रविवार, 5 मई 2019

हिन्दुस्तान नाम का कोई देश दुनिया में नहीं है

हिन्दुस्तान नाम का कोई देश दुनिया में नहीं है


हिन्दू नाम का कोई धर्म दुनिया में नहीं है हिन्दु धर्म  ब्राह्मण धर्म का नया नाम है जो SC/ST/OBC के लोगों को जब वयस्क मताधिकार का अधिकार अंग्रजों नें दिया  तब जाकर 3.5% ब्राह्मणों को लगा कि हम लोग लोकतंत्र में शासक नहीं बन सकते हैं  परन्तु अगर हम ब्राह्मण धर्म जिसमें वर्ण व्यवस्था है  

ब्राह्मण क्षञिय वैश्य शुद्र (OBC) जो 52% है अति शुद्र (SC/ST) 22.5% है जिनको हमने गुलाम बना रखा है  कभी भी ब्राह्मण धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण नहीं किया जा सकता है तो क्या किया जाये ब्राह्मणों नें ब्राह्मण धर्म का नाम हिन्दू रखा और  समाज में व्यवस्था ब्राह्मण धर्म कि ही रखीअब SC/ST/OBC के लोगों को ब्राह्मणों के षडयंत्र का पता ना लगे ब्राह्मणों दवारा इतिहास में हमारे लोगों पर किये गये अमानवीय अत्याचार का पता ना लगे इसके लिए मुसलमानों को काल्पनिक दुश्मन बना कर रात दिन हिंदू मुसलमान का मामला खड़ा किया जाता है इससे क्या होता है SC/ST/OBC का आदमी मुसलमान के विरोध में प्रतिक्रिया (reaction) करता है और हिंदू बन जाता है और अल्पसंख्यक ब्राह्मण बहुसंख्यक हो जाता है और राज सत्ता पाकर SC/ST/OBC के विरोध में षडयंत्र करने के लिए OBC को वर्ण व्यवस्था में छुत शुद्र (touchable गुलाम ) बता कर उसको हजारों सालों से पारित सांत्वना पुरस्कार देकर अपने ही DNA रिसर्च से सिद्ध भाई अनुसुचित जाति /जनजाति के विरोध में लडने के लिए तैयार करता है यह कब हो सकता है जब इनका नामकरण संविधान के विरोध में जाकर असंवैधानिक शब्द जिसको कोर्ट नें प्रतिबंध लगाया उस शब्द को इस्तेमाल करकेदलित दलित कहा जाये इसको कैसे स्थापित किया जाये इसके लिए रोज ब्राह्मण बनिया अखबारों में यह दिखाया जाये कि आज दलितो को वहाँ पिटा आज दलितों को मंदिर में नहीं घुसने दिया आज वहाँ दलितो को खाना नहीं खाने दिया आज दलितो को पानी नहीं पिने दिया गया आज दलितो को रास्ते पर नहीं जाने दिया गया आज दलितों को शमशान में शव नहीं जलाने दिया गया आज दलितों को अलग बिठाया गया आदमी चाहे डाक्टर /इंजिनियर /IAS/IPS /वकिल/लेखक /हिरो /हिरोईन /क्रिकेटर बन जाये पर रोज इनको दलित डाक्टर दलित इंजिनियर दलित लेखक दलित नेता कहकर ओबीसी के दिमाग में इनको हिन स्थापित किया जाये और ओबीसी को ही इस्तेमाल करके इनपर अन्याय अत्याचार किया जाये

इससे दो फायदे हैं एक तो यह भाई भाई कभी अपने को समान नहीं समझेंगे और पास पास नहीं बैठेगें तो क्या होगा हम ही दोनो को इस्तेमाल करके राज करते रहेगें अनुसुचित जाति का आदमी ओबीसी को ही अपना दुश्मन मानता रहेगा और षडयंत्रकारी ब्राह्मण सामने नहीं आयेगा केवल मनुवादी मनुवादी कहकर चिल्लाता रहेगा प्रतिक्रिया करता रहेगा संगठित होने का सोच भी नहीं पायेगा फिर क्या 52% ओबीसी गुलाम 52% ओबीसी को संविधान के विरोध में जाकर 27% शासन प्रशासन में अधिकार दिया उसमें भी संविधान के विरोध में जाकर क्रिमी लेयर का षडयंत्र करके पैसे वाले और गरीब ओबीसी को संगठित नहीं होने दिया 

इस कारण आज ओबीसी का शासन प्रशासन में आरक्षण को लागू होने के 20 साल बाद भी केवल 5.2% ही दिया परन्तु हमारे ओबीसी भाई इनके सांत्वना पुरस्कार कि हम लोग ब्राह्मणों के साथ बैठ सकते हैं हमें वह लोग छुते हैं इस हजारों सालों के सांत्वना पुरस्कार के षडयंत्र कि वजह से हम लोग गुलाम बनें हुए हैं गुलाम केवल शरीर से बंधे आदमी को नहीं कहा जाता जिस समाज कि हजारों समस्याएं होती है वह समाज गुलाम होता है और गुलाम समाज मालिक के पास जाकर हक अधिकार कि मांग करता है शासन प्रशासन में 3.5% ब्राह्मणों का 78% पदों पर कब्जा है न्याय पालिका में 3.5% ब्राह्मण 98% जजों के पदों पर कब्जा है लोकतंत्र में कोई भी कब्जा जायज नहीं होता है लोकतंत्र में हर कब्जा नाजायज़ होता है लोकतंत्र में सबका जनसंख्या के अनुपात में representation(प्रतिनिधित्व )होता है किसी कि मेरीट कि वजह से बुद्धिमता कि वजह से नहीं ऐसा होता तो अंग्रेज ब्राह्मणों से ज्यादा विद्वान थे तो अंग्रजों को भारत छोडने के लिए आंदोलन करने कि कहाँ जरूरत थी लोकतंत्र लोगों के लिए लोगों के दवारा लोगों के हित के लिए निर्माण किया जाता हैना कि किसी जाति विशेष को कब्जा कराने के लिए किया जाता है

आज तक किसी मुसलमान नें ऐसा कोई भी संगठन नहीं बनाया कि वह SC/ST/OBC कि किसी रोजगार
रोटी कपड़ा मकान के अधिकार का विरोध करता हो उसके धार्मिक हकों का विरोध करता हो परन्तु ब्राह्मण राज करने के लिए SC/ST/OBC को हिंदू बनाने के लिए रोज रोज गाय गाय मूञ भारत पाकिस्तान के मैच कश्मीर समस्या जो राजनितिक मुद्दा है उसको धार्मिक बनाकर आंतकवादी बता कर रातदिन मुसलमानों के विरोध में षडयंत्र करता हैदेश का नाम भारत है जो संविधान के पहले पेज पर लिखा है बाबा साहब अम्बेडकर यह जानते थे कि मेरे जाने के बाद यह संविधान का हिंदी संस्करण करेगें उसमें India शब्द का हिंदी में अनुवाद हिंदूस्तान करेगें इसलिए बाबा साहब अम्बेडकर नें संविधान के पहले पेज पर ही अंग्रेजी संस्करण में ही हिंदी अनुवाद लिखा इंडिया देट इज भारत और ब्राह्मणों के षडयंत्र कि नसबंदी कर दी परन्तु ब्राह्मणों नें षडयंत्र जारी रखा प्रिन्ट मिडिया इलेक्ट्रॉनिक मिडिया ट्रेडिशनल मिडिया वोकल मिडिया के दवारा रात दिन हिंदुस्तान हिंदुस्तान कि रट लगाई भारत के संविधान को दुनिया नें सराहा ब्राह्मणों नें भी सराहा परन्तु ना कभी उसके लागू किया ना कभी उसको हमारे लोगों को पाठयक्रम में पढाया गया यह है षडयंत्र  समझो और लोगों को जानकार बनाओ  जानकारी हथियार होती है


शनिवार, 4 मई 2019

मनुस्मृति क्यों जलाई गयी?

मनुस्मृति क्यों जलाई गयी?



इससे पहले की हम मनुस्मृति क्यों जलाई गयी? को जानें। मनुस्मृति संविधान इसलिए लिखा गया था की हारे हुए बौद्ध, राक्षश, असुर फिर दोबारा संगठित होकर सिर न उठा पाएं, उनका परमानेंट गुलाम बनाने का ग्रन्थ है मनुस्मृति। जिस महापुरुष ने अपने ग्रंथों को रखने के लिए राजगृह जैसा विशाल भवन बनवाया था, उसी ने 25 दिसम्बर 1927 के दिन एक पुस्तक जला दी थी, आखिर क्यों? जिस महापुरुष के पास लगभग तीस हजार से भी अधिक निजी पुस्तकें थी, उसी ने एक दिन एक पुस्तक जला दी थी, आखिर क्यों? जिस महापुरुष का पुस्तक प्रेम संसार के अनेक विद्वानों के लिए नहीं, बल्कि अनेक पुस्तक प्रकाशकों और विक्रेताओं तक के लिए आश्चर्य का विषय था, उसी ने एक दिन एक पुस्तक जला दी थी, आखिर क्यों? सबसे अहम बात तो यह है कि उस पुस्तक का नाम क्या था? उसका नाम था ‘‘मनु स्मृति’’ आइये हम जानने का प्रयास करते हैं कि वह क्यों जलाई गयी। इस पुस्तक में ऐसा हलाहल विष भरा है कि जिसके चलते इस देश में कभी राष्ट्रीय एकीकरण का पौधा कभी पुष्पित और पल्लवित नहीं हो सकता। वैसे तों इस पुस्तक में सृष्टि की उत्पत्ति की जानकारी भी दी गयी है, लेकिन असलियत यह सब अज्ञानी मन के तुतलाने से अधिक कुछ भी नहीं हैं। मनु स्मृति की इतने बढ़-चढ कर ज्ञान की डींगे बघारी गयी है, जिसका असली उद्देश्य जातिवाद का निर्माण और स्त्री को निंदनीय तथा निम्न बताना भर है। इसमे निहित आदेश निर्लज्जता से ब्राह्मणों के हित में है। कहने वाले तो कहते हैं कि मनुस्मृति और उसकी आज्ञाएं कब कि मर चुकी हैं, अब गड़े मुर्दे उखाडने से क्या फायदा? लेकिन सच पूछे कि क्या वाकई मनुस्मृति मर चुकी है? ऐसा नहीं है। आज भी विश्वविद्यालयों में मनुस्मृति पाठ्य पुस्तक के रूप में पढ़ाई जाती है। जयपुर हाईकोर्ट के परिसर में आज भी मनु की मूर्ति भारत के संविधान को मुँह चिढ़ाते नजर आ रही है। यूँ तो आज नये नए कानून बन गए हैं, परन्तु दुःख कि बात है कि आज भी वास्तव में हम मनु स्मृति से ही संचालित हो रहे हैं,न जाने हम कब इस कब्र से बाहर निकलेंगे?

