता इस भीड़ का हिस्सा हैं. यह इसलिए है क्योंकि ना हम और ना हमारा शासन-प्रशासन ये सब देखने के लिए तैयार है. जिन्होंने गरीबों के लिए नीतियां बनाई, उनकी कल्पना से परे कहीं ज्यादा गरीबी हमारे भारत की माटी में गड़ी हुई थी. कोरोना की बीमारी तो हवाई जहाज के रास्ते रईस ले आए, लेकिन अब चलते-चलते गरीबों के हवाई चप्पल घिस रही हैं.
बता दें कि आज देश की जनता का जो ये हाल किया जा रहा है इसका मूलकारण भारत का शासक विदेशी अर्थात ब्राह्मण है. देश की सत्ता पर ब्राह्मणा का कब्जा है. अगर देश का शासक भारत का मूलनिवासी होता, देश की सत्ता पर मूलनिवासी बहुजनां का कब्जा होता है तो आज ऐसा दिन नहीं देखने को मिलता. देश की सत्ता पर ब्राह्मणों का पूर्ण रूप से कब्जा होने के नाते शासक जातियों के लोग भारत के मूलनिवासियों पर जुल्म ढा रहे हैं. परन्तु, अब यही मौका है कि जनता को इन घटनाओं से सबक ले लेनी चाहिए और इन विदेशियों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर देना चाहिए. अगर आज का यह दर्द जनता भूल गई आने वाले समय में इससे ज्यादा दर्द झेलना होगा. समय है लॉकडाउन के दौरान घर में रहकर मूलनिवासी बहुजनों को आंदोलन के लिए तैयार करें.

73 साल बाद भी वहीं तस्वीर...

ये तस्वीरें चीख-चीखकर गवाही दे रही है कि सड़कों पर लगी गरीबों, मजदूरां की कतारें सामाजिक और आर्थिक विभाजन का मार्मिक आभास कराती हैं और बताती हैं कि जैसे तस्वीरें भारत ने 1947 में विभाजन के वक्त देखी थी, उसमें और आज के कोरोना काल में तनिक भी अंतर रह नहीं गया है. अंतर केवल यही है कि उस वक्त यही तस्वीरें ब्लैक एंड वाइट देखी गयी थी आज कलर में देखी जा रही है. देश की सड़कों पर खींची जा चुकी मुफलिसी की तमाम लकीरें ये बताती हैं कि खूबसूरत और चमकते-धमकते शहरों के अंदर कितना अंधेरा है. शायद इसीलिए ये लोग जिनका शरीर भी ठीक से साथ नहीं दे रहा, इनको अब अपने गांव की झोपड़ी के अंधकार में ही जिदंगी का आफताब नजर आने लगा है.

जिंदगी जीने के लिए आये शहर, जिंदगी बचाने के लिए जा रहे गांव...
मजदूरों को कोरोना वायरस से ज्यादा भूख का डर है. जिंदगी जीने के लिए शहरों में आये थे, लेकिन अब उनका जीना मुश्किल हो गया. इसलिए वे अपनी जिंदगी बचाने के लिए गांव जा रहे हैं. लॉकडाउन में कोई साधन नहीं है, इसलिए वे अपनी जान बचाने के लिए जान को दांव पर लगाकर सैकड़ों किमी पैदल ही अपने गांव के लिए निकल पड़े हैं. आनंद विहार में बसों की सूचना मिली तो शनिवार को सुबह से ही लोनी रोड, गोल चक्कर के पास से लोगों के काफिले निकलते नजर आए. घर जाने लिए निकले इन लोगों में इटावा, लखनऊ, मैनपुरी, हरदोई, आजमगढ़ जैसे क्षेत्रों के लोग है. जो परिवहन निगम की बस नहीं मिलने की स्थिति में पैदल ही 300-400 किलोमीटर के सफर पर निकले थे.

माँ अभी और कितना चलना है....?

अब तक शहरों में भूखे बच्चे आसमान ओढ़कर सोते थे, मां पत्थरों को तोड़कर रोटी कमाती थी और उसी से इन मासूमों को कभी एक वक्त तो कभी दो वक्त की रोटी मिलती थी. लेकिन लॉकडाउन ने जब उस रोटी पर भी कर्फ्यू लगा दिया है तो ये शहरों में रहकर क्या करें, जिएं तो जिएं कैसे. हर किसी का कलेजा फट जाता है जब इस विभत्स तस्वीरों को देखता है. एक मां के सिर से लेकर कंधे और पीट पर बोझ है, आखों में आंसूं के अलावा कुछ भी नहीं है. हाथ में रोती विलखती दो साल के मासूम बच्ची का हाथ और पीछे लंगड़ाती हुई चल रही चार साल की बेटी है. माँ अपने बच्चों के हसहनीय दर्द को पी-पीकर आगे बढ़ रही है, माँ तो ये भी भूल गई है कि दिल्ली से कानपुर की दूरी 470 किमी है.

अब और नहीं चला जाता माँ...

ऐसी ही विचलित कर देने वाली एक और विभत्स तस्वीर गोरखपुर से आई है. यूपी के बस्ती जिले में रहकर पेट पालने वाली एक बेघर माँ अपने छोटे बच्चे के साथ देवरिया पैदल ही निकल पड़ी. जब पूरा शहर अपने घरों में रहने को मजबूर है तो ये माँ-बेटे सड़कें नाप रहे थे. जबकि, बस्ती से गोरखपुर 80 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद बच्चा बीच सड़क पर अपनी माँ का पैर पकड़ कर बैठ गया. मानों बच्च अपनी माँ से कह रहा हो ‘बस माँ अब, मैं थक गया हूं और नहीं चल सकता.

सफर में छूट गया जीवनसाथी का साथ...

लॉकडाउन के चलते मोपेड पर पत्नी व दो बच्चों के साथ दिल्ली से सिद्धार्थनगर के लिए निकले युवक की अचानक तबीयत बिगड़ी और बाद में मौत हो गई. 32 वर्षीय युवक दिल्ली की नवीन विहार कॉलोनी में अपनी पत्नी व दो बच्चों के साथ किराए के मकान में रहता था, जहां वह बिस्कुट व कुरकुरे सामान की सेल्समैनी करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रहा था. लॉकडाउन के बाद काम बंद होने से आय का साधन समाप्त हुआ तो युवक शुक्रवार की देर रात्रि पत्नी व दो बच्चों को मोपेड पर बिठाकर घर के लिए चल दिया. सुबह 10 बजे के लगभग वह सिकंदराराऊ (अलीगढ़) जीटी रोड पर नगर पालिका के समीप पहुंचा तभी उसकी तबीयत बिगड़ गई. मोपेड रोकते ही वह जमीन पर गिर पड़ा. उसके साथ दूसरी मोपेड पर सवार भाई ने उपचार के लिए एंबुलेंस को फोन लगाया. लेकिन, एंबुलेंस की मदद एक घंटे तक नहीं मिली और विनोद ने दम तोड़ दिया.

4 साल के बेटे की लाश गोद मे लेकर पैदल जा रही महिला...

देश में जितना कोरोनावायरस का डर नहीं उससे कहीं ज्यादा लॉकडाउन का खौफ है. लॉकडाउन ने देश के 83 करोड़ गरीबों को भुखमरी की कगार पर खड़ा कर दिया है. अब तो नौबत उनके मरने की आ रही और कुछ मर भी रहे हैं. इस बीच एक और तस्वीर आई जिसे असम का बताया जा रहा है. इसमें दिखाया गया है कि एक माँ अपने 4 साल के बच्चे की लाश को लेकर पैदल अपने घर जा रही है. बताया जा रहा है कि लॉकडाउन में कोई साधन नहीं मिल रहा है. उस माँ पर क्या गुजरी होगी जो अपने बच्चे की लाश को लेकर कई मीलों तक पैदल चली होगी.

