मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

कांशीराम साहब के ‘कलम’ वाली परिभाषा की यादें


अपने कैडर में मान्यवर कांशीराम साहब एक बहुत दिलचस्प किस्सा बताते थे. इस किस्से के जरिए तमाम लोग मान्यवर साहब की बातों को अच्छी तरह से समझ जाते थे. असल में मान्यवर कांशीराम साहब जिस मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों के बीच काम कर रहे थे, जिन्हें जगा रहे थे उसका उस समाज को बहुसंख्यक हिस्सा गरीब और कम पढ़ा-लिखा था. उन्हें उनकी ही भाषा में समझाना जरूरी था, इसलिए कांशीराम साहब उनको उसी भाषा में समझाने के लिए किस्सों का सहारा लेते थे. इस लिहाज से कांशीराम साहब ऐसे-ऐसे किस्से ढूंढ़ लाते, जिससे बहुजन समाज के लोग उनकी बात आसानी से समझ जाते थे. जैसे बाबासाहब को वह टाई वाले बाबा कहते थे और महात्मा ज्योतिराव फुले को पगड़ी वाले बाबा कहकर संबोधित करते थे. जब वो मूलनिवासी बहुजन समाज को इनके बारे में बताते थे तो ऐसे संबोधन सुनकर सभी लोग तुरंत उनकी बातों को समझ जाते कि आखिर मान्यवर साहब किसके बारे में बात कर रहे हैं.

इसी तरह से कांशीराम साहब एक कलम के जरिए अपनी बात समझा रहे थे. हाथ में कलम लिए उनकी यह फोटो काफी चर्चित है. कांशीराम साहब यह पूछते कि कलम चलती कैसे है? लोग बताते थे कि स्याही या लीड से कलम चलती है. फिर कांशीराम साहब पूछते थे कि दिखता क्या है? जाहिर सी बात है मौजूद लोग पेन के कवर को बताते थे. कांशीराम साहब लोगों को फिर यह समझाते थे कि पेन का काम सिर्फ लिखना होता है और लिखने का काम पेन की लीड करती है. फिर वे बताते थे कि अगर पेन का कवर न हो तो भी पेन लिखता रहेगा. वे पेन की कवर को दिखाते हुए कहते थे कि असली ताकत दिखने वाले इस पेन की कवर में नहीं है, बल्कि लिखने वाली स्याही में है. अगर, पेन का कवर फेक दिया जाय तो भी पेन अपना काम करेगा. कवर तो सिर्फ दिखावे के लिए है.

कांशीराम साहब ने कलम दर्शन समझाते हुए बताते थे कि कलम का बड़ा हिस्सा पच्चासी परसेंट है और असली ताकत भी पच्चासी परसेंट के पास ही है और जो ऊपर का हिस्सा पेन का कवर है वह 15 परसेंट है. 15 परसेंट में कोई ताकत नहीं है वह सिर्फ दिखावे के लिए है. जब पचासी पर्सेंट काम करता है तो 15 परसेंट हिस्सा उसके सिर पर सवार हो जाता है और अपनी हुकूमत का एहसास कराता है. इसे वह मूलनिवासी बहुजन समाज से जोड़ते हुए कहते थे कि देश के 85 फीसदी मेहनतकश लोग ही देश की असली ताकत हैं, लेकिन ताकत होते हुए भी वह लाचार हैं. जबकि, 15 फीसदी लोगों के पास कोई ताकत नहीं है, लेकिन इसके बाद भी वे ताकतवर बने हैं और सत्ता पर कब्जा किये हैं. कांशीराम साहब की ऐसी ही परिभाषाओं ने मूलनिवासी बहुजन समाज को उसकी ताकत का अहसास कराया, जिसके बूते मूलनिवासी बहुजन समाज सत्ता के शिखर तक पहुंच सकी. 

आज वर्तमान समय में मूलनिवासी बहुजन समाज अपनी उसी ताकत को खोता जा रहा है. क्या आज मूलनिवासी बहुजन समाज को मान्यवर कांशीराम साहब की ‘कलम’ वाली परिभाषा याद है? इसी जरिए कांशीराम साहब समझाना चाहते थे कि लिखता कौन है (स्याही) यानी की असली ताकत किसके हाथ में है और दिखता कौन है (कवर) यानी बिना मेहनत किए कौन राजा बना बैठा है. बहुजन समाज के हर व्यक्ति को मान्यवर कांशीराम साहब द्वारा दी गई इस परिभाषा से सीख लेते हुए अपनी ताकत को पहचानना होगा. यही मूलनिवासी बहुजन समाज की उनके 13वीं स्मृति दिन पर सच्ची आदरांजलि होगी. 

बहुजन आंदोलन के सजग प्रहरी बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम साहब




मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल।
मगर, लोग साथ जुड़ते गए और कारवाँ बढ़ता गया।।  
  
‘‘राजनीती चले न चले, सरकार बने न बने. लेकिन, सामाजिक परिवर्तन की गति किसी भी कीमत पर नहीं रुकनी चाहिए :  मान्यवर कांशीराम साहब ’’   

मूलनिवासी बहुजन महापुरुषों के सदियों से चली आ रही ‘‘व्यवस्था परिवर्तन’’ के इस सामाजिक आन्दोलन के बारे में मान्यवर कांशीराम साहब कहा करते थे कि ‘‘राजनीती चले न चले, सरकार बने न बने. लेकिन, सामाजिक परिवर्तन की गति किसी भी कीमत पर नहीं रुकनी चाहिए’’ आज से लगभग २५०० वर्ष पूर्व तथागत गौतम बुद्ध द्वारा असमानता, जातिवाद और भेदभाव से युक्त सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ शुरू किया गया सामाजिक परिवर्तन का आन्दोलन चक्रवर्ती सम्राट अशोक से लेकर, संत रविदास, संत कबीर, वीर मेघमाया से होते हुए छत्रपति शाहूजी महाराज, राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले, माता सावित्रीबाई फुले, भारतरत्न बाबासाहब डॉ आंबेडकर तक आ पहुँचा.इन सभी महापुरुषों और माताओं ने अपने-अपने समयकाल में सैकड़ों कठिनाइयों का सामना करते हुए अथक संघर्ष, त्याग और बलिदान देकर मूलनिवासी बहुजनों का आंदोलन खड़ा किया. इस आंदोलन को डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर ने मनुवादियों से अकेले संघर्ष कर सदियों से दबे-कुचले, पिछड़े समाज को लिखित संवैधानिक अधिकार दिलाने में कामयाब हुए. बाबासाहब का अपने अनुयायियों को अंतिम संदेश था की, ‘‘मैं बहुत मुश्किल से इस कारवाँ को इस स्थिति तक लाया हूँ, जहाँ यह आज दिखाई दे रहा है. इस कारवाँ को आगे बढ़ने ही देना है, चाहे कितनी ही बाधाएं, रुकावटें या परेशानियाँ इसके रास्ते में क्यों न आएं. यदि मेरे लोग इस कारवाँ को आगे नहीं ले जा सकें, तो उन्हें इसे यहीं इसी दशा में छोड़ देना चाहिए, पर किसी भी हालत में कारवाँ पीछे नहीं जानी चाहिए’’



डॉ.बाबासाहब के महा-परिनिर्वाण के बाद उनका ये कारवाँ कुछ रुक सा गया था. इस मिशन को कोई मार्गदर्शक न मिला, जो इसे आगे बढ़ा सके और मंजिल तक ले जा सके. लगभग 22-23 साल तक मूलनिवासी बहुजन समाज में स्वाभिमानी नेतृत्व उभर कर नहीं आया, अगर कोई उभर कर आया भी तो वह कांग्रेसियों की चौखट पर उनके तलवे चाटने चला गया. अब मूलनिवासी बहुजनों के हकों की बागडोर चमचे और भडवे लोगों के हाथों में चली गई. ये चमचे अपना तो पेट भरते रहे, लेकिन अछूतों को भूखा मरने के लिए छोड़ दिया. ऐसे में डॉ. बाबसाहब अम्बेडकर के मूवमेंट को नेतृत्व प्रदान करने के लिए मान्यवर कांशीराम साहब का जन्म हुआ. मा.कांशीराम साहब का जन्म पंजाब के रोपड़ जिले में ख्वासपुर गांव में 15 मार्च, 1934 में रामदासिया चमार जाति में हुआ था. उनका बचपन अपने गांव ख्वासपुर में ही बीता और वहीं उनकी प्राथमिक शिक्षा पूरी हुई. 1956 में उन्होंने रोपड़ आकर बीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण की. 1957 में उन्होंने ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ की प्रतियोगात्मक परीक्षा पास की और प्रशिक्षण के लिए चले गए. लेकिन, प्रशिक्षण के दौरान उनसे सर्विस ब्रांड भरने को कहा गया तो उन्होंने नौकरी छोड़ दी. इसके बाद वह पूना के रक्षा विज्ञान एवं अनुसंधान विकास संस्थान की ‘एक्सप्लोसिव रिसर्च लेबोरेटरी’ में अनुसंधान सहायक पद पर कार्यरत हो गए. इसी दौरान मा. कांशीराम साहब के साथ ऐसी घटना घटित हुई कि मान्यवर साहब की दिशा ही बदल दी.