प्रश्न है कि डॉ.बाबासाहेब आम्बेडकर ने आखिर यहीं पुस्तक क्यों जलाई? इसका उत्तर साफ है कि जिस कारण गाँधी ने अनगिनत विदेशी कपड़े जलवाये थे, धर्मशास्त्र माने जाने वाले इस कुकृत्य को नष्ट करने के लिए क्या इसे जलाना अनिवार्य नहीं था? कहने वाले कहते हैं कि आज मनुस्मृति को कौन जानता और मानता है? इसलिए अब मनु स्मृति पर हाथ धो कर पड़ने से क्या फायदा? यह एक मरे हुए सांप को मारना है। हमारा कहना है कि कई सांप इतने जहरीले होते हैं कि उन्हें सिर्फ मारना ही पर्याप्त नहीं समझा जाता है, बल्कि उसके मृत शरीर से निकला जहर किसी को हानि न पहुंचा दे इसलिए उसे जलाना भी पड़ता है। वैसे मनु स्मृति जैसी घटिया किताब कि तुलना बेचारे सांप से करना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है, बेचारा सांप तो यूँ ही बदनाम है और अधिकांस तो यूँ ही मार दिए जाते हैं। फिर भी सांप के काटने से एकाध आदमी ही मरता हैं, जबकि मनु स्मृति जैसे ग्रन्थ तो दीर्घकाल तक पूरे समाज को डंसता चला आ रहा है।

क्या ऐसे कृतियों की अंत्येष्टि यथासंभव किया जाना अनिवार्य नहीं है? वैसे मनुस्मृति के अलावा भी ब्राह्मणों की तमाम ग्रन्थों और स्मृतियाँ शूद्रों (आज के ओबीसी और और अनुसूचित जाति, जनजाति) तथा महिलाओं को हेय दृष्टि से देखते हुए उन्हें ताड़न का अधिकारी बताती है। बाबासाहेब ने 25 दिसंबर 19 27 में जो मनुस्मृति जलाई थी वह अकेली एक पुस्तक से घृणा होने के कारण नहीं, बल्कि इसे अन्य तमाम स्मृतियों और किताबों का प्रतिनिधि ग्रन्थ मानकर दहन किया था, लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि भारत सरकार आज तक इस राष्ट्र विरोधी किताब पर प्रतिबन्ध लगाकर इसे जब्त नहीं कर रही है। मनुवादी अथवा ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अधीन रामचरित मानस, व्यास स्मृति और मनु स्मृति प्रमाणित करती है कि भारत का समस्त पिछड़ा वर्ग एवं अछूत वर्ग शूद्र और अतिशूद्र कहलाता है। जैसे कि तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल, कल्हार, बढई, नाई, ग्वाल, बनिया, किरात, कायस्थ, भंगी सुनार इत्यादि। मनुविधान अर्थात मनुस्मृति में उक्त शूद्रों के लिए मनु भगवान द्वारा उच्च संस्कारी कानून बनाये गए हैं, जिनको पढ़कर उनका अनुसरण करने से उक्त समाज के सभी लोगों का उद्धार हो जायेगा और हमारा भारत पुनः सोने की चिड़िया बन जायेगा।

आपके समक्ष मनु भगवान के अमृतमयी कानूनी वचन पेश हैं। जिस देश का राजा शूद्र अर्थात पिछड़े वर्ग का हो ए उस देश में ब्राह्मण निवास न करें क्योंकि शूद्रों को राजा बनने का अधिकार नही है। राजा प्रातः काल उठकर तीनों वेदों के ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मणों की सेवा करें और उनके कहने के अनुसार कार्य करें। जिस राजा के यहाँ शूद्र न्यायाधीश होता है उस राजा का देश कीचड़ में धँसी हुई गाय की भांति दुःख पाता है। ब्राह्मण की सम्पत्ति राजा द्वारा कभी भी नही ली जानी चाहिए, यह एक निश्चित नियम है, मर्यादा है, लेकिन अन्य जाति के व्यक्तियों की सम्पत्ति उनके उत्तराधिकारियों के न रहने पर राजा ले सकता है। नीच वर्ण का जो मनुष्य अपने से ऊँचे वर्ण के मनुष्य की वृत्ति को लोभवश ग्रहण कर जीविका यापन करे तो राजा उसकी सब सम्पत्ति छीनकर उसे तत्काल निष्कासित कर दे। ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का मुख्य कर्म कहा गया है। इसके अतिरक्त वह शूद्र जो कुछ करता है उसका कर्म निष्फल होता है। यदि कोई शूद्र किसी द्विज को गाली देता है तब उसकी जीभ काट देनी चाहिए, क्योंकि वह ब्रह्मा के निम्नतम अंग से पैदा हुआ है।

यदि शूद्र तिरस्कार पूर्वक उनके नाम और वर्ण का उच्चारण करता है, जैसे वह यह कहे देवदत्त तू नीच ब्राह्मण है। तब दश अंगुल लम्बी लोहे की छड़ उसके मुख में कील दी जाए। निम्न कुल में पैदा कोई भी व्यक्ति यदि अपने से श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति के साथ मारपीट करे और उसे क्षति पहुंचाए तब उसका क्षति के अनुपात में अंग कटवा दिया जाए। ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए एक मात्र कर्म निश्चित किया है और वह है गुणगान करते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना। शूद्र यदि ब्राह्मण के साथ एक आसन पर बैठे तब राजा उसकी पीठ को तपाए गए लोहे से दाग कर अपने राज्य से निष्कासित कर दे। यदि शूद्र गर्व से ब्राह्मण पर थूक दे तब राजा दोनों ओंठों पर पेशाब कर दे तब उसके लिंग को और अगर उसकी ओर अपान वायु निकाले तब उसकी गुदा को कटवा दे। यदि कोई शूद्र ब्राह्मण के विरुद्ध हाथ या लाठी उठाए तब उसका हाथ कटवा दिया जाए और अगर शूद्र गुस्से में ब्राह्मण को लात से मारे तब उसका पैर कटवा दिया जाए। इस पृथ्वी पर ब्राह्मण वध के समान दूसरा कोई बड़ा पाप नही है। अतः राजा ब्राह्मण के वध का विचार मन में भी लाए।

शूद्र यदि अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश करे तो उस शूद्र के मुँह और कान में राजा गर्म तेल डलवा दें। राजा बड़ी बड़ी दक्षिणाओं वाले अनेक यज्ञ करें और धर्म के लिए ब्राह्मणों को स्त्री, गृह शय्या वाहन आदि भोग साधक पदार्थ तथा धन दे। जानबूझ कर क्रोध से यदि शूद्र ब्राह्मण को एक तिनके से भी मारता है तो वह 21 जन्मों तक कुत्ते, बिल्ली आदि पापश्रेणियों में जन्म लेता है। ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने से और वेद के धारण करने से धर्मानुसार ब्राह्मण ही सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है। शूद्र को भोजन के लिए झूठा अन्न, पहनने को पुराने वस्त्र, बिछाने के लिए धान का पुआल और फटे पुराने वस्त्र देना चाहिए। बिल्ली, नेवला, नीलकण्ठ, मेंढक, कुत्ता, गोह, उल्लू, कौआ किसी एक की हिंसा का प्रायश्चित शूद्र की हत्या के प्रायश्चित के बराबर है अर्थात शूद्र की हत्या कुत्ता बिल्ली की हत्या के समान है। शूद्र लोग बस्ती के बीच में मकान नही बना सकते। गांव या नगर के समीप किसी वृक्ष के नीचे अथवा श्मशान पहाड़ या उपवन के पास बसकर अपने कर्मों द्वारा जीविका चलावें। ब्राह्मण को चाहिए कि वह शूद्र का धन बिना किसी संकोच के छीन लेवे, क्योंकि शूद्र का उसका अपना कुछ नही है। उसका धन उसके मालिक ब्राह्मण को छीनने योग्य है। धन संचय करने में समर्थ होता हुआ भी शूद्र धन का संग्रह न करें, क्योंकि धन पाकर शूद्र ब्राह्मण को ही सताता है। राजा वैश्यों और शूद्रों को अपना अपना कार्य करने के लिए बाध्य करने के बारे में सावधान रहें, क्योंकि जब ये लोग अपने कर्तव्य से विचलित हो जाते हैं तब वे इस संसार को अव्यवस्थित कर देते हैं।

शूद्रों का धन कुत्ता और गदहा ही है। मुर्दों से उतरे हुए इनके वस्त्र हैं। शूद्र टूटे फूटे बर्तनों में भोजन करें। शूद्र महिलाएं लोहे के ही गहने पहनें। यदि यज्ञ अपूर्ण रह जाये तो वैश्य की असमर्थता में शूद्र का धन यज्ञ करने के लिए छीन लेना चाहिए। दूसरे ग्रामवासी पुरुष जो पतित, चाण्डाल, मूर्ख, धोबी आदि अंत्यवासी हो उनके साथ द्विज न रहें। लोहार, निषाद, नट, गायक के अतिरिक्त सुनार और शस्त्र बेचने वाले का अन्न वर्जित है। शूद्रों के समय कोई भी ब्राह्मण वेदाध्ययन में कोई सम्बन्ध नही रखें ए चाहे उस पर विपत्ति ही क्यों न आ जाए । स्त्रियों का वेद से कोई सरोकार नही होता, यह शास्त्रों द्वारा निश्चित है। अतः जो स्त्रियां वेदाध्ययन करती हैं वे पापयुक्त हैं और असत्य के समान अपवित्र हैं, यह शाश्वत नियम है। अतिथि के रूप में वैश्य या शूद्र के आने पर ब्राह्मण उस पर दया प्रदर्शित करता हुआ अपने नौकरों के साथ भोज कराये। शूद्रों को बुद्धि नही देना चाहिए अर्थात उन्हें शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नही है। शूद्रों को धर्म और व्रत का उपदेश न करें। जिस प्रकार शास्त्रविधि से स्थापित अग्नि और सामान्य अग्नि दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान दोनों ही रूपों में श्रेष्ठ देवता है। शूद्र की उपस्थिति में वेद पाठ नहीं करना चाहिए। ब्राह्मण का नाम शुभ और आदर सूचक, क्षत्रिय का नाम वीरता सूचक व वैश्य का नाम सम्पत्ति सूचक और शूद्र का नाम तिरस्कार सूचक हो। दस वर्ष के ब्राह्मण को 90 वर्ष का क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र पिता समान समझ कर उसे प्रणाम करे। मनु के उपवर्णित विधानों से अनुमान लगाया जा सकता है कि शूद्रों अतिशूद्रों पर किस प्रकार और कितने अमानवीय अत्याचार हुए हैं ।

इस प्रकार के क्रूर और रोंगटे खड़े कर देने वाले विधान लिखे गए हैं। मनु के इन अमानवीय विधानों से भारत का हाथी जैसा मूलनिवासी बहुसंख्यक समाज मानव होते हुए भी पशु के समान जीवन जीने को मजबूर हो गया। मनु के आर्थिक प्रतिबंधों के कारण शूद्र और अतिशूद्र समाज मरे हुए जानवरों के सड़े से सड़े मांस को नोचकर खाने को मजबूर हो गए। मनु द्वारा ब्राह्मणों को दिए गए विशेषाधिकारों ने ब्राह्मणों में शूद्रों और अछूतों के प्रति निर्ममता और अमानवीयता का भाव भर दिया। मनुविधान में वर्णित मूर्ख, गवाँर और कुकर्मी ब्राह्मण भी मूलनिवासियों पर आधिपत्य स्थापित कर उन्हें जीवन भर गुलाम बनाने के लिए उनको कई हजार जातियों में बांट दिया। ब्राह्मणों ने मूल निवासियों को न केवल जातियों में विभक्त किया बल्कि उनमें ऊँच-नीच का भेद-भाव भी पैदा किया ताकि इन जातियों में आपस में फूट रहे और वे उन पर राज करते रहें। राष्ट्रपिता महात्मा, महान सामाजिक क्रांतिकारी ज्योतिराव फुले का कहना था अंग्रेजों और मुगलों ने तो हमारे शरीर को ही गुलाम बनाया, परन्तु ब्राह्मणों ने तो हमारी चेतना को ही गुलाम बना डाला ।

