बुधवार, 25 सितंबर 2019

24 सितंबर की तीन प्रमुख घटनाएं


1.कुळवाडी भूषण बहुजन प्रतिपालक छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपना दूसरा राज्याभिषेक आज से 345 साल पहले 24सितंबर1674 को शाक्त पंथ की रीति से करवाया था जिसका पौरोहित्य निश्चलपुरी गोसावी ने किया था। शाक्त पंथ बौद्ध धम्म की ही एक शाखा तंत्रयान से निकला हुआ एक पंथ है।

2.राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले ने व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन को संगठित रूप से आगे बढ़ाने हेतु आज से 146 साल पहले 24सितंबर1873 को ‘सत्य शोधक समाज’ की नींव रखी। उन दिनों समाज सुधार का दावा करने वाले कई संगठन काम कर रहे थे। जैसे, ‘ब्रह्म समाज’ (राजा राममोहन राय : 20अगस्त1928), ‘प्रार्थना समाज’ (केशवचंद सेन : 31मार्च 1867), पुणे सार्वजनिक सभा (महादेव गोविंद रानाडे : 02अप्रैल 1870) आदि प्रमुख थे। लेकिन वे सभी द्विजों द्वारा, द्विजों की हित सिद्धि के लिए बनाए गए थे, उनकी कल्पना में पूरा भारतीय समाज नहीं था। वे चाहते थे कि समाज में जाति रहे, लेकिन उसका चेहरा उतना क्रूर और अमानवीय न हो। इसी क्रम में आर्य समाज (स्वामी दयानंद सरस्वती : 10अप्रैल1875) का नाम भी आता है, जो वेदों की ओर लौटने का बात कर रहा था।

3.बाबासाहब डॉ0अम्बेडकर और मि0 एम. के. गांधी के मध्य आज से 87 साल पहले 24सितंबर 1932 को पूना पैक्ट हुआ था। बाबासाहेब ने इस पैक्ट पर अत्यधिक मजबूरी एवं भारी दबाव में बड़े ही दु:खी मन से सायं 05 बजे दस्तखत किये थे और हस्ताक्षर करते समय उन्होंने कहा था कि "मि0 गांधी मैं युद्ध हारा हूँ, हिम्मत नहीं।" इसके बाद उन्होंने Separate settlement & 30% sc/st compulsory vote for winner candidate to reserve seats के दांव चले, दुर्भाग्यवश वे दांव सफल नहीं हो पाये। हाँ, वे पूना पैक्ट का आजीवन धिक्कार अवश्य करते रहे, इससे उनके कथन की पुष्टि होती है। यदि उस समय आरक्षण के जनक कोल्हापुर नरेश लोकराजा राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज (26जून1874 -06मई 1922) जीवित होते तो यह समझौता कदापि नहीं होता, चाहें मि0 गांधी व उनके पैरोकार मर भले ही जाते।

इस प्रकार बाबासाहब से पूना पैक्ट पर दस्तखत करवाकर शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक एवं महात्मा फुले के सत्यशोधक समाज की स्थापना से मूलनिवासियों को मिलती खुशी और प्रेरणा को मि0 गांधी ने मातम में बदलकर ग्रहण लगा दिया।

24 सितंबर 1932 : पूना पैक्ट



आज से ठीक 87 साल पहले आज के ही दिन 24 सितंबर 1932 को मि0 एम.के. गांधी और बाबा साहेब डॉ0अम्बेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ था। बाबासाहेब ने इस समझौते पर अत्यधिक मजबूरी एवं भारी दबाव में दस्तखत किये थे क्योंकि इससे आजतक एससी- एसटी को गुलाम बनाया जा रहा है। हाँ, यह बात अलग है कि उस समय आरक्षण के जनक कोल्हापुर नरेश लोकराजा राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज (26जून 1874 -06मई 1922) यदि जीवित होते तो यह समझौता कदापि नहीं होता, चाहें मि0 गांधी व उनके पैरोकार मर भले ही जाते।
1. Separate Electorates अर्थात पृथक निर्वाचन क्षेत्र।
2. Dual Voting अर्थात दोहरा मत, अपने ही वर्ग के व्यक्ति को प्रतिनिधि के रूप में चुनने का अधिकार।
3. Adult Franchise अर्थात वयस्क मताधिकार।
4. Adequate Representation अर्थात प्रांत एवं केन्द्र के विधान-मंडलों में जनसंख्या के अनुपात में पर्याप्त प्रतिनिधित्व।

उपरोक्त चार अधिकार द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (07 सितंबर1931-01दिसंबर 1931), लंदन में बाबासाहब के अथक प्रयासों के फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने अछूतों (अनुसूचित जाति) के लिए 17 अगस्त1932 को स्वीकार किये थे जिसे COMMUNAL AWARD (साम्प्रदायिक पंचाट) कहा गया और उन अधिकारों में जिसमें पहला व दूसरा अधिकार केवल एससी के लिए, तीसरा भारत के समस्त वयस्कों के लिए तथा चौथे अधिकार में अन्य सामाजिक समूहों के लिए प्रतिनिधित्व देने की मंशा थी।
मि0 गांधी एण्ड कंपनी ने सिर्फ पहले अधिकार का विरोध किया और जब पहला अधिकार समाप्त हो गया तो दूसरा अधिकार स्वतः ही समाप्त हो गया। जेल में कैद मि0 गांधी ने आमरण अनशन करके तथा भयंकर दबाव द्वारा बाबासाहब अम्बेडकर को 24 सितंबर 1932 को यरवदा जेल, पूना में कम्यूनल अवार्ड के विरोध में मजबूर करके समझौता करने पर बाध्य किया। बाबा साहब और मि0 गांधी के बीच पूना में समझौता होने के कारण इसे POONA PACT (पूना समझौता) कहा गया। कम्युनल अवॉर्ड में केवल एससी के लिए पृथक निर्वाचन (Separate Electorates) का प्रावधान था किन्तु पूना पैक्ट से आये संयुक्त निर्वाचन (Joint Electorates) में अनुसूचित जन जातियों (एसटी) को भी शामिल कर लिया गया। हाँ, बाबासाहब इन सबके बावजूद पूना पैक्ट में प्राथमिक चुनाव प्रणाली बरकरार रखने में जरुर सफल रहे। वयस्क मताधिकार बाबा साहब ने भारत के समस्त वयस्कों के लिए स्वीकृत करवाया था जबकि मि0 गांधी इसके भी विरोध में थे। इस प्रकार एससी को मिली हुई वास्तविक आजादी केवल 38 दिन के लिए सिर्फ दिवास्वप्न बन रह गयी और वे फिर से गुलामी की खामोश जंजीरों में जकड़ लिए गये।

Dual Vote :- उदाहरण के लिए, वर्तमान में लोकसभा में 84 एससी के लिए तथा 47 एसटी के लिए, कुल 131निर्वाचन क्षेत्र एससी-एसटी के लिए सुरक्षित हैं तथा शेष 412 निर्वाचन क्षेत्र सभी धर्मावलम्बियों एवं जातियों के लिए हैं। इस प्रकार लोक सभा के कुल 543 निर्वाचन क्षेत्र हैं। यदि कम्युनल अवॉर्ड लागू रहता तो सुरक्षित स्थानों के लिए निर्वाचन हेतु पहले सम्पूर्ण भारत को 84 क्षेत्रों में विभक्त करके चुनाव करवाया जाता जिसमें सिर्फ एससी के लोग ही चुनाव लड़ते और एससी के लोग ही वोट भी करते, ऐसा एससी को दोहरे वोट का अधिकार मिला था। सुरक्षित स्थानों हेतु प्रत्याशी का चुनाव दो पड़ावों से होना था। पहले पड़ाव (सेमीफाइनल) में उम्मीदवार कौन होगा, यह पार्टी नहीं बल्कि प्रत्येक पार्टी द्वारा उतारे गए 04-04 उम्मीदवारों में से उसी पार्टी के सदस्यों/ डेलीगेट्स द्वारा पाए सिर्फ एससी के अधिकतम वोटों वाला ही प्रत्याशी बन पाता। इससे प्रत्याशी पर पार्टी का नाममात्र का दबाव रह जाता और दूसरे पड़ाव में प्रत्याशी का फाइनल चुनाव। उसके बाद दोबारा सम्पूर्ण भारत को 459 निर्वाचन क्षेत्रों में विभक्त कर चुनाव करवाये जाते जिसमें उस क्षेत्र के सभी जाति, धर्म और वर्ग के लोग चुनाव लड़ते और सभी जाति, धर्म और वर्ग के लोग वोट भी करते।

समझौता व उसकी वर्तमान स्थिति :- समझौते में पहले पड़ाव द्वारा उम्मीदवार चयन की व्यवस्था व संयुक्त निर्वाचन की व्यवस्था केवल अग्रिम 10 वर्षों के लिए मान तो ली गई और उसी व्यवस्था के तहत 1937 व 1945 में चुनाव भी हुए किन्तु व्यवहारिकता में उस पर बिल्कुल भी अमल नहीं किया गया। आगे चलकर संविधान सभा में बहुमत न होने के कारण एससी- एसटी के लिए पहले पड़ाव द्वारा उम्मीदवार चयन की व्यवस्था तो समाप्त ही हुई किन्तु इसके साथ ही पूर्व से लागू अन्य सामाजिक समूहों के लिए पृथक निर्वाचन की भी व्यवस्था समाप्त हो गई। कम्युनल अवॉर्ड की भरपाई के लिए बाबासाहब ने श्रम मंत्री के दौरान भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड वेवेल (01अक्टूबर 1943- 21फरवरी 1947) के समक्ष एससी-एसटी के लिए पृथक बस्ती (Separate settlement) का प्रस्ताव रखा, जिसे लॉर्ड वेवेल ने स्वीकार भी किया था और उन्होंने अॉल इंडिया रेडियो पर यह ऐलान भी किया था कि भारत के स्वतंत्र होने पर तीन समूहों (हिन्दू, मुस्लिम और एससी- एसटी) को हिस्सेदारी मिलेगी। भारत- पाकिस्तान का बंटवारा होने पर मुस्लिमों का तो मामला ही खत्म हो गया किन्तु लॉर्ड वेवेल के इंग्लैंड वापस चले जाने के बाद पृथक बस्ती और एससी-एसटी की हिस्सेदारी का मामला कब और कैसे समाप्त हो गया, आजतक पता ही नहीं चला। 