घरों में रामायण और सड़कों पर भूख से महाभारत
एक तफ जहां देश की सड़कों पर भूख की महाभारत नजर आ रही है तो वहीं देश के नेता घरों में बैठकर टीवी पर रामायण देख रहे हैं. सरकार शायद देखने में देर कर चुकी है तो सवाल यही कि क्या सरकार इस स्थिति से बेखबर थी. क्या सरकार और उसके अधिकारियों को ये नहीं पता था कि देश में 83 करोड़ लोग गरीबी के चलते भुखमरी के शिकार हैं? क्या सरकार यह नहीं जानती थी कि  देश में हर रोज 20 करोड़ लोग भूखे पेट सोते हैं? सरकार ने क्यों नहीं पहले ही सोच लिया कि भूखे लोगों को रोटी नहीं मिलेगी और हाल यही होगा. अब सरकारें किराया माफ करवाएं या फिर बसें चलवाएं, फर्क क्या पड़ता है. अब तो राहत के सारे ऐलान भी बेमानी से लगते हैं क्योंकि हर तरफ अफरा तफरी का माहौल है. दिल्ली बॉर्डर से बस चलने की सूचना क्या मिली, पूरी की पूरी सड़क पट गई. तिल रखने तक की जगह नहीं बची है. जब ये पता है कि कोरोना छूने से फैलता है, तब इससे खतरनाक और क्या हो सकता है.

बस अड्डों पर मजदूरों का हुजूम

बगैर तैयारी लॉकडाउन करके मोदी सरकार ने मजबूर और गरीबों का नरसंहार करने का खाका खींच दी है. पूरे देश में लॉकडाउन होने के बाद दिल्ली-एनसीआर से बिहार, यूपी और झारखंड के मजदूर, कामगार घर जाने का बैचेन हैं. लेकिन उनको इस संकट के दौर में भी कोई साधन नहीं मिल रहा है. दिल्ली का आनंद विहार बस अड्डा, गाजियाबाद बस अड्डा और कौशांबी इस वक्त अपने-अपने घर जाने वाले मजदूरों के हुजूम से अटे पड़े हैं. इतनी बड़ी भीड़ की वजह से यहां संक्रमण का खतरा पैदा हो गया है. इकसे लिए जिम्मेदार कौन होगा? जबकि, सरकार को पहले ही इन गरीबों और मजदूरों के लिए तैयारी करनी चाहिए थी. लेकिन, सरकार ने नहीं किया, उनको उनकी हालत पर ही छोड़ दिया.


भूख से बचें या कोराना से...?
बिना तैयारी ही लॉकडाउन करके मोदी सरकार ने गरीब, मजदूरों को हजारों किलोमीटर पैदल चलने के लिए मजबूर कर दिया है. लॉकडाउन में कामकाज बंद, कंपनियां बंद हो चुकी है. ऐसे में लोगों के पास कुछ भी खाने के लिए नहीं बचा है. ऐसे लाखों लोग दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार आदि शहरों से कई दिन से खायेपीये बगैर ही अपने घरों के लिए पैदल रवाना हो गये हैं. पैदल चल रहे लोगां में असंख्य बच्चे हैं, बूढ़े हैं, गर्भवती महिलाएं हैं, बीमार लोग हैं, गोद में छोटे से बच्चे को लेकर पैदल चल रही माएं हैं, भीख मांग कर पेट भरने वाले हैं, फुटपाथ पर सोकर मजूरी करने वाले हैं. उनके पास रहने को घर नहीं हैं. रैन बसेरे में जगह नहीं है. उनके पास खाने को नहीं है. पुलिस सड़कों पर नहीं रहने दे रही है, लोग घरों में जगह नहीं दे रहे हैं. ऐसे में वे कहां, कैसे रहेंगे. क्या मध्यवर्ग भी कभी ऐसी यात्रा किया है 1000 किलोमीटर पैदल बिना खाए पिए चलता रहे?

लॉकडाउन में फंसे गरीबों, मजदूरों की दुर्दशामहामारी से ज्यादा लॉकडाउन का खौफ

बगैर खाये पीये ही हजारों किमी पैदल निकल पड़े अपने-अपने गांव


हम तेरे शहर में आये थे, मुसाफिर...आज इस गीत को लॉकडाउन ने सच में चरितार्थ कर दिया है. देश में जितना ज्यादा कोरोना वायरस का खौफ नहीं है उससे कहीं ज्यादा खौफ 21 दिन के अचानक लॉकडाउन का है. इस 21 दिन के अचानक लॉकडाउन के खौफ की गवाही सुनी सड़कें और ये जगह-जगह की तस्वीरें दे रही हैं कि गरीबों और मजदूरों को जितना ज्यादा वायरस का खौफ नहीं है उससे कहीं ज्यादा खौफ लॉकडाउन का है. 

बता दें कि सड़कों पर सन्नाटा पसरा है, लेकिन कुछ मजबूर कदम सामान लादे एक लंबे सफर पर निकल चुके हैं. यह सफर कितने दिनों में पूरा होगा, यह उन्हें भी नहीं पता है. लेकिन, शहर में रोटी के लिए जूझते इन मजदूरों ने लॉकडाउन में भी अपने घर जाने का फैसला कर लिया है. सफर लंबा है, कोई दिल्ली से अलीगढ़ जा रहा है, तो कोई बिहार या फिर झारखंड, वो भी पैदल. उनके इरादे मजबूत हैं. साथ बच्चे और महिलाएं भी हैं. सब इस उम्मीद में शहर से निकल रहे हैं कि अपने गांव जाकर कम से कम भूखे नहीं मरेंगे.
इस 21 दिन के लॉकडाउन का खौफ सबसे ज्यादा उन लोगों को है जो अपना शहर छोड़कर दूसरे शहरों में रोजी रोटी के लिए गये थे. वो आज 21 दिन के इस लॉकडाउन में बुरी तरह से फंसे हुए हैं. कंपनियों के बंद हो जाने से उनके ऊपर आर्थिक संकट आ गया है, जिससे भूखों मरने की नौबत आ गई है. ऐसे में अगर वे अपने घर लौट जाते हैं तो कम से कम भूख से नहीं मरेंगे. लेकिन, इस लॉकडाउन ने उनको कहीं का नहीं छोड़ा है. आवागमन पूरी तरह से ठप है, ऐसे में दूसरे शहरों में काम करने वाले गरीब, मजदूर अपने छोटे-छोटे बच्चों सहित पूरे परिवार के साथ पैदल ही अपने घरों के लिए निकल पड़े हैं.

बुधवार, 25 मार्च 2020

देश में कोरोना वायरस के मामले बढ़ते रहे और सरकार स्वास्थ्य सुरक्षा उपकरणों का निर्यात करती रही


भारत सरकार के पास मास्क, दास्ताने से लेकर कोई सुरक्षा उपकरण नहीं
हॉस्पिटल कर्मचारी सेफ्टी किट के अभाव में डस्टबिन में यूज होने वाली पॉलीथिन पहनकर इस भयंकर महामारी से जूझ रहे हैं.