इस प्रकार मनु के विधान के फलस्वरुप समाज में जातिवाद, ऊंच-नीच ए छुआछू, पैतृक-पौरोहिताई, वर्णवाद, कर्मकाण्ड का वातावरण फैल गया। इससे केवल ब्राह्मणों को ही लाभ हुआ तथा शूद्रों का घोर अहित हुआ। उनमें हीनता का भाव पनप गया। ब्राह्मणों द्वारा भाग्यवाद, पुनर्जन्मवाद और ईश्वरवाद के बिछाये जाल में फंस कर बहुजन अपने मान और सम्मान के प्रति संवेदना ही नष्ट कर बैठे। उनमें एक अच्छा इंसान बनने की चाहत समाप्त हो गई। यह सब मनु द्वारा रचित मनुस्मृति के कारण हुआ। मनुवाद विध्वंसक, अपराधिक प्रवृत्ति युक्त, असमानता पर आधारित, लालची एवं स्वार्थी मनोवृत्ति वाला हिंसक एवं बेईमान, क्रूर, उत्पीड़क, निकम्मा तथा दूसरों का घातक शत्रु है। इस व्यवस्था ने इस देश के मूल निवासियों को शूद्र और अतिशूद्र बना कर उन्हें लम्बे अरसे तक जानवर की जिंदगी व्यतीत करने को मजबूर किया। मनुवाद हमेशा समाज को दिग्भ्रमित करता है तथा बहकाता है। यह बहुजनों और महिलाओं को हमेशा हतोत्साहित करता है। यह घोर भौतिकवादी और अवसरवादी है। बहुजन समाज की उन्नति और मुक्ति के लिए मनुवाद को पुनः दफनाने की जरूरत है। क्या हिन्दुवादी अर्थात ब्राह्मणवादी लोग ये बताने का कष्ट करेंगे कि उपरयुक्त् मनु के क्रूर विचारों और विधानों से क्या पिछड़े वर्ग के लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत नही होती हैं? क्या उनको अपने देश में एक सम्मान और मौलिक अधिकारों के साथ जीने का अधिकार नही है? क्या इससे हिन्दू धर्म की आस्था को ठेस नही पहुंचती है? क्या विचार धारा से हिंदुओं में फूट उत्पन्न नही होती है?

शुक्रवार, 3 मई 2019

सोने का सौदागर, सोने की तस्करी करती मोदी सरकार

सोने का सौदागर
सोने की तस्करी करती मोदी सरकार

 
राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

मोदी सरकार अपने ही देश में डकैती डाल देगी, शायद यह किसी ने नहीं सोथा होगा. लेकिन जिस तरह से मोदी सरकार ने चोरी चुपके से आरबीआई का करीब 200 टन सोना विदेशों में भेज दिया है. इस तरह से कहा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी चंबल के डाकूओं का बहुत बड़ा गिरोह बन गयी है. एक तरफ से सोना खरीद रही है और दूसरी तरफ से सोने का तस्करी कर रही है.
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 9 साल के दौरान भारत ने 50.94 टन सोना खरीदा है. मगर हाल ही में दिल्ली दक्षिण लोकसभा से चुनाव लड़ रहे नवनीत चतुर्वेदी ने सरकार और रिजर्व बैंक पर बड़े गंभीर आरोप लगाए हैं. चतुर्वेदी का दावा है कि रिजर्व बैंक का 200 टन सोना मोदी सरकार ने आते ही चोरी छुपे विदेश भेज दिया है. चतुर्वेदी का कहना है कि बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटेलमेंट्स (बीआईएस) जो स्विजरलैंड में है उसमें भेजा गया है. यह सोना विदेश में तब भेजा जाता है जब वहाँ से कर्ज लेना हो, डॉलर लेना हो या क्षमता से अधिक नोट छापना हो.

बता दें कि सोना खरीदना भारतीयों की पहली पसंद है. ये कहने की जरुरत नहीं है. यहाँ तो बस मौके का इंतजार रहता है, चाहे धनतेरस हो, नवरात्र हो, दिवाली हो, अक्षय तृतीया, किसी का जन्मदिन या फिर सालगिरह. तोहफे में देने के लिए गोल्ड को बेस्ट मानने वालों की कमी नहीं है. लेकिन देश में मोदी सरकार से बचकर रहने में ही भलाई है. क्योंकि मोदी सरकार सोने का सौदागर बन गयी है जो देश के ही सोने पर अपना हाथ साफ कर विदेशों में सप्लाई कर रही है.
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट कहती है कि पिछले 9 साल के दौरान भारत, रूस और कजाकिस्तान ने जमकर सोने की खरीदारी की है. इस दौरान भारत के सेंट्रल बैंक ने कुल 50.94 टन, रूस के सेंट्रल बैंक ने 1501 टन सोना और कजाकिस्तान ने 285.84 टन सोने की खरीदारी की है. हालांकि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ब्याज दरें बढ़ने के दौर में सोने की खरीदारी से भारतीय मुद्रा भंडार को मजबूती मिलेगी. ऐसे में भारत अपनी आर्थिक स्थिति को ज्यादा मजबूत कर पाएगा. अर्थशास्त्री कहते हैं कि आरबीआई के ज्यादा सोना खरीदने का मकसद देश को ग्लोबल रिस्क से बचाना है.
एसकॉर्ट सिक्योरिटी के रिसर्च हेड आसिफ इकबाल ने बताया कि अमेरिका ब्याज दरें बढ़ा रहा है. ऐसे में अमेरिकी डॉलर को मजबूती मिल रही है. भारतीय रुपया कमजोर हो रहा है. देश के पास सोना रहने पर किसी भी बड़ी आर्थिक और राजनीतिक समस्या से निपटा जा सकता है. आसिफ के मुताबिक, अगर दुनिया में जंग छिड़ जाती है तो करेंसी की कोई कीमत नहीं रह जाती है. ऐसे में सोना देकर ही हथियार और अन्य चीजें दूसरे देशों से खरीदी जाती हैं. मतलब साफ है कि सोना हमेशा से सेफ इन्वेस्टमेंट है.
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट बताती हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा सोने का भंडार अमेरिका के पास है. अमेरिका के पास कुल 8,133.5 टन सोना रिजर्व में है. जर्मनी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोने के भंडार रखने वाला देश है. जर्मनी की ऑफिशियल गोल्ड होल्डिंग 3,369.70 टन है. सोने का यह भंडार देश के विदेशी मुद्रा भंडार का 70 फीसदी है. अगर इटली की बात करें तो इटली के पास 2,451.8 टन सोना जमा है. यह सोना देश के विदेशी मुद्रा भंडार का 68 फीसदी है. वहीं, फ्रांस दुनिया का चौथा सबसे बड़ा सोने का भंडार रखने वाला देश है. फ्रांस के पास 2,436 टन सोने का भंडार है. यह सोना फ्रांस के विदेशी मुद्रा भंडार का 63 फीसदी है. इस लिस्ट में भारत का नंबर 11वाँ है. भारत के पास फिलहाल 608.7 टन सोने का रिजर्व है.
बताते चलें कि 90 के दशक में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने ब्रिटेन में रिजर्व बैंक का सोना गिरवी रखकर कर्ज लेने का फैसला किया था. कहीं ऐसा तो नहीं है कि मोदी सरकार भी ऐसे ही करने जा रही है? मोदी सरकार ने बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटेलमेंट्स (बीआईएस) जो स्विजरलैंड में करीब 200 टन सोना भेज दिया है. क्या मोदी सरकार स्विटजरलैंड से अरबों का कर्ज लेने की तैयारी कर रही है? अब सवाल उठता है कि सेंट्रल बैंक सोना क्यों खरीद रहा हैं? हालांकि जिस तरह से मोदी
सरकार ने स्विटजरलैंड में 200 टन सोना भेजा है उस तरह से तो यही लग रहा है कि मोदी सरकार एक तरफ से सोना खरीद कर दूसरी तरफ तस्करी कर रही है. इससे यह साबित होता है कि मोदी सरकार ने पाँच साल में सबसे ज्यादा सोना खरीदने और तस्करी करते आ रही है. निश्चित तौर से देश की जनता को मोदी सरकार से सतर्क रहने की जरूरत है. वर्ना मोदी सरकार कभी भी कानून बनाकर आम जनता के भी सोने पर हाथ साफ कर सकती है.
                                          

पीएम किसान योजना के तहत हजारों किसानों के खाते में डाले गए पैसे वापस लिए गए

मोदी छलिया रे........

पीएम किसान योजना के तहत हजारों किसानों के खाते में डाले गए पैसे वापस लिए गए

राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत किसानों को जारी की गई रकम में से करोड़ों रुपये उनके खातों से वापस ले लिए गए हैं. राष्ट्रीयकृत बैंकों में दायर किए गए सूचना का अधिकार आवेदन से इसका खुलासा हुआ. लोकसभा चुनाव के लिए हो रहीं रैलियों में भाजपा इस योजना को अपनी बड़ी सफलता के रूप में प्रदर्शित कर रही है. बीते 24 फरवरी को इस योजना के लॉन्च के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजना को किसानों की स्थिति सुधारने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम बताया था. लेकिन हालांकि, दस्तावेजों से पता चलता है कि इस योजना के तहत पहली किस्त के रूप में प्रति किसान को दिए गए 2000 रुपये कुछ दिनों या कुछ ही घंटों बाद उनके खातों से निकाल लिए गए. इस योजना के तहत दो एकड़ या इससे कम जमीन के मालिक वाले किसानों को 2000 रुपये की तीन किस्त में एक साल में 6,000 रुपये देने का प्रावधन रखा गया है. कुल 19 राष्ट्रीयकृत बैंकों में से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, यूको बैंक, सिंडिकेट बैंक, केनरा बैंक ने आरटीआई के जवाब में स्वीकार किया है कि इस योजना के तहत किसानों के खाते में डाले गए पैसे वापस ले लिए गए हैं.

भारत के सबसे बड़ी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बताया कि इस योजना के तहत आठ मार्च 2019 तक 27,307 खातों में डाली गई रकम में से 05 करोड़ 46 लाख रुपये वापस ले लिए गए. एसबीआई ने ये भी बताया कि आठ मार्च 2019 तक उन्होंने करीब 42 लाख 74 हजार खातों में लगभग 854.85 करोड़ रुपये पीएम किसान योजना के तहत डाला था. इसी तरह बैंक ऑफ महाराष्ट्र ने इस बात की पुष्टि की है कि योजना के तहत किसानों के खातों में डाले गए पैसे वापस ले लिए गए हैं. इस बैंक ने बताया कि अब तक उन्होंने करीब एक लाख 88 हजार खातों में लगभग 37 करोड़ 70 लाख रुपये डाले हैं. इसमें से 61 लाख 20 हजार रुपये वापस ले लिए गए हैं. इस हिसाब से बैंक ऑफ महाराष्ट्र द्वारा किसानों के करीब 3,060 खातों से पीएम किसान योजना के पैसे निकाल लिए गए या वापस हो गए हैं.
वहीं, यूको बैंक ने आरटीआई के जवाब में बताया कि 24 फरवरी 2019 तक 2919 खातों के 58 लाख 38 हजार रुपये वापस हो गए थे. प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक यूको बैंक ने 24 फरवरी तक पीएम किसान योजना के तहत करीब एक लाख 51 हजार खातों में लगभग 30 करोड़ 28 लाख रुपये डाले थे. एक अन्य राष्ट्रीय बैंक, सिंडिकेट बैंक ने ये नहीं कहा कि उनके यहाँ ऐसे मामले सामने नहीं आए हैं. बल्कि आरटीआई के तहत बैंक ने जवाब दिया कि चूंकि ये जानकारी देश के अलग-अलग शाखाओं से जमा करनी पड़ेगी, इसलिए धारा 7 (9) के तहत ये जानकारी नहीं दी जा सकती है.