संविधान सभा में संविधान लागू होने की तिथि (26जनवरी1950) से एससी- एसटी के लिए आरक्षित स्थानों की व्यवस्था अग्रिम 10 वर्षों के लिए मानते हुए तथा उसकी आगामी स्थिति पारस्परिक सहमति (Mutual agreement) अर्थात जनमत संग्रह पर निर्भर की गई किन्तु संसद में इसे बिना चर्चा, बिना वाद- विवाद किए ही केवल ध्वनि मत द्वारा प्रति 10वर्ष पर आज तक लगातार बढ़ाया जा रहा है, जो फिलहाल आगामी 25 जनवरी 2020 तक लागू है जिसे संसद के इसी साल 2019 के शीतकालीन सत्र में फिर अगले 10 वर्षों के लिए बढ़ा दिया जायेगा। संविधानसभा में जब पहले पड़ाव वाले चुनाव की व्यवस्था समाप्त हुई तो बाबा साहब ने एससी-एसटी के 30% वोट प्राप्त करने वाले को विजयी मानने का प्रस्ताव रखा किन्तु दुर्भाग्यवश बहुमत न होने के कारण यह प्रस्ताव भी 28अगस्त1947 को संविधान सभा में पास नहीं हो सका था।
इस प्रकार संयुक्त निर्वाचन द्वारा सुरक्षित स्थान से चुना गया व्यक्ति अपने समाज का वास्तविक प्रतिनिधि न होकर Tool (एससी- एसटी के विरोध में इस्तेमाल किया जाने वाला औजार, हथियार), Stooge (शासक जातियों का पिछलग्गू) और Agent (पिट्ठू, देशी भाषा में कहा जाय तो दलाल, भड़वा) बन कर काम करता है। पूना पैक्ट से भारत में छुआछूत की बीमारी आज तक बरकरार है जिसके संस्थापक मि0 गांधी हैं।

रविवार, 22 सितंबर 2019

भाऊराव पाटिल जयंती


भाऊराव पाटिल जयंती
कर्मवीर भाऊराव पायगोंडा पाटिल का जन्म महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में 22सितंबर 1887 को हुआ था। उन्होंने सतारा जिले के काले नामक स्थान पर महात्मा फुले के 'सत्य शोधक समाज ' के उद्देश्यों की पूर्ति के निमित्त 04अक्टूबर1919 को बहुजनों की शिक्षा के लिए 'रयत शिक्षण संस्था' की स्थापना की थी। उनका कहना था कि समाज का यह जो गरीब तबका है, इसके पिछड़ने का कारण अशिक्षा है। उन्होंने मजदूर वर्ग को नारा दिया, 'कमाओ और शिक्षा प्राप्त करो' (Earn and learn) रयत शिक्षण संस्था के पास आज करीब 700 होस्टल हैं जिनमें करीब 4,50,000 विद्यार्थी संस्था के विभिन्न स्कूलों और कालेजों में शिक्षा प्राप्त करते हैं।

महाराष्ट्र सरकार ने 1955 में उनके द्वारा समाज के लिए की गई उनकी सेवाओं को याद करते हुए उन्हें 'कर्मवीर' की मानद उपाधि से सम्मानित किया। भारत सरकार ने भी 1959 में उन्हें राष्ट्रीय सम्मान देते हुए 'पद्म भूषण' से अलंकृत किया तथा उनके 29वें स्मृति दिवस पर 09मई 1988 को 60 पैसे का एक डाक टिकट भी जारी किया। इसी वर्ष पूना यूनिवर्सिटी ने उन्हें 'डी लिट्' की मानद उपाधि से नवाजा। करीब 72वर्ष की आयु में 09मई1959 को उनका परिनिर्वाण हो गया। लीक से हटकर चलते हुए इस महान हस्ती ने दबे-कुचलों की शिक्षा के लिए जो कार्य किया, इतिहास में उसे हमेशा याद किया जायेगा।

यह मात्र एक संयोग ही कहा जायेगा कि बाबासाहेब अम्बेडकर ने भी कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क में 09मई1916 को आयोजित एक शोध संगोष्ठी में भारत में जातियां: उनकी संरचना, उत्पत्ति एवं विकास (Castes in India: Their Mechanism, Genesis & Development) पर अपना शोधपत्र पढ़ा था। बाबासाहेब तब केवल 25 साल के थे और मानवशास्त्र के शोधार्थी थे। 18 पृष्ठों के इस शोध प्रबंध में बाबासाहेब ने भारत की जाति प्रथा को एक अनूठे परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास किया है।

शनिवार, 21 सितंबर 2019

raj kumar









संत नारायण गुरु स्मृति दिन





संत नारायण गुरू के 91वें स्मृति दिन पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से सादर आदरांजलि!
लगभग सौ वर्ष तक पहले ट्रावनकोर और कोचीन (वर्तमान केरल राज्य) ऐसा क्षेत्र था जहाँ निम्न जाति वालों के लिये मंदिर, विद्यालय और सार्वजनिक स्थलों में प्रवेश वर्जित था. कुंओं का इस्तेमाल वे कर नहीं सकते थे. इस जाति के मर्द और औरतों के लिए कमर से ऊपर कपड़े पहनना तक का बड़ा गुनाह था, तो फिर गहने पहनने का तो सवाल ही नहीं था. इन्हें अछूत तो समझा जाता ही था, उनकी परछाइयों से भी लोग दूर रहते थे. बड़े लोगों से कितनी दूरी पर खड़े होना है वह दूरी भी जातियों के आधार पर निर्धारित थी और यह दूरी यह 5 फीट से 30 फीट तक थी. कुछ जातियों के लोगों को तो देख भर लेने से छूत लग जाती थी.

 उन्हें चलते समय दूर से ही अपने आने की सूचना देनी पड़ती थी. वे लोग जोर-जोर से चिल्लाते जाते थे कि ‘‘मेरे मालिकों, मैं इधर ही आ रहा हूँ, कृपया अपनी नजरें घुमा लें“ ये लोग अपने बच्चों के सुन्दर और सार्थक नाम भी नहीं रख सकते थे. नाम ऐसे होते थे जिनसे दासता और हीनता का बोध होता हो. ऐसे किसी भी सामाजिक नियम का उल्लंघन करने पर मौत की सजा निर्धारित थी. भले ही उल्लंघन गलती से हो गया हो. इन सारे अत्याचारों के बीच एक शख्स ने ऐसा चमत्कार कर दिखाया था, जिसने पूरे समाज को ही बदल दिया. इस स्थिति के खिलाफ संघर्ष करने वाले शोषितों को इस गुलामी से बाहर निकालने वाले महापुरुष का नाम था नारायण गुरू. उनका जन्म केरल में 26 अगस्त 1856 को हुआ था. जिन्होंने अपने दृढ़निश्चय से समाज की सूरत बदलकर मनुवादियों की धज्जियाँ उड़ा दीं.

नारायण गुरु जैसे महान युगपुरुष को देश के कई हिस्सों के लोगों द्वारा ज्यादा नहीं जान पाना दुर्भाग्यपूर्ण है. नारायण गुरु का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था. समाज की दशा को देखकर उन्हें बहुत दुख हुआ. केरल में नैयर नदीं के किनारे एक जगह है अरुविप्पुरम, तब यहाँ घना जंगल था, नारायण गुरु यहीं एकांतवास में आकर रहने लगे. उसी दौरान गुरुजी को एक मंदिर बनाने का विचार आया. नारायण गुरु एक ऐसा मंदिर बनाना चाहते थे जिसमें किसी किस्म का कोई भेदभाव न हो. जाति, धर्म, मर्द और औरत का कोई बंधन न हो. अरुविप्पुरम में उन्होंने एक मंदिर बनाकर एक इतिहास रचा. अरुविप्पुरम का मंदिर इस देश का शायद पहला मंदिर है, जहाँ बिना किसी जातिभेद के कोई भी पूजा कर सकता था. नारायण गुरु के इस क्रांतिकारी कदम से उस समय जाति के बंधनों में जकड़े समाज में हंगामा खड़ा हो गया. वहाँ के ब्राह्माणों ने इसे महापाप करार दिया था. दरअसल, वह एक ऐसे धर्म की खोज में थे जहाँ समाज का हर आदमी एक-दूसरे से जुड़ाव महसूस कर सके. वह एक ऐसे ‘बुद्ध’ की खोज में थे जो सभी मनुष्यों को समान दृष्टि से देखे. वह ढ़ोगी समाज द्वारा निम्न ठहरा दी गई जाति के लोगों को स्वाभिमान से जीते देखना चाहते थे. लोगों ने शिकायत की कि उनके बच्चों को स्कूलों में नहीं जाने दिया जाता है. उन्होंने कहा कि अपने बच्चों के लिए स्कूल स्वयं बना लो और इतनी अच्छी तरह चलाओ कि वे भी तुम्हारे स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने को इच्छुक हो जाएं. लोगों ने कहा कि उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता, उन्होंने कहा कि न तो जबरदस्ती प्रवेश करने की जरूरत है और न प्रवेश की अनुमति के लिए गिड़गिड़ाने की.