कोरोना वायरस जैसी महामारी से न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया खतरे में पड़ गई है. लेकिन चौंका देने वाली खबर है कि भारत में इस भयंकर महामारी से जनता और उनको बचाने वाले डाक्टर दोनां की जान के साथ मोदी सरकार खिलवाड़ कर रही है. जिससे मरीज और डाक्टर दोनां को खतरा पैदा हो गया है. क्योंकि, सरकार इस महामारी के विषय में पहले से ही जानते हुए भी भारत में निर्माण होने वाले बॉडी कवर कीट (पीपीई) सर्जिकल मास्क, डिस्पोजेबल मास्क, एनबीआर के अलावा सभी तरह के दस्ताने, सर्जिकल ब्लेड्स, शू-कवर, गैस मास्क, प्लास्टिक तारपोलीन, सांस लेने वाले मेडिकल सुरक्षा उपकरणों को अन्य देशों को ज्यारा पैसों में बेचती रही. जबकि, देशभर के डॉक्टर अपनी सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी इन बुनियादी चीजों को लेकर चिन्तित हैं. उनके होश उड़े हैं कि वे कैसे संक्रमित मरीजों के पास जायेंगे. वैसे ही पहले से देश में डॉक्टर, नर्स की संख्या बेहद कम हैं. हाली में जारी स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 84,000 भारतीयों पर एक आइसोलेशन बिस्तर है और 36,000 भारतीयों पर एक क्वारंटीन बिस्तर है. कोरोना के बढ़ते कोहराम के बीच जो आंकड़ा जुटाया गया उसके मुताबिक 11,600 भारतीयों पर एक डॉक्टर और 1,826 भारतीयों पर अस्पताल में एक बिस्तर है. वहीं नेशनल हेल्थ प्रॉफिट 2019 के मुताबिक देश में अभी 11,54,686 रजिस्टर एलोपैथिक डॉक्टर हैं और 7,39,024 सरकारी अस्पतालों में बिस्तर है. इस पूरी रिपोर्ट में एक बात जो ज्यादा ध्यान आकर्षित करती है कि कोरोना से लड़ने के लिए प्रशासन की ओर से कोई तैयारी नहीं जिससे सवंमित मरीजों का सही से इलाज हो सके.

दूसरी सबसे बड़ी बात है आज हमारे डॉक्टरों के पास मास्क से लेकर बॉडी कवर कीट तक नहीं है. हमारे डॉक्टर डस्टबीन में डालने वाले बड़े प्लास्टिक को बॉडी कवर बनाकर पहनने को मजबूर हैं. लानत है ऐसी सरकार पर जो जनता और डॉक्टर दोनों के जान के साथ खिलवाड़ कर रही है. और जनता को भी सरकार से सवाल पूछना चाहिए भारत में इस वक्त कितने बॉडी कवर कीट (पीपीई) उपलब्ध हैं? क्या आपको पता है कि भारत को हर दिन पांच लाख पीपीई की जरूरत है? एक कारवां नामक पत्रिका में दावा किया गया है कि सरकार ने इसके लिए सरकारी कंपनी एचएलएल को मई 2020 तक साढ़े सात लाख पीपीई, 60 लाख एन-95 मास्क और एक करोड़ तीन लाख थ्री प्लाई मास्क का निर्माण करने का आर्डर कर दिया था. सवाल यह है कि क्या सरकार इस महामारी के विषय में पहले से ही जानती थी? अगर, सरकार पहले ही जान चुकी थी तो यह संकट देश से क्यों छुपाया?

एक खबर के अनुसार, दिल्ली के एम्स के रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन ने अपने निदेशक को पत्र लिखकर अस्पताल में सुरक्षा उपकरणों जैसे कि सर्जिकल मास्क, दस्ताने इत्यादि की कमी पर चिंता जताई थी. आज एक बार फिर से एम्स के डॉक्टरों ने मास्क, दस्ताने की कमी को लेकर शिकायत की है. यीह नहीं लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज का है, जहां के रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन ने भी पत्र लिखकर सुरक्षा उपकरणों की कमी पर चिंता जताई है. अब यहां बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों इस तरह की कमी अस्पतालों में हो रही है और ऐसा करके क्यों सरकार डॉक्टरों, नर्सों, वॉर्डबॉय समेत अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रही है?

बता दें कि कारवां नामक पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, 18 मार्च को प्रधानमंत्री राष्ट्र के नाम संबोधन करते हैं. जिसमें 22 मार्च 2020 को जनता कर्फ्यू लगाने की घोषणा करते हैं और 19 मार्च को सरकार जो भारत में पहले से निर्माण हो रही बॉडी कवर कीट (पीपीई) सर्जिकल मास्क, डिस्पोजेबल मास्क, एनबीआर के अलावा सभी तरह के दस्ताने, सर्जिकल ब्लेड्स, शू-कवर, गैस मास्क, प्लास्टिक तारपोलीन, सांस लेने वाले मेडिकल सुरक्षा उपकरणों को दूसरे देशों को बेचती रही और 19 मार्च को उपरोक्त निर्माण उपकरणों के निर्यात (बेचने) पर रोक लगाती है. इसके तीन हफ्ते पहले तक यानि 27 फरवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दिशानिर्देश जारी करते हुए पहले ही बता दिया था कि दुनियाभर में पीपीई का भंडारण पर्याप्त नहीं है और लगता है कि जल्द ही गाउन और गुगल (चश्में) की आपूर्ति भी कम पड़ जाएगी. इसके बाद भी मोदी सरकार भारत में निर्माण हो चुके सुरक्षा उपकरणों को दूसरे देशों को बेचती रही. आखिर 31 जनवरी से लेकर 19 मार्च 2020 तक निर्यात की अनुमति क्यों दी गई? क्योंकि, देश में पहला कोविड-19 का केस 31 जनवरी को आया और अगले दिन 1 फरवरी को विदेश व्यापार के डाइरेक्टर जनरल ने डाक्टरों, नर्सो द्वारा प्रयोग किये जाने वाले उपकरणों में जैसे पीपीई, सर्जिकलमास्क, डिस्पोजेबल मास्क, एनबीआर के अलावा सभी तरह के दस्ताने, सर्जिकल ब्लेड्स, शू-कवर, गैस मास्क, प्लास्टिक तारपोलीन, सांस लेने वाले एवं गाउन इत्यादि के निर्यात पे बैन लगा दिया. परन्तु, एक हफ्ते बाद मोदी सरकार ने फिर से दस्ताने और एन-95 मास्क का निर्यात खोल दिया. वहीं पीपीई बनाने के रॉ मेटेरियल पे किसी तरह का बैन नहीं लगाया. इसके चलते दूसरे देशों ने इन उपकरणों के रॉ मेटेरियल को खरीद कर अपने यहां इमरजेंसी के लिए स्टोर करना शुरू कर दिया.

प्राइवेट वेयर मैन्यूफैचर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन संजीव कुमार ने 7 फरवरी को ही भारत सरकार से स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरुरी पीपीई के रॉ मेटेरियल निर्यात पे रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन भारत सरकार ने अनसुना कर दिया और इटली जर्मनी हमसे उपकरण बनाने का कच्चा माल खरीद के भंडारण करते रहे. इस से भारत में थ्री प्लाई मास्क बनाने का कच्चा माल 250 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 3000 प्रति किलो हो गया. जबकि, 25 फरवरी तक इटली में वायरस से 11 मरने और 200 से ज्यादा केस मिलने के बाद भी भारत सरकार ने ग्लव्स और मास्क के आलावा 8 और नये पीपीई के निर्यात को खोल दिया. कारवाँ पत्रिका ने एक और खुलासा किया है. कारवां के अनुसार, भारत सरकार ने इस महामारी के समय में हर कंपनी को आपूर्ति करने की छूट देने के बजाय सिर्फ एक सरकारी कंपनी एचएलएल को एकाधिकार दिया. जबकि रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सरकारी कंपनी एचएलएल खुद पीपीई नहीं बनाती है, बल्कि छोटी कंपनियों से लेकर असेम्बिल करके बढ़ाये हुए दाम 1000 प्रति किट बेच रही, जबकि, वो कंपनियां अपने मुनाफे के साथ 400-500 प्रति किट बेचने को तैयार थी, लेकिन सरकार इसमें मुनाफा कमाती रही.