आंध्रा बैंक ने आरटीआई के जवाब में बताया था कि 26 मार्च 2019 तक इस योजना के तहत उन्होंने करीब आठ लाख 54 हजार खातों में लगभग 170 करोड़ रुपये डाले थे. इसमें से अब तक 90 करोड़ से ज्यादा रुपये (90,50,02,178 रुपये) निकाल लिए गए हैं. केनरा बैंक का कहना है कि किसानों का खाता नंबर गलत होने की वजह से ये पैसे वापस हुए हैं. लेकिन केनरा बैंक ने इस संदर्भ में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया. बैंक ने बताया कि 20 मार्च 2019 तक में पीएम किसान योजना के तहत 7,18,892 खातों में कुल 1,43,77,84,000 रुपये भेजे गए थे. पीएम किसान योजना के तहत पैसे वापस होने के इतने मामलों के बावजूद केंद्रीय कृषि मंत्रालय का कहना है कि उनके पास इस प्रकार की कोई सूचना नहीं प्राप्त हुई है. मंत्रालय के किसान कल्याण विभाग ने आरटीआई के जवाब में कहा कि ऐसे मामलों को रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है. अभी तक विभाग द्वारा ऐसी कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई है.

मंत्रालय ने बताया कि एक दिसंबर 2018 से लेकर 31 मार्च 2019 तक पीएम किसान योजना के तहत पहली किस्त के रूप में करीब तीन करोड़ (3,00,27,429) किसानों के खाते में लगभग 6000 करोड़ रुपये (60,05,48,58,000 रुपये) डाले गए हैं. मालूम हो कि बीते फरवरी महीने में कई सारी मीडिया रिपोर्टें आई थीं जिसमें किसानों ने इस बात को लेकर शिकायत की थी कि उनके खाते में 2000 रुपये आने के कुछ घंटों या कुछ दिन बाद निकाल लिए गए. मिरर नाउ ने इस मामले को लेकर महाराष्ट्र के किसानों से बात की थी जिसमें उन्होंने फोन पर आए मैसेजेस को दिखाते हुए उनके खाते से पैसे निकाले जाने का आरोप लगाया था. कुल मिलाकर बात साफ है कि मोदी सरकार किसानों के साथ पहले भी धोखेबाजी किया और चुनाव के दौरान भी किसानों को धोखा देने से बाज नहीं आ रही है.

चोरी-चोरी चुपके..... एक और बड़ा घोटाला...

चोरी-चोरी चुपके.....
एक और बड़ा घोटाला...
मोदी सरकार ने रिजर्व बैंक का 200 टन सोना चोरी छुपे भेजा दिया विदेश


राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

♦ जिस तरह से मोदी सरकार ने चोरी चुपके 200 टन सोना विदेश भेज दिया है, ठीक ऐसा ही रवैया कालेधन के नाम पर भी किया था. नोटबंदी से पहले ही मोदी सरकार ने अपने चहेतों को बचाने के लिए उनके कालेधन को लिबेरालाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) के तहत करीब 30,000 करोड़ रूपये विदेश भेज दिया था, जिसकी जानकारी किसी को नहीं चल सकी. 

चोरी-चोरी चुपके-चुपके.....मोदी सरकार देश का दिवालिया निकालती रही है और अपने देश की जनता के सामने झूठे विकास का ढिंढोरा पीटती रही. जबकि जमीनी हकीकत यह है कि केन्द्र की सत्ता पर जब से संघ संचालित मोदी सरकार का अनियंत्रित कब्जा हुआ है तब से संघ संचालित मोदी सरकार ने देश को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. हर दिन बैंक घोटाले, रेल घोटाले, फंड घोटाले, सोना घोटाले, राफेल घोटाले, स्पेक्ट्रम घोटाले और ईवीएम घोटालों ने रिकार्ड तोड़ दिया है. इन बड़े घोटालों से देश उबर भी नहीं पाया कि इसी बीच एक और बड़ा घोटाला सामने आ गया. नवनीत चतुर्वेदी ने दावा किया है कि मोदी सरकार ने चोरी-चुपके से रिर्जव बैंक का करीब 200 टन सोना विदेश भेज दिया है.


विशेष सूत्रों के अनुसार दिल्ली दक्षिण लोकसभा से चुनाव लड़ रहे नवनीत चतुर्वेदी ने सरकार और रिजर्व बैंक पर बड़े गंभीर आरोप लगाए हैं. चतुर्वेदी ने कहा कि रिजर्व बैंक का 200 टन सोना मोदी सरकार ने आते ही चोरी छुपे विदेश भेज दिया है. चतुर्वेदी ने कहा बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटेलमेंट्स (बीआईएस) जो स्विजरलैंड में है उसमें भेजा गया है. यह सोना विदेश में तब भेजा जाता है जब वहाँ से कर्ज लेना हो, डॉलर लेना हो या क्षमता से अधिक नोट छापना हो.

चतुर्वेदी का आरोप है, कि 1991 में जब देश आर्थिक संकट से गुजर रहा था तब 45 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में गिरवी रखा गया था. 2015 में मोदी सरकार ने एक बार फिर देश का सोना विदेश के बैंक आप इंग्लैंड और बैंक आफ इंटरनेशनल सेटलमेंट में रख दिया था. चतुर्वेदी ने सरकार पर सवाल खड़ा किए कि इस तथ्य को मोदी सरकार ने क्यों छुपाया है? रिजर्व बैंक भी इस बात की जानकारी क्यों नहीं दे रहा है? नवनीत यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा एक साजिश के तहत मोदी सरकार ने विदेश में सोना भेजकर बहुत बड़ी गड़बड़ी की है. रिजर्व बैंक के रिकॉर्ड में, 30 जून 2014 तक सोना भारत में ही रखा हुआ था, उसके बाद 200 टन सोना विदेश गया है. वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक ने यह बात क्यों छुपाई? किस लिए सोना विदेश भेजा गया? यह कब वापस आएगा? यह जानकारी भी रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय नहीं दे रहा है.

नवनीत चतुर्वेदी एक पत्रकार भी हैं. उनका दावा है कि नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उस समय जीएसपीसी के घोटाले को मैने उजागर किया था. उनका यह भी कहना कहना है कि राफेल का घोटाला भी उन्होंने ही उजागर किया था. नवनीत चतुर्वेदी का यह भी कहना है कि भाजपा के आंतरिक फंड में बड़े पैमाने पर हुए घोटाले को उन्होंने उजागर किया था. इस सारे मामले को मोदी सरकार ने दबाकर रखा है.

जिस तरह से मोदी सरकार ने चोरी चुपके 200 टन सोना विदेश भेज दिया है, ठीक ऐसा ही रवैया कालेधन के नाम पर भी किया था. नोटबंदी से पहले ही मोदी सरकार ने अपने चहेतों को बचाने के लिए उनके कालेधन को लिबेरालाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) के तहत करीब 30,000 करोड़ रूपये विदेश भेज दिया था, जिसकी जानकारी किसी को नहीं चल सकी. 

एक रिपोर्ट के मुताबिक लिबेरालाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत विदेश में धन भेजन की सीमा सिर्फ 75 हजार डॉलर थी. मगर, भाजपा ने सत्ता में आने के एक हफ्ते के अंदर ही 03 जून 2014 को इसकी सीमा बढ़ाकर 125 डॉलर कर दी. यह मामला यही नहीं रूका, बल्कि 26 मई, 2015 को दोबारा इसकी सीमा को बढ़ाकर 250 हजार डॉलर कर दी. जिसका फायदा उठाते हुए पूँजीपतियों ने 500 व 1000 के नोट बंद होने से पहले ही करीब 30,000 करोड़ रूपये का कालाधन विदेशों में ट्रांसफर कर दिया. इस तरह से मोदी सरकार एक तरफ देश को बर्बाद कर रही है और दूसरी तरफ विकास का ढिंढोरा पीट रही है. 

गुरुवार, 2 मई 2019

प्रेस की स्वतंत्रता पर पहरा

प्रेस की स्वतंत्रता पर पहरा

राजकुमार (दैनिक ​मूलनिवासी नायक)

एक स्वतंत्र प्रेस एक जीवंत लोकतंत्र की आधारशिला है. हम सभी प्रकारों के प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी को कायम रखने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं. 125 करोड़ भारतीयों की कौशल, ताकत और रचनात्मकता दिखाने के लिए हमारी मीडिया का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाता है. यानी मीडिया का मुख्य कार्य बेजुबानों को जुबान देना है. परन्तु, प्रेस की स्वतंत्रता को भारत में कुचल दिया गया है. इतिहास पर नजर डालें तो देश में प्रेस की स्वतंत्रता को बुरी तरह से कुचलने का काम सबसे पहले नेहरू परिवार ने किया था. ऐसा नहीं है कि यह काम केवल कांग्रेस ने ही ऐसा किया है, आज बीजेपी भी वही काम कर रही है.


16 नवंबर, 2017 को राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दिए गये इस संदेश से समझा जा सकता है कि वे प्रेस की स्वतंत्रता को कितनी बड़ी ताकत मानते हैं और इसके प्रति कितने संवेदनशील हैं. हालांकि हमारे सामने ‘मुंह में राम बगल में छुरी’ वाले शासन की सच्चाई भी है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने 18 मार्च, 2018 को पार्टी के 84वें अधिवेशन को संबोधित करते हुए प्रेस की स्वतंत्रता की बात की और कहा था कि प्रेस के लोग डरे हुए हैं, सुप्रीम कोर्ट के जजों को न्याय के लिए मीडिया के सामने आना पड़ रहा है.

सबसे पहले हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि राहुल गाँधी की बातों में कितनी सच्चाई है.क्या कांग्रेस जो कह रही है सत्य है? क्या वाकई में कांग्रेस प्रेस की आजादी के लिए चिंतित है या फिर इसे एक ‘चुनावी टूल’ के तौर पर इस्तेमाल कर रही है? इसकी हकीकत जानकर आप भी चौंक जायेंगे. क्योंकि जो हकीकत सामने आये हैं वे बेहद चौंकाने वाले हैं. दरअसल कांग्रेस के शासनकाल में प्रेस की स्वतंत्रता पर कई बार कुठाराघात किए जा चुके हैं. इतिहास इस बात का  गवाह है कि नेहरू-गाँधी परिवार ने प्रेस की स्वतंत्रता का दमन करने के लिए कभी कानून बनाकर तो कभी आपातकाल लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाया है. हम एक नजर डालते हैं गाँधी परिवार द्वारा प्रेस की आजादी को खत्म करने के लिए कांग्रेस की कुत्सित कोशिशों पर. कांग्रेस के नेता अक्सर जवाहर लाल नेहरू को अपना रोल मॉडल बताते रहे हैं, लेकिन हकीकत ये है कि लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका निभा रहे खुद नेहरू ने ही सबसे पहले प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलने का काम किया है. 