पूना के रक्षा अनुसंधान संस्थान में मा.दीनाभाना साहब चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे. उनके द्वारा बुद्ध और अंबेडकर जयंती पर अवकाश को लेकर ब्राह्मण अधिकारी से विवाद हो गया. ब्राह्मण अधिकारी ने मा.दीनाभाना साहब को निलंबित कर दिया. इस घटना ने कांशीराम को झकझोर दिया. इसके बाद उसी संस्थान में मा.डीके खापर्डे साहब भी थे. कांशीराम साहब की मुलाकात मा. डीके खापर्डे साहब से हुई. इसके बाद कांशीराम साहब और डीके खापर्डे साहब किसी की कोई परवाह किए बगैर मा. दीनाभाना साहब की कानूनी मदद की और न्यायालय तक ले गए, जहाँ उनकी जीत हुई. उसके बाद मा. दीनाभाना साहब को वापस लिया गया और बुद्ध, डॉ.अम्बेडकर जयंती की छुट्टी भी बहाल हुई. दीनाभाना साहब और डीके खापर्डे साहब ने मान्यवर कांशीराम को डॉ.बाबसाहब अम्बेडकर की लिखी किताब ”एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’’ पढ़ने के लिए दिया जिसे पढ़कर मान्यवर कांशीराम साहब ज्यादा प्रभावित हुए. अब उनको समझ में आ गया था कि ‘जाति’ ही सामाजिक व्यवस्था की सारी बुराईयों की जड़ है. उसके बाद कांशीराम 1964 में अपनी नौकरी छोड़ पूरी तरह सामाजिक एवं राजनीतिक बदलाव के लिए समर्पित हो गए. उन्होंने अपने पारिवारिक दायित्वों से मुक्ति पाने के लिए आजीवन अविवाहित रहने का निश्चय भी ले लिया. कांशीराम ने अपने घरवालों को एक खत भेजा जिसमें साफ लिखा था ‘‘जब तक बाबासाहेब का सपना पूरा नहीं हो जाता, चैन से नहीं बैठूंगा’’

कांशीराम साहब मूलनिवासी बहुजन समाज को संगठित करने के लिए जुट गए और 6 दिसम्बर, 1978 को मा.दीनाभाना, मा.डीके खापर्डे और मा.कांशीराम साहब ने अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों को संगठित करने के लिए ‘‘बामसेफ’’ की स्थापना की. बामसेफ के माध्यम से कांशीराम साहब ने कार्यकर्ताओं की फौज और आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए निकल पड़े. फिर उन्होंने 6 दिसम्बर, 1981 को ‘डीएसफोर’ का गठन किया. मूलनिवासी बहुजन समाज की चेतना का प्रचार-प्रसार करने के लिए कांशीराम साहब ने साइकिल यात्राओं, जन संसदों, जन सभाओं आदि का आयोजन व्यापक स्तर पर किया. इन कार्यक्रमों का सिलसिला दक्षिण में कन्याकुमारी, उत्तर में कारगिल, उत्तर पूर्व में कोहिमा, पश्चिम में पोरबंदर और पूर्व में उड़ीसा से शुरु होकर पूरे देश में चलता हुआ दिल्ली में सम्पन्न हुआ. 6 दिसम्बर, 1983 से 15 मार्च, 1984 तक चले इस सौ दिनों के जन जागरण अभियान में लगभग तीन लाख लोगों ने हिस्सा लिया. कांशीराम साहब ने बामसेफ और डीएसफोर के 14 अप्रैल, 1984 को ‘बहुजन समाज पार्टी’ का गठन किया और बामसेफ की कमान मा.डीके खापर्डे साहब को सौंपकर बाहर हो गये. कांशीराम साहब कहते थे कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने अपनी सत्ता को कायम रखने के लिए मूलनिवासी बहुजन समाज को छः हजार जातियों में विभाजित कर दिया. इसलिए मा.कांशीराम साहब ने इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था को नष्ट करने के लिए छः हजार जातियों को संगठित करने के लिए अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया. ऐसे मूलनिवासी बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम साहब के 13वें स्मृति दिवस पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से कोटि-कोटि नमन्.

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

पूना पैक्ट से ओबीसी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ




अगर पूना करार नहीं होता तो संविधान में ओबीसी को न सिर्फ धारा 340 मिलता, बल्कि मूलअधिकार के तहत 26 जनवरी 1950 से ही ओबीसी को आरक्षण मिल जाता. पूना समझौता होने के कारण 26 जनवरी 1950 को कुछ नहीं मिला, सिर्फ धारा 340 मिला. बाबासाहब ने 10 नवम्बर 1951 को मंत्री पद से जब इस्तीफा दिया तो उन्होंने लिखा कि ‘‘हम अपने ओबीसी के लिए संविधान में कुछ नहीं कर पाए. हमने एक आयोग स्थापित करने की बात की थी. लेकिन, सरकार ने उसको भी नहीं माना’’ उसका धिक्कार करते हुए उनहोंने इस्तीफा दिया.

अगर पूना करार नहीं होता, तो 1952 के चुनाव में एससी, एसटी, ओबीसी, बीजेएनटी और मायनॉरिटी बाबासाहब के पक्ष में खड़े हो जाते. 1952 के इलेक्शन के नतीजे बदल जाते और जो कांग्रेस को पूरा का पूरा समर्थन मिला, वो नहीं मिल पाता. इसी तरह 1957 के चुनाव में भी बदल जाता और 1956-70 के आते-आते एससी, एसटी, ओबीसी, मायनॉरिटी को सत्ता का सूत्र हम मूलनिवासी बहुजनों के हाथ में आ जाता. हम 1970 तक इस देश में आजाद हो गए होते, लेकिन ऐसा पूना करार होने के कारण नहीं हो पाया. पूना पैक्ट के कारण तीन और बातें हुई. पहली बात हुई कि पूना समझौता में कहा था कि दस साल बाद इस करार का रिव्यु किया जायेगा. पूना करार ही हमें चर्चा करने के लिए कहती है. सन् 1942 में रिव्यु होना था, लेकिन नहीं हो पाया. 1952 में हम स्वतंत्र हो गए थे. बाबासाहब के बजाय खास करके कांग्रेस ने रिव्यु नहीं किया. 1962 और 1972 में भी रिव्यु नहीं हुआ. लेकिन, 1982 में मान्यवर कांशीराम साहब ने जब पूना पैक्ट को 50 साल पूरे हुए तो उसके खिलाफ आवाज उठाई. उसके बाद से बामसेफ संगठन लगातार चर्चा कर रहा है.

बाबासाहब ने फन्डामेंटल राईट में धारा 15(4) और 16(4) में कहते हैं कि ‘‘शिक्षा और नौकरी के आरक्षण में जब तक हमारा पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हो जाता तब तक आरक्षण मिलना चाहिए’’ ‘‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी की बात बाबासहाब फंडामेंटल राईट में कहते हैं. अगर पूना करार नहीं होता तो ये सिर्फ एससी और एसटी के लिए ही नहीं बनता, बल्कि एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लिए भी बनता. ओबीसी के आरक्षण की बात आजादी मिलने के 70 साल बाद भी सुप्रीम कोर्ट में लटक रही है. पूना करार के कारण ओबीसी को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. सबसे बड़ा धोखा ओबीसी के साथ हुआ, लेकिन बात करते समय लोग कहते हैं कि बाबासाहब अछूतों और अनुसूचित जनजातियों के नेता हैं, इसलिए नुकसान एससी और एसटी को हुआ. यह एकदम गलत बात है. एससी और एसटी को नुकसान तो हुआ ही, लेकिन सबसे जयादा नुकसान ओबीसी को हुआ, इसलिए ओबीसी को संविधान में धारा 340 के अलावा कुछ भी नहीं मिल.

बता दें कि 1932 में कम्युनल अवार्ड के तहत मुसलमान, ईसाई और सिक्खों को भी अलग से आरक्षण मिला था, लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद मौलाना आजाद और नेहरू ने पाकिस्तान बनने का कारण देकर इसे खत्म कर दिया. अगर, पूना पैक्ट नहीं होता तो मुसलमान, क्रिश्चन और सिख भी बाबासाहब के साथ जुड़ जाते और 1950 में उनका आरक्षण खत्म नहीं होता. मैं यह साबित करना चाहता हूं कि पूना पैक्ट के कारण इस देश के मुसलमानों, क्रिश्चयन और सिखों का भी अधिकार छीन लिया गया. अंत में बाबासाहब का एक स्टेटमेंट दोहराना चाहता हूँ जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘‘अगर सेप्रेट इलेक्टोरेट होता तो उनको जो सबसे अच्छा च्वाईस है, चुन सकते थे. अब ज्वाईंट इलेक्टोरेट होने से वे सबसे अच्छा च्वाइस नहीं चुन सकते हैं. दूसरी बात, बाबासाहब ने कहा था कि ‘बातें और भी बिगड़ जायेंगी और भी नुकसान हो जायेगा. क्योंकि आने वाले समय में पूना पैक्ट के तहत संविधान में चुनाव की पद्धति बनेगी. बाबासाहब ने ये बातें स्टेट एण्ड मायनॉरिटी में लिख रखी है. आगे बाबासाहब कहते हैं कि ‘पूना करार द्वारा हमें पूरी तरह डिसफ्रेन्चाईज (मत के अधिकार से वंचित) कर दिया गया. ये इतना गम्भीर मामला है कि लोकतंत्र में लोगों की सत्ता होती है. लोकतंत्र में लोगों को मतदान का अधिकार होता है. आज हमें मतदान का अधिकार है, लेकिन वो दिखावे के लिए है. हम अपना प्रतिनिधि संसद में चुनकर नहीं भेज सकते, इसलिए बाबासाहब कहते हैं कि हमें डिसफ्रेंचाईज किया गया अर्थात मतदान के अधिकार से वंचित किया गया.

एक बात और बताना चाहता हूँ कि पूना पैक्ट ने तो हमारा मताधिकार खत्म कर ही दिया, बाकी बचे मताधिकार को वर्तमान में ईवीएम के द्वारा खत्म किया जा रहा है. पूना पैक्ट के द्वारा बहुजन समाज के साथ धोखा किया गया, इससे दो धोखा हुआ. एक तो एकजुट होकर अपने अधिकार के लिए लड़ने में बाधा डाली गयी और दूसरी बात उन्हें मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया. हम आज तक मतदान के अधिकार से वंचित हैं. हम अपने लोगों को चुनकर नहीं भेज सकते हैं. आज फिर से सेप्रेट इलेक्टरेट को लाना संभव नहीं है. क्योंकि, 1932 में देने वाले ब्रिटिश थे, लेकिन आज सरकार में ब्राह्मणवादी लोग हैं, हम मांगेंगे भी, तो देंगे नहीं. इसलिए सेप्रेट इलेक्शन की मांग करने के बजाए हमें आंदोलन के माध्यम से छीनना होगा. इसके लिए हमें लोगों को पूना पैक्ट की जानकारी देनी होगी और एससी, एसटी, ओबीसी और मायनॉरिटी के बीच भाईचार कायम करनी होगी. बामसेफ के माध्यम से अब बड़े पैमाने एससी, एसटी, ओबीसी और मायनॉरिटी में जागृति पैदा हुई है. अब लोग एक मंच पर आकर अपने अधिकार के लिए आवाज उठा रहे हैं. इस आवाज को और ज्यादा बुलंद करने के लिए हमें अपने मूलनिवासी बहुजन समाज को जागृत करना होगा और आंदोलन के लिए तैयार करना होगा. अगर, हम ऐसा करते हैं राष्ट्रव्यापी आन्दोलन के माध्यम से आजादी हासिल कर सकते हैं.