इसका नतीजा यह निकला कि आज जब देश में वायरस दूसरे स्टेज में है तब भारत के डॉक्टर, नर्स, वार्डब्याय एवं अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के पास सुरक्षा के उपकरण नहीं हैं? आज भारत के ही डाक्टर असुरक्षित हैं. स्वास्थ्य विभाग के ऑल इंडिया ड्रग्स एक्शन नेटवर्क का कहना है कि भारत को 5 लाख कवरेल (गाउन) प्रतिदिन की जरूरत पड़ने वाली है. इस संकट में डाक्टर, नर्स और स्वास्थकर्मी अपनी जान हथेली पर लेकर इस महामारी पर काबू पाने की कोशिश कर हैं. क्या सरकार को ताली, थाली बजाने के लिए आदेश देने की जरूरत थी या देश में चिकित्सा उपकरणों का निर्माण करने जी जरूरत थी? लेकिन, भारत में की स्थिति यह है कि आज हॉस्पिटल कर्मचारी सेफ्टी किट के अभाव में डस्टबिन में यूज होने वाली पॉलीथिन पहनकर इस भयंकर महामारी से जूझ रहे हैं.

भारत सरकार ने क्यों नहीं मानी डब्ल्यूएचओ की सलाह?
डब्ल्यूएचओ की चेतावनी के बावजूद भारत ने नहीं किया सुरक्षा सामग्री का भंडारण
27 फरवरी 2020 को डब्ल्यूएचओ ने बता दिया था कि विश्व में पीपीई आपूर्ति में कमी आने वाली है सारे देश इसका बंदोबस्त करें. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दिशानिर्देश जारी करते हुए बताया था कि दुनियाभर में पीपीई का भंडारण पर्याप्त नहीं है और लगता है कि जल्द ही गाउन और गुगल (चश्में) की आपूर्ति भी कम पड़ जाएगी. लेकिन भारत सरकार ने अनसुना करते हुए घरेलू पीपीई के निर्यात पर रोक लगाने में 19 मार्च तक का समय लगा दिया. क्योंकि, 31 जनवरी को भारत में कोविड-19 का पहला मामला सामने आने के बाद, विदेश व्यापार निदेशालय ने सभी पीपीई के निर्यात पर रोक लगा दी थी, लेकिन 8 फरवरी को सरकार ने इस आदेश पर संशोधन कर सर्जिकल मास्क और सभी तरह के दस्तानों के निर्यात की अनुमति दे दी. 25 फरवरी तक जब इटली में 11 मौतें हो चुकी थीं और 200 से अधिक मामले सामने आ चुके थे, सरकार ने उपरोक्त रोक को और ढीला करते हुए 8 नए आइटमों के निर्यात की मंजूरी दे दी. यह बिलकुल साफ है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के चेतावनी के बाद भी भारत सरकार ने पीपीई की मांग का आंकलन नहीं किया. और अपनी कमाई के लिए भारत सरकार भारत में निर्मित उपकरणों को दूसरे देशों में बेचती रही. आज स्थिति यह है कि भारतीय डॉक्टरों और कर्मियों के पास सुरक्षा कीट नहीं है, जिससे उनके जान को खतरा पैदा हो गया है.


राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

भक्ति भरम है सो जान : विद्रोही संत रविदास

विद्रोही ‘संत रविदास’ जी की 622वें जयन्ती पर हार्दिक शुभेच्छाएं 
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संत रविदास का लम्बा काव्य है ‘‘भक्ति भरम है सो जान’’ यह दोहा अवधी भाषा में है. इसमें भक्ति को भ्रम कहा गया है. प्रोफेसर अहिरवार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य के प्रोफेसर हैं. रविदास के साहित्य के ऊपर अलग-अलग प्रकार का जो रिचर्स साहित्य लिखा गया है, इन रिसर्च साहित्यों का सम्पादन किया गया है. जब इन रिसर्च साहित्यों का संपादन किया गया तो सम्पादन के बाद एक लम्बा काव्य बना, जिसका शिर्षक है ‘‘भक्ति भरम है सो जान’’ शुद्ध हिन्दी में भ्रम कहते है, मगर अवधी में भरम कहते हैं. संत रविदास जी के समय में लोग भक्ति करते थे, तो भक्ति कई प्रकार से करते थे और जितने प्रकार से लोग भक्ति करते थे, वो सारे प्रकार रविदास जी ने उस काव्य में रिकॉर्ड करके रखा है.
जब मैं पहली बार उसको पढ़ा तो मालूम पड़ा कि भक्ति कितने प्रकार के होते हैं,  नहीं तो मुझे भी मालूम नहीं था. संत रविदास जी 100 प्रकार से भी ज्यादा भक्ति की गिनतियाँ की है कि कैसे-कैसे लोग भक्ति करते थे? जैसे उस काव्य में एक जगह लिखा हुआ है कि एक पेड़ है और पेड़ में से लताएं निकली हुई हैं, उस लता से भक्ति करने वाले व्यक्ति ने अपने पैरों को बांधा और पेड़ से उल्टा लटक गया. जैसे सर नीचे और पैर ऊपर करके लटक गया, तो उससे पूछा कि क्या चल रहा है? तो उसने कहा कि भक्ति चल रहा है. इस तरह से सौ से ज्यादा प्रकार हैं. 
अगर आप पढ़ोगे तो पता चलता है कि कितने प्रकार से लोग उस समय भक्ति करते थें. कुछ लोग तो सीधा खड़ा होकर एक पैर को अपने दूसरे पैर के ठेहुने पर चढ़ाकर और दोनों हाथ जोड़कर भक्ति करते थे. बहुत सारे प्रकार से लोग भक्ति करते थे. एक भक्ति तो ऐसा है किएक भक्त नदी के पानी में डूबकी मारकर बैठा हुआ है, ये भी एक प्रकार की भक्ति है. ये भी उस किताब में लिखा हुआ है.


रविदास जी ने इन भक्ति के प्रकारों के नाम लेकर उस काव्य में लिखा कि ये सारे भक्ति भरम हैं. यह वाक्य रविदास जी लोगों को कहते थे. जब वे प्रवचन करते थें और लोगों को जागरण करते थे, तब उसमें वे ये बाते कहते थे कि ‘‘भक्ति भरम है सो जान’’ अर्थात भक्ति भरम है, इसे तुम जान लो. इसका मतलब है कि भक्ति भरम है, अगर आप जान लोगे तो आप ऐसा काम कभी करोगे ही नहीं, ये उसका अर्थ है. रविदास जी ने उस काव्य में बहुत लम्बी लिस्ट बनाकर लिखी हुई है कि भक्ति करने के जो ये सारे तरीके लिखे हुए हैं, ये सारे के सारे तरीके भरम हैं. इसमें सच्चाई और वास्तविकता नहीं है. इसका मतलब है कि रविदास जी भक्ति के विरोध में थे.
दूसरी बात कि रविदास जी चमार जाति के थे, तो कुछ चमार जाति के लोगों ने रविदास जी की मूर्ति बनाई और उनके नाम पर मन्दिर बनाया. मैंने दो चार जगह पूछा कि रविदास जी मन्दिर में जाते थे क्या? तो उन्होंने कह कि कभी इस तरह का सवाल ही नहीं पूछा गया था. रविदास जी अछूत थे और जिन मन्दिरों पर ब्राह्मणों का कब्जा था, ब्राह्मण अछूतों को मन्दिरों में आने ही नहीं देते थे. एक रहस्य यह है कि अगर मन्दिरों का ऐतिहासिक पार्श्वभूमि अगर देखा जाए कि मन्दिर कबसे बनाना शुरू हुआ? जब बृहद्रथ की हत्या ब्राह्मणों ने कि और बौद्ध भिक्षुओं का सामुहिक कत्लेआत किया गया तो वे जो बड़े-बड़े विहार और महाविहार थे. वे सारे विहार और महाविहार खाली हो गए. उस महाविहारों में ब्राह्मण घुस गए और उसमें घुसने के बाद, विहार को अगर विहार ही रखते तो लोगों को मालूम होता कि ये बुद्ध की विहार है, इसलिए ब्राह्मणों ने उन विहारों को मन्दिर नाम दिया. 