नेहरू ने कई ऐसे कानून लागू किये, जिससे देश में प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ गयी. 23 अक्टूबर 1951 को नेहरु ने ‘‘द प्रेस ऑब्जेक्शनेबल मैटरर्स एक्ट-1951’’ लागू किया. यह कानून अंग्रेजों द्वारा 1908, 1910, 1930 और 1931 में पारित कानूनों के समान प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाने वाला था. इस कानून के पारित होने पर देश में जबरदस्त विरोध हुआ. द ऑल इंडिया न्यूज पेपरर्स एडिटरर्स कॉन्फ्रेंस (एआईएनपीएसी), द इंडियान फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्ल्यूजे), और लंग्वेज न्यूज पेपर एसोशियन (एलएनपीए) ने इस कानून का विरोध किया, लेकिन फिर भी नेहरू नहीं माने और कानून लागू कर दिया. यही नहीं कांग्रेसी कुशासन का सबसे बड़ा उदाहरण इंदिरा गाँधी के समय में भी देखने को मिला है. देश में लगाये गये आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलने का जो काम इंदिरा गाँधी ने किया वह अभूतपूर्व है. एक लेटर मिला है जो साबित करने के लिए काफी है कि इंदिरा गाँधी ने भी प्रेस की आजादी का दमन किया है. इंदिरा गाँधी ने आपातकाल के दौरान न केवल लोगों के नागरिक एवं मौलिक अधिकारों का दमन किया, लोकतंत्र की गरिमा पर आघात किया, बल्कि प्रेस की आजादी को भी कुचल डाला.
 
आजादी के बाद पहली बार इंदिरा सरकार ने 26 जून 1975 को केंन्द्रीय सेंसरशिप आदेश (सीसीओ) और प्रेस के लिए दिशानिर्देश (जीएफटीपी) जारी किया. 11 फरवरी 1976 को ‘‘प्रीवेन्सशन ऑॅफ पब्लिकेशन ऑफ ऑब्जेक्शनेबल मैटर एक्ट-1976’’ यानी आपत्तिजनक मामले की रोकथाम लिए अधिनियम-1976 को लागू कर दिया. हालांकि इंदिरा गाँधी ने 1971 में ही प्रेस की स्वतंत्रता को खत्म करने के लिए पहली बार कदम उठाने के लिए सोचा था. इंदिरा गाँधी ने एक ऐसा कानून तैयार करवाया, जिसमें समाचारपत्रों के मालिकों का एकाधिकार खत्म करने के प्रवाधान थे. ऐसे प्रावधान किए गए जिससे सरकार के प्रतिनिधियों को समाचार पत्रों के बोर्ड अधिक शक्ति मिले. हालांकि यह कानून की शक्ल नहीं ले सका. 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान इंदिरा गाँधी ने प्रेस की आजादी को यह कहते हुए खत्म कर दिया कि वह राष्ट्रीय नीति के विरूद्ध कार्य कर रहा है. इस दौरान वे सारी बंदिशें लगा दी गईं जो अंग्रेजों द्वारा प्रेस के ऊपर लगाए जाते थे.

राजीव गाँधी भी प्रेस की स्वतंत्रता को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. राजीव गांधी, प्रेस की आजादी और मुखरता को गलत मानते थे और अपनी सरकार के मुताबिक ही रखना चाहते थे. राजीव गाँधी ने लोकसभा से ‘‘मानहानि विधेयक-1988’’ पारित करवाकर प्रेस की आजादी को कुचलना चाहा, लेकिन पत्रकारों ने राजीव गाँधी की सरकार को मजबूर कर दिया कि वह यह विधेयक राज्यसभा में पेश न कर सके. एक और आँकड़े हैं जो हैरत में डाल देते हैं, वो ये हैं कि प्रेस की आजादी की बात करने वाले राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी ने यूपीए-2 के पाँच वर्षों के शासन काल में महज छह बार ही मीडिया से इंटरैक्शन किया है. उनमें से भी दो ऐसे मौके थे, जिनमें महज दो मिनट के लिए ही मीडिया का सामना किया.

नेहरू-गाँधी परिवार प्रेस की आजादी को कितना तवज्जो देते हैं इसका अंदाजा इस बात से भी लग जाता है कि राहुल गाँधी ने 2004 से राजनीति में आने के 10 साल बाद पहली बार किसी न्यूज चैनल को इंटरव्यू दिया. इसके साथ ही राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी इस बात का भी विशेष ख्याल रखते हैं कि उनके करीबी पत्रकारों से ही वे मिलें, ताकि कोई मुश्किल प्रश्न पेश न आए. यह बात यही खत्म नहीं होती है. वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बीते 46 महीनों में 29 बार विभिन्न मीडिया संस्थानों, पत्रकारों से इस संदर्भ में बात-चीत कर चुके हैं. यही नहीं भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने भी 20 नवंबर 2012 को कह चुके हैं कि प्रेस की स्वतंत्रता को ‘निश्चित तौर पर’ ‘कुचल’ दिया जाना चाहिए. यह बात अपने आप प्रमाणित करती है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने मिलकर प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलने का काम किया है. जिसका परिणाम आज भी सामने देखने को मिल रहा है. 

आदर्श गाँव की लीपापोती

आदर्श गाँव की लीपापोती


राजकुमार (दैनिक ​मूलनिवासी नायक)

जिस गाँव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोद लिया था क्या वह गाँव ‘आदर्श’ बन पाया? 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने और प्रधानमंत्री बनने के बाद वाराणसी के सांसद नरेंद्र मोदी ने जिले के जयापुर गाँव को सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया था. जिसका मकसद इस गाँव को आदर्श गाँव बनाना था. एक ऐसा गाँव जिसका नाम विश्वपटल पर लिया जा सके. अब पाँच साल बीतने को है, लोकसभा चुनाव हो रहे हैं. लेकिन, जयापुर वो आदर्श गाँव नहीं बन पाया, जिसका सपना यहाँ रहने वाले लोगों को दिखाया गया था.
अगर इस गाँव की तस्वीर देखें तो आज भी इस गाँव में सीवर की व्यवस्था नहीं है, तमाम घरों में लोग चूल्हे पर ही खाना बनाते हैं. इलाज के लिए कोई स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं और सबसे बड़ी बात इस गाँव में जाने के लिए की पर्याप्त साधन भी उपलब्ध नहीं हैं.

आपको बता दें कि जयापुर की कुल आबादी इस समय 4200 है. 2011 की जनगणना के अनुसार, इस गाँव की आबादी 3100 है. इस गाँव में कुल 2700 वोटर हैं. गाँव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है. यहाँ पटेल, ब्राह्मण, भूमिहार, कुम्हार, अनुसूचित जति आदि जातियों के साथ रहते हैं. सबसे ज्यादा आबादी पटेलों की है. इस गाँव के लोग मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं. यहाँ पर गेहूं, धान और तरह-तरह की सब्जियों की खेती होती है. खेती के अलावा कुछ लोग सरकारी नौकरी तो कुछ लोग प्राइवेट नौकरी में भी हैं. अगर आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गोद लिए गाँव जयापुर जाने की सोच रहे हैं तो पहले आप ये समझ लीजिए कि अगर आपके पास अपनी गाड़ी है तो ठीक है, नहीं तो गाड़ी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है. वाराणसी रेलवे स्टेशन से लगभग 30 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में बसे इस गाँव में आने के लिए आपको साधन की काफी मशक्कत करनी पड़ती है. अगर गाड़ी मिल गई है तो जयापुर जाने के लिए आपको बहुत संभल कर गाड़ी में बैठना होगा. क्योंकि, सड़क ऊबड़-खाबड़ और बेहद खराब हाल में है. राजातालाब से जयापुर की दूरी महज छह किलोमीटर है. मगर आपको घंटों लग जायेंगे.

जयापुर गाँव के लिए एक पूर्व माध्यमिक स्कूल है, जो पास के चंदापुर गाँव में स्थित है. यहाँ आठवीं तक की पढ़ाई होती है. बिल्डिंग देखकर स्कूल की हालत अच्छी स्थिति में लगती है. परन्तु केवल देखने के लिए है वास्तविक उलट है. आठवीं से आगे की पढ़ाई के लिए गाँव में कोई व्यवस्था नहीं है. जब आप थोड़ी आगे बढ़ते हैं तो आपको एक लाइब्रेरी दिखाई देता है. लाइब्रेरी की दीवार पर अच्छी-अच्छी बातें तो लिखी हैं, लेकिन वो सब शायद दिखावे के लिए ही है, क्योंकि इस लाइब्रेरी में ताला लगा हुआ है. जयापुर में कोई भी स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. यहाँ से करीब चार किलोमीटर दूर महगाँव है, वहाँ एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है. जयापुर के इलाज के लिए लोग वहीं जाते हैं. जब कभी तबीयत खराब होती है तो यहाँ से करीब पाँच किलोमीटर दूर जक्खिनी जाना पड़ता है. डिलिवरी या कोई भी इमरजेंसी के दौरान कोई सुविधा भी इस गाँव में नहीं है. 

प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान के तहत प्रशासन ने जयापुर गाँव में हर घर में शौचालय निर्माण करवाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था और काम हुआ भी. करीब-करीब सभी घरों में शौचालय बना दिए गए, लेकिन इन शौचालयों की हालत पीएम मोदी की स्वछ भारत अभियान की असफलता की कहानी बयान कर रहे हैं. इस गाँव में सीवर नाली की कोई व्यवस्था नहीं है. जब बारिश होती है तो पानी घर में घुसने लगता है. शिकायत करने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जयापुर को गोद लेने के बाद गाँव में जगह-जगह सोलर लाइट की व्यवस्था की गई, लेकिन देखरेख के अभाव में ये खराब हो गईं. इनमें लगीं बैटरियां भी चोरी हो गईं. गाँव में नंदघर यानी आंगनबाड़ी केंद्र भी बना हुआ है. दूर से देखने में ये सुंदर लगता है, लेकिन जब आप पास जाकर देखते हैं तो पता लगता है कि यहाँ ताला बंद है. मार्बल उखड़े पड़े हैं, खिड़की का शीशा टूटा हुआ है. खिड़की से अंदर देखने पर सारा सामान बिखरा पड़ा नजर आता है. सभी जगह धूल ही धूल है. इसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले कई महीने से ये खुला ही नहीं है. 

अब जरा उज्जवला योजना पर गौर करें तो यहाँ के लोगों का कहना है, उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर और चूल्हा तो मिल गया है, मगर सिलेंडर दोबारा भरवाने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं. लिहाजा वह फिर से लकड़ी पर खाना बनाने को मजबूर है. वहाँ की महिलाएं बताती हैं कि गैस सिलेंडर और चूल्हा निःशुल्क मिल गया, मगर सिलेंडर खाली होने पर उसे दोबारा भरवाने के लिए 1110 रुपये कहाँ से लाएं? सब्सिडी का पैसा तो बाद में आएगा. उनका कहाना है कि हम मुश्किल से दिन में 100 रुपये कमा पाते हैं. इसी में बच्चों का खर्च भी होता है. मेरे पति मजदूरी करते हैं. हम दोनों लोग मिलकर किसी तरह अपना और अपने बच्चों का पेट पाल लेते हैं. अगर उक्त बातों का पूर्ण रूप से विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि देश विनाशक प्रधानमंत्री ने इस गाँव को गोंद लेकर इस गाँव को बर्बादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है. इससे अच्छा होता कि इस गाँव को गांद ही नहीं लिया गया होता. अगर इस गाँव को गोंद नहीं लिया गया होता तो शायद इसका अच्छा विकास हुआ होता. मगर नरेन्द्र मोदी ने ‘आदर्श गाँव’ के नाम पर इस जयापुर गाँव को गोंद लेकर आदर्श गाँव की लीपापोती कर दिया. इसके बाद भी इस जयापुर गाँव का विकास पाँच साल में भी नहीं हो पाया.

देश विनाशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

देश विनाशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
क्या भारत के मुसलमान गुजरात दंगे को भूल चुके हैं?
राजकुमार (दैनिक ​मूलनिवासी नायक)

देश विनाशक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस अंदाज और शैली में चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं, उससे साल 2002 के गुजरात दंगों के बाद दिसंबर, 2002 में हुए गुजरात विधानसभा के चुनाव याद आ रहे हैं. उस चुनाव के दौरान मोदी के भाषण और चुनावी रैलियों की भी याद आ रही है. साल 2002 के बाद हर चुनाव के समय में संवाददाता, पत्रकार और रिसर्चर ये सवाल पूछते आए हैं कि क्या गुजरात के मुसलमान 2002 के दंगों से उबर पाए हैं? मेरे खयाल से यह सवाल न केवल गुजरात के मुसलमानों के लिए बल्कि देश भर के मुसलमानों के लिए है. बीते पाँच साल के दौरान, भारत के मुसलमानों ने भी इस सवाल की आँच को महसूस किया है. ये सवाल फिर से साल 2002 में ले जाता है और यह सवाल बार-बार पूछा जाना चाहिए. क्योंकि इस हादसे को भूल जाना और फिर बीजेपी को माफ कर देना खुद को धोखा देने के समान है. ठीक उसी तरह, जिस तरह गुजराती मुसलमान 1969, 1985 और 1992 के दंगों को भुला चुके हैं और संभवतः कांग्रेस को माफ कर चुके हैं. 
28 फरवरी, 2002 की दोपहर करीब 12 बजे ऐसा लग रहा था जैसे चारों तरफ खून की होली खेली जा रही है. नंगी तलवारें और भगवा गमछा लपेटे लोग अहमदाबाद सिटी के दानिलिम्बदा में स्थित सोसायटी की ओर दौड़कर आते हैं. सोसायटी के सामने खुले मैदान के उस पार कुछ अनुसूचित और पिछड़ी जातियों की सोसायटी मौजूद थी. देखते-देखते सामने युद्ध का मैदान बन चुका था. ये साफ दिख रहा था कि नजदीक की झोपड़ियों के मुस्लिम युवा दंगा करने वालों से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. बचाने की कोशिश करने वालों में घरों में काम करने वाली अनुसूचित जाति की महिलाएं भी शामिल थीं. वास्तव में यह घटना दिल दहला देने वाला था. सुरक्षा के लिए भागकर मुसलमानों के एक इलाके में शरण लेनी पड़ी.

राज्य में स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी. हर दिन बलात्कार, लूट और हत्या की खबरें आ रही थीं. पड़ोस के दस लोग, इलाके से निकलने के दौरान मारे गए थे. दो लोगों को जिंदा जला दिया गया. हालांकि अपने-अपने इलाकों से बाहर निकलना बेहद डराने वाला था. बीते सालों में गुजरात के मुसलमानों को काफी कुछ सहना पड़ा है. क्या मुसलमान तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को भूल जाएं? कांग्रेस का अतीत भी बीजेपी जितना ही दागदार है. लेकिन, मोदी ने जिस तरह से गाँव, कस्बों और शहरों में जा जाकर लोगों के बीच नफरत फैलाने के लिए, ‘हम पाँच, हमारे पच्चीस’ और ‘मियां मुशर्रफ’ जैसे नारों का इस्तेमाल किया है, उसे मुसलमान कभी नहीं भूल पाएंगे.

राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें लोगों के बीच अमन, भाईचारा और एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए थी. लेकिन, उन्होंने लोगों के बीच नफरत फैलाकर समाज को बांटने का काम किया. उनकी पहचान उनकी नफरत की राजनीति बन गयी थी.यही वजह है कि उस दंगों के असर को भूल जाना मुसलमानों के लिए मुमकिन नहीं है. सांप्रदायिक आधार पर राज्य और देश को बांटने के लिए मोदी और बीजेपी को शायद कोई नहीं माफ कर सकता है. दूसरी सबसे अहम बात यह है कि जिस तरह से मोदी को 2002 के दंगों के लिए जिम्मेदार है तो उसी प्रकार से कांग्रेस को भी 1969, 1985, 1989 और 1992 के अहमदाबाद दंगों के लिए जिम्मेदार है. कांग्रेस ने भी इन दंगों के आधार पर लोगों के बीच नफरत फैलाने को अपनी राजनीति का हिस्सा बना लिया था. 
इन दंगों से गुजरात के मुसलमान आर्थिक तौर पर प्रभावित तो हुए ही थे, उनकी सामाजिक जिंदगी पर भी बड़ा असर पड़ा था. दंगों के बाद मुसलमानों के अपने कमतर होने और देश के दोयम दर्जे के नागरिक होने का एहसास होने लगा था. इन मनोभावों से उबरने में मुसलमानों को कई साल लगे. मुसलमानों को ये भी महसूस हुआ कि ना तो कांग्रेस और ना ही बीजेपी, उन्हें फिर से खड़ा होने में मदद करेगी. उन्हें ये भी लगा कि कांग्रेस ऐसा वातावरण बना रही है जिस पर मुसलमान केवल उनपर निर्भर हो जाएं. मुसलमानों को कहा गया उन्हें सबकुछ मिलेगा, लेकिन अपना हक मांगने का अवसर नहीं मिलेगा. मुस्लिम विद्वानों, धार्मिक नेताओं और मुस्लिम नेताओं को इफ्तार और ईद के जलसे में जरूर बुलाया जाता रहा, लेकिन समुदाय का उत्साह बढ़ाने, उन्हें प्रेरित करने और उनकी मदद करने के नाम पर कुछ नहीं हुआ.

2011 की जनगणना के मुताबिक गुजरात की कुल आबादी में मुसलमान 7.1 प्रतिशत हैं. यह समुदाय आर्थिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्यगत ढांचा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे तमाम मसलों पर न केवल पिछड़ा है, बल्कि गैर-मुस्लिम समुदायों पर निर्भर है. 90 के दशक से ही 182 सदस्यीय गुजरात विधानसभा में महज एक-दो मुस्लिम विधायक रहे हैं. मुस्लिम इलाकों में आज भी गिनती के स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, अस्पताल और सामुदायिक भवन हैं. 2002 के दंगों के बाद पूरा समुदाय इस तरह से लाचार हुआ कि वह ना तो अपने बच्चों को शिक्षित बना पाया ना ही उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिलीं और ना ही जीवन यापन के लिए जरूरी पैसा कमा पाए. यह आज भी जाहिर होता है. इतना ही नहीं, इस समुदाय को सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ा. लोग मुसलमानों से मिलने-जुलने और बात करने तक से कतराते थे. मुसलमानों को अपना राजनीतिक नेतृत्व तैयार करना चाहिए, क्योंकि कांग्रेस ने लंबे समय तक मुस्लिम मतदाताओं को अहमियत नहीं दी. कांग्रेस की नरम हिंदुत्व की राजनीति में मुसलमानों के लिए जगह नहीं है. ना ही कांग्रेस के पास मुसलमानों के लिए कोई विजन है जिससे मुस्लिम समाज की शैक्षणिक, आर्थिक और स्वास्थ्यगत हालात में सुधार आए. यही हाल बीजेपी का है.

मुसलमानों के लिए जैसे कांग्रेस खतरनाक है वैसे ही बीजेपी भी मुसलमानों के लिए खतरानाक है. मुसलमानों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि मुसलमानों में नेतृत्व नहीं है. मुसलमानों में नेतृत्व निर्माण करने के लिए बामसेफ ने राष्ट्रीय मुस्लिम मोर्चा नामक संगठन बनाकर बड़े पैमाने पर मुहिम चला रहा है. राष्ट्रीय मुस्लिम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हजरत मौलाना अब्दुल हमीद अजरी पूरे देश के मुसलमानों से आवाहन कर रहे हैं कि कांग्रेस और बीजेपी के तांडव से अगर बचना है तो मुसलमानों को एससी, एसटी और ओबीसी को साथ लेकर जालिमों के साथ संघर्ष करना होगा. जिस दिन मूलनिवासी बहुजन समाज एक मंच पर आ गये उसी दिन से कांग्रेस और बीजेपी की उलटी गिनती शुरू हो जायेगी और देश से ब्राह्मणवाद भी खत्म हो जायेगा. 

दरार गहरी करने की राजनीति

दरार गहरी करने की राजनीति
नफरत और घृणा से भरा भाजपा का चुनावी अभियान


मेनका गाँधी का भगवा खेमे में होना एक संयोग है. 1989 से पहले जनता दल, फिर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पीलीभीत से और एकबार आंवला से जीतकर संसद पहुँचीं. 2004 में वे भाजपा में शामिल हो गईं. वहीं 2009 में उनके बेटे वरुण गाँधी पीलीभीत से चुनाव लड़े और जीत गये. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान अल्पसंख्यकों को अपशब्द कहना और उनकी आलोचना करना जैसे भाजपा का मुख्य एजेंडा बन गया है. यही कारण है कि 2009 में 29 वर्ष के वरुण गाँधी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र के मुस्लिमों को धमकी दी कि अगर वे हिंदूओं की ओर उंगली भी उठाएंगे, तो वे उनके हाथ काट देंगे. दूसरी तरफ उनकी माँ मेनका गाँधी ने पार्टी के एजेंडे पर चलते हुए अपने निर्वाचन क्षेत्र के मुसलमानों को कहा है कि अगर वे उन्हें वोट नहीं देते तो उन्हें उनसे मदद की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. 
खबरों के मुताबिक उन्होंने कहा था, मैं यह चुनाव पहले ही जीत चुकी हूँ, इसलिए फैसला आपको करना है. यही नहीं उन्नाव में मुस्लिमों के उग्र विरोधी साक्षी महाराज, जिनपर अतीत में हत्या और बलात्कार का आरोप लगा है, उन्होंने कहा कि अगर वे उन्हें वोट नहीं देंगे, तो उन्हें इसका पाप लगेगा. चुनाव वह समय होता है, जब उम्मीदवार लोगों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ता और मतदाताओं से हर तरह के वादे करता है. 
राजकुमार (दैनिक ​मूलनिवासी नायक)

चुनावों में खुलेआम सांप्रदायिक भाषण देने वाले नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपना स्वर बदलते हुए मुख्य तौर पर भ्रष्टाचार और रोजी-रोटी के मसलों, आर्थिक विकास और रोजगार आदि के बारे बात की थी. उन्हें एक नये विकल्प की तलाश थी. परन्तु इस बार मोदी और उनकी पार्टी के पास आर्थिक विकास के मोर्चे पर दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है और उनकी सरकार क्रोनी-कैपिटलिज्म के आरोपों से घिरी है. इसलिए मोदी और उनकी पार्टी अपने सुर बदलते हुए मतदाताओं को उनका समर्थन करने के लिए धमका और डरा रहे हैं.