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उनसे मिलने के बाद कहा था ‘मैंने लगभग पूरी दुनिया का भ्रमण किया है और मुझे अनेक संतों और महर्षियों से मिलने का सौभाग्य मिला है. लेकिन, मैं खुलकर स्वीकार करता हूँ कि मुझे आज तक ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं मिला जिसकी आध्यात्मिक उपलब्धियाँ नारायण गुरु से अधिक हों, बल्कि बराबर भी हो’ उनके कार्यों की सफलता से प्रभावित होकर मिस्टर गाँधी उनसे मिलकर बातचीत करने को बहुत इच्छुक हुए और उन्होंने पूछा कि क्या गुरुजी अंग्रेजी जानते हैं? गुरुजी ने पलटकर पूछा कि क्या गांधीजी संस्कृत में बातचीत करेंगे? उन्होंने हमेशा अपने अनुयायियों को शिक्षा के माध्यम से जानकार और जागरूक बनने, संगठित होकर मजबूत बनने और कठिन परिश्रम से समृद्धि प्राप्त करने की शिक्षा दी. ब्राह्मणवाद के विरुद्ध लड़ते-लड़ते लगभग 72 वर्ष की आयु में उनका परिनिर्वाण 20 सितंबर 1928 को हो गया. उनके सम्मान में भारत सरकार ने 21 अगस्त 1967 को 15 पैसे व श्रीलंका सरकार ने 04 सितंबर 2009 को 05 रुपये के डाक टिकट जारी किये. उनके 91वें स्मृति दिन पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से सादर आदरांजलि! 

बुधवार, 18 सितंबर 2019

सुनो गौर से भारत वालों....! इसराईल में ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर पर हुआ चुनाव


भारत में जहाँ इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का उपयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है, तो वहीं इजराइल, यूक्रेन, इंडोनेशिया, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैण्ड, इटली, नीदरलैंड, आयरलैंड, ब्रिटेन  और अमेरिका जैसे दुनिया के विकसित देश आज भी ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराते हैं. जबकि, उपरोक्त देशों में जापान, अमेरिका सहित कुछ देशों ने ईवीएम का आविष्कार किया है. इसके बाद भी ईवीएम से चुनाव नहीं कराते हैं. उन देशों का मानना है कि ईवीएम से निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र रूप से चुनाव नहीं हो सकता है.

गौरतलब है कि 17 सितंबर 2019 को इसराईल के नागरिकों ने देश में पाँच महीने में दूसरी बार हुए आम चुनाव में मंगलवार को बैलेट पेपर पर वोट डाले. इस चुनाव को मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व पर एक जनमत संग्रह के तौर पर देखा जा रहा है. मंगलवार सुबह सात बजे बैलेट पेपर से मतदान शुरू हुआ. जबकि, इसी साल अप्रैल में चुनाव हुआ था. लेकिन, 120 सदस्यीय संसद में 61 सदस्यों का गठबंधन बनाने में नेतन्याहू (69) के नाकाम रहने के चलते मध्यावधि चुनाव की फिर जरूरत पड़ गयी. इसलिए पाँच महीनें में यह दूसरी बार चुनाव हो रहा है. इसराईली चुनाव की सबसे खास बात यह है कि यहाँ बैलेट पेपर से चुनाव होता है. इसराईली सरकार को ईवीएम पर रत्तीभर भी भरोषा नहीं है. इसराईल के प्रधानमंत्री नौ सितंबर को एकदिवसीय भारत दौरे पर आने वाले थे, लेकिन चुनावों में व्यस्तता के कारण उन्हें यह दौरा रद्द करना पड़ा. इससे पहले अप्रैल में हुए चुनावों के कारण भी अपना भारतीय दौरा रद्द करना पड़ा था.

बता दें कि 2017 में जापान में भी चुनाव बैलेट पेपर से संपन्न हुआ था. यही नहीं 30 मार्च 2019 को यूक्रेन में भी चुनाव बैलेट पेपर से संपन्न हुआ है. दिलचस्प बात तो यह है कि जापान में मतदाताओं को दो बार वोट डालने का अधिकार है. एक वोट चुनाव क्षेत्र के उम्मीदवार के लिए और दूसरा वोट पार्टी के लिए. जापान का संविधान वयस्क मताधिकार और गुप्त मतदान का अधिकार देता है. साथ ही वह निर्धारित करता है कि चुनाव कानून, नस्ल, जाति, लिंग, सामाजिक स्थिति, पारिवारिक मूल, शिक्षा, जायदाद या आय से भेदभाव नहीं कर सकता.

अगर भारत की बात करें तो भारत में ईवीएम में घोटाला होने के बाद भी बैलेट पेपर से चुनाव नहीं किया जा रहा है. जबकि बीते फरवरी 2019 को इंडोनेशिया में राष्ट्रपति का चुनाव संपन्न हुआ. जिसमें ईवीएम की जगह बैलेट पेपर का इस्तेमाल किया गया है. इंडोनेशिया में ईवीएम पर लंबे समय से बहस जारी थी, जिसके बाद सभी दलों में राजनीतिक सहमति नहीं बन सकी और वापस बैलेट पेपर पर लौटना तय हुआ. इंडोनेशिया दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ अमेरिका की तरह ही राष्ट्रपति सिस्टम लागू है.

सबसे ज्यदा चौंकाने वाली बात तो यह है कि इंडोनेशियाई में 8,00,000 मतदान केंद्रों पर 19 करोड़ से अधिक मतदाताओं को वोट देना होता है. इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह भी है कि 19 करोड़ से ज्यादा मतदाता बैलेट पेपर पर मतदान करते हैं. लेकिन, वहीं भारत में चुनाव आयोग द्वारा कहा जा रहा है कि बैलेट पेपर से चुनाव कराने में देरी होगी. अब सवाल यह है कि क्या इंडोनेशिया में देर नहीं हो रहा है? दूसरा सवाल यह है कि चुनाव आयोग का काम निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र रूप से चुनाव कराने का काम दिया गया है या चुनाव जल्दी कराने का काम दिया गया है?

सोमवार, 16 सितंबर 2019

पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें : सरकार


‘‘गोबर-गोमूत्र से बनी दवाओं का इस्तेमाल करें, फिर बुद्धिमान बच्चों को जन्म दें महिलाएं’’
मोदी सरकार द्वारा गठित आयोग ने एक अजीबो गरीब दावा किया है. आयोग का दावा है कि गोमूत्र और गोबर से तैयार दवाओं का इस्तेमाल कर महिलाएं बुद्धिमान बच्चों को जन्म देंगी. वैसे अब तक जितने भी अजीबो गरीब दावे या अजीबो गरीब हरकतों से भरी घटनाएं हुई हैं, वे मोदी सरकार में ही संभव हो पाया है. खासकर गाय, गोबर, गोमूत्र और धर्म, चमत्कार, पाखंडवाद, अंधविश्वास को लेकर. कभी बताया जाता है कि गाय के गोबर और गोमूत्र से कैंसर ठीक हो जाता है तो कभी गाय के पीठ पर हाथ फेरने से हार्टअटैक. हद तो तब हो गयी जब सरकार द्वारा गठित आयोग ने दावा कर दिया कि गोबर-गोमूत्र से तैयार दवाएं इस्तेमाल करने से महिलाएं बुद्विमान बच्चों को जन्म देंगी. इस दावे पर हंसी आती है और गुस्सा भी आता है कि सरकार के इस बचकाने दावे को क्या कहा जाय? इन लोगों ने तो विज्ञान को भी पीछे छोड़ दिया है. मिशन चन्द्रयान-2 के फेल हो जाने पर सोशल मीडिया पर कई तरह के पोस्ट आने लगे थे. एक ने तो पूरे दावे के साथ लिखा था कि ‘‘अगर चन्द्रमा पर गोबर का लेप किया गया होता तो मिशन चन्द्रयान फेल नहीं होता’’ इस हिसाब से तो पोस्ट करने वाले का दावा सत्य हो सकता है? क्या इस दावे को सत्य मान लिया जाय? अगर यही बात है तो सरकार द्वारा गठित आयोग को मिशन चन्द्रयान के लिए गोबर-गोमूत्र से किसी ऐसे उपकरण का निर्माण करना चाहिए जिससे मिशन कामयाब हो सके.
सरकार ने गाय की सुरक्षा के लिए न केवल भारी भरकम बजट पेश किया है, बल्कि कानून भी बना दिया है. लेकिन, गाय के नाम पर मौत के घाट उतारे जा रहे लाखों लोगों के लिए आज तक कोई कानून नहीं बनाया है. यूपी की योगी सरकार ने तो खुले शब्दों में कह दिया था कि ‘‘हमारी सरकार सिर्फ गाय की रक्षा और सुरक्षा के लिए संकल्पबद्ध है’’ उस वक्त इस बयान पर योगी सरकार की जमकर किरकिरी हुई थी. लोग नारा देने लगे थे कि ‘‘योगी तेरे राज में बहन, बेटियाँ न माँएं, सिर्फ गायें सुरक्षित हैं’’ यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि यह नारा काफी हद तक साबित भी हुआ है. यूपी ही नहीं, पूरे देश में महिलाओं के प्रति अपराध में बेतहासा बढ़ोत्तरी हुई है. एक रिपोर्ट के अनुसार भारत ही भारत की महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक देश बन गया है, जहाँ हर 15 मिनट पर एक महिला के साथ बलात्कार होता है. हर 22 मिनट पर एक महिला के साथ सामुहिक बलात्कार होता है और हर 35 मिनट पर एक बच्ची को हवस का शिकार बनाया जाता है.

मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में जितना महत्व गाय को दिया है. अगर, शायद उतना महत्व देश और इंसान पर दिया होता तो आज न तो देश में बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, हत्या, बलात्कार, अपहरण, आतंकवाद, मॉब लिंचिंग, दंगा-फसाद होता और न ही गाय के नाम पर लाखों लोगों को मौत के घाट उतारा जाता. बल्कि देश के विकास में काफी हद तक सुधार हो गया होता. लेकिन, सरकार पर जनता का जोर चलने वाला नहीं है. क्योंकि, सरकार को जनता ने नहीं ईवीएम मशीन ने चुना है. यही कारण है कि सरकार को जनता से ज्यादा ईवीएम मशीन की चिंता है और फालतू काम करने की सनक सवार है. लगे हाथ एक और बात बता दें कि कभी बीजेपी की चुनावी नैय्या यही गाय, गंगा, गीता पार लगाती थीं बशर्ते आज ईवीएम लगा रही है.