धर्म परिवर्तन हुआ, लेकिन विचार परिवर्तन नहीं हुआ : वामन मेश्राम



विचार परिवर्तन ही हर तरह का मूल है. मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों की सबसे बड़ी जरूरत परिवर्तन है और परिवर्तन हमारी सबसे बड़ी जरूरत है. क्योंकि, परिवर्तन से ही हमारी सभी समस्याओं का समाधान होने वाला है. इसलिए परिवर्तन हमारी सबसे बड़ी जरूरत है. अब परिवर्तन कैसे होगा? यह सबसे बड़ी समस्या है. अगर, हम इस समस्या का समाधान कर लें तो हमारी सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है. मूलनिवासी बहुजन समाज के पढ़े-लिखे लोग, बुद्धिजीवी लोग और संगठन बनाने, चलाने वाले मूलनिवासी बहुजनों के हजारों संगठन हैं. ये लोग सोंचते हैं कि परिवर्तन चारिटी करने से होगा, परिवर्तन संगठन बनाने और संगठन चलाने से होगा. कुछ लोग सोंचते हैं परिवर्तन बेलफेयर चलाने से, सोशल वर्क आदि करने से परिवर्तन होगा. कुछ लोग स्कूल-कॉलेज खोलने की सलाह देते हैं. उन्हें यह मालूम नहीं है कि हमारे समाज के बहुत सारे स्कूल-कॉलेज हैं. मगर, हमारे समाज का परिवर्तन नहीं हो रहा है. इसमें से किसी से भी परिवर्तन नहीं होगा. आखिर क्यों परिवर्तन नहीं होगा? क्योंकि स्कूल-कॉलेज हमारे हैं. लेकिन, स्कूल ऑफ थॉट हमारी नहीं है. अभ्यास-क्रम हमारी नहीं है. इस तरह से हमारे मूलनिवासी बहुजन समाज का परिवर्तन होने वाला नहीं है. अब सवाल है कि आखिर परिवर्तन कैसे होगा? यूरोप के बेस्टन थींकर ‘‘जौन स्टोड मील’’ का कहना है कि ‘‘अगर आप समाज में मूलभूत परिवर्तन करना चाहते हो तो लोगों के मौलिक विचार, सोच में परिवर्तन करना होगा. इसलिए सोच में परिवर्तन करने का काम सिर्फ विचार ही करता है. एक विचार को बदलने का काम दूसरा विचार ही करता है.

आप सामाजिक परिवर्तन, राजनैतिक परिवर्तन, धार्मिक परिवर्तन और आर्थिक परिवर्तन यानी सभी तरह के परिवर्तन बिना विचार परिवर्तन किये बगैर नहीं कर सकते हो. इसलिए हर परिवर्तन का मूल विचार परिवर्तन है. अगर, आप समाज मे परिवर्तन लाना चाहते हो तो समाज में रहने वाले लोगों के विचार में परिवर्तन करना होगा. यह बात मूलनिवासी बहुजन समाज के हजारो संगठन चलाने वाले लोगों को सोचना होगा. विचार भी प्रासंगिक होनी चाहिए, विचार टमाटर की तरह होता है. जिस तरह टमाटर को चार-पाँच दिनों तक छोड़ देने पर सड़ जाता है. ठीक उसी तरह से विचार का डेली अपडेट न करने से भी विचार टमाटर की तरह सड़़-गल जाता है, खत्म हो जाता है, मर जाता है. मरा हुआ विचार, किसी जिंदा आदमी में परिवर्तन नहीं ला सकता है. इसलिए विचार को प्रतिदिन अॅपडेट, निरंतर (प्रचार-प्रसार) करना पड़ता है, विचार में डेली एडिशन और डेलीगेशन करना पड़ता है. तथागत बुद्ध कहते हैं कि ‘‘दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है, दुनिया का हर चीज परिवर्तनशील है’’ जो भी परिवर्तन के विरोध में व्यवहार करता है वह परिवर्तन वहीं रूक जाता है. जैसे पानी का अवरोध करने पर पानी एक जगह रूक जाता है. पानी जहाँ भी रूक जाता है पानी वहीं सड़ जाता है.

मार्क्स ने कहा है कि ‘‘विचार ही दुनिया पर राज करता है’’ जो शासक होता है वह विचार को ही माध्यम बनाता है, हथियार बनाता है. जैसे, राम जन्म भूमि का आन्दोलन नहीं हुआ होता तो, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार दिल्ली में नहीं बनी होती. ‘‘आईडिया स्मूथ द सोसाएटी’’ आडवाणी ने कहा मैं राम का मंदिर बनाना चाहता हूँ, लेकिन मुसलमान नहीं बनने देना चाहते हैं. इस पर मूलनिवासी बहुजन समाज के लाखों लोग जो मंडल कमीशन का आन्दोलन चल रहा था उसे छोड़कर कमंडल के आन्दोलन में चले गये. यानी दिमाग में पहले विचार आता है फिर उस विचार पर अमल किया जाता है और विचार के अनुसार कार्य होता है. विचार समाज को बदलने का काम करता है. विचार को हथियार बनाकर ही परिवर्तन कर सकते हैं. दुनिया में कोई भी मूलभूत परिवर्तन करना चाहता है तो विचार ही मूलभूत परिवर्तन कर सकता है. 

रशियन फिलॉस्फी रनाथोनी ने अपने ग्रंथ प्रिंसपल ऑफ फिलॉस्फी’’ में लिखा है कि ‘‘दुनिया के हर देश में शासन करने वाला शासक वर्ग अल्पसंख्य होता है और वह एक सक्षम विचारधारा से बहुसंख्य लोगों पर राज करता है. अगर, वह मिलिट्री, पुलिस और हथियार आदि से दीर्घकाल तक राज करना चाहता है तो नहीं कर सकता है’’ अगर आप दीर्घकालीन राज करना चाहता हैं तो आपको एक सक्षम विचारधारा की जरूरत होगी. अगर, आपने विचारधारा बनाया और उस विचारधारा का निरंतर प्रचार-प्रसार किया तो लाखो-करोड़ों लोग उस विचारधारा को स्वीकार करेंगे और आपको शासन-सŸा पर पहुँचाने का काम करेंगे. आपको मान्यता देंगे और कहेंगे कि आप हमारे ऊपर राज करो. यानी शासक लोग शाषित लोगों के ऊपर विचारधारा से राज स्थापित करता है. ठीक उसी तरह अगर शाषित वर्ग शासक वर्ग को बदलना चाहता है और शासक को बदलकर शासक बनना चाहता है तो शाषित को सबसे पहले विचार का निर्माण और विकास करना होगा. तथागत बुद्ध दुनिया के पहले ऐसे क्रांतिकारी हैं जिन्होंने विचार से क्रांति की थी.

बौद्ध धम्म में अशोक विजयादशमी का एक ऐतिहासिक महत्व है. 1956 में अशोक विजयादशमी को 2,500 साल पूरे होने जा रहे थे. डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर मूलनिवासी बहुजनों को उस विरासत के साथ जोड़ देना चाहते थे. बाबासाहब ने महापुरूषों और उनके इतिहास के साथ मेल बनाने का प्रयास किया. इसलिए डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में लाखों अनुयायियों के साथ ‘धम्म दीक्षा’ लिया. यह इतिहास की सबसे बड़ी घटना थी. विजयादशमी भारत के इतिहास का इतना बड़ा दिन था, कि उस दिन को लोग त्यौहार के रूप में मानते हैं. तथागत बुद्ध 90 वर्ष की उम्र तक निरंतर विचार का प्रचार-प्रसार करते रहे. इतना ही नहीं मरने के आखिरी दिन भी नंद भिक्खु के घर पर विचार का प्रचार करते हुए कहा ‘‘चरथं भिक्वें चारकं, बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय, लोकानु कंपाय, अन्तानु हिताय, आदि कल्याण, मध्य कल्याण, अंत कल्याण’’

 बुद्ध ने कोई स्कूल-कॉलेज नहीं खोला फिर भी परिवर्तन कर दिया.
‘‘बुद्धजन हिताय-बुद्धजन सुखाय’’ का विचार, ‘‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’’ इस सिद्धान्त के विरोध में है. क्योंकि, विदेशी आक्रमणकारी आर्य ब्राह्मणों ने जिस वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया उस व्यवस्था के विरोध में तथागत बुद्ध ने जीवनपर्यंत संघर्ष किए. इतिहास समझने की कोशिश करनी होगी कि ब्राह्मण तथागत बुद्ध के इतने ज्यादा विरोधी क्यों थे? इसलिए विरोधी थे, क्योंकि बुद्ध वर्ण व्यवस्था के विरोधी थे. बुद्ध ने ब्राह्मणों का ऐसा कोई तर्क नहीं छोड़ा जिस तर्क का ब्राह्मणों ने वर्ण-व्यवस्था निर्माण करने के लिए आधार बनाया था. ब्राह्मणों के प्रत्येक तर्क का तथागत बुद्ध ने खंडन किया. ब्राह्मणों के पास अपनी विषमतावादी व्यवस्था का समर्थन करने के लिए कोई तर्क नहीं बचा. परिणामतः वर्ण व्यवस्था की नींव कमजोर हुई और खत्म हो गई. आपके पास भविष्य की दृष्टि होनी चाहिए. जिन लोगों को वर्तमान का आंकलन नहीं होता, उन्हें वर्तमान की समझ नहीं होती है और वे लोग भविष्य का कोई कार्यक्रम निर्धारित नहीं कर सकते हैं. भविष्य के लिए यदि कोई कार्यक्रम बनाना है तो उसके लिए वर्तमान की समीक्षा करनी होगी. 

मनुष्य धर्म के लिए नहीं, बल्कि धर्म मनुष्य के लिए बना है : डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर



डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर 14 अक्टूबर 1956 को लाखों अनुयायियों के साथ नागों की प्रवित्र भूमि नागपुर में बौद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण की. इस धम्म दीक्षा समारोह को 63 साल पूरे होने जा रहे हैं. डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने 14 तरीख ही क्यों चुना? क्योंकि, 1956 में 14 अक्टूबर को अशोक विजयादशमी का दिन था. इसलिए बाबासाहब अम्बेडकर ने 14 तारीख को नहीं, अशोक विजयादश्मी को ध्यान में रखते हुए अशोक विजयादशमी का दिन चुना था. डॉ.अम्बेडकर द्वारा धम्म दीक्षा समारोह के लिए अशोक विजयादशमी का ही दिन क्यों चुना? बाबासाहब डॉ.अम्बेडकर ने 1951 में केन्द्रीय मंत्री मंडल से अपने विधिमंत्री पद का इस्तीफा दिया था. इस्तीफा देने के पश्चात उनके पास 1956 तक समय ही समय था. वे 1951 से लेकर 1956 के बीच धर्म परिवर्तन कर सकते थे. मगर, उन्होंने 1956 को ही धर्म परिवर्तन क्यों किया? बहुत सारे लोग यह सोचते हैं कि बाबासाहब ने 14 तारीख के महत्व को ध्यान में रखकर धर्म परिवर्तन किया, इसलिए 14 तारीख को ही धम्मचक्र प्रवर्तन दिन मनाना चाहिए. जबकि, यह गलत सोच है. दरअसल, बौद्ध धम्म में अशोक विजयादशमी का एक ऐतिहासिक महत्व है. सबसे बड़ी बात यह है कि 1956 में 14 तारीख को अशोक विजयादशमी को 2,500 साल पूरे होने जा रहे थे. इसलिए बाबासाहब अम्बेडकर मूलनिवासी बहुजनों को उस विरासत के साथ जोड़ देना चाहते थे. इसलिए बाबासाहब ने 14 अक्टूबर 1956 को धम्म दीक्षा ली.