भारत के प्राचीन इतिहास में बृहद्रथ के हत्या के पहले मन्दिर शब्द उपलब्ध ही नहीं है. बृहद्रथ की हत्या करने के बाद में मन्दिर शब्द शुरू होता है और मन्दिर का निर्माण नहीं किया गया था, बल्कि उस समय जो विहार और महाविहार थे, उन्हीं का मन्दिर नामकरण करके, उस पर ब्राह्मणों ने कब्जा किया. जो बौद्धिस्ट थे, उनके खिलाफ में ब्राह्मणों ने घृणा अभियान चलाया, जैसा आज के तारीख में ब्राह्मण  मुसलमानों के विरोध में चला रहे हैं. बौद्धिस्टों के विरोध में ब्राह्मणों ने जो घृणा अभियान चलाया नतीता यह हुआ कि सारे बुद्धिस्ट लोगों के नजरों में अछूत हो गए. जैसे आज किसी दाढ़ी और टोपी वाले मुसलमान को अगर कोई गैर मुसलमान देखता है तो उसकी भृकुटी तन जाती है. ब्राह्मणों द्वारा मुसलमानों के खिलाफ जो घृणा फैलाई गई है, उसके चेहरे पर उसका भाव प्रतिबिम्बित होता है. इस बात को समझना होगा. फिर क्या हुआ? जो ब्राह्मणों के समर्थक लोग थे, उनके मन में बौद्धिस्ट लोगों के प्रति घृणा भाव पैदा हुआ और जब घृणा भाव पैदा हुआ तो जो बौद्धिस्ट थे, उनके साथ अछूतों के जैसा व्यवहार शुरू कर दिया गया और उनका सामुहिक रूप से बहिस्कार किया गया. ठीक वहीं चीज आज हो रहा है. 
अब सवाल है कि रविदास जी अछूत थे और अछूतों की परछाई छू जाने से जब ब्राह्मण अपवित्र हो जाते थे तो क्या एक अछूत को अपने बनाए मंदिरों में जाने देते थे? जबकि एक सच्चाई यह भी है कि आज भी अनुसूचित जाति के लोगों को मंदिरों में प्रवेश वर्जित है. दूसरा सवाल, अगर रविदास जी ब्राह्मणों द्वारा बनाए गये भगवान के भक्त थे, भक्ति करते थे तो इस तरह से वे ब्राह्मणवाद को और ज्यादा मजबूत बना रहे. अगर, रविदास जी ब्राह्मणवाद को मतबूत बना रहे थे तो ब्राह्मणों ने रविदास की हत्या क्यों की? इससे अपने आप ही साबित हो जाता है कि संत रविदास किसी भी भगवान, देवी-देवता के भक्त नहीं थे. संत रविदास जी किसी की भक्ति नहीं करते थे, बल्कि वे ब्राह्मणों की गुलामी से मूलनिवासी बहुजनों को मुक्त कराने के लिए मुक्ति का आंदोलन चला रहे थे. संत रविदास ब्राह्मणवाद के घोर विरोधी थे और ब्राह्मण के खिलाफ आंदोलन चला रहा थे. संत रविदास ने अपने आंदोलन से ब्राह्मणवाद की नींव हिला दी थी. इस बात का अांदाजा उनकी वाणी से लगाया जा सकता है. 
रैदास न ब्राह्मण पूजिए, जऊ होवे गुणहीन।
पूजे चरण चंडाल के, जऊ होवे गुण परवीन।।
जात-पांत में जात है, जो केलन की पात।
रविदास न मानुष जुड सकै, जो लौ जात न जात।।
रैदास जन्म के कारनै, होत न कोऊ नीच।
नर कूं नीच करि डारी है, ओछे करम की कीच।।
संत रैदास द्वारा यह पद सुनाने के बाद उनकी हत्या हुई थी. 
जीवन चारि दिवस का मेला रे।
बांभन झूठा, वेद भी झूठा, झूठा ब्रह्म अकेला रे।
मंदिर भीतर मूरति बैठी, पूजति बाहर चेला रे।।
लड्डू भोग चढावति जनता, मूरति के ढोंग केला रे।
पत्थर मूरति कछु न खाती, खाते बांभन चेला रे।।
जनता लूटति बांभन सारे, प्रभु जी देति न धेला रे।
पुन्य पाप या पुनर्जन्म का, बांभन दीन्हा खेला रे।।
स्वर्ग नरक बैकुंठ पधारो, गुरु शिष्य या चेला रे।
जितना दान देव गे जैसा, वैसा निकरै तेला रे।।
बांभन जाति सभी बहकावे, जन्ह तंह मचै बवेला रे।
छोड़ि के बांभन आ संग मेरे, कह विद्रोहि अकेला रे।।
यही कारण रहा कि ब्राह्मणों ने संत रविदास की हत्या की. 

इतिहास के पन्नों में नारायण मेघाजी लोखंडे


‘‘रविवार की छुट्टी पर मेरा नहीं समाज का हक है. इसलिए रविवार की छुट्टी के दिन समाज को जागृत करने चाहिए, समाज को बामसेफ द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के लिए तैयार करना चाहिए और इस आंदोलन के माध्यम से मूलनिवासी बहुजन संत महापुरूषों के सपनों को साकार करने के लिए संकल्प लेना चाहिए.’’
09 फरवरी 2020 को मूलनिवासी बहुजनों को ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए विद्रोही आंदोलन चलाने वाले क्रांतिकारी संत ‘‘रविदास’’ की जयन्ती थी. हर साल की भांति इस साल भी संत रविदास की जयन्ती बड़े धूमधाम से मनाई गई. छुट्टी होने की वजह से लोगों ने रविदास जयंती में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. लेकिन, 09 फरवरी को एक और महापुरूष का स्मृति दिन था, जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं. संयोग की बात देखिए कि 09 फरवरी को ‘रविवार’ का दिन था. यह तो सभी लोग जानते होंगे कि हर रविवार को छुट्टी रहती है. परन्तु, यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे कि रविवार की छुट्टी के जनक कौन हैं? रविवार की छुट्टी किस लिए लागू की गई? रविवार की छुट्टी के पीछे क्या मकसद है? बात आगे बढ़ने से पहले बता देना चाहता हूँ कि 09 फरवरी को जिस महापुरूष का स्मृति दिन था वही महापुरूष रविवार की छुट्टी के जनक हैं. उसी महापुरूष के अथक संघर्ष के बदौलत रविवार को छुट्टी घोषित हुआ, जिनका नाम है ‘‘नारायण मेघाजी लोखंडे’’

130 साल पहले 10 जून 1890 से रविवार की छुट्टी नारायण मेघाजी लोखंडे के अथक प्रयासों से शुरू हुई थी. नारायण मेघाजी लोखंडे का जन्म महाराष्ट्र के ठाणे जिले में 08 फरवरी 1848 को हुआ था, किन्तु इनका पैतृक गाँव सासवड जनपद पुणे था. वे राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक आन्दोलन के कर्मठ कार्यकर्ता थे. उन्हें रविवार की छुट्टी और भारत में श्रमिक आंदोलन का जनक कहा जाता है. भारत सरकार ने उनके सम्मान में 03 मई 2005 को 05 रुपये का एक डाक टिकट जारी किया था. अगर, इतिहास का बारिकीपूर्वक अध्ययन करें तो पता चलेगा कि ब्रिटिश शासन के दौरान मिल मजदूरों को सातों दिन काम करना पड़ता था और उन्हें कोई छुट्टी नहीं मिलती थी. उस समय मजदूरों का काफी शोषण होता था. ब्रिटिश अधिकारी प्रार्थना के लिए हर रविवार को चर्च जाया करते थे. लेकिन, मजदूरों के लिए ऐसी कोई परंपरा नहीं थी. ऐसे में जब मजदूरों ने भी रविवार की छुट्टी की मांग की तो उन्हें डरा-धमकाकर शांत करा दिया गया. उस समय मिल मजदूरों के नेता लोखंडे ने 1881 में अंग्रेजों के सामने साप्ताहिक छुट्टी का प्रस्ताव रखा और कहा कि हम लोग खुद के लिए और अपने परिवार के लिए सातों दिन काम करते हैं, अतः हमें एक दिन की छुट्टी अपने देश की सेवा करने के लिए मिलनी चाहिए और हमें अपने समाज के लिए कुछ विकास के कार्य करने चाहिए.

इसके साथ ही उन्होंने मजदूरों से कहा कि रविवार देवता ‘‘खंडोबा’’ का दिन है और इसलिए इस दिन को साप्ताहिक छुट्टी के रूप में घोषित किया जाना चाहिए. लेकिन, उनके इस प्रस्ताव को ब्रिटिश अधिकारियों ने अस्वीकार कर दिया. लोखंडे जी यहीं नहीं रुके, उन्होंने अवकाश की मांग को लेकर एक लंबी लड़ाई जारी रखी. आखिरकार 09 साल के लम्बे संघर्ष के बाद पहली बार 10 जून 1890 को ब्रिटिश सरकार ने रविवार को छुट्टी का दिन घोषित किया. हैरानी की बात यह है कि भारत सरकार ने कभी भी इसके बारे में कोई आदेश जारी नहीं किए हैं. इसके बाद दोपहर में आधा घंटा खाना खाने की छुट्टी और हर महीने की 15 तारीख को मासिक वेतन दिया जाने लगा. यही नहीं लोखंडे जी की वजह से मिलों में कार्य प्रारंभ के लिए प्रातः 6ः30 बजे का और कार्य समाप्ति के लिए सूर्यास्त का समय निर्धारित किया गया.

अधिकांश मूलनिवासी लोग रविवार की छुट्टी का दिन मौजमस्ती करने में बिता देते हैं. उन्हें लगता है, हम इस छुट्टी के हकदार हैं. परन्तु, क्या हमें यह बात पता है कि रविवार की छुट्टी हमें क्यों मिली या यह छुट्टी लोखंडेजी ने हमें क्यों दिलायी या इसके पीछे उस महान व्यक्ति का मकसद क्या था? लोखंडे जी का मानना था कि सप्ताह के सातों दिन हम अपने परिवार के लिए काम करते है, किन्तु जिस समाज की बदौलत हमें नौकरी मिली उस समाज की समस्या का समाधान करने के लिए हमें एक दिन की छुट्टी मिलनी चाहिए. इस भावना के साथ उन्होंने 09 वर्षों तक निरंतर आंदोलन किया तब जाकर हमें यह रविवार की छुट्टी मिली.

अनपढ़ लोगों को तो छोड़ो क्या पढ़े लिखे लोग भी इस बात को जानते हैं? यदि जानते हैं तो क्या समझते भी हैं? जहाँ तक हमारी जानकारी है, पढ़े लिखे लोग भी इस बात को नहीं जानते/समझते हैं.अगर जानकारी होती तो वे रविवार के दिन मौज मस्ती नहीं, बल्कि समाज का काम करते और अगर समाज का काम ईमानदारी से काम किया होता तो समाज में बेरोजगारी, बलात्कार, लाचारी आदि समस्यायें नहीं होती. रविवार की छुट्टी पर मेरा नहीं समाज का हक है. इसलिए रविवार की छुट्टी के दिन समाज को जागृत करने चाहिए, समाज को बामसेफ द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन के लिए तैयार करना चाहिए और इस आंदोलन के माध्यम से मूलनिवासी बहुजन संत महापुरूषों के सपनों को साकार करने के लिए संकल्प लेना चाहिए.
राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

‘‘मन चंगा तो व्यर्थ है गंगा : संत रविदास’’


मूलनिवासी बहुजन मुक्ति आंदोलन के जुझारु नायक ‘संत रविदास’

राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)
यह बात अब तक मिले कई गुरूवाणी, तथ्यों, दस्तावेजी सबूतों और तर्क के आधार पर प्रमाणित हो चुका है कि मुनवादियों ने ही छल-कपट और धोखे से क्रांतिकारी संत रैदास (रविदासजी) की हत्या की है. सतनाम सिंह द्वारा लिखित पुस्तक ‘गुरू रविदास की हत्या के प्रमाणिक दस्तावेज’ के अनुसार, संत रविदास की हत्या राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में राणा सांगा ने की. अब सवाल यह है कि मनुवादियों ने संत रविदास की हत्या क्यों की? जबकि, ब्राह्मणों के द्वारा बताया जाता है कि संत रविदास भक्ति आंदोलन चला रहे थे. संत रविदास भगवान के भक्त थे, उनके अंदर अदभूत शक्ति थी, वे चमत्कारिक संत थे. अगर, यह बात सही है तो पुनः सवाल खड़ा होता है कि जब संत रविदास खुद ब्राह्मणवाद को मजबूत करने का काम कर रहे थे तो फिर ब्राह्मणों को उनकी हत्या करने की क्या जरूरत पड़ी?  इससे साबित होता है कि ब्राह्मणों द्वारा संत रविदास के विषय में कही गई हर बात निराधार एवं कोरा बकवास है.

असल में हकीकत यह है कि देश के मध्ययुगीन, महानतम, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, क्रांतिकारी संत रविदास ‘भक्ति आंदोलन’ नहीं, वे मूलनिवासी बहुजनों को ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए ‘मुक्ति आंदोलन’ चला रहे थे. संत रविदास एक क्रांतिकारी संत थे, वे अपनी वाणी के माध्यम से छुआछूत, असमानता, पाखंडवा, जातिवाद, निम्नवर्णों की शिक्षा, सुरक्षा और संपत्ति के अधिकार पर प्रतिबंध व इनपर किए जाने वाले अत्याचार, शोषण, भेदभाव, प्रताड़ना, शोषण और मनमानी के सिद्धांतों पर ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई व्यवस्था का न केवल घोर विरोध किया, बल्कि ब्राह्मणवाद पर करारा हमला भी किया था. जिससे कारण ब्राह्मणों में खलबली मच गई. 

संत रविदास ने भी वहीं किया जो तथागत बुद्ध ने किया था. संत रविदास के अनुसार किसी बात को ठीक से सोच विचार कर बुद्धि की कसौटी पर परख कर ही मानना चाहिए. उन्होंने श्रम की महत्ता पर अत्यधिक बल दिया और आजीवन वैज्ञानिक-मानववाद के प्रचार में सक्रिय रहे. अतः वे इस समता मिशन के नायक बन चुके थे. वास्तव में संत रविदास जी गैरब्राह्मण धर्म चेतना की एक महत्वपूर्ण कड़ी रहे हैं. क्योंकि, यह जनक्रांति यक्षों, नागों, नास्तिकों, बौद्धों, सिद्धों, नाथों, वीरों, विनायकों, पीरों से होती हुई निर्गुणियां संतो तक चली आयी थी. लाजिमी है कि वे मनुवादियों की आंखों में खटक रहे थे. संत रविदास के इस हमले से ब्राह्मणवाद खतरे में पड़ गया. इसलिए ब्राह्मणों द्वारा संत रविदास की हत्या करने का षड्यंत्र करने लगे.

संत रविदास की हत्या का दूसरा सबसे बड़े कारण चित्तौड़गढ़ के राणा सांगा की पत्नी रानी झालीबाई और मीराबाई द्वारा संत रविदास को अपना गुरू स्वीकार करना साबित हुआ है. 1509 से 1527 तक मेवाड़ पर शासन करने वाले राणा सांगा की पत्नी रानी झाली और मीरा बाई ने 1567-68 में काशी जाकर संत रविदास को अपना गुरू स्वीकार किया. मध्ययुग के इस शक्तिशाली राजा की पत्नी द्वारा एक अछूत संत को अपना गुरू बना लेना मनुवाद के लिए सबसे बड़ा चुनौती बन गया था. उस समय राजस्थान के ब्राह्मणों ने संत रविदास का कड़ा विरोध किया. ब्राह्मणों को सबसे ज्यादा धक्का तो तब लगा जब रानी झाली के निवेदन के पश्चात संत रविदास मेवाड़ आए. इस पर ब्राह्मण और ज्यादा बौखला गये और रोकने लगे. परन्तु, रानी झाली पर इसका कोई असर नहीं हुआ, बल्कि रानी झाली ने पालकी पर संत रविदास का स्वागत किया. यहां तक की संत रैदास की उपस्थिति में ही रानी झाली ने अपने बेटे कुंवर भोजराज की शादी मीराबाई से कर दी थी. जब संत रैदास ने शादी के वक्त महल में बतौर अतिथि प्रवेश किया तो राजस्थान के ब्राह्मणों ने इनका विरोध किया. यह दृश्य देखकर ब्राह्मणों ने कहा कि यदि तुम्हारे गुरू में शक्ति है तो अपनी शक्ति का प्रमाण दें. इस तरह धोखे से राणा सांगा और ब्राह्मणों ने 1527 को चित्तौड़गढ़, किले में उनकी हत्या कर दी.  चित्तौड़गढ़ के किले में आज भी उनकी समाधि मौजूद है. बाद में झूठा प्रचार किया कि संत रविदास में अलौकिक शक्ति है. हालांकि, राणा सांगा की मृत्यु के बाद विधवा रानी झाली का जीवन किस प्रकार बीता, यह अभी भी शोध का विषय है.

मीरा को यातनाएं उसकी भक्ति भावना के कारण नहीं दी जाती थी, बल्कि उसे यातनाएं इस बात के लिए दी जाती थी कि वह एक अछूत संत के पास उनकी बस्ती में क्यों जाती थी? मीरा के गुरु का चमार होना ही उसकी यातनाओं का मुख्य कारण था. मीरा ने अपनी वाणी में भी इसका उल्लेख किया है. मनुवादियों को यह गवारा नहीं था, अतः मीरा अपने गुरु की हत्या का सबसे बड़ा कारण बनी, इसमें कोई शक नहीं रह जाता है. यही कारण है कि मीरा को जान से मारने के प्रयास दो बार किए गए. संत रविदास जी के मिशन के सहयोगी रहे संत पलटू साहिब को ब्राह्मणों ने उनकी झोपड़ी में आग लगाकर मार डालने का प्रयास किया। मीरा और पलटू जी की हत्या के प्रयासों को देखते हुए साबित हो जाता है कि मनुवादी अपने विरोधियों की हत्याएं तक करने पर उतर आए थे। ऐसे में उनके लिए संत रविदास जी की हत्या कोई बड़ी बात नहीं थी. उनकी हत्या करने के बाद संत रविदास के अनुयायी इसका विरोध न करें, इसलिए ब्राह्मणों ने उनके बारे में तमाम अनर्गल झूठा प्रचार किया. ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा, ‘गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सभी गढ़ैया’ जैसे मुहावरे भी ब्राह्मणों ने उसी जघन्य हत्याकांड के बाद रचे, क्योंकि उसी चित्तौड़गढ़ में जनचेतना की एक प्रचंड ज्योति को षड्यंत्र के तहत बुझाया गया था. असल में संत रविदास ने कहा था कि ‘‘मन चंगा तो व्यर्थ है गंगा’’


संत रैदास द्वारा यह पद सुनाने के बाद उनकी हत्या हुई थी. 
जीवन चारि दिवस का मेला रे।
बांभन झूठा, वेद भी झूठा, झूठा ब्रह्म अकेला रे।
मंदिर भीतर मूरति बैठी, पूजति बाहर चेला रे।
लड्डू भोग चढावति जनता, मूरति के ढोंग केला रे।
पत्थर मूरति कछु न खाती, खाते बांभन चेला रे।
जनता लूटति बांभन सारे, प्रभु जी देति न धेला रे।
पुन्य पाप या पुनर्जन्म का, बांभन दीन्हा खेला रे।
स्वर्ग नरक बैकुंठ पधारो, गुरु शिष्य या चेला रे।
जितना दान देव गे जैसा, वैसा निकरै तेला रे।
बांभन जाति सभी बहकावे, जन्ह तंह मचै बवेला रे।
छोड़ि के बांभन आ संग मेरे, कह विद्रोहि अकेला रे।

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

बहुजनों की माता रमाबाई अम्बेडकर

राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)
माता रमाबाई अम्बेडकर वह महिला थी, जिसके त्याग, समर्पण ने ‘भीमा’ को डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर बना दिया. ऐसे त्याग, समर्पण की प्रतिमूर्ति ‘‘माता रमाबाई अम्बेडकर’’ के 122वीं जयन्ती के अवसर पर देश के 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजन समाज को दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से हार्दिक शुभेच्छाएं।

भारतीय संविधान के निर्माता और भारत के पहले कानून मंत्री, डॉ. बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर ने अपने जीवन में हर कदम पर चुनौतियों का सामना किया. लेकिन, वे कभी नहीं रुके. उनके इस सफर में बहुत से लोगों ने उनका साथ दिया. कभी उनके स्कूल के शिक्षक ने उनसे प्रभावित होकर उनको अपना उपनाम दे दिया तो कभी शाहूजी महाराज ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया था. लेकिन, इन सब लोगों के बीच एक और नाम था, जिनके जिक्र के बगैर डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर की सफलता की कहानी अधूरी है. वह नाम है उनकी पत्नी रमाबाई आम्बेडकर.

माता रमाबाई अम्बेडकर का जन्म 7 फरवरी 1898 को एक गरीब परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम भिकु धुत्रे (वलंगकर) व माता का नाम रुक्मिणी था. माता रमाबाई अम्बेडकर अपने माता-पिता, दो बहनों व एक भाई के साथ दाभोल के पास वंणदगांव में नदी किनारे महारपुरा बस्ती में रहती थी. रमाबाई के माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था. रामी की दो बहनें और एक भाई था, जिसका नाम शंकर था. बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने के कारण रामी और उसके भाई-बहन अपने मामा और चाचा के साथ मुंबई में रहने लगे थे.
वर्ष 1906 में माता रमाबाई की उम्र महज 9 वर्ष थी. 9 वर्ष की उम्र में ही उनकी शादी बॉम्बे (अब मुंबई) के बायकुला मार्केट में 14 वर्षीय भीमराव से हो गई. माता रमाबाई को भीमराव प्यार से ‘रामू’ बुलाते थे और वो उन्हें ‘साहेब’ कहकर पुकारतीं थीं. शादी के तुरंत बाद से ही रमाबाई को समझ में आ गया था कि पिछड़े तबकों का उत्थान करना ही बाबासाहब के जीवन का लक्ष्य है और यह तभी संभव था, जब वे खुद इतने शिक्षित हों कि पूरे देश में शिक्षा की मशाल जला सकें. इसके लिए माता रमाबाई ने डॉ.बाबासाहब के इस संघर्ष में अपनी आखिरी सांस तक उनका साथ दिया. डॉ. बाबासाहब ने भी अपने जीवन में रमाबाई के योगदान को बहुत महत्वपूर्ण माना है.

इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दिसंबर 1940 में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने ‘थॉट्स ऑफ पाकिस्तान“ पुस्तक लिखी और यह पुस्तक उन्होंने अपनी पत्नी ‘रमो’ को ही भेंट की.  डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने अपनी किताब ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ को माता रमाबाई को समर्पित करते हुए लिखा कि ‘‘मैं यह पुस्तक रमो को उसके मन की सात्विकता, मानसिक सदवृत्ति, त्याग समर्पण की भावना, सदाचार की पवित्रता और मेरे साथ दुःख झेलने में, अभाव व परेशानी के दिनों में जबकि हमारा कोई सहायक न था सहनशीलता और सहमति दिखाने की प्रशंसा स्वरुप भेंट करता हूं“ उपरोक्त शब्दों से स्पष्ट है कि माता रमाबाई ने डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर का किस प्रकार संकटों के दिनों में साथ दिया और बाबासाहब के दिल में उनके लिए कितना सत्कार और प्रेम था. बाबासाहब भी ऐसे ही महापुरुषों में से एक थे, जिन्हें रमाबाई जैसी बहुत ही नेक जीवन साथी मिली. सच में ‘‘उन्हें मामूली भीमा से डॉ.अम्बेडकर बनाने का श्रेय रमाबाई को ही जाता है’’ हर एक परिस्थिति में रमाबाई, बाबासाहब का साथ देती रहीं.

डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर वर्षों अपनी शिक्षा के लिए बाहर रहे और इस समय में लोगों की बातें सुनते हुए भी रमाबाई ने घर को सम्भाले रखा. कभी वे घर-घरजाकर उपले बेचतीं, तो बहुत बार दूसरों के घरों में काम करती थीं. वे हर छोटा-बड़ा कामकर, आजीविका कमाती थीं और साथ ही बाबासाहब की शिक्षा का खर्च जुटाने में भी मदद करती रहीं. जबकि, उनके जीवन का हर क्षण मुसिबतों से ही भरा रहा. माता रमाई ने 5 संतानों को जन्म दिया था. जिसमें यशवंतराव जीवित रहे. बाकी गंगाधर, रमेश, इंदू नाम की लड़की और राज रत्न की मौत हो गई. जिस माँ के जीते जी पैसे और इलाज के अभाव में, उनके चार बच्चों की मौत हो जाय और कफन तक भी नसीब न हो उस समय उस माँ के दिल पर क्या गुजरा होगा? धन अभाव के कारण जब भोजन ही भरपेट नहीं मिलता था, तब ऐसे समय में दवा के लिए पैसे कहाँ से आते. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि यशवंतराव के अलावा सभी बच्चे अकाल ही काल कलवित हो गए.

दूसरे पुत्र गंगाधर के निधन की दर्दभरी कहानी खुद डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने बताई थी जो इस प्रकार थी. दूसरा लड़का गंगाधर हुआ, जो देखने में बहुत सुंदर था. वह अचानक बीमार हो गया, जबकि दवा के लिए पैसा नही था. उसकी बीमारी से तो एक बार मेरा मन भी डावांडोल हो गया कि मैं सरकारी नौकरी लूं, फिर मुझे विचार आया कि अगर मैंने नौकरी कर ली तो उन करोड़ो बच्चें का क्या होगा जो गंगाधर से ज्यादा बीमार हैं. ठीक प्रकार से इलाज ना होने के कारण वह नन्हा सा बच्चा ढाई साल की आयु में चल बसा. गम में शामिल हुए लोगों ने मृत बच्चे के शरीर को ढकने के लिए नया कपड़ा लाने के लिए पैसे मांगे, लेकिन मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं कफन खरीद सकूँ. अंत में मेरी प्यारी पत्नी ‘रामू’ ने अपनी साड़ी में से एक टुकड़ा फाड़कर दिया. उसी में ढंककर उसे श्मशान पर लोग लेकर गए हैं और दफना आये. ऐसी थी मेरी आर्थिक स्थिति.

पांचवा बच्चा राज रत्न बहुत प्यारा था. रमाई ने उसकी देखरेख में कोई कमी नहीं आने दी. अचानक जुलाई 1926 में उसे डबल निमोनिया हो गया. काफी इलाज करने पर भी 19 जुलाई 1926 को दोनों को बिलखते छोड़ वह भी चल बसा. माता रमाबाई के जीते जी उनके चार बच्चों की मौत से बहुत सदमा पहुंचा और वह बीमार रहने लगी. धीरे-धीरे पुत्र शोक कम हुआ तब तक डॉ. बाबासाहब अंबेडकर महाड सत्याग्रह में जुट गये. महाड में विरोधियों ने षडयंत्र कर डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर को मार डालने की योजना बनाई. यह सुनकर माता रमाई ने महाड़ सत्याग्रह में अपने पति के साथ रहने की अभिलाषा व्यक्त की. इस तरह से 29 साल तक माता रमाबाई ने असहनीय दर्द सहते हुए भी डॉ.बाबासाहब का साथ दिया. 29 साल बाद 27 मई 1935 को उन पर शोक और दुःख का पर्वत ही टूट पड़ा. उस दिन नृशंस मृत्यु ने उनसे उनकी पत्नी रमाबाई को छीन लिया. उस समय डॉ.बाबासाहब के पूरे जीवन में उतना दुःख नहीं हुआ, जितना माता रमाबाई के मृत्यु को लेकर हुआ था.

क्या यह बात किसी को पता है कि एक ऐसी नारी के त्याग समर्पण और समाज के प्रति निष्ठा की बदौलत मूलनिवासी बहुजन समाज और सर्व समाज की नारी शक्ति को भारत वर्ष में न केवल सम्मान मिला, बल्कि सम्मान से जीने का हर मानवीय अधिकार भी मिला. वो कोई और नहीं, परमपूज्यनीय त्याग, भावना की मूर्ति माता रमाई अंबेडकर थी. परमपूज्य बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी को विश्वविख्यात महापुरुष बनाने में रमाई का ही साथ था. आज सभी महिलाओं को (चाहे वे किसी भी धर्म या जाति समुदाय से हो) को माता रमाबाई अंबेडकर पर गर्व होना चाहिए कि किन परिस्थितियों में उन्होंने डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर का मनोबल बढ़ाये रखा और उनके हर फैसले में उनका साथ देती रहीं. यही नहीं जब पता चलता है कि उन्होंने खुद अपना जीवन घोर कष्ट में बिताया और बाबासाहब की मदद करती रहीं. सोचो उन पर क्या गुजरा होगा?