आपको बताते चलें कि मोदी सरकार ने इसी साल फरवरी में गोवंश के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए ‘राष्ट्रीय कामधेनु आयोग’ के गठन के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. यह आयोग आयुष मंत्रालय के साथ मिलकर पंचगव्य दवाएं तैयार करने पर काम कर रहा है. ये पंचगव्य दवाएं गोमूत्र और गोबर आदि से तैयार किए जा रहे हैं. आयोग का दावा है कि अगर गर्भवती महिलाएं इन दवाओं का नियमित इस्तेमाल करेंगी तो वे ‘बेहद बुद्धिमान और स्वस्थ बच्चों’ को जन्म दे पाएंगी. राष्ट्रीय कामधेनु आयोग के चेयरमैन वल्लभभाई कथीरिया ने अंग्रेजी वेबसाइट द प्रिंट से बातचीत में कहा कि शास्त्र और आयुर्वेद में भी पंचगव्य औषधि का जिक्र है, जो गाय से मिलने वाली पाँच चीजों का मिश्रण है. उन्होंने कहा, शास्त्रों और आयुर्वेद में लिखा है कि अगर गर्भवती स्त्रियाँ इन दवाओं का सेवन करती हैं तो वे बेहद बुद्धिमान और स्वस्थ बच्चों को जन्म दे सकती हैं. कथीरिया ने बताया कि आयुष मंत्रालय के अलावा हालिया गठित पशुपालन मंत्रालय की ओर से सूक्ष्म लघु और मध्यम उद्योग मंत्रालय से मदद मांगी जाएगी. एक बार बड़े पैमाने पर दवाओं का उत्पादन शुरू होने के बाद वे गांवों में वैद्यों की नियुक्ति करेंगे, जो गर्भवती महिलाओं को ये दवाएं इस्तेमाल करने के लिए कहेंगे. आयोग के चेयरमैन ने बताया कि उनकी जिम्मेदारी देसी गायों की नस्लों के विकास और उनके संरक्षण की भी है. इसके लिए 22 देसी नस्लों का चयन किया जा चुका है.

बता दें कि 15 अगस्त के दिन जैसे ही पीएम मोदी ने विस्फोटक जनसंख्या पर चर्चा किया, वैसे ही एक बार फिर जनसंख्या वृद्धि को लेकर मुसलमानों पर हमला शुरू हो गया कि मुसलमान की बढ़ती संख्या देश के लिए खतरनाक है. हालांकि, पहले भी समय-समय पर हिन्दुवादी नेताओं द्वारा बयानबाजी और आंकड़ेबाजी शुरू हुई है. कोई कहता था कि हिन्दुओं को पाँच-पाँच बच्चे पैदा करना चाहिए तो कोई कहता हिन्दुओं को दस-दस बच्चे पैदा करना चाहिए. हिन्दुवादी नेताओं द्वारा तो यह भी कहा जाता रहा है कि जितनी तेजी से मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है उतनी ही तेजी से हिन्दुओं की संख्या कम हो रही है. यही नहीं यह भी दावा किया जा चुका है कि जिस तरह से देश में मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ रही है उस तरह से आने वाले कुछ ही सालों में देश पर केवल मुसलमानों का ही कब्जा हो जायेगा. इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें लगता है कि इन दवाओं की सबसे ज्यादा जरूरत उन हिन्दुवादी नेताओं के लिए है जो मुस्लिमों की बढ़ती आबादी और हिन्दुओं की घटती जनसंख्या से चिंतित होकर हिन्दुओं को पाँच से दस बच्चे पैदा करने की सलाह देते हैं. सरकारी आयोग ने जिस हिसाब से दावा किया है उस हिसाब से हिन्दुवादी नताओं को इन दवाओं का इस्तेमाल करके बुद्धिमान बच्चों को जन्म देने के साथ-साथ हिन्दुओं की जनसंख्या में वृद्धि करनी चाहिए.
राजकुमार
सामाजिक कार्यकर्ता
चन्दौली (उत्तर प्रदेश)

मूलनिवासी बहुजनों का साझा आंदोलन




पिछड़े वर्ग के महापुरुषों द्वारा शुरू की गयी साझी लड़ाई को केवल अनुसूचित जाति की लड़ाई समझना पिछड़े वर्ग के समस्याओं का मूल कारण है. पिछड़े वर्ग को यह लगता है कि ब्राह्मण के विरोध की लड़ाई अनुसूचित जाति की लड़ाई है. इस सोच ने पिछड़े वर्ग का सबसे ज्यादा नुकसान किया है. क्योंकि, पिछड़े वर्ग को अपने महापुरुषों के वास्तविक इतिहास को दूर रखा गया है और हमारे पुरखों के साहित्य को षड्यंत्र पूर्वक दलित साहित्य, और हमारे पूर्वजों को दलितों का महापुरुष घोषित किया गया है. जबकि, दलित शब्द असंवैधानिक शब्द है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि किसी भी सरकारी, अर्धसरकारी या गैरसरकारी क्षेत्रों में बोलचाल और लिखित रूप में ‘दलित शब्द’ का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. इसके बाद भी लोग दलित शब्द का प्रयोग कर रहे हैं.

जबकि, हम बहुजन मूलनिवासी की बात करते हैं तो पिछड़े वर्ग को यह लगता है कि यह तो अनुसूचित जातियों की लड़ाई है. लेकिन, जब हम इतिहास का अध्यन करते हैं तो पता चलता है कि प्राचीन भारत में ब्राह्मणवाद के विरोध में सबसे बड़ी लड़ाई पिछड़े वर्ग के महामानव तथागत बुद्ध ने लड़ी और बहुजन संकल्पना दिया और इसी की वजह से मौर्य साम्राज्य स्थापित हुआ. यही नहीं, आधुनिक भारत में इस लड़ाई को राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने बढ़ाया. राष्ट्रपिता जोतिराव फुले भी पिछड़े वर्ग से थे. राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने किया मूलनिवासी संकल्पना दिया. क्योंकि वे कहते थे कि भारत में रहने वाले एससी, एसटी, ओबीसी, एनटी, डीएनटी, बीजेएनटी और इन लोगों से धर्म परिवर्तित करने वाले मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और लिंगायत मूलनिवासी है. जबकि, ब्राह्मणों को विदेशी कहते थे. उन्होंने लिखा है आर्य इरानी है.

राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने जो बात कही उसे छत्रपति शाहूजी महाराज ने अपने राज्य में लागू किया. जबकि, छत्रपति शाहूजी महाराज भी ओबीसी थे. डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने लिखा है कि प्राचीन भारत में ब्राह्मणवाद को समाप्त करने का कार्य तथागत बुद्ध और सम्राट अशोक ने किया, मध्यकालीन भारत में संत तुकाराम, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविंद सिंह, संत रविदास, संत कबीर सहित तमाम संत, महापुरुषों ने इसके विरोध में लड़ाई लड़ी. आधुनिक भारत में राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ने फुले और छत्रपति शाहू महाराज की लड़ाई की वजह से डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर ने ब्राह्मणवाद को समाप्त कर भारतीय संविधान लागू किया. इसी आन्दोलन को पेरियार रामास्वामी नायकर, संत गाडगे महाराज, डा.रामस्वरूप वर्मा, कर्पूरी ठाकुर, जगदेव बाबू कुशवाहा, पेरियार ललई सिंह यादव और मान्यवर काशीराम आगे बढ़ाया. यानी हमारे सभी संत, महापुरूष अगल-अलग जाति के होकर भी किसी विशेष जाति के लिए लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि बहुजनों के लिए लड़ाई लड़ी. इसलिए यह लड़ाई केवल अनुसूचित जाति की लड़ाई नहीं है, यह लड़ाई ओबीसी के महापुरुषों द्वारा शुरू की गयी मूलनिवासी बहुजनों की साझी लड़ाई है.

हमारे महापुरुषों ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरोध में मिल-जुलकर साझी लड़ाई लड़ी. जब राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले को जरूरत पड़ी तो फातिमा शेख, उस्मान सेख ने ज्योतिबा फुले को मदद किया. जब डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर की जरूरत पड़ी तो छत्रपति शाहू महाराज ने मदद की और गोलमेज सम्मेलन में मुसलमानों ने बाबासाहेब का साथ दिया और संविधान सभा में भेजने का कार्य किया. जब डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर को संविधान लिखने का मौका मिला तो डॉ. बाबसाहब अम्बेडकर ने एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लिए हक अधिकार दिया. लेकिन, आज ओबीसी के लोग यह समझ रहे हैं कि यह लड़ाई एससी, एसटी की लड़ाई है. यह लड़ाई एससी, एसटी की लड़ाई नहीं है. यह लड़ाई मूलनिवसी बहुजन समाज की लड़ाई है. लेकिन, हम सभी इस साझी लड़ाई को भूलकर ब्राह्मणों द्वारा लगाये गये आपसी झगड़े में फंस गये हैं, जिसकी वजह से हम मूलनिवासियों की समस्याएं बढ़ गयी है  और लोकतंत्र पर ब्राह्मणों का अनियंत्रित कब्जा हो गया है. इसलिए हमें मूलनिवासी बहुजन की इस साझी लड़ाई को एक साथ मिलकर लड़नी होगी और अपने अधिकार को हाशिल करनी होगी.

हमें आवाज बुलंद करनी होगी!