पुष्यमित्र शुंग द्वारा की गई प्रतिक्रांति के संबंध में बाबासाहब ने 6 जून, 1950 को कोलंबो (श्रीलंका) में दिये अपने भाषण में कहते हैं ‘‘ब्राह्मणी शासनाधिकार की एक बहुत बड़ी घटना मौर्य साम्राज्य का पतन होने में दिखायी देती है. भारतीय इतिहासकारों ने इस महान घटना को महत्व नहीं दिया, यह खेदजनक बात है. मूलतः यह भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी घटना है’’ पुष्यमित्र नामक एक ब्राह्मण अंतिम मौर्य सम्राट राजा बृहद्रथ का सेनापति था और पुष्यमित्र का गुरू पतंजली था. पतंजली ने बौद्धों से ही योग विद्या ग्रहण की थी, किन्तु बाद में वह बौद्धों का दुश्मन बन गया. पतंजली की सलाह पर सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने राजा बृहद्रथ की हत्या की और मौर्य वंश की जगह अपने शृंगवंश के नाम से राज स्थापित किया. इसके बाद पुष्यमित्र शुंग ने पुनः ब्राह्मण धर्म की स्थापना करने के लिए बौद्ध भिखुओं का कत्लेआम शुरू कर दिया. यही नहीं, पुष्यमित्र शुंग ने नालंदा, तक्षशिला जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों में आग दी. बताया जाता है कि वह आग छः महीने से ज्यादा दिन तक जलती रही. जिसके कारण बौद्ध धम्म भारत से लुप्त हो गया और ब्राह्मण राज की स्थापना हुई. इस प्रतिक्रांति के बाद इस देश में ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित हुआ. ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित होने के बाद रामायण, महाभारत, मनुस्मृति, गीता आदि ब्राह्मणी ग्रंथां की रचना की गई. असल में रामायण का राम एक काल्पनिक पात्र है. हकीकत यह है कि राम कोई और नहीं पुष्यमित्र शुंग ही है और रावण जिसे लोग दशानन अर्थात दश सिर वाला कहते हैं वह कोई और नहीं राज बृहद्रथ है जो मौर्य वंश का दसवाँ और अंतिम शासक था. जिसकी छल-कपट से पुष्यमित्र ने हत्या कर दी थी. लेकिन, ब्राह्मणों ने प्रतिक्रांति के बाद पुष्यमित्र शुंग को ‘राम’ के रूप में नायक के तौर पर सामने रखकर लोगों के सामने प्रस्तुत कर दिया. इसी तरह से राजा बृहद्रथ मौर्य को रावण के रूप में प्रस्तुत कर दिया और रामायण के नाम से प्रचारित किया कि राम ने रावण का वध किया था. इसलिए खुशी में हर साल दशहरा (विजयदश्मी) को त्योहार के रूप में मनाया जाता है. हर साल दशहरा के दिन रावण के पुतले को जलाकर जश्मन मनाया जाता है.

जबकि, असल में यह सब एकदम बकवास है. क्योंकि, दशहरा (विजयदश्मी) का कोई भी संबंध रामायण से नहीं है. बल्कि, विजयदश्मी का नाम अशोक विजयदश्मी है. चूंकि, ऊपर ही बताया जा चुका है कि रामायण का राम पुष्यमित्र शुंग और रावण मौर्य राजा बृहद्रथ है. इसलिए राम और रावण को मानने की बात ही गलत है. क्योंकि, अगर रावण को मानते हैं तो हमें राम को भी मानना होगा. कुल मिलाकर अशोक विजयादशमी और उसके महत्व को खत्म करने के लिए एक वैकल्पिक कार्यक्रम खड़ाकर रावण दहन की परंपरा शुरू कर दी. अगर, मूलनिवासी बहुजन समाज के लोग रावण को मानते हैं तो उनके अनुसार ‘रावण दहन’ के नाम पर वे अपने ही पुरखे को जलाकर खुश होते हैं और जश्न मनाते हैं. इस तरह से ब्राह्मणों ने रामायण सहित कई अनर्गल ग्रंथ लिखकर ब्राह्मण धर्म को मजबूत कर लिया. जबकि, धर्म परिवर्तन करने के पीछे अपने मकसद को जाहिर करते हुए डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर कहते हैं कि ‘‘मैंने धर्म परिवर्तन इसलिए किया, क्योंकि मुझे समता, स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय चाहिए’’ उपरोक्त चारों बातें मुझे तथागत बुद्ध के विचारों में दिखायी देती है, इसलिए मैंने बुद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण की है. इसलिए, डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर कहते हैं कि ‘‘मनुष्य धर्म के लिए नहीं है, बल्कि धर्म मनुष्य के लिए है’’ 

अखण्ड भारत का अजेय सम्राट



राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)
संपूर्ण भारतीय प्रायद्वीप पर 37 वर्षो तक एकछत्र शासन करने वाला अशोक (269-232 ई0पू0) एक अत्यंत व्यवहार कुशल और मौर्य राजवंश का तृतीय प्रसिद्ध शासक था. राज सिंहासन की सुदृढ़ता और शासन करने की लंबी अवधि उसके प्रधान उद्देश्य एवं लक्ष्य थे. इनकी पूर्ति के लिए जब जैसा कदम उठाने की आवश्यकता पड़ी उसने उठाया. आदर्श वचन से छोटी-छोटी शक्तियों को विभाजित करना आसान था, किंतु कलिंग पर विजय प्राप्त करने के लिए कठोर कदम उठाना आवश्यक था. अशोक यथार्थवादी था। शासन पर कब्जा जमाना तथा साम्राज्य को सुद्ढ़ बनाना उनका लक्ष्य था। सम्राट अशोक का नाम देवानाम्प्रिय एवं प्रियदर्शी था। इनका जन्म पाटलिपुत्र जो आज वर्तमान में पटना (बिहार) में 304 ई.पू में हुआ था। चक्रवर्ती सम्राट अशोक चन्द्रगुप्त मौर्य के पोते एवं बिन्दुसार के पुत्र थे। इनकी माता का नाम सुभाद्रंगी जो छोटी-सी उम्र में ही राजगद्दी संभाली थी.

माना जाता है कि अशोक का राज भारत के सभी राजाओं में सबसे बड़ा था. आज तक भारत का कोई भी राजा इतने बडे़ क्षेत्र में राज्य नहीं कर पाया. चक्रवर्ती सम्राट का नाम सिर्फ अशोक को ही पूरे भारत में मिला है. अन्य कोई भी राजा को ये सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ. चक्रवर्ती सम्राट अशोक को चक्रवर्ती सम्राट इसलिए कहा जाता है कि, वह सम्राटों के सम्राट थे. अशोक को सभी राजाओं और सम्राटों में सबसे ऊपर रखा जाता है. मौर्य राजवंश के सम्राट अशोक ने अखण्ड भारत पर राज्य किया है. उन्होंने उत्तर में हिन्दकुश से लेकर दक्षिण में मैसूर तक और पूरब में बंगाल से लेकर पश्चिम के अफगानिस्तान, ईरान तक अपना राज्य फैला रखा था. यह सम्राज्य तब से लेकर अभी तक का सबसे बड़ा साम्राज्य था. सम्राट अशोक को अपने बड़े साम्राज्य के अलावा अपने राज्य में शासन करने में निपुणता एवं बौद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार के लिए भी श्रेष्ठ माना जाता है.

सम्राट अशोक ने संपूर्ण एशिया तथा अन्य सभी महाद्वीपों में भी बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार किया. सम्राट अशोक के समय के स्तंभ एवं उनपर लिखे हुए वाक्य और चित्र आज भी हमें भारत के कई शहरों और वहाँ की जानकारी बहुत ही आसानी से मिल जाती है, जिससे हमें सम्राट अशोक के राज्य और उनकी काबिलियत का पता लगता है. सम्राट अशोक अपने सरल जीवन शैली एवं शांत स्वभाव का परचम हर जगह लहराते थे, उन्हें प्रेम, संवेदना, अहिंसा और शाकाहारी जीवन प्रणाली के लिए महान माना गया है. उन्हें भारत के सभी राजाओं में सबसे परोपकारी सम्राट मना गया. इसलिए उन्हें परोपकारी सम्राट की उपाधि दी गई है. अशोक यद्यपि बौद्ध धम्म अपनाया था, किन्तु संप्रदायवाद उसके हृदय में नहीं था. अपने 12वें शिलालेख में उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता का मर्मस्पर्शी उपदेश दिया है. उन्होंने सच्ची धर्मोन्नति का मूल मंत्र संयम बनाया. ‘‘मनुष्य अपने धर्म की स्तुति और दूसरे धर्म की निंदा ना करे’’ उनकी सोच थी. अपने जीवनकाल में आगे ले जाते हुए सम्राट अशोक बौद्ध धम्म एवं तथागत गौतम बुद्ध को अपनाकर उसका प्रचार-प्रसार किया. उनकी स्मृति में उन्होंने कई स्तंभ खड़े कर दिए जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थान लुंबनी में मायादेवी मंदिर के पास, सरनाथ, बोधगया, कुशीनगर एवं श्रीलंका, थाईलैण्ड, चीन आदि इन देशों में अशोक स्तंभ के रूप में देखे जा सकते हैं. अशोक के द्वारा स्वयं के बारे में खुदवाये गये अभिलेखों को अपने अध्ययन का मुख्य आधार बनाकर भावनात्मक शैली में इसे महान, सर्वश्रेष्ठ, मानवतावादी और दयालू बताया.

सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिश्र तथा यूनान में भी किया. सम्राट अशोक अपने पूरे जीवन काल में एक भी युद्ध नहीं हारे. सम्राट अशोक के ही समय में 23 विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई, जिसमें तक्षशिला, विक्रमशिला, नालंदा, कंधार आदि विश्वविद्यालय प्रमुख थे. इन विश्वविद्यालयों में विदेश से छात्र शिक्षा पाने के लिए भारत आते थे. ये विश्वविद्यालय उस समय के उत्कृट विश्वविद्यालय थे, जिसमें लाखों छात्र-छात्राएँ अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए शिक्षा ग्रहण करते थे. नालंदा और तक्षशिला अपने समय की सबसे बड़े विश्वविद्यालय थे. इसी के साथ शिलालेख शुरू करने वाले अशोक पहले सम्राट थे.

बौद्ध धम्म का प्रचार करने के लिए सम्राट अशोक अफगानिस्तान, यूनान, श्रीलंका, सरिया, मिश्र और नेपाल गये. लगभग सालों अखंड भारत पर शासन करने के बाद उन्होंने अपना सम्राट पद त्याग दिया और बौद्ध धम्म का प्रचार करने के लिए निकल पड़े. 239 ई.पू. में उनकी मृत्यु का होना माना जाता है. अंतिम क्षण तक उनका पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा बौद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार में काफी योगदान दिया. सम्राट अशोक बिन्दुसार एवं रानी धर्मे के पुत्र थे. अशोक सम्राट बचपन से ही सैन्य गतिविधियों में निपूर्ण थे. दो हजार वर्षो के पश्चात सम्राट अशोक का प्रभाव एशिया मुख्यतः उपमहाद्वीप में देखा जा सकता है. बौद्ध धम्म के इतिहास में तथागत बुद्ध के बाद सम्राट अशोक को सर्वोपरि रखा गया. सम्राट के कार्यकाल के सातवें वर्ष में ही कलिंग पर हमला हुआ. आन्तरिक अशान्ति से निपटने के बाद 231 ई.पू. उनका विधिवत राज्याभिषेक हुआ. 13वें शिलालेख के अनुसार कलिंग युद्ध में 1,50,000 व्यक्तियों को बंदी बनाकर निर्वासित कर दिया गया था. करीब लाखों  लोगों की हत्या हुई थी. सम्राट अशोक ने भारी नरसंहार को अपनी आँखों से देखा. इससे द्रवित होकर सम्राट अशोक ने शांति, सामाजिक प्रगति तथा बौद्धित्व का प्रचार किया. अशोक ने जो तत्व जीवन में देखा, उसी को अपने राजनैतिक जीवन में अभ्यास किया, उसी को अपनी प्रजा को सिखाया और उसी को लेखों में अंकित करवाया. इस तरह से परोपकार के लिए अदम्य कर्मयोग का अभ्यास ही अशोक के जीवन का मूल दर्शन है, जिसका उसने राजनीति के क्षेत्र में प्रयोग किया. अशोक की मृत्यु के बाद भी मौर्य राजवंश लगभग 50 वर्षो तक चलता रहा.

अगर, मौर्य वंश पर एक नजर डालें तो इतिहास से पता चलता है कि मौर्य वंश का पहला चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य थे, जिनका शासन काल ई.पूर्व 323 से 298, दूसरे विन्दुसार मौर्य जिनका शासन काल ई.पूर्व 298 से 273, तीसरे सम्राट अशोक थे, जिनका शासन काल ई.पूर्व 273 से 232, चौथे सुयश मौर्य (कुणाल), जिनका शासन काल ई.पूर्व 232 से 224, पाँचवें दशरथ मौर्य, जिनका शासन काल ई.पूर्व 224 से 216, छठवें सम्पति मौर्य, जिनका शासन काल ई.पूर्व 216 से 207, सातवें शलिशुक मौर्य, जिनका शासन काल ई.पूर्व 207 से 206, आठवें देववर्मा मौर्य, जिनका शासन काल ई.पूर्व 206 से 198, नौवें सप्तधन्वा मौर्य, जिनका शासन काल ई.पूर्व 198 से 191 और दशवां मौर्य शासक सम्राट बृहद्रथ मौर्य थे, जिनका शासन काल ई.पूर्व 191 से 184 था.

अशोक विजयादशमी की वास्तविक सच्चाई



राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

विजयादश्मी (दशहरा) का कोई भी संबंध रामायण से नहीं है. बल्कि, विजयादश्मी का संबंध चक्रवर्ती सम्राट अशोक से है. विजयादश्मी (दशहरा) का वास्तविक नाम अशोक विजयादश्मी है. क्योंकि, रामायण का राम पुष्यमित्र शुंग और रावण राजा बृहद्रथ मौर्य है. दशहरा का वास्तविक नाम सम्राट अशोक विजयादशमी है. भारत में ‘सम्राट अशोक विजयादशमी’ के बौद्धों के पवित्र त्योहार को खत्म करने के लिए ब्राह्मणों ने षडयंत्र किया और विजयदश्मी (दशहरा) का नाम दे दिया. इस तरह से पराजित करने वाले दिन को ‘दशहरा’ नाम दिया गया और सम्राट अशोक विजयादशमी को गायब कर दिया गया. रावण का जो प्रतीक है उसमें रावण को 10 मुख का बताया गया. जबकि बौद्ध धम्म में दस परमिताओं, दस शीलों का बहुत अधिक महत्व है. इसके साथ मौर्य वंश के दशवें शासक सम्राट बृहद्रथ मौर्य को रावण के रूप में दस मुख वाला बता दिया. 8, 9 या 11 मुख का क्यों नहीं बताया? यही कारण है कि सम्राट अशोक विजयादशमी के त्योहार को समाप्त करने के लिए आर्यों ने दशहरा नामक त्योहार शुरू किया.

आर्यों के इस षडयंत्र को डॉ. बाबासाहब खत्म करना चाहते थे. इसलिए वे सोच समझकर, योजना बनाकर 14 अक्टूबर 1956 को जिस दिन अशोक विजयादश्मी के 2,500 साल पूरे हो रहे थे. यानी 1956 में 14 अक्टूबर को 2,500वीं सम्राट अशोक विजयादशमी आ रही थी. इसलिए बाबासाहब ने उस दिन को निर्धारित किया और लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा ली. तब लोगों को पता चला कि बाबासाहब ने जो 14 अक्टूबर 1956 को धम्म दीक्षा ली, वह सम्राट अशोक विजयादशमी के साथ जुड़ा हुआ है. इसका मतलब है कि डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर अशोक विजयादश्मी के 2,500वें साल पर धम्म दीक्षा लेकर मूलनिवासी बहुजनों की विरासत को न केवल पूर्नजीवित कर दिया, बल्कि उसे बड़े पैमाने पर खड़ा भी कर दिया.

बता दें कि सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध में विजयी होने के दसवें दिन मनाये जाने के कारण इसे अशोक विजयदशमी कहते हैं. इस दिन सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी. विजय दशमी एक तरह से बौद्धों का पवित्र त्यौहार है. यह ऐतिहासिक सत्यता है कि महाराजा चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद हिंसा का मार्ग त्यागकर बुद्ध धम्म अपनाने की घोषणा कर दी थी. बौद्ध बन जाने पर वह बौद्ध स्थलों की यात्राओं पर गए. तथागत बुद्ध के जीवन को चरितार्थ करने तथा अपने जीवन को कृतार्थ करने के निमित्त हजारों स्तुपों, शिलालेखों और धम्म स्तम्भों का निर्माण कराया. अशोक की इस धम्म विजय संकल्प से खुश होकर देश की जनता उन सभी स्मारकों को सजाया-सवारा तथा उसपर दीपोत्सव किया. यह आयोजन हर्षोलास के साथ 10 दिनों तक चलता रहा.

दसवें दिन सम्राट अशोक ने राजपरिवार के साथ पूज्य भंते मोग्गिलिपुत्त तिष्य से धम्म दीक्षा ग्रहण किया. सम्राट अशोक ने धम्म विजय को ही सबसे बड़ा विजय कहा. इस दिन सम्राट ने धम्म विजय का संकल्प लिया. सम्रोट अशोक कोई धर्म परिवर्तन नहीं किया, क्योंकि उनके पूवर्ज पहले से ही बौद्ध सम्राट थे, वे कभी भी हिन्दू नहीं थे. धम्म दीक्षा के उपरांत सम्राट अशोक ने प्रतिज्ञा किया कि आज के बाद वह शस्त्रों से नहीं, बल्कि शांति और अहिंसा से प्राणी मात्र के दिलों पर विजय प्राप्त करेंगे. इसीलिए सम्पूर्ण बौद्ध जगत इसे अशोक विजयादसमी के रूप में मनाने लगा. लेकिन, स्वार्थी पाखंडी, रूढ़िवादी और अंध विश्वासों को जन्म देने वाले ब्राह्मणों ने इसे काल्पनिक राम और रावण की कहानी बताकर हमारे इस महत्त्वपूर्ण त्यौहार पर कब्जा कर लिया और प्रचारित किया कि दसहरे के दिन ही राम ने रावण को मारा था.  

जहाँ तक दशहरे की बात है तो इससे जुड़ा तथ्य यह है कि चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक बृहद्रथ मौर्य तक कुल दस सम्राट हुए. अंतिम सम्राट बृहद्रथ मौर्य के सेनापति ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग ने छल-कपट से हत्या कर दी और ‘शुंग वंश’ की स्थापना की. पुष्यमित्र शुंग ने जिस दिन बृहद्रथ की हत्या की उस दिन बड़े धूमधाम से उत्सव मनाया और उसी दिन को दशहरा के नाम पर प्रचारित कर दिया. इसके बाद ब्राह्मणों ने अशोक विजयदश्मी से ‘अशोक’ शब्द को हटाकर विजयदश्मी कर दिया. अशोक विजयदश्मी का ब्राह्मणीकरण करने के बाद ब्राह्मणों ने इस जश्न में मौर्य वंश के 10 सम्राटों के अलग-अलग पुतले न बनाकर एक ही पुतला बनाया और उसके 10 सर बना दिए और उसका दहन किया.

असल में विजयदश्मी (दशहरा) का कोई भी संबंध रामायण से नहीं है. बल्कि, विजयदश्मी का नाम अशोक विजयादश्मी है. चूंकि, ऊपर ही बताया जा चुका है कि रामायण का राम पुष्यमित्र शुंग और रावण मौर्य राजा बृहद्रथ है. इसलिए राम और रावण को मानने की बात ही गलत है. अगर आप रावण को मानते हैं तो आपको राम को भी मानना होगा. कुल मिलाकर अशोक विजयादशमी और उसके महत्व को खत्म करने के लिए ब्राह्मणों ने एक वैकल्पिक कार्यक्रम खड़ाकर रावण दहन की परंपरा शुरू की है. अगर, मूलनिवासी बहुजन समाज के लोग रावण को मानते हैं तो भी उनके अनुसार ‘रावण दहन’ के नाम पर वे अपने ही पूर्वजों को जलाते हैं और खुशी में जश्न मनाते हैं.

शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल स्मृति दिवस



कुछ ऐसे महापुरुष होते हैं, जिनके ऋण आज भी समाज पर चुकता करने के लिए बाकी हैं. वे ऐसे कार्य किये होते हैं, जिससे एक नए समाज की नींव बनती है, एक नया इतिहास रचता है. बंगाल के नमोशुद्रा समाज में पैदा होने वाले जोगेंद्रनाथ मंडल ऐसी ही शख्सियत हैं. सन 1945-46 के आम चुनाव में कांग्रेस ने पक्का बंदोबस्त कर रखा था कि दबी-पिछड़ी जातियों का कोई सदस्य जीतकर संविधान सभा में न पहुँच पाए. जोगेन्द्रनाथ मंडल ने वह कर दिखाया कि बाबासाहब न सिर्फ चुनाव जीते वरन संविधान-सभा में पहुँचकर भारतीय संविधान का शिल्पकार बने. 
बंगाल जो अब बांगला देश में है, में 12वीं सदी के दौरान नमोशुद्रा समाज सत्ता में था. तब, इस समाज ने बौद्ध धर्म को बड़े पैमाने पर अपनाया था. नमोशुद्रा समाज का मुख्य व्यवसाय कास्तकारी और मछली पालन था. मगर, बाद में यह समाज हिन्दू-घृणा से रसातल में पहुँच गया. उनकी गिनती अस्पृश्य-जातियों में होने लगी. 
हिन्दुओं के अत्याचारों से तंग आकर 18वी सदी में इस जमात के काफी लोग इस्लाम और ईसाई धर्म में धर्मान्तरित हुए. भारत-पाकिस्तान बटवारे के समय इस जमात का बड़ा भाग पाकिस्तान में चला गया था. इस दौर में नमोशुद्रा जमात के काफी लोग प.बंगाल और आसाम में शरणार्थी बनकर आये.
जोगेंद्रनाथ मंडल का जन्म 29 जनवरी 1904 को बरीसल जिले के मइसकड़ी में हुआ था. इनकी माता का नाम संध्या और पिताजी का नाम रामदयाल मंडल था. जोगेन्द्रनाथ मंडल 6 भाई-बहन थे जिनमे ये सबसे छोटे थे. बालक जोगेंद्र ने सन 1924 में इंटर और सन 1929 में बीए पास किया था. उन्होंने अपने पोस्ट-ग्रेजुएशन की पढ़ाई पहले ढाका में और बाद में कलकत्ता विश्व-विद्यालय से पूरी की थी. 
पढ़ाई के दौरान जोगेंद्रनाथ को भारी आर्थिक तंगी और मुसीबतों का सामना करना पड़ा.अनुसूचित जाति में पैदा होने के कारण जोगेन्द्रनाथजी को अपने समाज की चिंता खाए जा रही थी. उन्होंने सोचा कि सरकारी नौकरी कर वे अपने समाज का अधिक भला नहीं कर पाएंगे. यही सोच कर उन्होंने सन 1935 में कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत करना शुरू किया. 
यहाँ पर उन्हें लगा कि वे अपने समाज से दूर है. अतः शीघ्र ही वे अपने निवास बरीसल के जिला कोर्ट में जाकर प्रेक्टिश करने लगे.बरीसल में वकालत करते उन्हें अहसास हुआ कि अपने समाज के लिए वे बिना सत्ता के ज्यादा कुछ नहीं कर सकते. ये सोचकर वे राजनीति में कूद पड़े.
सन 1937 में उन्हें जिला काउन्सिल के लिए मनोनीत किया गया. इसी वर्ष उन्हें बंगाल लेजिस्लेटिव काउन्सिल का सदस्य चुना गया.सन 1939-40 तक वे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के करीब आये मगर, जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि कांग्रेस के एजेंडे में उसके अपने समाज के लिए ज्यादा कुछ करने की इच्छा नहीं है. इस बीच वे डा.आंबेडकर के सम्पर्क में आये. 
वे 19 जुलाई 1942 को डा.आंबेडकर के ‘अखिल भारतीय शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन’ में अपने साथियों के साथ शामिल हो गए. बाद में उन्होंने बंगाल में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की स्थापना कर डा.अंबेडकर के कार्य को वहाँ अपने हाथ में लिया. आजाद भारत में कानून मंत्री बनने के बाद डा. आंबेडकर शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के लिए समय नहीं निकल पा रहे थे. तब भी जोगेन्द्रनाथ मंडल ने इसका नेतृत्व सम्भाला था. कांग्रेस से निराश होकर जोगेन्द्रनाथ मंडल ने मुस्लिम लीग का साथ पकड़ा था. 
वे फरवरी 1943 में ख्वाजा नजीमुद्दीन-मंत्रिमंडल में इस शर्त के साथ सम्मिलित हुए कि सरकार शेड्यूल्ड कास्ट के कल्याण के लिए कुछ करेगी, अपने 21 एमएलले के साथ सम्मिलित हो गए. वे प्रथम कानून एवं श्रम मंत्री बने. शासन में रहते हुए जोगेन्द्रनाथ मंडल ने अस्पृश्य समाज के लोगों को शासकीय नौकरी में लाने के लिए भरपूर प्रयास किया. 
शिक्षा पर जोर देते हुए उन्होंने ‘बैगई हालदार पब्लिक एकेडमी’ की स्थापना कर नमोशुद्रों के लिए शिक्षण-संस्थाएं खोली. समाज के जागृति के लिए प्रचार-माध्यमों की महत्ती भूमिका होती है, इस सोच के साथ जोगेन्द्रनाथ मंडल ने ‘जागरण’ का साप्ताहिक प्रकाशन शुरू किया. इसी कार्यालय से उन्होंने शेडूल कास्ट फेडरेशन की बुलेटिन का भी प्रकाशन किया था.
जोगेन्द्रनाथ मंडल विभाजन के बाद पुनः बंगाल से चुने जा कर अप्रैल 1946 में उन्हें सुहरावर्दी मंत्रि-मंडल में शामिल होने का मौका मिला था. बंगाल की राजसत्ता के दौरान जोगेन्द्रनाथ मंडल कई महत्वपूर्ण पद सम्भाले थे. उन्होंने वहाँ की शोषित जातियों के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये. भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान दबी-पिछड़ी जातियों का जो कत्लेआम हुआ, जोगेन्द्रनाथ मंडल उससे बेहद आह़त हुए थे. 
उन्होंने सोचा था कि पाकिस्तान सरकार इन जातियों के साथ अन्याय नहीं करेगी. किन्तु पाकिस्तान सरकार ने विभाजन के दौरान इनकी कोई चिंता नहीं की. हताश होकर जोगेन्द्रनाथ मंडल 8 अक्टू. सन 1950 को लियाक़त अलीखां के मंत्री-मंडल से त्याग-पत्र दे कर भारत आ गए थे. इसी दौरान भारत के अन्तरीम सरकार में शामिल होने के लिए उन्हें आमंत्रण मिला. 
जोगेन्द्रनाथ मंडल इस शर्त पर राजी हुए थे कि अगर उनके नेता बाबासाहब डा.आंबेडकर को पसंद नहीं आया तो उन्हें तुरंत त्याग-पत्र देने की अनुमति होगी. डा.आम्बेडकर तब गोलमेज सम्मेलन में थे, जोगेन्द्रनाथ मंडल के टेलीग्राम पर डा. आम्बेडकर ने तत्काल आपत्ति नहीं ली थी. वे भारत सरकार के अंतरिम मंत्रिमंडल में शामिल हो गए थे. 
सन 1945-46 में आम चुनाव हुए थे. इस चुनाव के द्वारा विभिन्न राज्यों से 1585 लेजिस्लेटिव काउन्सिल के सदस्य चुने जाने थे. इन्हीं में से कुछ को ‘संविधान-निर्माण समिति’ के लिए चुना जाना था. अनु.जातियों के लिए देश भर में कुल 151 स्थान आरक्षित थे. बंगाल की 30 सीटें थी जिसमें से 3 सीटें संविधान-निर्माण समिति के लिए थी. 
शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन ने देशभर में अपने उम्मीदवार खड़े किये थे, जिसमे से 5 उम्मीदवार बंगाल से थे. जोगेन्द्रनाथ मंडल ने दो स्थानों से पर्चे भरे थे. शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के पास साधनों का भारी अभाव था जबकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के पास प्रचुर संसाधन थे. जब चुनाव के नतीजे आये तो शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन को सिर्फ एक सीट हासिल हुई थी जहाँ से जोगेन्द्रनाथ मंडल चुनकर आये थे.
देश के संविधान-निर्माण में अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए, यह बात डा.बाबासाहब आंबेडकर को परेशान किये जा रही थी. उधर, एससी, एसअी समाज का कोई सदस्य चुनाव जीत न पाए, इसका कांग्रेस कमेटी ने पक्का बंदोबस्त कर रखा था. डा. आंबेडकर के कहीं से भी चुनकर आने की सम्भावना नहीं थी. स्थिति को भांप कर जोगेन्द्रनाथ मंडल ने उन्हें बंगाल से नामांकन-पत्र भरने का न्यौता दिया. 
डा.अंबेडकर को जिताने की जिम्मेदारी जोगेन्द्रनाथ मंडल पर थी. उन्होंने बंगाल के सभी अनु.जातियों के विधायकों की बैठक बुलाई और उन्हें समझाया कि डा.अंबेडकर का जीतना क्यों जरुरी है? जोगेन्द्रनाथ मंडल ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी और उनके अथक प्रयास से डॉ. बाबसाहब अंबेडकर चुनाव जीत गए. शायद अगर जोगेन्द्रनाथ मंडल नहीं होते तो बाबासाहब संविधानसभा में चुनकर नहीं गये और यदि नहीं गये होते तो मूलनिवासी बहुजनों को अधिकार नहीं मिला होता. क्योंकि, कांग्रेस ने बाबासाहब अम्बेडकर के लिए कहा था डॉ.अम्बेडकर के लिए संविधान सभा के दवाजे ही नहीं, बल्कि खिड़कियां भी बंद है. 
ऐसे में जोगेंनद्रनाथ मंडल ने बाबासाहब अम्बेडकर को अपने स्थान पर चुनकर संविधान सभा भेजकर मूलनिवासी बहुजनों के अधिकार दिलाने में बाबासाहब अम्बेडकर की मदद की. ऐसे महान युगपुरूष जोगेन्द्रनाथ मंडल का 5 अक्टूबर 1968 को परिनिर्वाण हो गया. ऐसे महापुरूष के 51वें स्मृति दिवस पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से कोटि-कोटि नमन. 

05 अक्टूबर : महाप्राण स्मृति दिन




अंतरिम सरकार में भारत के द्वितीय कानून मंत्री महाप्राण बैरिस्टर जोगेन्द्र नाथ मंडल जी (29 जनवरी 1904- 05अक्टूबर 1968) शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन (बाबा साहेब की पार्टी) के बंगाल प्रांत के प्रदेश अध्यक्ष थे। वे बंगाल में एससीएफ के एकमात्र विधायक थे जो बारीसाल से निर्वाचित हुए थे तथा हुसैन शहीद सोहरावर्दी (जो बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने) की प्रांतीय सरकार में कानून एवं श्रम मंत्री थे। जब 02सितंबर 1946 को भारत की अंतरिम सरकार का गठन हुआ और नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया तो उसमें सैय्यद अली जहीर को कानून मंत्री बनाया गया था किन्तु नेहरू सरकार में 26अक्टूबर 1946 को जब मुस्लिम लीग शामिल हुई तो मुस्लिम लीग के पांच लोगों को मंत्रिमंडल में स्थान मिला, तब उन पांच लोगों में से एक महाप्राण बैरिस्टर जोगेन्द्र नाथ मंडल जी भी थे जिन्हें कानूनमंत्री बनाया गया और तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड वेवेल द्वारा शपथ दिलाई गयी थी। 15अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत की सरकार का गठन किया गया जिसमें नेहरू को पुनः प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों सहित बाबा साहब डॉ0 अम्बेडकर को कानून मंत्री बनाया गया और शपथ तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटेन द्वारा दिलाई गयी थी। विभाजन के समय मोहम्मद अली जिन्नाह के कहने पर मंडल जी पाकिस्तान चले गये जहाँ वे पाकिस्तान संविधान सभा के सदस्य व अस्थायी अध्यक्ष तथा कानून मंत्री भी बने। जिन्नाह पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल बने वहीं लियाकत अली खान प्रथम प्रधानमंत्री (14अगस्त 1947- 16अक्टूबर 1951) बने। किन्तु 11सितंबर 1948 को जिन्नाह की मृत्यु के बाद ख्वाजा नजीमुद्दीन गवर्नर जनरल बने। ख्वाजा नजीमुद्दीन व लियाकत अली खान से उपेक्षित किये जाने पर अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति होते हुए न देखकर मंडल जी ने 08अक्टूबर 1950 को सभी पदों से इस्तीफा देकर भारत चले आये और फिर कभी पाकिस्तान नहीं गये। विदित हो कि लियाकत अली खान भारत की अंतरिम सरकार में वित्त मंत्री एवं ख्वाजा नजीमुद्दीन बंगाल के मुख्यमंत्री रह चुके थे। इस प्रकार भारत का संविधान बाबासाहेब डॉ0 अम्बेडकर ने लिखा वहीं पाकिस्तान का संविधान महाप्राण बैरिस्टर जोगेन्द्र नाथ मंडल ने लिखा। यह कहा जाय कि यदि मंडल जी न होते तो शायद बाबासाहेब भी 

07 पैसे में वोट की बिक्री



यदि परिवार में 04 वोट हैं और वह परिवार 500 रुपये में वोट बेच देता है तो एक व्यक्ति के हिस्से में आये 125 रुपये, जो अमूमन पांच वर्ष के लिए होते हैं। अब एक व्यक्ति को एक साल के हिसाब से 25 रुपये मिले और एक साल में 365 दिन होते हैं, तो एक दिन के लिए लगभग 07 पैसा प्रतिदिन मिला। अब सोचो कि जिस वोट को हम 07 पैसे में बेच रहे हैं वह वोट का अधिकार बाबासाहब ने कितने संघर्षों से हमें दिलवाया जिसका हम कैसा सदुपयोग कर रहे हैं, उसके ऊपर EVM ने हमारा वह भी अधिकार छीन लिया है। इसलिए उस मताधिकार को, अपने वोट को बचाने के लिए मूलनिवासी नायक मा0 वामन मेश्राम साहब के संयोजन में देशव्यापी परिवर्तन यात्रा चल रही है उसका हमें भरपूर सहयोग का चाहिए।

बाबासाहब अम्बेडकर और बौद्ध धम्म.....



"धर्म मनुष्य के लिए है न कि मनुष्य धर्म के लिए वरना मानसिक गुलामों के लिए धर्म एक अफीम है"
बुद्धं शरणं गच्छामि : मैं बुद्ध की शरण लेता हूं। धम्मं शरणं गच्छामि : मैं धम्म की शरण लेता हूं। संघं शरणं गच्छामि : मैं संघ की शरण लेता हूं। बौद्ध धम्म को हम मानवीय धम्म कह सकते हैं, क्योंकि बौद्ध धम्म ईश्वर को नहीं, मनुष्य को महत्व देता है। तथागत बुद्ध ने अहिंसा की शिक्षा के साथ ही अपने धम्म के अंग के तौर पर सामाजिक, बौद्धिक, आर्थिक, राजनैतिक स्वतंत्रता एवं समानता की शिक्षा दी है। उनका मुख्य ध्येय इंसान को इसी धरती पर इसी जीवन में विमुक्ति दिलाना था, न कि मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्ति का काल्पनिक वादा करना। बुद्ध ने साफ कहा था कि उनका उपदेश स्वयं उनके विचार पर आधारित है, उसे दूसरे तब स्वीकार करें, जब वे उसे अपने विचार और अनुभव से सही पाएं। जिस प्रकार एक सुनार सोने की परीक्षा करता है, उसी प्रकार मेरे उपदेशों की भी परीक्षा करनी चाहिए। दूसरे किसी भी धर्म संस्थापक ने कभी यह बात नहीं कही। यही कारण है कि बाबासाहब ने दूसरे किसी धर्म को न अपना कर बौद्ध धम्म का ही चुनाव किया। डॉ0 अम्बेडकर के अनुसार बौद्ध धम्म नैतिकता पर आधारित, विज्ञान से संबंध रखने वाला धम्म है। फिर भी हम यदि बौद्ध ग्रंथों में कोई विवरण आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के विरुद्ध पाते हैं तो बौद्ध होने के नाते हम उसे अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र हैं। ऐसी स्वतंत्रता अन्य किसी भी धर्म में नहीं है।

डॉ0 अम्बेडकर के अनुसार धर्म प्रत्येक समाज के लिए नैतिकता का निर्धारक तत्व होता है और उस समाज में अनुशासन बनाए रखने के लिए धम्म की कुछ शर्तें पूरी करनी होती है, जिसे विज्ञान सम्मत या बुद्धिसंगत होना चाहिए, साथ ही उसे स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के मूलभूत तत्वों को मान्य करना चाहिए। डॉ0 अम्बेडकर के अनुसार बौद्ध धम्म उक्त सभी कसौटियों पर खरा उतरता है। यद्यपि बौद्ध धम्म बहुत ही प्राचीन धम्म है और अपने ढाई हजार वर्षों की अवधि में अनेक उतार- चढ़ाव से गुजरा है, जिसकी कुछ समय के लिए तेजी से अवनति हुई, किन्तु बाबासाहब द्वारा सामूहिक धम्म स्वीकार आंदोलन के बाद भारत में यह तेजी से प्रसारित हुआ है। इस आंदोलन ने हम पिछड़ों को मनुष्य का दर्जा दिलाया है, जिससे हम कई तरह से स्वतंत्रता का अनुभव कर रहे हैं। इस धम्मक्रांति के कई वर्षों बाद भी जो समस्याएं हैं, उसका कारण है कि हम ये समझ ही नहीं पाए हैं कि डॉ0 अम्बेडकर ने बौद्ध धम्म ही क्यों चुना ? इसी तरह सामूहिक धमाम परिवर्तन के आंदोलन के महत्व को समझने में हमारी असफलता रही है, साथ ही इस आंदोलन को हम उस विशाल दृष्टिकोण से देख ही नहीं पातये, समझ ही नहीं पाये और यही कारण है कि हम अपने दायरे से ऊपर किसी महान कार्य करने की भावना से प्रेरित नहीं हो पाये व धम्मक्रांति के कार्य करने के बारे में विचार नहीं करते, उल्टे हम बहुत ही संकीर्णता से व्यक्तिगत मामलों में ही उलझे रहते हैं।

एक प्रश्न है, जिसका उत्तर प्रत्येक धर्म को अवश्य देना चाहिए कि शोषितों को पैरों तले कुचले लोगों के लिए वह किस तरह की मानसिक और नैतिक राहत पहुंचाता है ? क्या हिन्दू धर्म पिछड़े वर्गों और अछूत जातियों, जनजातियों के करोड़ों लोगों को कोई मानसिक और नैतिक राहत पहुंचाता है ? तय है ऐसा नहीं है। वर्तमान का समय बौद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार के लिए बिल्कुल अनुकूल दिखाई देता है। एक समय था, जब धर्म के गुण और अवगुणों की परख करने का सवाल ही नहीं उठता था, इसलिए धर्म आदमी के उत्तराधिकार का अंग हुआ करता था, जो पैतृक संपत्ति प्राप्त करने योग्य भी है कि नहीं, का प्रश्न तो उठाया करते थे, लेकिन ऐसा कोई उत्तराधिकारी नहीं था जो यह प्रश्न करता कि क्या उसके माता-पिता का धर्म अपनाने योग्य है ? लगता है अब समय बदल चुका है। संसार भर में अब बहुत से लोगों में उत्तराधिकार में पाए जाने वाले धर्म के बारे में प्रश्न करने का अद्भुत साहस दिखाई देने लगा है, जिसके लिए कारण चाहे जो भी हों, यह सत्य है कि धर्म के बारे में लोगों के मन में जांच-पड़ताल करने की भावना पैदा हो चुकी है, इसलिए कौन सा धर्म अपनाने योग्य है, इस पर साहसपूर्वक प्रश्न किया जाने लगा है। ऐसी स्थिति में बौद्ध या बौद्ध राष्ट्रों को चाहिए कि बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार करना अपना कर्तव्य मानते हुए यह मानना ही होगा कि नैतिकता का धर्म बौद्ध धम्म का प्रसार करना वास्तविक मानवता की सेवा करना है।

संसद में मौन मंत्री



डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने आरक्षित चुनाव क्षेत्र से चुनकर जाने वाले एससी, एसटी के जनप्रतिनिधियों को लेकर कहा था कि ‘‘अगर, जम्भाई लेना प्रकृतिक नहीं होता तो ये लोग संसद और विधानसभा में मुँह तक नहीं खोलते’’ आज यह बात सत प्रतिशत साबित हो चुकी है. वर्ष 2017 में बीबीसी में एक खबर आयी थी कि संसद और विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की वजह से चुनकर आने वाले लगभग बारह सौ जनप्रतिनिधियों ने अपने समुदाय को लगातार निराश किया है. अनुसूचित जाति और आदिवासी हितों के सवाल उठाने में ये जनप्रतिनिधि बेहद निकम्मे साबित हुए हैं. संसद के बाहर ‘भाषा, हत्या, बलात्कार, दंगा-फसाद, मॉब लिंचिंग हो या बेरोजगारी, गरीबी और भुखमरी सहित अन्य मुद्दों को लेकर विभिन्न दलों के सांसदों की तीखी नोक-झोंक सुनने को मिलती है. चुनावी रैली हो या कोई दूसरा कार्यक्रम, वहाँ भी नेताओं के मुंह से कुछ ऐसा निकल जाता है, जो कई दिन तक मीडिया की सुर्खियों में चलता रहता है. लेकिन, संसद व विधानसभा में उपरोक्त मुद्दों को लेकर हमारे सांसद कितने गंभीर हैं, यह अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने भाषा, हत्या, बलात्कार, दंगा-फसाद, मॉब लिंचिंग हो या बेरोजगारी, गरीबी और भुखमरी सहित अन्य को लेकर पिछले 16 साल में केवल 77 सवाल पूछे हैं.

अगर, बात केवल एससी और एसटी के जनप्रतिनिधियों की करें तो एससी और एसटी के नाम पर चुनकर जाने वाले जनप्रतिनिधी संसद और विधानसभा में उनके ही खिलाफ बनाए जा रहे कानून के विरोध में मुँह तक नहीं खोलते हैं. हर दस साल के बाद संसद एक संविधान संशोधन विधेयक पारित करती है. जिसके, तहत लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसुचित जाति और जनजाति के लिए राजनीतिक आरक्षण को दस साल के लिए बढ़ा दिया जाता है और फिर राष्ट्रपति इस विधेयक को अनुमोदित करते हैं. संविधान का अनुच्छेद 334, हर दस साल के बाद बदल जाता है. जबकि, यह राजनीतिक आरक्षण केवल दस साल के लिए था. अगर इसे और दस साल के लिए बढ़ाना है तो इसके लिए एससी, एसटी के प्रतिनिधियों से सहमति लेनी पड़ती है. इसके बाद इसकी समीक्षा होती है इसे बढ़ाया जाय या इसे खत्म किया जाय. लेकिन, एससी, एसटी के जनप्रतिनिधी बगैर सोचे समझे राजनीतिक आरक्षण को दस साल बढ़ाने के लिए सहमति दे देते हैं. वे क्यों अपनी सहमति देते हैं? क्योंकि, इसी प्रावधान की वजह से लोकसभा की 543 में से 79 सीटें अनुसूचित जाति और 41 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिज़र्व हो जाती हैं. वहीं, विधानसभाओं की 3,961 सीटों में से 543 सीटें अनुसूचित जाति और 527 सीटें जनजाति के लिए सुरक्षित हो जाती हैं. इन सीटों पर वोट तो सभी डालते हैं, लेकिन कैंडिडेट सिर्फ एससी या एसटी का होता है. लोकसभा और विधानसभाओं में आजादी के समय से ही अनुसूचित जाति और जनजाति का उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व रहा है. लेकिन, सवाल यह उठता है कि इतने सारे अनुसूचित जाति और आदिवासी सांसद और विधायक अपने समुदाय के लिए करते क्या हैं?

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के जारी आंकड़ों के मुताबिक इन समुदायों के उत्पीड़न के साल में 40,000 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हुए. यह आंकड़ा साल दर साल बढ़ रहा है. जाहिर है कि इन आंकड़ों के पीछे एक और आंकड़ा उन मामलों का होगा, जो कभी दर्ज ही नहीं होते हैं. क्या अनुसूचित जाति उत्पीड़न की इन घटनाओं के खिलाफ अनुसूचित जाति के सांसदों या विधायकों ने कोई बड़ा यादगार आंदोलन किया है? ऐसे सवालों पर संसद कितनी बार ठप की गई है और ऐसा रिजर्व कैटेगरी के सांसदों ने कितनी बार किया है? इसी तरह, सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अनुसूचित जाति और जनजाति को आबादी के अनुपात में आरक्षण मिला हुआ है. लेकिन, केंद्र और राज्य सरकारें अक्सर यह सूचना देती हैं कि इन जगहों पर कोटा पूरा नहीं हो रहा है. खासतौर पर उच्च पदों पर, अनुसूचित जाति और जनजाति के कोटे का हाल बेहद बुरा है. जैसे कि हम देख सकते हैं कि देश की 43 सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एक भी वाइस चांसलर अनुसूचित जाति का नहीं है या केंद्र सरकार में सेक्रेटरी स्तर के पदों पर भी एक भी एससी या एसटी का कोई अफसर नहीं है.

शासन के उच्च स्तरों पर अनुसूचित जाति और जनजाति की अनुपस्थिति क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों के लिए चिंता का विषय नहीं है? अगर वे इसके लिए चिंतित हैं, तो उन्होंने सरकार पर कितना दबाव बनाया है? क्या इस सवाल पर कभी संसद के अंदर कोई बड़ा आंदोलन या हंगामा हुआ? ज़ाहिर है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ. चूंकि सरकारी नौकरियों की संख्या लगातार घट रही है और हाल के वर्षों में निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग उठी है, लेकिन क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों और विधायकों के लिए यह कोई मुद्दा है? इसी तरह की एक मांग उच्च न्यायपालिका में आरक्षण की भी है. ख़ासकर संसद की करिया मुंडा कमेटी की रिपोर्ट में न्यायपालिका में सवर्ण वर्चस्व की बात सामने आने के बाद से यह मांग मज़बूत हुई है. लेकिन क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों ने कभी इस मुद्दे पर संसद में पुरज़ोर तरीक़े से मांग उठाई है? बता दें कि 120 से ज्यादा एससी और एसटी सांसदों के लिए किसी मुद्दे पर संसद में हंगामा करना और सरकार पर दबाव बनाना मुश्किल काम नहीं है क्यों? क्योंकि ये सभी निकम्मे हैं. एससी, एसटी के नाम पर चुनकर जाने वाले जनप्रतिनिधि समाज के नहीं, बल्कि पार्टियों के हैं जो उन्हें टिकट देकर मैदान में उतारती है. ये जनप्रतिनिधि एससी, एसटी के नाम पर वोट लेते हैं और काम पार्टी की करते हैं. इसको आसान शब्दों में ‘दलाली करना’ कहा जाता है.

इसका सबसे बड़ा कारण है पूना पैक्ट. इसलिए अब समय आ गया है कि पूना पैक्ट की वजह से चली आ रही सुरक्षित सीटों वाली इस व्यवस्था को खत्म करके वो सिस्टम लाया जाए जो बाबासाहब अंबेडकर लाना चाहते थे. बाबासाहब चाहते थे कि ‘सेपरेट इलेक्टोरेट’ यानी सिर्फ अनुसूचित जाति और आदिवासी वोटर ही अपने प्रतिनिधि चुनें. उन सीटों पर दूसरा प्रतिनिधि भी हो, जिनका चुनाव बाकी लोग करें. इससे समाज का सच्चा प्रतिनिधी चुनकर जायेगा और अपने समाज के लिए काम करेगा. अगर गांधी ‘सेपरेट इलेक्टोरेट’ को खत्म नहीं किया होता तो आज ये जनप्रतिनिधि दलाल नहीं बने होते. लेकिन, गाँधी ने ‘ज्वाइंट इलेक्टोरेट’ लागू करके एससी, एसटी, ओबीसी और मायनॉरिटी में दलाल और भड़वों को जन्म दे दिया. यही कारण है कि उनके सामने उनके ही विरोध में कानून बनाए जाते हैं और ये दलाल मुँह तक नहीं खोलते हैं.

सोमवार, 30 सितंबर 2019

देश में तार-तार होती महिलाओं की आबरू


हर मिनट पर बलात्कार की घटनाओं से देश में दहशत

भारत में एक तरफ ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा लगाया जाता है तो दूसरी तरफ उन्हीं बेटियों को हवस का शिकार बनाया जाता है. जबकि, भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में महिलाओं को माँ का दर्जा दिया गया है. लेकिन, उन्हीं माँ समान महिलाओं के साथ बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाएं हो रही हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि जिस देश में बेटी बचाओ का नारा दिया जाता है आज वही देश पूरी दुनिया में माँ और बेटियों के लिए असुरक्षित देश बन गया है? महिलाओं के साथ हो रहे बलात्कार और सामुहिक बलात्कार के मामलों में भारत जहाँ 2011 में चौथे नंबर था वहीं 2018 में दुनिया का नंबर वन देश बन गया.




2018 में जारी नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर 15 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार होता है, हर 22 मिनट पर एक सामुहिक बलात्कार होता है और हर 35 मिनट पर एक बच्ची को हवस का शिकार बनाया जाता है. इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात तो यह है कि हर तीन दिन पर पुलिस थाने में एक बलात्कार होता है. बलात्कार होने वाली महिलाओं में छोटी जातियां और कमजोर वर्ग की महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है.




अगर, भारत में वर्ष 1994 से लेकर 2016 तक की बात करें तो 1994 में केवल बच्चियों के साथ बलात्कार की 3,986 घटनाएं हुई थी जो, वर्ष 2016 में 4.2 प्रतिशत की दर से बढ़कर 16863 घटनाएं हो गई. केवल दिल्ली में महज एक साल 2017 में जहाँ 757 बलात्कार हुए, वहीं 2018 में बलात्कार की 780 घटनाएं हुई. इसके अलावा मध्य प्रदेश के आंकड़ों पर गौर करें तो रोंगटे खड़े हो जायेंगे. यह सुनकर की महज 181 दिनों में महिलाओं के साथ 4,961 छेड़छाड़ की घटनाएं हुई. जबकि, 2,439 बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया गया. इसी तरह से मध्य प्रदेश के चार टॉप शहरों में भोपाल जहाँ 156 बलात्कार, इंदौर 132, जबलपुर 108 और ग्वालियर 97 बलात्कार की घटनाओं के साथ शामिल है.




बता दें कि बलात्कार के मामले में यूपी भी पीछे नहीं है. अगर, आंकड़ों पर गौर करें तो अप्रैल 2017 से जनवरी 2018 तक उत्तर प्रदेश में 3,704 घटनाएं हुई. जबकि, इसी दौरान यूपी में उत्पीड़न के 13,392 घटनाएं और हत्या की 2,223 घटनाओं को अंजाम दिया गया. इसके अलावा 1 अप्रैल 2017 से 31 जनवरी 2018 तक की घटनाओं की बात करें तो 1 अप्रैल 2017 से लेकर 1 जनवरी 2018 तक 3,704 महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया गया और 11,404 शीलभंग की घटनाएं हुई. अब सवाल खड़ा होता है कि देश में कानून लागू है इसके बाद भी महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कोई कमी नहीं आ रही है. देश में महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. इसके बाद भी सरकार इस पर रोक लगाने में नाकाम है. शासन-प्रशासन का रवैया बता रहा है कि इन घटनाओं पर रोक लगाना सरकार और कानून दोनों के ही बस की बात नहीं है.