मतदाताओं को खासकर हिंदुओं में डर भरने के लिए शत्रुओं, वास्तविक या काल्पनिक, देश के भीतर के या बाहर खड़ा किया जा रहा है. इस बारे में कोई बात नहीं की जा रही है कि अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा सरकार द्वारा क्या किया जाएगा. इसकी जगह पार्टी खुलेआम यह कह रही है कि पार्टी हर तरह के दुश्मनों तथाकथित बाहरियों से लेकर विरोधियों तक के खिलाफ कठोर नीतियाँ अपनाएगी. राजनाथ सिंह, जो मोदी और अमित शाह जैसे कट्टरपंथियों की तुलना में ज्यादा संतुलित माने जाते हैं. उन्होंने ऐलान किया है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में वापस आती है, तो वह राजद्रोह कानून को इतना सख्त बनाएगी कि ‘उनकी रूह काँप जाएगी’. यहाँ उनके या वे से मतलब हर तरह के ‘देशद्रोहियों’ से है. इसके भीतर वे सब आ सकते हैं, जो कठिन सवाल पूछते हैं या सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करते हैं.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यह खुलकर कहा है कि अगर उनकी पार्टी जीतती है, तो ‘बौद्ध, हिंदू और सिख’ के अलावा हर घुसपैठिए को देश से निकाल बाहर किया जाएगा. इसका अर्थ यह निकलता है कि किसी मुस्लिम शरणार्थी को देश में घुसने नहीं दिया जाएगा. लेकिन यह उनके बयान की उदार व्याख्या होगी. इसका असली अर्थ स्पष्ट है कि मुसलमानों और ईसाइयों को यह पता होना चाहिए कि वे तब तक संदेह के घेरे में आएंगे, जब तक वे खुद को इसके विपरीत साबित न कर दें. और अगर उन्हें भारत में रहने की इजाजत दे भी दी जाती है, तो इसके लिए उन्हें काफी कुछ सहना होगा. यह विचार मुसलमानों और ईसाइयों को भारत का मूलनिवासी नहीं मानता और उन्हें किसी बाहरी शक्ति के प्रति वफादार मानता है. यह भाजपा और संघ परिवार का पुराना बुनियादी सिद्धांत रहा है, लेकिन अब इसकी घोषणा खुले तौर पर की जा रही है.

नागरिकता (संशोधन) विधेयक ने उत्तर-पूर्व में तूफान खड़ा कर दिया है, लेकिन इससे तौबा करने की जगह, भले चुनाव के दौरान ऐसा रणनीतिक तौर पर ही किया जाता, भाजपा ने उन सबको चुन-चुनकर देश से बाहर निकालने की अपनी योजना को आगे बढ़ाने का ही काम किया है, जिन्हें वह विदेशी मानती है. यह सोचना कि इससे हिंदू वोटों को लामबंद करने में मदद मिल सकती है, इस आक्रामकता की अधूरी व्याख्या होगी. भाजपा पूरी शिद्दत के साथ इस बात में यकीन करती है कि हिंदू ही भारत के एकमात्र असली वारिस और नागरिक हैं और बाकी किसी न किसी तरह से भारत में अनाधिकार प्रवेश करने वाले हैं. पार्टी के भीतर कुछ लोग यह भी मानते हैं कि मोदी सरकार ने कुछ ज्यादा ही देर कर दी और उन्हें इस विधेयक को शुरू में ही लाना चाहिए था, जब इसे कहीं ज्यादा समर्थन और प्रेम हासिल था. ऐसा होता, तो अब तक यह पारित भी हो चुका होता.

भाजपा ने पिछले दिनों चुनाव के लिए जिन भी रणनीतियों को आजमाया, उनमें से कई लोगों के बीच उम्मीद के मुताबिक लोकप्रिय नहीं हो सके. पुलवामा और बालाकोट के सहारे राष्ट्रवाद का उफान लाने की कोशिश पर तुरंत पानी फिर गया. राज्य स्तरीय गठबंधन भाजपा के सामने असली चुनौती पेश कर रहे हैं. अब भाजपा अपने आजमाए हुए हथकंडों में मुसलमानों को अलग-थलग करके हिंदू ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही है. परन्तु क्या यह संकटों का सामना कर रहे किसानों, मुसीबत झेल रहे छोटे कारोबारियों और बेरोजगार स्नातकों को दिलासा दे पाने के लिए काफी हो पाएगा? यह देखने की बात है. पार्टी द्वारा उठाए जानेवाले मुद्दे अब थके हुए और मुरझाए से लगने लगे हैं और उनमें कुछ भी नयापन नहीं है. लेकिन खुली धमकियां निश्चित तौर पर एक अब तक अनदेखी-अनसुनी थीं. अतीत में राजनेताओं ने कभी भी इतने प्रत्यक्ष तौर पर अपने नागरिकों को चेतावनी नहीं दी थी. काल्पनिक दानव खड़ा करना एक आजमाई हुई राजनीतिक रणनीति है और यह अक्सर कामयाब भी होती है. मगर भाजपा की मौजूदा रणनीति, जो हिटलर द्वारा यहूदियों, स्तंभकारों और जर्मनी की बहुसंख्यकवादी लोकशाही के लिए अन्य आंतरिक चुनौतियों के सतत दमन की याद दिलाती है, हमारे राजनीतिक शब्दकोश में शामिल हुई एक डरावनी चीज है.

इससे समाज का एक बड़ा तबका अलग-थलग होगा और इसकी आखिरी नतीजा चाहे जो कुछ भी हो, यह देश के नागरिकों के बीच धर्म के आधार पर एक गहरी दरार पैदा कर दिया है. जो मुसलमानों और अन्यों को संदेह की निगाहों से भारत में बाहरी के तौर पर और देश के प्रति शत्रुता भाव रखने वाले के तौर पर देखा जाएगा. यह संदेह कई रूपों में खुद को प्रकट करेगा, कभी हिंसक तरीके से तो कभी निगरानी के तौर पर.भाजपा ने भारतीय नागरिकों के प्रति जिस नफरत को भड़काया है, वह जल्दी समाप्त नहीं होगी. इस चुनाव को जीतने के लिए भाजपा ने एक ऐसा दानव छोड़ दिया है, जो हमारे बीच लंबे समय तक रहने वाला है. ऐसे में बीजेपी को हटाना जनता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन गयी है.

प्राथमिकता से दूर राजस्थान के आदिवासी

प्राथमिकता से दूर राजस्थान के आदिवासी

राजकुमार (दैनिक ​मूलनिवासी नायक)

खाट पर पड़े ढेरों फटे कपड़े, कुछ बर्तन, बुझा चूल्हा, पीपे में थोड़े से सूखे आटे के साथ रखी कुछ रोटी और लोहे के संदूक के अलावा इस खपरैल ओढे ‘घर’ में भूखमरी, गरीबी, बीमारी के अलावा कुछ भी नहीं है. ब्राह्मणवादी व्यवस्था के शिकार इन भील आदिवासियों को अपने अस्तित्व की लड़ाई ख़ुद ही लड़नी पड़ रही है.

राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर और प्रतापगढ़ जनजाति बहुल जिले हैं. जबकि, चित्तौड़गढ़, पाली, सिरोही और राजसमंद जिलों की कुछ तहसीलें जनजाति क्षेत्र में आती हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार, इन आठ जिलों में 5696 गाँव हैं और इन गाँवों में रहने वाली जनसंख्या की 70.42 प्रतिशत आबादी आदिवासी या जनजाति हैं. वहीं पूरे राजस्थान की आबादी की 13.48 प्रतिशत जनसंख्या जनजाति समुदायों से आती है. लोकसभा चुनावों के मद्देनजर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ की भदेसर तहसील के कई गाँव में आदिवासी भीलों की सामाजिक, आर्थिक और सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुँच के बारे में पता लगाने से जो बात सामने आयी वो सरकारों की ओर से किए जा रहे विकास के तमाम दावों के उलट और हैरान करने वाली है. 

यहाँ भील समुदाय के लोग भयंकर मुफलिसी के शिकार हैं. ऊँची जाति (ब्राह्मण एवं तत्सम जाति) के लोग भीलों से सिर्फ शराब या बहुत कम पैसों में खेती का काम कराते हैं. गरीबी की वजह से बीमारी इतनी है कि भदेसर में पाए जाने वाले टीबी के मरीजों में 90 प्रतिशत से ज्यादा भील समुदाय से आते हैं. उज्ज्वला जैसी सरकारी योजना इन गाँवों में पहुँची तो हैं लेकिन, ये लोग एक साल से भी ज्यादा वक्त से सिलेंडर रिफिल नहीं करा पाए हैं क्योंकि, इनके पास सिलेंडर भराने के लिए पैसे नहीं हैं.

भदेसर तहसील में करीब 162 गाँव आते हैं और इनमें से 77 गाँव भील जनजाति बहुल हैं. 2011 जनगणना के अनुसार, भदेसर तहसील की जनसंख्या 1.24 लाख है. इसमें से 62 हजार से ज्यादा की आबादी अनपढ़ है और 53 हजार लोग नॉन वर्कर हैं. भारत सरकार ने राजस्थान को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया है लेकिन, भदेसर तहसील की सुखवाड़ा ग्राम पंचायत के गणपतखेड़ा गाँव के लोग आज भी खुले में शौच के लिए जाते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि सरपंच ने हमसे यह कहकर शौचालय बनवा लिए कि बाद में सबको शौचालय का पैसा दे दिया जाएगा. गरीब ग्रामीणों ने जैसे-तैसे शौचालय बनाए लेकिन, आज तक किसी को एक रुपया भी नहीं मिला.

भदेसर तहसील में कुल 162 गाँव हैं और इनमें से करीब 77 गाँव में भील बहुतायत में रहते हैं. जिन गाँव में भील ज्यादा संख्या में नहीं हैं वहाँ ये लोग गाँव से बाहर किसी ढाणी में रहते हैं. गरीबी, नशाखोरी और पोषित खाना नहीं मिलने के कारण यहाँ टीबी की बीमारी सबसे आम है. आँकड़ों के अनुसार 2017 में भदेसर में 237, 2018 में 168 और 10 मार्च 2019 तक 38 मरीज टीबी के आ चुके हैं. 10 मार्च तक के आँकड़ों के मुताबिक ही निक्षय योजना के तहत टीबी के इलाज के लिए मिलने वाले 500 रुपये प्रति महीने की राशि अब तक 173 मरीजों को दी गई है और 143 मरीज अभी पेंडिंग हैं.

बता दें कि टीबी का इलाज लगातार छह महीने तक चलता है लेकिन अशिक्षा, अंधविश्वास के कारण भील जनजाति के कई लोग यह इलाज पूरा नहीं लेते और मौत के मुँह में समा जाते हैं. इस क्षेत्र के आसपास जिला मुख्यालय चित्तौड़गढ़ में ही सरकारी कॉलेज हैं जो कि हट्टीपुरा से करीब 30 किमी दूर है. गरीब आदिवासियों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे चित्तौड़गढ़ रहकर या रोजाना वहाँ जाकर तालीम हासिल कर सकें. 

आदिवासियों के इन हालातों पर एक नजर दौड़ाएं तो पता चलेगा कि बीजेपी की उज्ज्वला, स्वच्छ भारत योजनाएं सिर्फ दिखाने के लिए हैं. इन योजनाओं की धरातल पर बुरी हालत है. पिछली सरकार ने जो कुछ काम आदिवासी और घूमंतु समुदाय के लिए शुरू भी की थीं तो बीजेपी सरकार ने बंद कर दी है. अब इन लोगों की समस्याओं पर ध्यान देना बंद कर दिया गया है. इन इलाकों में टीबी की समस्या सहित अन्य मामलों में आदिवासियों की सबसे ज्यादा बुरी हालत हो गयी है. देश में एक बार फिर से चुनाव हैं बल्कि, राजस्थान करीब चार महीने में ही दूसरा बड़ा चुनाव देख रहा है. लेकिन, चित्तौड़गढ़ के आदिवासी भील आज भी समाज की मुख्यधारा से सैकड़ों साल दूर हैं.

बुधवार, 1 मई 2019

नीदरलैंड में अपराधियों के लिए तरस रहे जेल

संकट में जेल
नीदरलैंड में अपराधियों के लिए तरस रहे जेल
नीदरलैंड में बंद हो रहीं जेल और भारत मे सरकारी स्कूल


राजकुमार (दैनिक ​मूलनिवासी नायक)

जहाँ एक ओर दुनिया के कई देशों में अपराध तेजी से बढ़ रहा है तो वहीं एक देश में जेल बंद होने के कगार पर है. जी हाँ यह सच है एक यूरोपीय देश नीदरलैण्ड दुनिया का ऐसा देश है जहाँ एक भी कैदी नहीं है. यहाँ की जेलें अपराधियों के लिए तरस रही हैं. जेलों में काम कर रहे कर्मचारियों की नौकरी बचाने के लिए दूसरे देशों से अपराधी लाये जा रहे हैं. सरकार का फैसला है कि जेल के सभी कर्मचारियों को दूसरे जगह शिफ्ट करके सभी जेलों को बंद कर दिया जायेगा.

गौरतलब है कि हर देश में क्राइम तेजी से बढ़ता जा रहा है. कई देशों में तो क्राइम इस हद तक बढ़ गया है कि अपराधी ज्यादा होने से जेल में जगह नहीं है. अगर भारत की बात करें तो इस मामले में भारत नंबर वन देश है जहाँ 100 की क्षमता वाले जेलों में 2500 से 3000 तक कैदियों को रखा जाता है. लेकिन, यूरोप का नीदरलैंड एक देश ऐसा है जहाँ एक भी कैदी नहीं है. जेल को बंद करने का फैसला लिया गया है. जेल बंद होने से कई लोगों को झटका भी लगा है. क्योंकि जेल में करीब 2 हजार लोग काम करते हैं. फिलहाल नीदरलैंड सरकार ने फैसला लिया है कि जब तक जेल में काम कर रहे कर्मचार्रियों को दूसरी जगह शिफ्ट नहीं कर दिया जाता है तब तक जेलों को बंद नहीं किया जायेगा. इसलिए जेलों में कार्यरत कर्मचारियों की फिलहाल नौकरी बचाने के लिए नीदरलैंड सरकार दूसरे देशों से अपराधी लाकर अपने जेलों में बंद कर रही है. वहाँ की सरकार का फरमान है कि जल्द से जल्द जेल में कार्यरत कर्मचारियों को दूसरे जगह शिफ्ट करने के तुरंत बाद ही जेलों को बंद कर दिया जायेगा. 


बता दें कि दुनिया भर के देशों की जेलों में गुंडे और अपराधी सालों जेल की सजा काट रहे हैं, लेकिन वेस्टर्न यूरोप के देश नीदरलैंड में घटते क्राइम की दर शून्य हो गयी है. नीदरलैंड की कुल आबादी जहाँ 1 करोड़ 71 लाख 32 हजार से ज्यादा है. वहीं सलाखों के पीछे डालने के लिए कोई अपराधी ही नहीं है. खबर के अनुसार वर्ष 2013 तक वहांँ की जेलों में केवल 19 कैदी ही रह गये थे जो वर्ष 2019 आते-आते वहांँ कैदियों की संख्या शून्य हो गई. इसलिए जेलों को बंद किया जा रहा है. जेलों के कर्मचारियों की नौकरी बचाने के लिए दूसरे देशों के कैदियों को आयात किया जा रहा है. 

नीदरलैंड जहाँ लगातार शांति और सुरक्षा की ओर बढ़ता जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर भारत में जेलों की बड़ी संख्या होने पर भी उनमें क्षमता से अधिक अपराधी भरे हुए हैं. इसके बाद भी न तो अपराध कम हो पा रहे हैं और न ही अपराधी, दोनों ही बढ़ते जा रहे हैं. इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जहाँ नीदरलैंड में जेल बंद हो रहे हैं तो वहीं भारत में सरकारी स्कूल बंद होने के कगार पर हैं. क्या भारत में सरकारी स्कूलों के बंद करने से अपराध और अपराधी में कही होगी? निश्चित तौर से इसका जवाब है नहीं, परन्तु भारत में लाखों सरकारी स्कूल बंद होने के कगार पर आ चुके हैं.

ईवीएम पर रार

ईवीएम पर रार


राजकुमार (दैनिक मूलनिवासी नायक)

ईवीएम पर रार अभी जारी है और लगता है कि जब तक भारत में ईवीएम से चुनाव होता रहेगा तब तक यह रार भी जारी रहेगा. हालांकि ईवीएम पर रार पहली बार रही हो रहा है, बल्कि इसके पहले कई बार रार हो चुका है और निरंतर जारी है. केवल एक बार चुनाव आयोग को ईवीएम के बजाए बैलेट पेपर से चुनाव कराकर ईवीएम पर रार करने वाले लोगों के जुबान पर ताला लगा देना चाहिए. इससे चुनाव आयोग भी उन आरोपों से बच जायेगा जो लगातार उसके ऊपर ईवीएम घोटाले में शामिल होने का आरोप लगा रहा है. मगर, न जाने क्यों चुनाव आयोग राजी नहीं हो रहा है? जबकि दुनिया का सिद्धांत है कि जिसे चोर कहा जाता है भले ही वह चोरी किया है या नहीं, फिर भी वह एक बार अपने आपको यह साबित करने का प्रयास करता है कि वह चोर नहीं है. यहाँ तो चुनाव आयोग मान ही नहीं रहा है. चुनाव आयोग खुद अपने ऊपर लगे आरोप को गलत साबित करने के लिए आज तक प्रयास नहीं किया. वैसे भी आयोग जानता है कि प्रयास करने के बाद भी जो नतीजें आयेंगे वह भी वही साबित करेंगे की आयोग ही चोर है. शायद इसलिए ही आयोग खुद के ऊपर लगे आरोप को गलत साबित करने के लिए प्रयास नहीं कर रहा है. हालांकि चुनाव आयोग को आज नहीं तो कल साबित करना ही होगा कि चुनाव आयोग ही चोर है. क्योंकि, वामन मेश्राम नाम का व्यक्ति ऐसा करके ही दम लेने वाला है.
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असल बात यह है कि हरि प्रसाद ने साल 2010 में साबित कर दिया है कि ईवीएम में घोटाला होता है और जैसे कांग्रेस 2004 और 2009 का चुनाव जीती थी उसी प्रकार से बीजेपी भी ईवीएम में घोटाला करके सरकार बनायी है. बता दें कि हरि प्रसाद तब सुर्खियों में आए जब उनपर कथित तौर पर ईवीएम से छेड़छाड़ करने और ईवीएम चुराने के आरोप लगे. हरि प्रसाद 2009 से ईवीएम के मुद्दों पर सक्रिय हैं. 
चुनाव आयोग ने सितंबर, 2009 में अपने सामने उन्हें ईवीएम हैक करने के लिए आमंत्रित किया था. मगर, चुनाव आयोग ने हरि प्रसाद की टीम को अपना काम पूरा करने से पहले ही रोक दिया. इसके बाद चुनाव आयोग ने कहा कि उनकी टीम ईवीएम हैक नहीं कर पायी. हरि प्रसाद का कहना था कि आयोग ने उन्हें काम पूरा नहीं करने दिया. उन्होंने इस पूरी घटना का वीडियो रिकॉर्डिंग जारी कराने की भी अपील की थी. उस वक्त वी.वी राव कहे थे कि हमारे काम में बाधा डालने के लिए, भारत का चुनाव आयोग खोखली दलील लेकर आया है कि ईवीएम खोलने से ईसीआईएल के पेटेंट का उल्लंघन होगा.

साल 2010 में महाराष्ट्र से ईवीएम चुराने के आरोप में हरि प्रसाद को गिरफ्तार किया गया था. हरि प्रसाद 29 अप्रैल 2010 को एक तेलुगू चैनल पर लाइव ये दिखा रहे थे कि कैसे एक ईवीएम को हैक किया जा सकता है. जिस ईवीएम पर हरि प्रसाद ये डेमो दिखा रहे थे उसका इस्तेमाल महाराष्ट्र चुनाव में किया गया था. 12 मई, 2010 को महाराष्ट्र के राज्य चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र पुलिस से इसकी शिकायत की जिसके बाद उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. 

कुछ अन्य विदेशी विशेषज्ञों ने हरि प्रसाद के साथ काम किया है. हालांकि, हरि प्रसाद को 2010 में इसी मुद्दे पर सैन फ्रांसिस्को की संस्था इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन ने उन्हें पायनियर पुरस्कार से सम्मानित किया. मिशिगन विश्वविद्यालय के तीन प्रतिनिधियों, हरिप्रसाद सहित नेट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के चार प्रतिनिधियों और नीदरलैंड के एक प्रतिनिधि को ये पुरस्कार दिया गया. 2010 में उन्होंने अमरीका में आयोजित कम्प्यूटिंग मशीनरी सम्मेलन के 17वें एसोसिएशन में भारत के इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के सुरक्षा विश्लेषण पर एक पेपर प्रकाशित किया था. हरिप्रसाद ने अपने लिंक्डइन अकाउंट पर ईवीएम के मुद्दे पर अपना बचाव किया. उन्होंने लिखा, मैंने सुरक्षा के लिहाज़ से ईवीएम का पहला स्वतंत्र ऑडिट किया है. मुझे इसके लिए जेल भेजा गया, मेरे खिलाफ जाँच की गई. मैंने ये सब कुछ अकेले सह लिया ताकि जो लोग इसमें मेरे साथ थे वे बच सकें. उन्होंने यह भी लिखा था कि ईवीएम के मुद्दे पर एक साल तक चुनाव आयोग के सामने गुहार लगाने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला है.

इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि 2010 में भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा प्रवक्ता और चुनावी मामलों के विशेषज्ञ जीवीएल नरसिम्हा राव ने एक किताब लिखी- ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट ऑर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन?’ इस किताब की प्रस्तावना लाल कृष्ण आडवाणी ने लिखी और इसमें आंध्र प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री एन चंद्राबाबू नायडू का संदेश भी प्रकाशित है. इतना ही नहीं पुस्तक में वोटिंग सिस्टम के एक्सपर्ट स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड डिल ने भी बताया है कि ईवीएम का इस्तेमाल पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है. भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने किताब की शुरुआत में लिखा है- मशीनों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है, भारत में इस्तेमाल होने वाली इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन इसका अपवाद नहीं है. ऐसे कई उदाहरण हैं जब एक उम्मीदवार को दिया वोट दूसरे उम्मीदवार को मिल गया है या फिर उम्मीदवारों को वो मत भी मिले हैं जो कभी डाले ही नहीं गए.

किताब का चौथा अध्याय ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा है. लेकिन अब मौजूदा विवाद के बाद इस मुद्दे पर जीवीएल नरसिम्हा राव चिड़ीचुप है. जीवीएल नरसिम्हाराव ने अपनी किताब में 2010 के ही उस मामले का जिक्र विस्तार से किया है. जिसमें, हैदराबाद के टेक एक्सपर्ट हरि प्रसाद ने मिशिगन यूनिवर्सिटी के दो रिसर्चरों के साथ मिलकर ईवीएम को हैक करने का दावा किया था. इसके बाद न तो इस मुद्दे पर बीजेपी नेता कोई आवाज उठा रहे हैं और न ही चुनाव आयोग कुछ बोल रहा है. इसका मतलब साफ है कि चुनाव आयोग चाहता है कि ईवीएम पर रार चलती रहे, ताकि इसीक आड़ में बीजेपी को सत्ता सौंपी जा सके.