आप सभी जानते हैं कि देश की आजादी के लगभग 72 वर्ष हो चुके है. आजादी के आंदोलन में पिछड़े वर्ग के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, बहुत सारे पिछड़े वर्ग के लोग जेल गये. फाँसी पर चढ़ गये, गोलियाँ खाई जिसकी वजह से 15 अगस्त 1947 को देश अंग्रेजो से आजाद हुआ. हमारे समस्त महापुरूषों ने अग्रेंजो को भगाने के लिए जेल गये, फाँसी पर चढ़े, गोलियाँ खाई. उन्होने सोचा था, देश की आजादी के बाद उनकी आने वाली नस्लें आजाद रहेंगी. लेकिन, आजादी के 72 वर्षो के बाद भी, देश में पिछड़े वर्ग के लोगों के हालात खराब हैं. इसका एक ही कारण है कि आज तक हमने जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर वोट किया. जिसकी वजह से आज तक हमारा सत्यानाश हो रहा है. देश में हर 5 साल में लोकसभा एवं विधान सभा के चुनाव होते हैं और हर बार हम वोट देते हैं. हमारे वोटों से हर पांच साल बाद सरकारें आती हैं. यानी सत्ता बदलती है, सरकारें बदलती हैं, मगर हमारी समस्याएं जस की तस रहती हैं. एक मौलिक बात यह है कि हम वोट क्यों देते हैं? इसका सीधा जवाब है अपनी समस्याओं का समधान करने के लिए. लेकिन, क्या कभी सोचा है कि हमने जिसको वोट दिया क्या वह हमारी समस्याओं का समाधान कर रहा है? नहीं कर रहा है, बल्कि हमारे वोट से चुनकर जाने वाले हमारी समस्याओं को और ज्यादा भयावह बना रह हैं.


दूसरी बात, देश की आजादी के पहले गुलाम भारत में अंग्रेज हमारी गिनती कराते थे. लेकिन, जवाहर लाल नेहरू ने जाति आधारित गिनती रोकने का काम किया. केन्द्र में अटल बिहारी की सरकार ने भी पिछड़े वर्ग की जनगणना नही किया और 2014 में पिछड़े वर्ग के नाम पर वोट लेकर प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी ने जानवरों की गिनती का आदेश दिया. लेकिन, पिछड़ों की गिनती का आदेश नहीं दिया बल्कि पिछड़े वर्ग के साथ धोखेबाजी करने का कार्य किया. इसी तरह से सपा और बसपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बावजूद पिछड़ों की गिनती के लिए प्रस्ताव तक पारित नही किया. एससी, एसटी को 1932 में संख्या के अनुपात में आरक्षण मिल गया था. जो अधिकार एससी, एसटी को 1932 में मिल गया था वह अधिकार लेने के लिए पिछड़े वर्ग को 60 साल तक इंतजार करना पड़ा. बहुत लम्बी लड़ाई के बाद 1992 में ओबीसी को मण्डल कमीशन लागू किया गया. मण्डल कमीशन में ओबीसी के साथ धोखेबाजी हुई. जब एससी, एसटी को संख्या के आधार पर आरक्षण है तो ओबीसी को क्यों नही? 26 साल से ओबीसी को यह कहा जा रहा है कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नही हो सकता. इसलिए 52 प्रतिशत ओबीसी को 52 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाय. लेकिन, सवर्णों को संविधान के विरोध में जाकर आरक्षण 48 घंटे के अन्दर दे दिया गया, जिसका समर्थन सपा-बसपा ने किया. यह पिछडे वर्ग के साथ धोखेबाजी है.

16 नवम्बर 1992 को सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी पर क्रीमीलेयर लगाया, जिसकी वजह से ओबीसी के लोग जो कि अपने बच्चों को महंगी शिक्षा देने में सक्षम है. उन्हे क्रीमीलेयर के नाम पर बाहर किया जा रहा है और जो सक्षम नही हैं वे स्वतः ही बाहर हो जा रहे हैं. इसका अनुमाना इसी से लगाया जा सकता है कि क्रीमीलेयर के नाम पर मोदी सरकार ने 314 आईएएस की नियुक्ति पर रोक लगा दिया. लेकिन सपा-बसपा ने इसके विरोध में को स्टैण्ड नही लिया. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार ने पूरी संवैधानिक प्रक्रिया किये बगैर प्रमोशन में आरक्षण लागू किया था. जिसकी वजह से कोर्ट ने एससी, एसटी का प्रमोशन में आरक्षण खारिज कर दिया. मायावती ने ओबीसी को प्रमोशन में आरक्षण नही दिया. बाद में अखिलेश यादव को मायावती की गलतियों को सुधार कर एससी, एसटी के साथ-साथ ओबीसी को प्रमोशन में आरक्षण देना चाहिए. मगर, उन्होने एससी, एसटी का प्रमोशन में आरक्षण समाप्त कर दिया.

इसके साथ ही अखिलेश यादव के कार्यकाल में इलाहाबाद लोक सेवा आयोग ने त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था लागू किया था. लेकिन, तब अखिलेश यादव को यह ज्ञान नही था कि वे पिछड़े वर्ग के हैं. लेकिन, जब योगी अदित्यनाथ ने अखिलेश यादव की कुर्सी शुद्ध करायी तो अखिलेश यादव को ज्ञात हुआ कि वे पिछड़े वर्ग के है. लेकिन, यह ज्ञान होने के बावजूद भी अखिलेश यादव ने त्रिस्तरीय आरक्षण का मुद्दा अपने घोषणा पत्र में शामिल नही किया. यही नहीं ओबीसी समाज का एक बड़ा तबका किसान है. किसानों की जमीनें सेज के माध्यम से छीना जा रहा है. उनकी फसल का उचित मूल्य नही मिल रहा है. इस सम्बन्ध में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट न तो सपा-बसपा ने लागू किया और न ही भाजपा, कांग्रेस ने. इस तरह से उपरोक्त मुद््दे पूर्व में स्थापित कोई भी राजनैतिक पार्टियाँ नही उठा रही है. इसका मतलब है कि खुद हमें आवाज बुलंद करना होगा और अपने अधिकार को हाशिल करना होगा. 

ब्राह्मणवाद के खिलाफ़ असली पेरियार

पाखंडवाद और असामनता के खिलाफ तार्किक दृष्टि देने वाले नास्तिक पेरियार ई.वी. रामासामी नायकर के 140 वें जन्म दिवस पर हार्दिक शुभेच्छाएं.



पेरियार ई.वी. रामासामी नायकर का जन्म 17 सितंबर 1879 को तमिलनाडु के ईरोड में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था. इनके पिता वेंकतप्पा नायडू एक व्यापारी थे. उनकी माता का नाम चिन्ना थायाम्मल था. उनके एक बड़े भाई और दो बहने थीं. 

इनका पूरा नाम इरोड वेंकट नायकर रामासामी था. वे एक महान जननायक और सामाजिक कार्यकर्ता थे. इनके प्रशंसक इन्हें आदर के साथ ‘पेरियार’ संबोधित करते थे. जिसका अर्थ होता है ‘सम्मानित’ इन्होने ‘आत्म सम्मान आन्दोलन’ या ‘द्रविड़ आन्दोलन’ प्रारंभ किया था. उन्होंने जस्टिस पार्टी का गठन किया जो बाद में जाकर ‘द्रविड़ कड़गम’ हो गई. वे आजीवन रुढ़िवादी हिन्दुत्व का विरोध करते रहे. उन्होंने दक्षिण भारतीय समाज के साथ-साथ देशभर के शोषित वर्ग के लिए आजीवन कार्य किया. उन्होंने ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों पर करारा प्रहार किया और एक पृथक राष्ट्र ‘द्रविड़ नाडु’ की मांग की. पेरियार ई.वी.रामासामी नायकर ने तर्कवाद, आत्म सम्मान और महिला अधिकार जैसे मुद्दों पर जोर दिया और जाति प्रथा का घोर विरोध किया. उन्होंने दक्षिण भारतीय गैर-तमिल लोगों के हक़ की लड़ाई लड़ी और उत्तर भारतियों के प्रभुत्व का भी विरोध किया. यूनेस्को ने अपने उद्धरण में उन्हें ‘नए युग का पैगम्बर, दक्षिण पूर्व एशिया का सुकरात, समाज सुधार आन्दोलन के पिता, अज्ञानता, अंधविश्वास और बेकार के रीति-रिवाज़ का दुश्मन’ कहा.


सन् 1885 में उन्होंने स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा के लिए दाखिला लिया पर कुछ सालों की औपचारिक शिक्षा के बाद वे अपने पिता के व्यवसाय से जुड़ गए. बचपन से ही वे रूढ़िवादिता, अंधविश्वासों और धार्मिक उपदशों में कही गयी बातों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते रहते थे. उन्होंने हिन्दू महाकाव्यों और पुराणों में कही गई परस्पर विरोधी बातों को बेतुका कहा और माखौल भी उड़ाया. उन्होंने सामाजिक कुप्रथाएं जैसे बाल विवाह, देवदासी प्रथा, विधवा पुनर्विवाह का विरोध और स्त्रियों और अछूतों के शोषण का खुलकर विरोध किया. उन्होने जाति व्यवस्था का भी विरोध और बहिष्कार किया. एक बार पेरियार ने एक ब्राह्मण को गिरफ्तार करवाने में न्यायालय की मदद की, उस ब्राह्मण का भाई पेरियार के पिताजी का दोस्त था. इस बात से नाराज होकर उनके पिता ने उन्हें सबके सामने पीटा और घर से निकाल दिया. इसके बाद पेरियार काशी चले गए, जहाँ से उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया. 

एक दिन भूख लगने पर वे वहाँ निःशुल्क भोज मिलने वाले स्थान पर चले गए, पर वहाँ जाने के बाद उन्हें पता चला कि यह सिर्फ ब्राह्मणों के लिए है. उन्होंने फिर भी भोजन प्राप्त करने की कोशिश की पर उन्हें अपमानित किया गया और धक्के मारकर निकाल दिया गया. इसके बाद वे रुढ़िवादी हिन्दुत्व के विरोधी हो गए. इसके बाद उन्होंने किसी भी धर्म को नहीं स्वीकारा और आजीवन नास्तिक रहे.


उन्होंने इरोड के नगर निगम के अध्यक्ष के तौर पर भी कार्य किया और सामाजिक उत्थान के कार्यों को बढ़ावा दिया. उन्होंने खादी के उपयोग को बढ़ाने की दिशा में भी कार्य किया. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की पहल पर सन 1919 में वे कांग्रेस के सदस्य बन गए. उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया और गिरफ्तार भी हुए. सन 1922 के तिरुपुर सत्र में वे मद्रास प्रेसीडेंसी कांग्रेस समिति के अध्यक्ष बन गए और सरकारी नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण की वकालत की. सन 1925 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी. इनसे प्रभावित होकर केरल कांग्रेस नेताओं ने उनसे वैकोम आन्दोलन का नेतृत्व करने का निवेदन किया. केरल के वैकोम में अस्पृश्यता के कड़े नियम थे, जिसके अनुसार किसी भी मंदिर के आस-पास वाली सडक पर अछूतों का चलना वर्जित था, जिसके विरोध में वैकोम आंदोलन किया गया था.

पेरियार ने समाज में व्याप्त भेदभाव को खत्म करने के लिए सरकारी महकमों के अधिकारियों और सरकार दबाव बनाया. उन्होंने ‘आत्म सम्मान आन्दोलन’ शुरू किया, जिसका मुख्य लक्ष्य था गैर-ब्राह्मण द्रविड़ों को उनके सुनहरे अतीत पर अभिमान कराना. सन 1925 के बाद पेरियार ने ‘आत्म सम्मान आन्दोलन’ के प्रचार-प्रसार पर पूरा ध्यान केन्द्रित किया. आन्दोलन के प्रचार के एक तमिल साप्ताहिकी ‘कुडी अरासु’ और अंग्रेजी जर्नल ‘रिवोल्ट’ का प्रकाशन भी शुरू किया गया. उन्होंने हिंदी और उत्तर भारतीयों का भी विरोध किया था. सन 1937 में जब सी. राजगोपालाचारी मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने स्कूलों में हिंदी भाषा की पढ़ाई को अनिवार्य कर दिया, जिससे हिंदी विरोधी आन्दोलन उग्र हो गया. 


तमिल राष्ट्रवादी नेताओं, जस्टिस पार्टी और पेरियार ने हिंदी-विरोधी आंदोलनों का आयोजन किया जिसके फलस्वरूप सन 1938 में कई लोग गिरफ्तार किये गए. उसी साल पेरियार ने हिंदी के विरोध में ‘तमिल नाडु तमिलों के लिए’ का नारा दिया. उनका मानना था कि हिंदी लागू होने के बाद तमिल संस्कृति नष्ट हो जाएगी और तमिल समुदाय उत्तर भारतीयों के अधीन हो जायेगा. सन 1916 में एक राजनैतिक संस्था ‘साउथ इंडियन लिबरेशन एसोसिएशन’ की स्थापना हुई थी. इसका मुख्य उद्देश्य था ब्राह्मण समुदाय के आर्थिक और राजनैतिक शक्ति का विरोध और गैर-ब्राह्मणों का सामाजिक उत्थान करना. यह संस्था बाद में ‘जस्टिस पार्टी’ बन गयी. जनसमूह का समर्थन हासिल करने के लिए गैर-ब्राह्मण राजनेताओं ने गैर-ब्राह्मण जातियों में समानता की विचारधारा को प्रचारित-प्रसारित किया. सन 1937 के हिंदी-विरोध आन्दोलन में पेरियार ने ‘जस्टिस पार्टी’ की मदद ली थी. जब जस्टिस पार्टी कमजोर पड़ गई तब पेरियार ने इसका नेतृत्व संभाला और हिंदी विरोधी आन्दोलन के जरिये इसे सशक्त किया. सन 1944 में पेरियार ने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कड़गम’ कर दिया. 

द्रविड़ कड़गम का प्रभाव शहरी लोगों और विद्यार्थियों पर था. ग्रामीण क्षेत्र भी इसके सन्देश से अछूते नहीं रहे. हिंदी-विरोध और ब्राह्मण रीति-रिवाज़ और कर्म-कांड के विरोध पर सवार होकर द्रविड़ कड़गम ने तेज़ी से पाँव जमाये. द्रविड़ कड़गम ने अनुसूचित जातियों में अश्पृश्यता के उन्मूलन के लिए संघर्ष किया और अपना ध्यान महिला-मुक्ति, महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर केन्द्रित किया. जीवन भर पेरियार सामाजिक बुराईयों और धर्म में व्याप्त पाखंडों का विरोध करते रहे, उन्होंने कभी किसी धर्म को आत्मसात नहीं किया, बल्कि तार्किकता के साथ धर्म के षड़यंत्रों का विरोध किया और लोगों को इसके लिए हमेशा जागरुक करने में लगे रहे. पेरियार रामासामी नायकर नाम का सूरज 24 दिसंबर 1973 को डूब गया. लेकिन मूलनिवासी बहुजन समाज को वे एक ऐसी दिशा दे गए, जिससे वे सदियों से बनाए गए ब्राह्मणों के जाल से निकल सकें.



सिद्धार्थ शिवा विद्यार्थी
छात्र, इलेक्ट्रिकल इंजीनियर
गोयल ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूट टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट, बराबंकी (लखनऊ)

दैनिक मूलनिवासी नायक स्थापना दिवस


दैनिक मूलनिवासी नायक हिन्दी के 9वें स्थापना दिवस पर सभी पाठकों को दैनिक मूलनिवासी परिवार की ओर से ढेर सारी हार्दिक शुभेच्छाएं 
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‘‘खिंचों न कमान को, न तलवार निकालो, लोक का तंत्र है तो अखबार निकालो’’
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हम जिस व्यवस्था को बदलने के लिए आंदोलन कर रहे हैं, उसे बदलने में मीडिया की अहम भूमिका है. इस बात को ध्यान में रखते हुए बामसेफ संगठन के द्वारा ‘‘दैनिक मूलनिवासी नायक’’ नाम से मराठी और हिन्दी, बहुजनों का बहुजन भारत हिन्दी साप्ताहिक, मूलनिवासी बहुजन भारत अंग्रेजी मासिक पत्रिका, के अलावा पंजाबी और कई भाषाओं में पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित की जा रही है. साथ ही सोशल मीडिया के माध्यम से एमएन न्यूज, एमएन वॉइस रेडियो का सीधा प्रसारण भी हो रहा है. बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम साहब के नेतृत्व में 16 सितंबर 2009 को दैनिक मूलनिवासी नायक मराठी और 17 सितंबर 2011 को पेरियार रामासामी नायकर के 132वें जन्म दिवस के अवसर पर दैनिक मूलनिवासी नायक हिन्दी की स्थापना की गई थी. आज इस मूलनिवासी बहुजन आंदोलन के साथी दैनिक मूलनिवासी नायक (मराठी) का 11वाँ तथा दैनिक मूलनिवासी नायक (हिन्दी) का 9वाँ स्थापना दिवस है.



मूलनिवासी बहुजन समाज के कई संत महापुरूषों ने बहुजन आंदोलन को सफल करने के लिए समय-समय पर पत्र, पत्रिकाएं प्रकाशित की और कुछ संत महापुरूषों ने ‘‘वाणी’’ के माध्यम से आंदोलन को सफल बनाया. डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर कहते थे, मीडिया की ताकत बहुत बड़ी ताकत होती है. ‘‘अगर बायें हाथ में मीडिया है तो दायें हाथ से रातों रात किसी को जीरो से हीरो बनाया जा सकता है और हीरो से जीरो बनाया जा सकता है’’ जिसकी कीमत टकाभर भी नहीं है वह आज मीडिया के बदौलत महात्मा और बापू बने हुए हैं. डॉ.बाबासाहब अंबेडकर कहते थे, मिशन चलाने के लिए मुखपत्र अख़बार का होना बहुत जरूरी है. इसलिए उन्होंने अपने जीवन में पैसों की भारी कमी के बावज़ूद भी अख़बार निकालकर लोगों में चेतना और लोगों को जागृत करने का काम किया. डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने मूकनायक, जनता, बहिष्कृत भारत, प्रबुद्ध भारत जैसे समय-समय पर मुखपत्र निकाले. इसके बाद बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम साहब ने भी उनके ही नक्शे कदम पर चलकर कुछ पाक्षिक, साप्ताहिक, पत्र पत्रिकाएं निकाली. जिनमें दी अनटचेबल इंडिया अंग्रेजी, दी ऑपरेसड इंडियन अंग्रेजी, श्रमिक साहित्य मराठी, दलित साहित्य गुजराती, बहुजन साहित्य हिंदी, शोषित साहित्य पंजाबी, बहुजन नायक मराठी, बहुजन संदेश पंजाबी, बहुजन संघटक हिन्दी और बहुजन टाइम्स हिंदी मराठी और इंग्लिश दैनिक अखबार प्रमुख है.
इसी नक्शे कदम पर चलते हुए बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम साहब भी कई पत्र पत्रिकाएं निकाल कर तथागत बुद्ध से लेकर मान्यवर कांशीराम साहब तक के आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं. वामन मेश्राम द्वारा आज वर्तमान में दैनिक मूलनिवासी नायक मराठी और हिन्दी, बहुजनों का बहुजन भारत हिन्दी साप्ताहिक, मूलनिवासी बहुजन भारत अंग्रेजी मासिक पत्रिका, इसके अलावा पंजाबी साप्ताहिक और कई भाषाओं में पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित हो रहे हैं. इसके साथ ही सोशल मीडिया के माध्यम से एमएन न्यूज, एमएन वॉइस रेडियो का सीधा प्रसारण किया जा रहा है.
बहुजन आंदोलन के लिए खुद का मीडिया इसलिए जरूरी है क्योंकि, भारत की मीडिया पर ब्राह्मण और बनियों का पूर्ण रूप से कब्जा हो गया है. बता दें कि वर्तमान समय में तकरीबन 3840 टीवी चैनल और 5170 से ज्यादा समाचार पत्र हैं. इन सभी समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के मालिक बनिया हैं और संपादक ब्राह्मण हैं. टाईम्स ऑफ इंडिया का मालिक जैन बनिया, दैनिक जागरण का मालिक गुप्ता बनिया, दैनिक भाष्कर का मालिक अग्रवाल बनिया, गुजरात समाचार का मालिक शाह बनिया, लोकमत का मालिक दर्डा बनिया, राजस्थान पत्रिका का मालिक कोठारी बनिया, नव भारत का मालिक माहेश्वरी बनिया और अमर उजाला का मालिक महेश्वरी/अग्रवाल बनिया हैं.

अगर टीवी चैनलों की बात करें तो लोकसभा टीवी के सीईओ राजिव मिश्रा, राज्य सभा टीवी के सीईओ राजेश बादल, डीडी दूरदर्शन के सीईओ त्रिपुरारी शर्मा, प्रसार भारती के चेयरमैन एस सूर्य प्रकाश, पीटीआई के चेयरमैन एमएम गुप्ता, टाईम्स ग्रुप के सीईओ रविन्द्र धारीवाल, एक्सप्रेस ग्रुप के विवेक गोयंका और हिन्दू के सीईओ राजीव लोचन हैं. इस तरह से मीडिया पर पूरी तरह से ब्राह्मणों और बनियों का कब्जा हो गया है. यही कारण है कि मूलनिवासी बहुजन आंदोलन की एक भी खबर प्रकाशित नहीं करते हैं, बल्कि उसको छिपाने का काम करते हैं. वहीं दैनिक मूलनिवासी नायक मराठी और हिन्दी इस आंदोलन के लिए पूर्ण रूप से समर्पित होकर मूलनिवासी बहुजनों की आवाज को बुलंद कर रहा है.
राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

शनिवार, 7 सितंबर 2019

मनुदावाद के खिलाफ दो पेरियार



विद्रोही चेतना के दूसरे पेरियार, ललई सिंह यादव का जन्म 01 सितम्बर 1911 को उत्तर प्रदेश प्रदेश के ग्राम कठारा रेलवे स्टेशन-झींझक, जिला कानपुर देहात के एक समाज सुधारक सामान्य कृषक परिवार में हुआ था. पिता चौधरी गुज्जू सिंह यादव एक कर्मठ मूलनिवासी समाजी थे. इनकी माता मूलादेवी उस क्षेत्र के जनप्रिय नेता चौधरी साधो सिंह यादव निवासी ग्राम मकर दादुर रेलवे स्टेशन रूरा, जिला कानपुर की पुत्री थीं. इनके मामा चौधरी नारायण सिंह यादव एक समाज सेवी कृषक थे. मा.ललई सिंह यादव ने सन् 1928 में हिन्दी के साथ उर्दू लेकर मिडिल पास किया. सन् 1929 से 1931 तक फॉरेस्ट गार्ड भी रहे. 1931 में ही इनका विवाह ‘दुलारी देवी’ पुत्री चौधरी सरदार सिंह यादव ग्राम जरैला निकट रेलवे स्टेशन रूरा जिला कानपुर के साथ हुआ. 1933 में शशस्त्र पुलिस कम्पनी जिला मुरैना (म.प्र.) में कान्स्टेबल पद पर भर्ती हुए. नौकरी से समय निकाल कर विभिन्न शिक्षाएं प्राप्त की.

सन् 1946 ईस्वी में नान गजेटेड मुलाजिमान पुलिस एण्ड आर्मी संघ ग्वालियर कायम करके उसके अध्यक्ष चुने गए. ‘सोल्जर ऑफ दी वार’ ढंग पर हिन्दी में ‘‘सिपाही की तबाही’ किताब लिखी, जिसने कर्मचारियों को क्रांति के पथ पर विशेष अग्रसर किया. इन्होंने आजाद हिन्द फौज की तरह ग्वालियर राज्य की आजादी के लिए जनता तथा सरकारी मुलाजिमान को संगठित करके पुलिस और फौज में हड़ताल कराई जवानों से कहा कि ‘‘बलिदान न सिंह का होते सुना, बकरे बलि बेदी पर लाए गये. विषधारी को दूध पिलाया गया, केंचुए कटिया में फंसाए गये. न काटे टेढ़े पादप गये, सीधों पर आरे चलाए गये. बलवान का बाल न बांका भया, बलहीन सदा तड़पाये गये. हमें रोटी कपड़ा मकान चाहिए’’


29.03.47 को ग्वालियर स्टेट्स स्वतंत्रता संग्राम के सिलसिले में पुलिस व आर्मी में हड़ताल कराने के आरोप में धारा 131 भारतीय दण्ड विधान (सैनिक विद्रोह) के अंतर्गत साथियों सहित राज-बन्दी बने. 6.11.1947 को स्पेशल क्रिमिनल सेशन जज ग्वालियर ने 5 वर्ष सश्रम कारावास तथा पाँच रूपये अर्थ दण्ड का सर्वाधिक दण्ड अध्यक्ष हाईकमाण्डर ग्वालियर नेशनल आर्मी होने के कारण दी. वहीं दिनांक 12.01.1948 को सिविल साथियों सहित बंधन मुक्त हुये. उसी समय यह स्वाध्याय में जुट गये और एक के बाद एक इन्होंने श्रृति स्मृति, पुराण और विविध रामायणें भी पढ़ी. हिन्दू शास्त्रों में व्याप्त घोर अंधविश्वास, विश्वासघात और पाखण्ड से वह तिलमिला उठे. स्थान-स्थान पर ब्राह्मण महिमा का बखान तथा दबे पिछड़े शोषित समाज की मानसिक दासता के षड़यन्त्र से वह व्यथित हो उठे. ऐसी स्थिति में इन्होंने यह धर्म छोड़ने का मन भी बना लिया. अब वह इस निष्कर्ष पर पहुंच गये थे कि समाज के ठेकेदारों द्वारा जानबूझकर सोची समझी चाल और षड़यन्त्र से शूद्रों के दो वर्ग बना दिये गये है. एक सछूत-शूद्र, दूसरा अछूत-शूद्र, शूद्र तो शूद्र ही है, चाहे कितना सम्पन्न ही क्यों न हो.

उनका कहना था कि सामाजिक विषमता का मूल, वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था, श्रृति, स्मृति और पुराणों से ही पोषित हैं. सामाजिक विषमता का विनाश सामाजिक सुधार से नहीं, अपितु इस व्यवस्था से अलगाव में ही समाहित है. अब तक इन्हें यह स्पष्ट हो चुका था कि विचारों के प्रचार-प्रसार का सबसे सबल माध्यम लघु साहित्य ही है. इन्होंने यह कार्य अपने हांथों में लिया और 1925 में इनकी माताश्री, 1939 में पत्नी, 1946 में पुत्री शकुन्तला (11 वर्ष) और 1953 में पिताश्री इन चार लोगों की मृत्यु हो गयी. इससे मानों उनके ऊपर पहाड़ टूट पड़ा, हालांकि वे अपने पिता के इकलौते पुत्र थे. पहली स्त्री के मरने के बाद दूसरा विवाह कर सकते थे, किन्तु क्रान्तिकारी विचारधारा होने के कारण इन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया और कहा कि अगली शादी स्वतन्त्रता की लड़ाई में बाधक होगी.

अंततः साहित्य प्रकाशन की ओर भी इनका विशेष ध्यान गया. दक्षिण भारत के महान क्रान्तिकारी पेरियार ई.वी.रामसामी नायकर के उस समय उत्तर भारत में कई दौरे हुए थे. वह इनके सम्पर्क में आये. जब पेरियार रामासामी नायकर से सम्पर्क हुआ तो इन्होंने उनके द्वारा लिखित ‘‘रामायण ए टू रीडिंग’’ (अंग्रेजी में) में विशेष अभिरूचि दिखाई. साथ ही दोनों ने इस पुस्तक के प्रचार-प्रसार की, सम्पूर्ण भारत विशेषकर उत्तर भारत में लाने पर भी विशेष चर्चा हुई. उत्तर भारत में इस पुस्तक के हिन्दी में प्रकाशन की अनुमति पेरियार रामास्वामी नायकर ने ललईसिंह यादव को 01-07-1968 को दे दी.

इस पुस्तक के ‘सच्ची रामायण’ हिन्दी में 01-07-1969 को प्रकाशन से सम्पूर्ण उत्तर-पूर्व तथा पश्चिम् भारत में एक तहलका सा मच गया. पुस्तक प्रकाशन को अभी एक वर्ष ही बीत पाया था कि उ.प्र. सरकार द्वारा 08-12-69 को पुस्तक जब्ती का आदेश जारी हो गया कि यह पुस्तक भारत के कुछ नागरिक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर चोट पहुंचाने तथा उनके धर्म एवं धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने के लक्ष्य से लिखी गयी है. उपरोक्त आज्ञा के विरूद्ध प्रकाशक ललई सिंह यादव ने हाईकोर्ट आफ जुडीकेचर इलाहाबाद में क्रिमिनल मिसलेनियस एप्लीकेशन 28-02-70 को प्रस्तुत की. माननीय तीन जजों की स्पेशल फुल बेंच इस केस को सुनने के लिए बनाई गई. कोर्ट ने अपीलॉट (ललई सिंह यादव) की ओर से निःशुल्क एडवोकेट बनवारी लाल यादव और सरकार की ओर से गवर्नमेन्ट एडवोकेट तथा उनके सहयोगी पीसी चतुर्वेदी एडवोकेट व आसिफ अंसारी एडवोकेट की बहस 26, 27 व 28 अक्टूबर 1970 को लगातार तीन दिन सुनी. 19-01-71 को माननीय जस्टिस ए.के.कीर्ति, जस्टिस के.एन.श्रीवास्तव तथा जस्टिस हरी स्वरूप ने बहुमत के तीन निर्णय दिये. 1. गवर्नमेन्ट ऑफ उ.प्र.की पुस्तक ‘सच्ची रामायण’ की जप्ती की आज्ञा निरस्त की जाती है. 2. जप्तशुदा पुस्तकें ‘सच्ची रामायण’ अपीलांट ललई सिंह यादव को वापिस दी जाये और 3. गर्वर्न्मेन्ट ऑफ उ.प्र. की ओर से अपीलांट ललई सिंह यादव को तीन सौ रूपये खर्चे के दिलावें जायं.

ललई सिंह यादव द्वारा प्रकाशित ‘सच्ची रामायण’ का प्रकरण अभी चल ही रहा था कि उ.प्र. सरकार की 10 मार्च 1970 की स्पेशल आज्ञा द्वारा  ‘सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें’ नामक पुस्तक जिसमें डॉ.अम्बेडकर के कुछ भाषण थे तथा ‘जाति भेद का उच्छेद’ नामक पुस्तक 12 सितम्बर 1970 को चौ. चरण सिंह की सरकार द्वारा जब्त कर ली गयी. इसके लिए भी ललई सिंह यादव ने बनवारी लाल यादव एडवोकेट के सहयोग से मुकदमें की पैरवी की. मुकदमें की जीत से ही 14 मई 1971 को उ.प्र.सरकार की इन पुस्तकों की जब्ती की कार्यवाही निरस्त कराई गयी और सभी उपरोक्त पुस्तकें जनता को भी सुलभ हो सकी. इसी प्रकार ललई सिंह यादव द्वारा लिखित पुस्तक ‘आर्यो का नैतिक पोल प्रकाश’ के विरूद्ध भी 1973 में मुकदमा चला दिया गया. यह मुकदमा उनके जीवन पर्यन्त चलता रहा.
दिलचस्प बात तो यह है कि सच्ची रामायण के मामले में हाई कोर्ट में हारने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में अपील दायर कर दी वहाँ भी अपीलांट उत्तर प्रदेश सरकार क्रिमिनल मिसलेनियस अपील नम्बर 291/1971  निर्णय सुप्रीम कोर्ट ऑफ इण्डिया, नई दिल्ली दि. 16.9.1976 के अनुसार अपीलांट की हार हुई अर्थात् रिस्पांडेण्ट ललई सिंह यादव की जीत हुई. (सच्ची रामायण की जीत हुई) फुलबेंच में माननीय सर्वश्री जस्टिस पी.एन. भगवती जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर तथा जस्टिस मुर्तजा फाजिल अली थे.

चौधरी ललई सिंह यादव से पेरियार ललई सिंह बनने का एक ऐतिहासिक सच यह है कि महान क्रान्तिकारी पेरियार ई.व्ही.रामासामी नायकर जो गड़रिया (पाल-बघेल) जाति के थे, के संघर्षमय जीवन का लम्बा इतिहास है. 20 दिसम्बर 1973 को उनका निर्वाण हो गया, इनके जीवन काल से ही इनका जन्मोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाने लगा था. इनकी मृत्यु के पश्चात् एक विशाल सभा में चौधरी ललई सिंह यादव को भी भाषण के लिए बुलाया गया. निर्वाण प्राप्त रामासामी नायकर की श्रद्धांजलि सभा में दिये गये इनके भाषण पर दक्षिण भारतीय मुग्ध हो गये. इनके भाषण की समाप्ति पर तीन नारे लगाये गये ‘‘अब हमारा अगला पेरियार’’ बस इसी नारे की आवाज ने चौधरी ललई सिंह यादव से पेरियार ललई सिंह की नई पहचान देकर फिर से पेरियार ई.वी.रामासामी नायकर के संघर्ष को पुर्नजीवित कर दिया.
इस घटना के बाद से ही इनके नाम के पूर्व पेरियार ‘शब्द’ का शुभारम्भ हुआ. दक्षिण भारत में पेरियार शब्द जातिवादी नहीं अपितु क्रांतिकारी, स्वच्छ, निष्पक्ष, निर्भीक और सागर के अर्थों में प्रयोग किया जाने वाला सम्मान सूचक शब्द है. साहित्य प्रकाशन के लिए उन्होंने एक के बाद एक तीन प्रेस खरीदे. शोषित पिछड़े समाज में स्वाभिमान व सम्मान को जगाने तथा उनमें व्याप्त अज्ञान, अंधविश्वास, जातिवाद तथा ब्राह्मणवादी परम्पराओं, व्यवस्थाओं को ध्वस्त करने के उद्देश्य से वह लघु साहित्य के प्रकाशन की धुन में अपनी 59 बीघे जमीनों को कौड़ियों के भाव बेचकर प्रकाशन के कार्य में आजीवन जुटे रहे. अंततः 7 फरवरी 1993 को वह चमकता सूरज अस्त हो गया.

सिद्धार्थ शिवा विद्यार्थी

छात्र, इलेक्ट्रिकल इंजीनियर
गोयल ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूट टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट, बराबंकी (लखनऊ)

शासक जातियों का झूठा रिसर्च झूठा दावा, आर्य ब्राह्मणों के बदमाशी को छिपाने की कोशिश

भारतीय इतिहास को फिर से छेड़छाड़ करने लगा शासक वर्ग


आर्यों द्वारा भारत पर आक्रमण की थ्योरी पूरी तरह झूठी: प्रो.वसंत शिंदे
राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

आर्य ब्राह्मणों द्वारा अपने को विदेशी होने का साहित्यक और पुरातात्तिवक प्रमाणों पर भले ही अनर्गल और भ्रामक दलील दें, परन्तु 21 मई 2001 के आनुवंशिक डीएनए शोध प्रमाण के आगे उनके मुँह पर ताला लग गया है. इसलिए आर्य ब्राह्मण बौखला गये हैं. उताह विश्वविद्यालय साल्टकेक सिटी अमेरिका के डाॅ.माइकल वामशाद और आंध्र विश्वविद्यालय विशाखापट्टनम के मानवशास्त्र के प्रो. बी. भास्कर राव के संयुक्त आनुवंशिक शोध ने प्रमाणित कर दिया कि उच्चवर्ण जातियाँ यूरेशियन अर्थात विदेशी हैं. बता दें कि आरएसएस से संबंध रखने वाले एस. तालेगारी, केडी सठना, एसपी गुप्ते, बीएस गिडवानी आदि आर्य ब्राह्मण इतिहासकारों ने अपने धोखेभरी बातों से यह प्रमाणित करने की कोशिश की थी कि आर्य विदेशी नहीं है. इसके लिए उन्होंने डाॅ.बाबासाहब अम्बेडकर के नाम का भी दुरूपयोग किया था ताकि, उनके इस कपटपूर्ण और धोखेभरी बातों का मूलनिवासी बहुजनों का समर्थन मिल सके.

यही नहीं आर्य ब्राह्मणों ने सिंधू घाटी सभ्यता और मोहनजोदड़ो को गलत साबित करने के लिए उन्होंने अलग से नकली खुदाई कराकर स्वयं द्वारा प्रत्यापित सामग्रियों को निकालकर कम्प्यूटर के द्वारा अपने कुतर्क को प्रमाणित करने की कुचेष्टा की थी. उनका छल तब पकड़ा गया जब वह मूलनिवासी संस्कृति के प्रतीक ‘साँड़’ को विदेशी आर्य संस्कृति के प्रतीक ‘घोड़ा’ के रूप में परिवर्तित करने की कोशिश की थी. ठीक वही रवैया अब हरियाणा के राखीगढ़ी में अपना रहे हैं.

गौरतलब है कि भारत में आर्यों का आगमन और आर्यों द्वारा अनार्यों पर आक्रमण करने वाले इतिहास को शासक वर्ग झूठा साबित करने के लिए पहले जैसा फिर से धोखेबाजी करने का काम शुरू कर दिया है. इससे वह यह साबित करना चाहते हैं कि भारत के मूल निवासियों पर आर्यों के आक्रमण की थ्योरी पूरी तरह से गलत है. जबकि, ठीक इसके उलट बता रहे हैं कि उस काल में भारत के मूल निवासियों पर किसी तरह का आक्रमण हुआ ही नहीं था. बल्कि, भारत के ही लोगों के कुछ पूर्वज ईरान और तु्र्कमेनिस्तान जैसे मिडल ईस्ट देशों में गए थे.
बताते चलें कि हरियाणा के हिसार में स्थित राखीगढ़ी पर रिसर्च कर रही आर्य ब्राह्मणों की टीम के निदेशक प्रोफेसर वसंत शिंदे ने बताया कि भारत पर आर्यों के आक्रमण की कहानी पूरी तरह गलत है. राखीगढ़ी में दबे शवों के कंकालों के डीएनए परीक्षण के बाद यह तथ्य सामने आया है कि हड़प्पाकालीन भारतीय क्षेत्र में रह रहे लोग ही समय के साथ दक्षिण के राज्यों तक गए थे. उन कंकालों के डीएनए और आज के दक्षिण भारतीय लोगों के डीएनए यह बात साबित करते हैं. जबकि, यह सरासर झूठ है.

क्योंकि राखीगढ़ी में जो कंकाल मिले हैं वो 3 हजार साल पुराने है. उनका डीएनए जाँच किया गया, जिसमें ब्राम्हणों का डीएनए ही नही मिला. केवल एससी, एसटी, ओबीसी और मायनाॅरिटी का ही डीएनए मिला. लेकिन, आर्य ब्राह्मणों ने गलत प्रचार शुरू कर दिया कि जो राखीगढ़ी में शोध हुआ उसमें डीएनए के अनुसार आर्यों ने न तो यहाँ के मूलनिवासियों पर आक्रमण किया और न ही भारत पर आक्रमण किया था. इस तरह से उन्होंने कहा कि यहाँ के मूलनिवासियों पर कभी किसी भी प्रकार का कोई आक्रमण नहीं हुआ है. जबकि, इसतिहास गवाह है कि खुद आर्य ब्राह्मण इतिहासकारों ने लिखित दस्तावेज के रूप में लिखकर रखा है कि आर्यो ने भारत और यहाँ के मूलनिवासियों पर आक्रमण किया था. इसका मतलब यह हुआ कि शासक वर्ग बामसेफ द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन से बौखला गया है. इसलिए वे भारत के गौरवशाली मूलनिवासी इतिहास को झूठ और आर्य ब्राह्मणों द्वारा प्रोपगंडा फैलाये जा रहे झूठे इतिहास को सही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं.