शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

9 अगस्तः विश्व मूलनिवासी दिवस, मेरी आन, बान शान है.....


‘‘9 अगस्त विश्व मूलनिवासी दिवस के अवसर पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से देश के मूलनिवासी बहुजनों को हार्दिक शुभकामनाएं’’


राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

विश्व मूलनिवासी दिवस, यूएनओ द्वारा पिछले 22 वर्षों से दुनिया के 193 देशों में मनाया जा रहा है. मगर, भारत के ही मूलनिवासी बहुजनों को इसकी जानकारी नहीं है. इसको मद्देनजर रखते हुए अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर मूलनिवासियों की समस्याओं को मजबूती के साथ रखने के सन्दर्भ में बामसेफ के राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम ने 23 जुलाई 2016 को लंदन (इंग्लैंड), 26 जुलाई 2016 को पेरिस (फ्रांस) व 01 अगस्त 2016 को रोम (इटली) में बामसेफ द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनारों का आयोजन किया. तब से भारत में विश्व मूलनिवासी दिसव बड़े पैमाने पर मनाये जाने लगा.

बता दें कि यूएनओ की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई. इसका मुख्यालय न्यूयार्क में है तथा वर्तमान में इसके 193 देश सदस्य हैं. भारत भी यूएनओ का 30 अक्टूबर 1945 से सदस्य है. इसके बाद भी ब्राह्मणों ने यह बात किसी को पता नहीं होने दी. मूलनिवासियों के मानवाधिकारों को लागू करने और उनके संरक्षण के लिए 1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) ने एक कार्यदल ‘‘यूनाईटेड नेशनल वर्किंग ग्रुप ऑन इंडिगेंस पॉपुलेशन’’ (यूएनडब्ल्यूजीओआईपी) के आयोग का गठन किया था. जिसकी, पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को हुई. प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को ‘‘विश्व मूलनिवासी दिवस’’ यूएनए द्वारा अपने कार्यालय एवं अपने सदस्य देशों को मनाने का निर्देश दिया था. मूलनिवासी बहुजन समाज की समस्याओं के निराकरण हेतु विश्व के देशों का ध्यान आर्षित करने के लिए सबसे पहले यूएनओ ने 1982 में होने वाले सम्मेलन के 300 पन्नों के एजेंडे में 40 विषय रखा, जो 4 भागों में बांटे गए. तीसरे भाग में रियोडीजनेरो (ब्राजील) सम्मेलन में विश्व के मूलनिवासियों की स्थिति की समीक्षा की और प्रस्ताव पारित किया. यूएनओ ने यह महसूस किया कि 21वीं सदी में भी विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत मूलनिवासी समाज अपनी उपेक्षा, बेरोजगारी एवं बंधुआ बाल मजदूरी जैसी समस्याओं से ग्रसित हैं.

1993 में यूएनडब्ल्यूजीआईपी कार्य दल के 11वें अधिवेशन में मूलनिवासी घोषणा प्रारूप को मान्यता मिलने पर 1994 को ‘मूलनिवासी वर्ष’ व 9 अगस्त को ‘‘विश्व मूलनिवासी दिवस’’ घोषित किया. अतः मूलनिवासियों को हक अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं का निराकरण, भाषा, संस्कृति, इतिहास के संरक्षण के लिए यूएनओ की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 को जेनेवा शहर में विश्व के मूलनिवासी प्रतिनिधियों का विशाल एवं विश्व का ‘प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय मूलनिवासी दिवस’ का सम्मेलन आयोजित किया. मूलनिवासियों की संस्कृति, भाषा, उनके मूलभूत हक एवं अधिकारों को सभी ने एकमत से स्वीकार किया और उनके सभी हक अधिकार बरकरार रहें इस बात की पुष्टि की गयी. साथ ही यूएनओ ने ‘हम आपके साथ हैं’ यह वचन भी मूलनिवासियों को दिया. यूएनओ ने व्यापक चर्चा के बाद 21 दिसंबर 1994 से 20 दिसंबर 2004 तक प्रथम मूलनिवासी दशक तथा प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को ‘‘विश्व मूलनिवासी दिवस’’ मनाने का फैसला लिया और विश्व के सभी देशों को मनाने का निर्देश दिया.

तब से लेकर अब तक विश्व के समस्त देशों में 9 अगस्त को विश्व मूलनिवासी दिवस मनाया जाने लग. किन्तु, अफसोस भारत की ब्राम्हणवादी सरकारों ने मूलनिवासियों के साथ धोखा करते हुए भारत में इस दिन के बारे में आज तक किसी को नहीं बताया और ना ही आज तक इस पर चर्चा ही किया. जबकि, यूएनओ ने पुनः 16 दिसंबर 2004 से 15 दिसंबर 2014 तक फिर ‘दूसरा मूलनिवासी दशक’ घोषित किया. जेनेवा के सम्मेलन में भारत की मनुवादी सरकार ने अपने प्रतिनिधि के रूप में डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर के सगे पौत्र प्रकाश अम्बेडकर द्वारा यूएनओ को यह अवगत कराया कि भारत में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा परिभाषित देशज अर्थात मूलनिवासी भारतीय लोग ही नहीं हैं और न ही यहाँ के अनुसूचित जाति, जन जातियों से किसी भी प्रकार का सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व शैक्षिक पक्षपात हो रहा है. इस तरह से संयुक्त राष्ट्र संघ में ग्लोबल इकनॉमी के संबंध में मूलनिवासियों को जो प्रतिनिधित्व मिलने वाला था, उसे मनुवादियों ने अपने में से ही बिकाऊ एक मूलनिवासी के द्वारा समाप्त कर दिया. 

यूएनओ द्वारा पिछले 22 वर्षों से निरन्तर विश्व मूलनिवासी दिवस मनाया जा रहा है. किन्तु, भारत के मूलनिवासी बहूजनों को इसकी कोई जानकारी नहीं होने दी. इसको मद्देनजर रखते हुए अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर मूलनिवासियों की समस्याओं को मजबूती के साथ रखने के सन्दर्भ में बामसेफ के राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम ने 23 जुलाई 2016 को लंदन (इंग्लैंड), 26 जुलाई 2016 को पेरिस (फ्रांस) व 01 अगस्त 2016 को रोम (इटली) में बामसेफ द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनारों का आयोजन किया. फिर वामन मेश्राम के इस कोशिश को नाकाम करने के लिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने लन्दन में गया और बोला कि भारत में हिन्दू नामक का कोई धर्म नहीं है, बल्कि एक परम्परा है. बता दें कि यूएनओ की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई. इसका मुख्यालय न्यूयार्क में है तथा वर्तमान में इसके 193 देश सदस्य हैं. भारत भी यूएनओ का 30 अक्टूबर 1945 से सदस्य है. इसके बाद भी ब्राह्मणों ने यह बात किसी को पता नहीं होने दी. ‘‘9 अगस्त, विश्व मूलनिवासी दिवस के अवसर पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से देश के मूलनिवासी बहुजनों को हार्दिक शुभकामनाएं’’

सोमवार, 5 अगस्त 2019

मीडिया की ऐसी की तैसी, देशद्रोही मीडिया का दोगला चरित्र


" भारत में ईवीएम के माध्यम से जनता के वोटों की चोरी हो रही है. इतनी बड़ी खबर भारतीय मीडिया से गायब है. और भारतीय मीडिया इस सच्चाई को बताने के बजाय दूसरे देशों की झूठी बातों को  बता रहा है. भारतीय मीडिया का यह रवैया ही बता रहा है कि भारतीय मीडिया मौजूदा सरकार की दलाली करने में कोई परहेज नहीं कर रहा है"  

 राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

कुछ दिन पहले ही भारतीय मीडिया पर मैने ‘‘मीडिया की करतूत’’ नाम से संपादकीय लिखा था, जिसे दैनिक मूलनिवासी नायक ने 15 जुलाई 2019 को प्रकाशित किया था. मैने उस संपादकीय में लिखा था कि मीडिया का बुनियादी सिद्धांत क्या है? ‘‘सत्य बात बोलना, सत्य बातों का प्रचार-प्रसार करना ही मीडिया का बुनियादी उसूल है’’ परन्तु, भारतीय मीडिया, अपनी बुनियादी उसूलों से हटकर चाटुकारिता करने में मसगुल हो गया है. जिस मीडिया को देश और जनता की सच्ची आवाज बनकर हकीकत को जनता से सरकार को सरकार से जनता को रूबरू कराना चाहिए, आज वही मीडिया यूरेशियन ब्राह्मणों और सत्ता पक्ष की चाटुकारिता करने में गर्व महसूस कर रहा है. यह बात कहने में जरा भी अतिश्योक्ति नहीं है कि आजकल मीडिया पत्रकारिता छोड़कर चाटुकारिता करने लगा है. 

आप लोगों को याद होगा, जम्मू कश्मीर के पुलवामा ज़िले के अवंतिपुरा में 14 फरवरी 2019 को सीआरपीएफ के जवानों पर आतंकी हमला हुआ. हमले में सीआरपीएफ के तकरीबन 40 जवान शहीद हो गए थे. इसके 12 दिन बाद ही भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइट-2 किया. लेकिन, सर्जिकल स्ट्राइक-2 में इस मीडिया की क्या भूमिका रही शायद यह किसी ने नहीं देखा होगा. हम आपको बता रहे हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक-2 में मीडिया की क्या भूमिका थी. सर्जिकल स्ट्राइक-2 में धमाका किसी विमान का नहीं, मिग-21 का नहीं, एफ-16 का नहीं और 1000 किलों बम का नहीं, बल्कि चाटुकार मीडिया का रहा. यानी मीडिया को जो काम करना चाहिए वो नहीं कर रहा था वो दो देशों के बीच माहौल को भड़का रहे थे सरल शब्दों में मीडिया जंग लड़ रहा था. अगर जंग लड़ने का इतना ही शौक है तो देश की सरहद पर जाओ और जंग लड़ो? इसी तरह 23 मई 2019 के लोकसभा चुनाव का परिणाम घोषित हो रहा था. भारतीय जनता पार्टी ईवीएम में घोटाला करके हर सीट जीत रही थी, और हर मीडिया दफ्तर में बीजेपी के जीत की मिठाईयाँ बांटकर चाटुकार पत्रकार जश्न मना रहे थे. उस दौरान चाटुकार मीडिया के चाटुकार पत्रकार ऐसे खुश हो रहे थे जैसे चुनाव नरेन्द्र मोदी नहीं चाटुकार पत्रकारों के रिस्तेदार जीत रहे हों. 

यही नहीं अगर देश में उन्माद फैलाना है तो मीडिया से सीखा जा सकता है कि किस तरह से देश में उन्माद फैलाये जाते हैं. इसका एक बानगी दिखाना चाहता हूँ. इससे पहले यह जान लेने की जरूरत है कि आज देश में चारों तरफ जय श्रीराम के नाम पर भीड़ द्वारा हत्या करने का सिलसिला बहुत ही तेजी से चल रहा है. देश में हिन्दू-मुसलमान के नाम पर जानबूझकर उन्माद, दंगा-फसाद फैलाया जा रहा है. ऐसे में मीडिया झूठी खबर फैलाकर आग में घी डालने का काम कर रहा है. बता दें कि 29 जून 2019 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी से सटे चंदौली जिले में रविवार सुबह एक मुस्लिम युवक को मिट्टी का तेल छिड़क कर जलाए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया. मैं चन्दौली जिले का रहने वाला हूँ इसलिए इस घटना को बारीकी से जानता हूँ. चंदौली जिले के सैयदराजा इलाके में रहने वाला 18 वर्षीय खलील अंसारी रविवार सुबह घर से घूमने के लिए निकला. खलील के बताने के अनुसार जब वह छतेम गाँव के पास पहुँचा तभी मुंह पर कपड़ा बांधे चार युवकों ने उसको पकड़ लिया. कुछ दूर खेत में ले जाकर उसके ऊपर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगा दी और मौके से फरार हो गए. गंभीर रूप से झुलसे युवक को देख लोगों ने इसकी सूचना पुलिस और परिजनों को दी. 

मौके पर पहुंची पुलिस और परिजनों ने खलील को इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया. प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उसे वाराणसी रेफर कर दिया. एसपी संतोष कुमार सिंह ने अस्पताल जाकर पीड़ित का हाल जाना और घटना के बारे में उससे जानकारी ली. सैयदराजा थाना प्रभारी एसपी सिंह ने बताया कि छानबीन के दौरान जिस जगह घटना होने की बता कही गयी थी व वहाँ से काफी दूर एक मजार के पास खलील के कपड़े और चप्पल बरामद हुए. अधिकारियों ने कहा कि इससे लगता है कि मजार पर तंत्र-मंत्र के चक्कर में आग लगने से युवक झुलसा है. लेकिन गाँव के पुराने विवाद को लेकर भी घटना को अंजाम दिया गया हो. यह भी पता चला कि स्कूल में कुछ लड़कों से उसका झगड़ा हो गया था हो सकता है इस घटना में उन्हीं लड़कों का हाथ हो. हालांकि इसकी जाँच चल रही है.
हद तो तब हो गयी जब टीवी चैनल, समाचार पत्र और वेबसाइटों पर यह खबर चलाई गयी कि चन्दौली में मुस्लिम युवक से जबरन ‘जय श्रीराम बुलवाया गया’ मुस्लिम युवक द्वारा नहीं बोलने पर उसको जिंदा लगाने की कोशिश की गयी. जबकि, इस घटना में इस बात का रत्तीभर भी जिक्र नहीं है कि पीड़ित युवक से जय श्रीराम बुलवाया गया और उसके न बोलने पर आग लगा दी गयी. चन्दौली के आसपास के सभी समाचार पत्रों में भी इसका जिक्र नहीं है. यानी इस तरह की झूठी खबर फैलाने का मतलब साफ है कि मीडिया हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर देश में दंगा फैलाने का काम कर रहा है. अब ऐसे मीडिया को दलाल, भड़वा और ब्राह्मणवादी सरकरों की चाटुकारिता करने वाला आदि जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाय तो क्या कहा जाय?

दूसरी बात अगर भारतीय मीडिया को, पाकिस्तान की छोटी से भी छोटी खबर मिल जाय तो उसमें मसाला लगाकर उसे ऐसा पेश करेंगे जैसे वहाँ जाकर उस खबर की खुद रिर्पोटिंग की हो वहीं जब पाकिस्तानी या अन्य देशों की मीडिया मोदी सरकार या सरकार के अन्य नेताओं पर आरोप लगाते हैं, तो भले ही वह आरोप सच क्यों न हो मगर, यही भारतीय मीडिया उसे मानने के लिए राजी नहीं होता है. बल्कि उस सच्ची खबर को सीधे खारिज करते हुए विदेशी मीडिया पर हमला शुरू कर देते हैं. हाल ही में भारतीय मीडिया ने पाकिस्तान के बारे में एक खबर छापते हुए लिखा था कि पाकिस्तान में पचास फीसदी परिवार ऐसे हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही है और चालीस फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. एक कहावत है कि ‘‘दूसरों के गिरेवान पर हाथ डालने से पहले अपने गिरेवान में झांक लेना चाहिए’’ यही हाल भारतीय मीडिया का है. भारत में बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, हत्या, बलात्कार, दंगा-फसाद, मॉब लिंचिंग, नक्सलवाद, आतंकवाद और भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गयी है. यही नहीं भारत में ईवीएम के माध्यम से जनता के वोटों की चोरी हो रही है. इतनी बड़ी खबर भारतीय मीडिया से गायब है. और भारतीय मीडिया इस सच्चाई को बताने के बजाय दूसरे देशों की बातों को  बता रहा है. भारतीय मीडिया का यह रवैया ही बता रहा है कि भारतीय मीडिया मौजूदा सरकार की दलाली करने में कोई परहेज नहीं कर रहा है.
इसकी एक और बानगी देखी जा सकती है. जहाँ एक तरफ लाखों लोगों के लिए बाढ़ त्रासदी बनकर आई है. इस बाढ़ में लाखों लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है तो वहीं दूसरी तरफ मीडिया के दलाल पत्रकारों ने ‘बाढ़ क्षेत्र’ को एक पिकनिक स्पॉट बना दिया है. पानी की जिस धारदार बहाव से असम, बिहार और मुंबई के कई हिस्सों में लोग मौत के मुँह में समाते जा रहे हैं और उसी को पूल समझकर ये पत्रकार तैरते हुई रिकॉर्डिंग कर रहे हैं. यह मामला यही नहीं रूका, ऐसा करने के लिए भी खुद कष्ट नहीं उठा रहे हैं. बल्कि, पहले से ही असुविधा में जी रहे ग्रामीणों से अपना बोझा उठवा रहे हैं या दूसरे शब्दों में कहें तो ग्रामीणों की इस बदहाली का मजाक उड़ा रहे हैं.

इस बात का नजारा दलाल मीडिया के दलाल एंकरों की सोशिल मीडिया पर वायरल इन तस्वीरों में आसानी से देखी जा सकती है. हालांकि, इनकी घिनौती हरकत से सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हो रही है. जरा गौर से देखिए वायरल इन तस्वीरों को कि कैसे बाढ़ त्रासदी में भी मजे ले रहे हैं.  वायरल तस्वीर में साफ दिख रहा है कि कैसे ‘इंडिया टुडे’ समूह की एंकर चित्रा त्रिपाठी अपने माईक के साथ केले के थम पर बैठकर रिपोर्टिंग कर रही हैं और तीन चार लोग इस थम का बोझा उठाए हुए हैं ताकि एंकर पानी में न चली जाएं. हद तब और ज्यादा हो गयी जब हाथ को हवा में उठाकर ऐसे बॉय-बॉय का संकेत दे रहे हैं जैसे अब वो इस दुनिया से जा रहे हैं. चले भी जाते तो अच्छा ही होता कम से कम बाढ़ त्रासदी से जूझ रहे बाढ़ पीडितों का मजाक तो नहीं उड़ाया जाता! 

मजेदार बात यह है कि बाढ़ की विभीषिका दिखाने के लिए तैरने और उतराने की जरूरत ही क्या है? लेकिन, नहीं लोगों की बदहाली का मज़ाक उड़ाते इन बेशर्म पत्रकारों को इसकी कोई फिक्र नहीं है. जिन ग्रामीणों की हर संभव मदद की जानी चाहिए थी उनको ही अपने इस ‘विशेष शूटिंग’ में लगा दिया गया है. दल्ला मीडिया की इन हरकतों से नाराज़ तमाम लोग सोशल मीडिया पर आलोचनात्मक प्रतिक्रिया दे रहे हैं. इस वायरल तस्वीर को फेसबुक पर शेयर करते हुए एक ने लिखा कि ‘कुछ दिन पहले पत्रकारिता आई.सी.यू में थी, अब केले के थम पर आ गई है. बेशर्म पत्रकार चित्रा त्रिपाठी की हरकत यही नहीं रूकी. चित्रा की ही एक अन्य तस्वीर भी है जिसका जिक्र मैने ऊपर किया है. जिसमें वह एक नाव पर सैर करती नजर आ रही है. इन तस्वीरों को देखकर क्या लगता है कि इन बेशर्मों को बाढ़ त्रासदी से जूझ रहे पीड़ितों की रत्तीभर भी चिंता है? मेरे हिसाब से इन बेशर्मों के लिए ‘बाढ़’ त्रासदी नही, महज मनोरंजन मात्र है और पीड़ित एक मजाक बन गये हैं.

अब सवाल यह है कि इसका कारण क्या है? इसका यही कारण है कि भारत की मीडिया पर ब्राह्मण और बनियों का पूर्ण रूप से कब्जा है. 234-235 सालों में देश में तकरीबन 3840 टीवी चैनल और 5170 से ज्यादा समाचार पत्र हैं. लेकिन, इन सभी समाचार पत्रों, टीवी चैनलों के मालिक बनिया हैं और संपादक ब्राह्मण हैं. टाईम्स ऑफ इंडिया का मालिक जैन बनिया, दैनिक जागरण का मालिक गुप्ता बनिया, दैनिक भाष्कर का अग्रवाल बनिया, गुजरात समाचार का शाह बनिया, लोकमत का दरिणा बनिया, राजस्थान पत्रिका का कोठारी बनिया, नव भारत का जैन बनिया और अमर उजाला का मालिक महेश्वरी बनिया है. अगर टीवी चैनलों की बात करें तो लोकसभा टीवी के सीईओ राजिव मिश्रा, राज्य सभा टीवी के सीईओ राजेश बादल, डीडी दूरदर्शन के त्रिपुरारी शर्मा, प्रसार भारती के चेयरमैन एस सूर्य प्रकाश, पीटीआई के चेयरमैन एमएम गुप्ता, टाईम्स ग्रुप के सीईओ रविन्द्र धारीवाल, एक्सप्रेस ग्रुप के विवेक गोयंका और हिन्दू के सीईओ राजीव लोचन हैं. इस तरह से मीडिया पर पूरी तरह से ब्राह्मणों और बनियों का कब्जा हो गया है. जबकि एससी, एसटी, ओबीसी और मायनॉरिटी की संख्या जीरो है. यही सबसे बड़ा कारण है कि देश की चाटुकार मीडिया ब्राह्मणों और सरकारों की चाटुकारिता कर रहा है.


गुरुवार, 1 अगस्त 2019

एक सरकार में दो परम्परा....



5 जुलाई, 2019 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश का बजट पेश किया. इस बार का बजट उन्होंने सूटकेस में न लाकर एक लाल कपड़े में लाया. इसके बाद चारों तरफ यह गूंज उठने लगी कि यह एक नई परम्परा की शुरूआत किया गया है. परन्तु एक सवाल जेहन में कौंध रहा है कि एक ही सरकार के कार्यकाल में दो परम्पराएं कैसे संभव है? दरअसल बात यह है कि बीते पाँच साल तक बीजेपी की सरकार रही और बीते पाँच सालों में सूटकेस में ही बजट पेश होते आया है. लेकिन मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में यह बताया जा रहा है कि निर्मला सीतारमण ने उस परम्परा को खत्म करके एक नई परम्परा की शुरूआत की है. इन सबसे मजेदार बात तो यह है कि मौजूदा वित्तमंत्री ने यहाँ तक कह दिया कि लंबे समय से चली आ रही सूटकेस की परम्परा गलत थी. सवाल तो यहाँ भी खड़ा होता है कि यह जानते हुए भी मोदी सरकार ने गलत परम्परा क्यों जारी रखी? परन्तु यह भी जानने की आवश्यकता है कि जो परम्परा गलत थी उसे भी मोदी सरकार ने जारी रखा और जो नई परम्परा की शुरूआत हुई वो भी मोदी सरकार के ही कार्यकाल में हुई है. यानी एक ही सरकार के कार्यकाल में दो परम्पराएं संभव हैं?

खैर इस संदर्भ में निर्मला सीतारमण ने क्या कहा एक नजर इसपर भी डालते हैं. इसके पीछे की एक कहानी है, जिसे खुद निर्मला सीतारमण ने सुनाया है, हर बात पर गौर करने जी जरूरत है. 5 जुलाई, 2019. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश का बजट पेश किया. इसे नाम दिया गया बही-खाता. अब तक होता ये आया था कि बजट को एक चमड़े के बैग में लेकर जाया जाता था. लेकिन पाँच जुलाई को जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करने गईं, तो बजट चमड़े के बैग में नहीं बल्कि लाल रंग के एक कपड़े में रखा हुआ था और उस कपड़े पर अशोक की लाट बनी हुई थी. बजट चमड़े के बैग में न होकर लाल रंग के कपड़े में क्यों था, इसको लेकर अलग-अलग कयास लगाए जा रहे थे. भारत के चीफ इकनॉमिक एडवाइजर के. सुब्रमण्यम ने बताया था कि लाल रंग शगुन यानी शुभ का प्रतीक होता है. इसीलिए वित्त मंत्री की बजट वाली फाइल लाल रंग की है. यह पश्चिमी विचारों की गुलामी से निकलने का प्रतीक है. लेकिन अब खुद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया है कि बजट चमड़े के बैग में न होकर लाल रंग के कपड़े में क्यों था.

6 जुलाई को पत्रकारों से बातचीत में निर्मला सीतारमण ने बताया भारत के किसी भी हिस्से में जाइए, वहाँ बही-खाते को लाल रंग के कपड़े में रखने की परंपरा है. दक्षिण भारत में लक्ष्मी पूजा के दौरान इसी तरह से हिसाब-किताब की कॉपी लाल रंग के कपड़े में लपेटकर रखी जाती है. गुजरात और महाराष्ट्र में दिवाली पूजा के अगले दिन और असम में बिहू के वक्त ऐसा ही किया जाता है. ये हमारी परंपरा है. ब्रीफकेस में बजट ले जाना हमारी परंपरा नहीं है. ब्रीफकेस इसलिए ले जाया जाता है ताकि उसमें रखने पर कागज न गिरें, लेकिन कागजों को गिरने से बचाने के लिए उन्हें लाल कपड़े में भी बांधा जा सकता है. इसलिए मैंने सोचा कि बजट को लाल रंग के कपड़े में ले जाया जाए. 

दिलचस्प बात तो यह भी है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के हाथ में जो लाल रंग की पोटली थी उसे किसी और ने नहीं खुद वित्तमंत्री की मामी ने तैयार किया था. क्या वित्तमंत्री की मामी वित्तमंत्रालय में कोई बड़े ओहदे पर हैं कि एक वित्तमंत्री की फाइल उलटपलट सकती हैं? बजट के लिए लाल रंग का कपड़े की पोटली तैयार की गई थी. निर्मला सीतारमण ने इसके बारे में बताते हुए कहा अपना बजट भाषण रखने के लिए मैंने लाल रंग का एक बुक कवर मंगवाया था. मेरे घर में मेरे साथ मामा-मामी भी रहते हैं. मामी ने देखा कि बुक कवर में क्लिप नहीं है. मामी ने कहा कि ऐसे तो कागज गिर जाएंगे. इसके बाद उन्होंने लाल रंग के कपड़े से ही एक फोल्डर बना दिया और फिर लाल कपड़े का बस्ता जैसा सिल दिया, जिससे कोई कागज न गिरे.

उन्होंने कहा मेरे मामा-मामी लंबे समय से मुंबई में रहते हैं. उनका सिद्धिविनायक मंदिर और महालक्ष्मी मंदिर से गहरा जुड़ाव है. एक बात और समझ में नहीं आ रही है कि यहाँ देश का बजट पेश हो रहा है कि पारिवारिक जान-पहचान हो रही है. खैर आगे देखते हैं क्या कहा. उन्होंने कहा मामा-मामी बजट की इस पोटली को लेकर मंदिर गए. अरे वाह! यह तो कमाज हो गया. कोई आम आदमी देश के बजट की फाइल को लेकर शहर-शहर और मंदिर-मंदिर लेकर धूम भी रहा है? उन्होंने कहा वहाँ दर्शन के बाद जब ये मेरे पास वापस आया, तो मैंने इसपर भारत का राजचिन्ह और सत्यमेव जयते लिखी अशोक की लाट लगवाई, जिसके बाद ये ऑफिशियल हो गया. जब मैं इसे लेकर संसद पहुंची तो लोगों ने इसे बही-खाते का नाम दे दिया. ये तो बहुत कमाल हो गया, कोई सरकार कागज को मंदिरों के दर्शन कराने से भी ऑफिशियल हो सकता है आज यह भी पता चल गया. इस तरह से देश की महिला वित्त मंत्री ने देश का बजट देश के सामने रखा, जो लाल रंग के कपड़े में लिपटा हुआ था और जिसे देखकर संसद में मौजूद लोगों ने इसे बही-खाते काम नाम दे दिया था. अर! भाई यह तो एक ही सरकार के कार्यकाल में दो परंपराएं चल रही है? यदि उक्त बातों पर विश्लेषण किया जाय तो एक लाइन में ऐसा कहा जाता है कि देश की जनता को सिफ मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा किया जा रहा है.

लाखों पद खाली फिर भी युवा बेरोजगार


केन्द्र सरकार में 07 लाख और रेलवे में 2.6 लाख से ज्यादा पद खाली, देश भर में पुलिस बलों के 5.28 लाख पद रिक्त
 

भारत में नौकरियों की रत्तीभर भी कमी नहीं है, बल्कि नौकरियों की भरमार है. इसके बाद भी देश में बेरोजगारों की पूरी फौज खड़ी हो चुकी है. जहाँ एक तरफ केन्द्र से लेकर राज्य की सरकारें नौकरियों की बात करती हैं तो वहीं दूसरी तरफ भर्तियों को रोक लगा रखी हैं. बात यदि सभी क्षेत्रों में नौकरियों की करें तो भारत में सरकारी और अर्धसरकारी क्षेत्रों में लगभग 02 करोड़ से ज्यादा नौकरियाँ हैं. अगर केन्द्र सरकार में खाली पदों की बात करें तो केवल केन्द्र सरकार में 07 लाख से ज्यादा और रेलवे में 2.6 लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं. इसके बाद भी सरकारें खाली पदों को नहीं भर रही हैं. यही नहीं सरकारों द्वारा नई भर्तियाँ कराना तो दूर लंबे अरसों से खाली पड़े इन पदों को भी खत्म कर रही हैं. 

गृहमंत्रालय के अनुसार देश भर में केवल पुलिस के कुल 5.28 लाख पद रिक्त हैं. जिनमे से सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में तकरीबन 1.29 लाख पद खाली हैं. हैरान करने वाला बात तो यह है कि उत्तर प्रदेश में केवल पुलिस में 1.29 लाख पद खाली हैं. इसके बावजूद भी योगी सरकार उत्तर प्रदेश में 93 सरकारी विभागों में से 49 विभागों को खत्म करने का फरमान जारी कर दिया है. इसके साथ ही बिहार में 50,000 पद और पश्चिम बंगाल में 49,000 पद रिक्त हैं. गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, सभी राज्यों के पुलिस बलों में 23,79,728 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से सरकार का दावा है कि 18,51,332 पदों को एक जनवरी, 2018 तक भर लिया गया था. 

मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि इस तारीख तक कुल 5,28,396 पद खाली पड़े थे. उत्तर प्रदेश में पुलिस बल में अनुमोदित पदों की संख्या 4,14,492 है. इनमें से 2,85,540 पद भरे हुए और 1,28,952 पद रिक्त हैं. बिहार में 1,28,286 स्वीकृत पदों में से 77,995 पदों पर कर्मी कार्यरत हैं और यहाँ 50,291 पद खाली हैं. वहीं पश्चिम बंगाल पुलिस में ऐसी स्वीकृत संख्या 1,40,904 है और यहाँ 48,981 रिक्त पद हैं. इसी तरह से तेलंगाना में भी 30,345 रिक्त पद हैं जबकि यहाँ 76,407 पद स्वीकृत हैं.

अगर महाराष्ट्र की बात करें तो महाराष्ट्र में 26,195 पद रिक्त हैं. जबकि, यहां 2,40,224 पुलिस कर्मियों के पद स्वीकृत हैं और मध्यप्रदेश में 1,15,731 स्वीकृत पदों में कुल रिक्तियाँ 22,355 हैं. इसके अलावा तमिलनाडु पुलिस में 1,24,130 स्वीकृत पदों के बरक्स 22,420 पद खाली हैं. साथ ही कर्नाटक पुलिस में 1,00,243 स्वीकृत पदों में से 21,943 पदों पर नियुक्ति होनी बाकी है. यही नहीं गुजरात पुलिस की कुल 1,09,337 और झारखंड पुलिस की कुल 79,950 स्वीकृत संख्या में रिक्तियाँ क्रमशः 21,070 और 18,931 हैं. इसके बाद राजस्थान में 1,06,232 स्वीकृत पदों में से 18,003 पद खाली हैं. आंध्र प्रदेश पुलिस में, 72,176 पदों में से, 17,933 पद खाली हैं, जबकि हरियाणा में 61,346 पदों की स्वीकृत संख्या में से 16,844 पद खाली हैं. यही हाल नक्सल प्रभावित इलाकों की है. नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में स्वीकृत 71,606 पुलिस पदों में 11,916 पद खाली हैं. ओडिशा पुलिस के पास 66,973 स्वीकृत पद हैं और यहाँ खाली रिक्तियों की संख्या 10,322 है. वहीं उग्रवाद प्रभावित असम में 65,987 स्वीकृत पदों में से 11,452 रिक्त पद हैं, जबकि जम्मू और कश्मीर में 87,882 स्वीकृत पदों में 10,044 पद रिक्त हैं.

दिलचस्प बात यह है कि नागालैंड पुलिस देश की एकमात्र ऐसा बल है जहाँ 21,292 पदों की स्वीकृत संख्या से 941 अधिक कर्मियों को भर्ती किया गया है. अधिकारियों ने बड़ी संख्या में पद रिक्त होने के लिए धीमी भर्ती प्रक्रिया, सेवानिवृत्ति और असामयिक मृत्यु जैसे कारणों को जिम्मेदार ठहराया है. यदि देखा जाय तो रिक्त पद खाली होने का कारण अधिकारी कम सरकारें ज्यादा हैं. क्योंकि सरकार ही नहीं चाह रही है कि देश से बेरोजगारी को खत्म करके गरीबी और भुखमरी को खत्म किया जाय, इसलिए सरकारें बेरोजगारी, गरीबी और भुखमरी को खत्म करने के बजाय नौकरियों को ही खत्म कर रही हैं.
राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

राजधानी लखनऊ के थानों पर ठाकुर, ब्राह्मणों का कब्जा : योगी राज में 60 फीसदी थानेदार क्षत्रिय और ब्राह्मण




सूबे में जब से योगी की सरकार बनी है तब से राजधानी सहित सूबे में सभी जिलों के थानों पर ठाकुरों और ब्राह्मणों का पूर्ण रूप से कब्जा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के थानों पर तकरीबन 60 प्रतिशत से ज्यादा ठाकुरों और ब्राह्मणों का कब्जा है. इस बात का खुलासा तब हुआ जब आरटीआई के तहत आईजी अमिताभ ठाकुर की पत्नी डॉ.नूतन ठाकुर द्वारा मांगे गये एक जवाब में यह बात सामने आई. आरटीआई में खुलासा हुआ है कि यूपी की राजधानी के 60 फीसदी थानों की जिम्मेदारी क्षत्रिय या ब्राह्मण समुदाय के पास है. अखिलेश सरकार के दौर में यादववाद का आरोप लगता था, लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि लखनऊ के 43 थानों में से एक पर भी यादव थाना प्रभारी नहीं हैं.


आईजी अमिताभ ठाकुर की पत्नी डॉ. नूतन ठाकुर ने आरटीआई के तहत लखनऊ के थाना प्रभारियों की सूचना मांगी थी. इस आरटीआई पर एसएसपी लखनऊ कलानिधि नैथानी ने थाना प्रभारियों की सूचना दी है. इस लिस्ट में दी गई सूचना के मुताबिक लखनऊ के कुल 43 थाने हैं, जिनमें से 14 थानों पर क्षत्रिय, 11 पर ब्राह्मण, 9 पर अन्य पिछड़ा वर्ग, 8 पर अनुसूचित जाति और महज 1 थाने पर सामान्य मुस्लिम थाना प्रभारी नियुक्त है. इस प्रकार लखनऊ के कुल थाना प्रभारियों में 60 फीसदी थाना प्रभारी क्षत्रिय या ब्राह्मण जाति के हैं, जिसमें अकेले क्षत्रिय जाति के एक-तिहाई थाना प्रभारी हैं.

बता दें कि सत्ता पर काबिज बीजेपी, सपा सरकार पर ‘यादववाद’ और बसपा पर ‘जाटववाद’ के खिलाफ अक्सर तंज कसती थी. अखिलेश सरकार में नियुक्तियों पर सवाल खड़े करने से लेकर पुरस्कार वितरण तक में जातिवाद का इल्जाम लगता रहा. यहाँ तक कि ये भी कहा जाता रहा कि यूपी के अधिकतर थानेदार यादव हैं. लेकिन, योगी सरकार में उससे कहीं ज्यादा जातिवाद का परचम लहरा रही है कि लखनऊ के 60 फीसदी थानों की जिम्मेदारी क्षत्रिय या ब्राह्मण समुदाय के पास है.

आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक लखनऊ में पिछड़ा वर्ग के मात्र 20 फीसदी और अनुसूचित जाति के 18 फीसदी थाना प्रभारी वर्तमान समय में लखनऊ में तैनात हैं. आरटीआई के अनुसार पिछड़ा वर्ग में 6 थाना प्रभारी कुर्मी, 1 काछी, 1 मौर्य और 1 मुस्लिम हैं. जबकि, लखनऊ के किसी भी थाने में यादव समुदाय का कोई भी थाना प्रभारी नियुक्त नहीं है. लखनऊ जिले में दो 2 मुस्लिम थानाध्यक्ष हैं, जिनमें सामान्य वर्ग के फरीद अहमद अलीगंज और पिछड़ा वर्ग के मोहम्मद अशरफ थाना जानकीपुरम में तैनात हैं. इस पर आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ.नूतन ठाकुर ने कहा कि थाना प्रभारियों की तैनाती में शासनादेश का साफ उल्लंघन है. ये भी विचार का एक गंभीर विषय है. इससे साफ जाहिर होता है कि योगी सरकार ने राजधानी पर ठाकुरों और ब्राह्मणों का कब्जा कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.
राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

बहुजनों के उद्धारक छत्रपति शाहूजी महाराज




♦ आरक्षण के पिता, बहुजनों के उद्धारक छत्रपति शाहूजी महाराज के 145वें जन्म दिवस पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से हार्दिक शुभेच्छा! 

सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म 26 जून 1874 को कोल्हापुर में हुआ था. उनके पिता का नाम श्रीमंत जयसिंह राव आबासाहब घाटगे तथा उनकी माता का नाम राधाबाई साहिबा था. शाहूजी महाराज की शिक्षा राजकोट में स्थापित राजकुमार कॉलेज में हुई थी.राजकोट की शिक्षा समाप्त करके शाहूजी को आगे की शिक्षा पाने के लिए 1890 से 1894 तक धारबाड़ में रखा गया. शाहूजी महाराज ने अंग्रेजी, इतिहास और राज्य कारोबार चलाने की शिक्षा ग्रहण की. अप्रैल 1897 में शाहूजी का विवाह खानविलकर की कन्या श्रीमंत लक्ष्मीबाई से संपन्न हुआ. विवाह के समय लक्ष्मीबाई की उम्र महज 11 वर्ष की ही थी. जब छत्रपति शाहूजी महाराज की आयु 20 वर्ष थी तब इन्होंने करवीर (कोल्हापुर) संस्थान के अधिकार ग्रहण करके सत्ता की बागड़ोर अपने हाथ में ले ली तथा शासन करने लगे. इसके बाद यशवंत राव शाहूजी महाराज कहलाने लगे.

1894 में शाहूजी महाराज का जब राज्यभिषेक हुआ, उस समय चारों ओर ब्राह्मणों का वर्चस्व था. उनके राज्य में एक सौ मंत्री ब्राह्मण थे. शाहूजी महाराज ने अपने राज्य में ब्राह्मणों का प्रभुत्व कम कर दिया और मूलनिवासी बहुजनों को प्रतिनिधित्व दिया. छत्रपति शाहूजी महाराज जिस समय गद्दी पर बैठे, उस समय समाजिक दशा कई दृष्टियों से सोचनीय थी. जाति-पाँत, ऊँच-नीच, छुआ-छूत, मानवाधिकारों की असमानता, निर्धन कृषकों और मजदूरों की दीन-हीन स्थिति, पाखंडवाद भरी धर्म पद्धति, वर्ण-व्यवस्था का घोर तांडव असहाय जनता को उबरने नहीं दे रही थी. वर्ण-व्यवस्था में चौथा वर्ण यानी शूद्र जिसका कोई अपना अस्तित्व नहीं था, उसकी दशा दायनीय थी. उस समय वर्ण-व्यवस्था और ऊँच-नीच के भेदभाव को मिटाने के लिए ‘‘सत्य शोधक समाज“ लगातार कार्य कर रहा था, जिसकी स्थापना महात्मा राष्ट्रपिता ज्योतिबाफुले ने की थी. शाहूजी के जीवन पर राष्ट्रपिता जोतिराव फुले का काफी प्रम्भाव था. फुले के देहांत के बाद महाराष्ट्र में चले सत्यशोधक समाज आन्दोलन का कारवाँ चलाने वाला कोई नेता नहीं था. 1910 से 1911 तक शाहूजी महाराज ने इस सत्यशोधक समाज आन्दोलन का अध्ययन किया. 1911 में राजा शाहूजी महाराज ने अपने संस्थान में सत्य शोधक समाज की स्थापना की. कोल्हापुर संस्थान में शाहू महाराज ने जगह-जगह गाँव-गाँव में सत्यशोधक समाज की शाखाएँ स्थापित की. 

शाहूजी महाराज इस बात से चिंतित रहते थे कि महाराष्ट्र में उस समय ब्राह्मणों की संख्या 5 प्रतिशत थी, लेकिन फिर भी वे ब्रिटिश शासन में हर स्थान पर नियुक्त थे. राजनीति, सरकारी नौकरियाँ, धर्मदण्ड सभी कुछ उनके हाथ में था. ऐसी विषम स्थिति में अबोध और गरीब जनता का जीवन नारकीय हो गया था. ब्राह्मण शिक्षा पर अपना एकाधिकार बनाये हुए थे. वे गैर-ब्राह्मणों को शिक्षा पाने पर प्रतिबन्ध लगाये हुए थे. वेदों का अध्ययन ब्राह्मणों के अतिरिक्त कोई जाति नहीं कर सकती थी. छत्रपति शाहूजी महाराज जी की धारणा थी कि शासन में सभी वर्गों व जातियों के लोगों की साझेदारी शासन को संतुलित और चुस्त बनाएगी. किसी एक जाति के लोगों का शासन प्रजा की वास्तविक भावना और आकांक्षा का प्रतिनिधित्व नहीं करता और अंततः उन्होंने ऐसा ही किया. सर्वप्रथम उन्होंने अपने दरबार से ब्राह्मणों के वर्चस्व को कम किया और सभी वर्गों की भागीदारी निश्चित की. वे मूलनिवासियों को नौकरियों पर ही नहीं रखा, बल्कि उनकों साथ लेकर चलने भी लगे. इससे ब्राह्मणों में रोष उत्पन्न हो गया और वो लोगों में भ्रम फैलाने लगे कि छत्रपति शाहूजी महाराज अनुभवहीन है तथा वे अक्षम लोगों को सरकारी पदों पर नियुक्त कर रहे हैं. छत्रपति शाहूजी महाराज अपनी विचारधारा पर अटल थे और उनपर ब्राह्मणों के इस रवैये का कोई फर्क नहीं पड़ा.

उन्होंने प्रशासन में ब्राह्मणों के इस एकाधिकार को समाप्त करने के लिए तथा बहुजन समाज की भागीदारी के लिए आरक्षण कानून बनाया. इस क्रान्तिकारी कानून के अंतर्गत बहुजन समाज के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था थी. यह देश में आरक्षण की पहली व्यवस्था थी. क्योंकि उस समय बहुजन समाज के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद थे. उन्हें तिरस्कार की जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया जाता था.  छत्रपति शाहूजी महाराज जी ने अनुभव किया कि अछूत वर्ग तथा पिछड़े वर्ग के लोग प्रायः अशिक्षित और निर्धन हैं. वे आर्थिक दरिद्रता और सामाजिक अपमान को एक लम्बी परम्परा से भोग रहे हैं. छत्रपति शाहूजी जी महाराज जी की इच्छा थी कि शिक्षा का प्रसार छोटी जातियों एवं वर्गों के बीच किया जाए, जिससे उनकों अपने अधिकारों का सही ज्ञान हो सके. इसके लिए उन्होंने स्वयं की देख-रेख में 18 अप्रैल 1901 में मराठा स्टूडेंट्स इंस्टीट्यूट एवं विक्टोरिया मराठा बोर्डिंग संस्थान की स्थापना की और 47 हजार रूपये खर्च करके इमारत बनवाई. 1904 में जैन हॉस्टल, 1906 में मॉमेडन हॉस्टल और 1908 में अस्पृश्य मिल क्लार्क हॉस्टल जैसी संस्था का निर्माण किया और अपने राज्य में स्कूली छात्रों को निःशुल्क शिक्षा, पुस्तकें एवम् भोजन की व्यवस्था करके शाहूजी महाराज ने शिक्षा फैलाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया जो मील का पत्थर साबित हुआ. 

अज्ञानी और पिछड़े बहुजन समाज को ज्ञानी, संपन्न एवं उन्नत बनाने हेतु छत्रपति शाहूजी महाराज ने अपने जीवन का एक-एक क्षण समर्पित कर दिया. अंततः 06 मई 1922 को केवल 48 वर्ष की आयु में बहुजन समाज के हितकारी राजा छत्रपति शाहूजी महाराज का परिनिर्वाण हो गया. आज छत्रपति शाहूजी महाराज के जीवन संघर्ष से मूलनिवासी बहुजन समाज को प्रेरणा लेकर निश्चित रूप से समाज में काम करना चाहिए और उनके क्रांतिकारी विचारों को जन-जनतक पहुँचाने का काम करना चाहिए. आरक्षण के पितामह, बहुजनों के उद्धारक छत्रपति शाहूजी महाराज के 145वें जन्म दिवस पर दैनिक मूलनिवासी नायक परिवार की ओर से हार्दिक शुभेच्छा!
राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)

बामसेफ भवन पूना में आरक्षण अधिकार दिवस पर विशेष प्रबोधन कार्यक्रम का आयोजन


आरक्षण का विरोध करने वाले आरक्षण नहीं दे सकतेः डीआर ओहोल

जिन लोगों ने आरक्षण का विरोध किया और कर रहे हैं वहीं लोग सत्ता में भी हैं. क्या वे लोग आरक्षण देंगे? आरक्षण का विरोध करने वाले, आरक्षण नहीं दे सकते हैं. अगर इतिहास पढ़ो तो पता चलेगा कि शासक वर्ग यूरेशियन ब्राह्मण 1902 से लेकर 2019 तक लगातार आरक्षण का विरोध करते आ रहे है. 1902 में  पटवरधर ने आरक्षण का विरोध किया, 1918 में बाल गंगाधर तिलक ने विरोध किया, 1928 में गाँधी ने विरोध किया, 1932 में फिर गाँधी ने विरोध किया, जिसमें लाठी लगने से लाला लाजपत राय की मौत हो गयी. 

1946 में गाँधी, नेहरू और सरदार पटेल ने विरोध किया, 1950 को गाँधी और नेहरू ने विरोध किया, 1953 में कांग्रेस और नेहरू ने काला कालेलकर का विरोध किया, 1979 में मोराजी देसाई ने मंडल आयोग का विरोध किया, 1981 में इंदिरा गाँधी ने विरोध किया और 1984 में उसकी हत्या हो गयी. 1984-89 में राजीव गाँधी ने विरोध किया और 1991 में उसकी भी हत्या हो गयी. 1996 लेकर 1999 तक अटल बिहारी बाजपेयी ने विरोध किया, 2004 से 2014 तक फिर कांग्रेस से सोनिया गाँधी ने विरोध किया और 2014 से अब तक नरेन्द्र मोदी आरक्षण का विरोध कर रहा है. 

यह बात डी.आर.ओहोल (प्रभारी, केन्द्रीय सचिवालय बामसेफ, पूना) ने बामसेफ भवन में 26 जुलाई 2019 को 117वें आरक्षण अधिकार दिवस को संबोधित करते हुए कही. बालासाहब मिसाल पाटिल (प्रदेश अध्यक्ष, बीएमपी) इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे. इस कार्यक्रम का आयोजन, दिलीप बाइत (संपादक, दैनिक मूलनिवासी मराठी) ने किया, वहीं संचालन स्वप्नील नरांजे (डीटीपी, दै.मू.नायक मराठी) और राजकुमार (सहा.संपादक, दै.मू.नायक हिन्दी) ने धन्यवाद ज्ञापन दिया एवं सुनील गवली ने सोशल मीडिया पर सीधा प्रसारण किया. इसके साथ ही गौरव कसारे, परेश हेब्रम ने अपने-अपने विचार रखे. तथा बामसेफ भवन के सभी पूर्णकालीन कार्यकर्ता मौजूद रहे.
डीआर ओहोल ने कहा प्रतिनिधित्व (आरक्षण) की बुनियादी बातें हमारे लोगों को मालूम ही नहीं है.

उन्होंने कहा छत्रपति शाहूजी महाराज भारत में आरक्षण के जनक हैं. 1882 में हंटर कमीशन भारत में आया. राष्ट्रपिता जोतिराव फुले ने सबसे पहले हंटर कमीशन के सामने मूलनिवासी बहुजनों को आरक्षण की मांग की. इससे प्रेरणा लेकर छत्रपति शाहूजी महाराज ने 1902 को लोल्हापुर की सियासत में मूलनिवासी बहुजनों को 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया. डीआर ओहोल ने कहा छत्रपति शाहूजी महाराज कोई भी बात बगैर सर्वे और बगैर उदाहरण के नहीं करते थे. उन्होंने अपने सियासत में सर्वे किया तो उनको पता चला कि उनके सियासत में 71 पोस्ट हैं, जिनमें मात्र 09 मूलनिवासी और 62 ब्राह्मण हैं. इसी तरह से निजी कारोबार में 52 पोस्ट में 07 मूलनिवासी और 46 ब्राह्मण हैं. उनको लगा राजा हम हैं निर्णय लेने का काम ब्राह्मण कर रहे हैं. ऐसा नहीं होना. इसलिए उन्होंने मूलनिवासी बहुजनों को 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया. 

आगे उन्होंने कहा ‘‘जिनकी शासन में भागीदारी होती है वह शासनकरती जमात होता है’’ अगर, लोकतंत्र से प्रतिनिधित्व निकाल दो तो लोकतंत्र की मृत्यू हो जाती है. इसलिए डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने प्लान बनाकर आरक्षण को राष्ट्रव्यापी बनाना चाहते थे. आरक्षण के आधार पर बाबासाहब एससी, एसटी, ओबीसी, एनटी, डीएनटी, बीजेएनटी और इनसे धर्म परिवर्तित अल्पसंख्यकों का ध्रुविकरण करना चाहते थे. इसलिए आरक्षण को लेकर ब्राह्मणों ने भ्रम फैलाया और प्रचार किया कि आरक्षण भीख, बैशाखी, लाचारी, मेहरबानी आदि है.  उन्होंने कहा आज भारत में आरक्षण पूरी तरह से खत्म हो चुका है. क्योंकि शासक वर्ग ने आरक्षण को खत्म करने के लिए एलपीजी लागू किया और एलपीजी के माध्यम से आरक्षण को खत्म कर दिया. क्योंकि निजीकरण में आरक्षण नहीं है. इसलिए निजीकारण के कारण देश में अब सरकारी नौकरियाँ खत्म हो गयी हैं सिर्फ जॉब रह गया है. 12 घंटे काम कराते हैं और 8 घंटे का वेतन देते हैं. अंत में डीआर ओहोल ने कहा आरक्षण सिर्फ नौकरी का मामला नहीं है, बल्कि प्रतिनिधित्व का मामला है. आरक्षण साधारण बात नहीं है, आरक्षण ब्राह्मणों के लिए ‘‘डेथ सर्टिफिकेट’’ है. इसलिए शासक जातियाँ मूलनिवासी बहुजनों को आरक्षण नहीं देना चाहती हैं.

भाजपा हुई मालामाल: भाजपा की कुल संपत्ति 1483 करोड़ से ज्यादाः एडीआर रिपोर्ट



2014 और 2019 में हुए लोकसभा चुनावों में जैसे भाजपा ने ईवीएम में घोटाला करके अच्छा प्रदर्शन किया और ईवीएम से संबंधित मामलों में गुप्त समझौत के अनुसार कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा. ठीक यही स्थिति दोनों दलों की संपत्तियों में भी देखी जा सकती है. एडीआर रिपोर्ट के अनुसार सत्तारुढ़ भाजपा देश की सबसे अमीर ब्राह्मणों पार्टी बन चुकी है. जबकि, कांग्रेस की संपत्ति में कुछ कमी आई है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा अपनी सालाना रिपोर्ट पेश की गई है. जिसमें, 2016-17 से 2017-18 के बीच 3.5 प्रतिशत ब्राह्मणों की पाँच राष्ट्रीय दलों में भाजपा सबसे अमीर पार्टी बन गयी है. 

रिपोर्ट के अनुसार भाजपा, कांग्रेस, राकांपा, बसपा, सीपीआई, सीपीएम और एआईटीसी) द्वारा घोषित संपत्ति, देनदारियों की जानकारी दी गई है. एडीआर हर वर्ष राष्ट्रीय दलों की संपत्ति को लेकर रिपोर्ट जारी करता है. इस बार एडीआर द्वारा पेश की गई रिपोर्ट में राष्ट्रीय दलों की संपत्ति में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वित्तीय वर्ष 2016-17 में सातों राष्ट्रीय दलों की कुल औसत संपत्ति 465.83 करोड़ थी जो वित्तीय वर्ष 2017-18 तक बढ़कर 493.81 करोड़ हो गई. सत्तारुढ़ भाजपा की कुल संपत्ति सबसे अधिक हैं और साथ ही पार्टी की कुल संपत्ति में 22.27 फीसदी की बढ़त हुई है। वित्तीय वर्ष 2016-17 के दौरान भाजपा की कुल संपत्ति 1213.13 करोड़ रुपये थी जो वित्तीय वर्ष 2017-18 में बढ़कर 1483.35 करोड़ रुपये हो गई है. 

राष्ट्रीय दलों द्वारा घोषित वार्षिक संपत्ति में केवल कांग्रेस और राकांपा की संपत्ति में कमी देखी गई. कांग्रेस की संपत्ति वित्तीय वर्ष 2016-17 में 854.75 करोड़ रुपये थी वहीं वित्तीय वर्ष 2017-18 में यह घटकर 724.35 करोड़ रुपये हो गई. कांग्रेस की संपत्ति में 15.26 फीसदी गिरावट देखी गई है. वहीं दूसरी तरफ राकांपा की संपत्ति वित्तीय वर्ष 2016-17 में 11.41 करोड़ रुपये थी जो वित्तीय वर्ष 2017-18 में 16.39 फीसदी घटकर 9.54 करोड़ रुपये हो गई. इसी तरह तृणमूल कांग्रेस भले लोकसभा चुनावों में उम्मीद से ज्यादा प्रदर्शन नहीं कर पाई हो, लेकिन उसकी संपत्ति पर कुछ खास असर नहीं पड़ा है. वित्तीय वर्ष 2016-17 के दौरान तृणमूल कांग्रेस की कुल संपत्ति 26.25 करोड़ रुपये थी जो वित्तीय वर्ष 2017-18 में 10.86 फीसदी बढ़कर 29.10 करोड़ रुपये हो गई है.

राष्ट्रीय दलों द्वारा घोषित देनदारियाँ कुल 514.99 करोड़ रुपये थी, जो प्रति दल औसत 73.57 करोड़ रुपये हो रही थी. कांग्रेस की देनदारी सबसे अधिक 461.73 करोड़ थी, जबकि भाजपा की 20.03 करोड़ थी. वित्तीय वर्ष 2017-18 में सबसे अधिक देनदारी कांग्रेस ने घोषित किया है जिसके ऊपर 324.20 करोड़ रुपये की देनदारी है. इसके बाद भाजपा ने 21.38 करोड़ रुपये और तृणमूल कांग्रेस ने 10.65 करोड़ रुपये की देनदारी अपने वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट में घोषित किया है.

वित्तीय वर्ष 2016-17 और 2017-18 के बीच, चार राष्ट्रीय दलों ने अपनी देनदारियों में कमी घोषित की है जिसमें कांग्रेस ने 137.53 करोड़ रुपये की कमी, सीपीएम ने 3.02 करोड़ रुपये की कमी, राकांपा ने 1.34 करोड़ रुपये की कमी और तृणमूल कांग्रेस ने 55 लाख रुपये की कमी देनदारियों में घोषित की है. भाजपा, सीपीआई और बीएसपी ने वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए अपने देनदारियों की राशि में वृद्धि घोषित की है. 

चोर-चोर मौसेरे भाई....



स्विस बैंक में भारतीयों के जमा कालेधन का सही आंकड़ों की जानकारी नहीं : केन्द्र सरकार




थूककर चाटना....इस कहावत को मोदी सरकार ने दूसरे कार्यकाल में भी चरितार्थ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. मोदी सरकार ने स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा कालेधन मामलो में सही आंकड़ा न होने की बात कहकर उपरोक्त कहावत को चरितार्थ कर दिया है. एक तरफ तो मोदी सरकार कह रही है कि स्विट्जरलैंड के बैंकों में अघोषित खाते रखने वाले भारतीयों पर शिकंजा कसी जा रही है और दूसरी तरफ यह भी कह रही है कि स्विस बैंकां में भारतीयों के जमा कालेधन के सही आंकड़ों की जानकारी हमारे पास नहीं है. जबकि, 2014 में मोदी सरकार बनने के तत्काल बाद ही स्विट्जरलैंड सरकार ने तकरीबन 700 से ज्यादा भारतीयों के नाम की सूची भेजी थी. लेकिन, एक साल के अंदर ही पीएमओ ऑफिस से यह खबर आयी की पीएमओ ऑफिस में आग लगने से 700 से ज्यादा भारतीयों के नाम की सूची, सुभाष चंद्र बोस हत्या मामले, गांधीजी से संबंधित और कई महत्वपूर्ण फाइलें जलकर खाक हो गयी. इसके बाद सरकार किस आधार पर कह रही है कि स्विस बैंकां में भारतीयों के जमा कालेधन का सही आंकड़ों की जानकारी हमारे पास नहीं है? यही नहीं अभी बीते जून में ही स्विट्जरलैंड के अधिकारियों ने कम से कम 50 भारतीयों की बैंक संबंधी सूचनाएं भारतीय अधिकारियों को सौंपी थी. 

बताते चलें कि मोदी सरकार हद से ज्यादा झूठ बोल रही है. इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि भारतीय नागरिकों या कंपनियों के स्विस बैंक में जमा कालेधन का भारत के पास प्रमाणिक आंकड़ा नहीं है. असल में कितनी रकम जमा है, इस बात का सही-सही पता नहीं है. एक सवाल के जवाब में सोमवार को वित्त मंत्री ने लोकसभा में मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से बताया कि स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा कराए पैसे में 2018 में 6 प्रतिशत की गिरावट आई है. मजेदार बात तो यह है कि जब सरकार के पास आंकड़े ही नहीं हैं तो फिर यह बात वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को कैसे पता चली कि स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा कराए पैसे में 2018 में 6 प्रतिशत की गिरावट आई है? 

आगे सीतारमण ने कहा कि केंद्र सरकार भारतीयों के स्विट्जरलैंड में संपत्तियों और बेहिसाब आय का पता लगाने और टैक्स वसूलने के लिए लगातार कदम उठा रही है. लेकिन, सवाल यह है कि क्या यह सच है? कैसे और किस आधार पर कदम उठा रही है? बगैर आंकड़े ही कदम उठाना कहाँ तक उचित है यह तो सरकार ही बता सकती है, लेकिन, जनता भी इस बात को अच्छी तरह से समझ रही है कि कार्यवाही कैसी होगी. वित्त मंत्री ने डबल टैक्सेशन अवॉयडेंस अग्रीमेंट और ऑटोमेटिक एक्सचेंज ऑफ फाइनैंशियल अकाउंट इन्फॉर्मेशन का भी जिक्र किया, जिसके तहत भारत को स्विट्जरलैंड में भारतीय नागरिकों के खातों की जानकारी सितंबर 2019 से मिलनी शुरू हो जाएगी. यहाँ सवाल यह भी है कि जो जानकारी 2014-15 में मिली थी क्या कार्यवाही करने के लिए वह जानकारी कम थी? सरकार ने उस वक्त क्यों नहीं कदम उठाया? 

यह मामला यही नहीं रूका, वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि सरकार ने देश के अंदर और बाहर, दोनों ही मोर्चों पर कालेधन पर कार्रवाई की दिशा में कई ठोस कदम उठा रही है. इसके लिए कई कड़े कानून भी लाए गए हैं. अब जरा गौर करें की क्या सरकार को पता नहीं है कि देश के अंदर कहाँ-कहाँ और किन-किन लोगों के पास काला धन है? अगर सरकार कई कानून बना चुकी है तो अब तक कार्यवाही क्यों नहीं हुई? असल में ये सभी कानून कालेधन को बाहर निकालने के लिए नहीं, बल्कि सफेद बनाने के लिए बनाये गये हैं. इसका नजारा नोटबंदी के दौरान बड़े पैमाने पर देखने को मिल चुका है. 

अब रह गयी बात देश के अंदर छिपे कालेधन की तो सरकार को अच्छी तरह से पता है कि देश के मंदिरों, पार्टियों, मंत्रियों, नेताओं और पूँजीपतियों के पास अकूत कालाधन है. इसके बाद भी सरकार उनपर कोई कार्यवाही नहीं कर रही है, केवल जनता को मूर्ख बनाने के लिए कानून का हवाला देकर हल्ला मचा रही है. क्योंकि सरकार बीते पाँच सालों से यही राग अलापते आ रही है, परन्तु हुआ कुछ भी नहीं. बल्कि यह हुआ कि जैसा निर्मल सीतारमण ने कहा कि स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा कराए पैसे में 2018 में 6 प्रतिशत की गिरावट आई है. इसी तरह से धीरे-धीरे बगैर कार्यवाही किये या कार्यवाही करने तक पता चलेगा कि अब स्विस बैंकों में किसी भी भारतीयों के कालाधन नहीं है. इसलिए सरकार द्वारा ऐसा भ्रामक प्रचार किया जा रहा है कि स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा कराए पैसे में 2018 में 6 प्रतिशत की गिरावट आई है. यानी सरकार कार्यवाही करने में जानबूझकर इसलिए देरी कर रही है ताकि कार्यवाही करने तक सभी कालेधन सफेद हो जाये. क्योंकि, सरकार से लेकर नेता, मंत्री, पूँजीपति और मंदिरों में दान के नाम पर कालाधन रखने वाले सभी चोर-चोर मौसेरे भाई हैं. स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा कराए पैसे में 2018 में 6 प्रतिशत की गिरावट दिखाना इसी षड्यंत्र का एक अहम हिस्सा है.

आरटीआई के अधिकार पर कैंची



केंद्रीय सूचना आयोग में करीब 32 हज़ार अपील और शिकायतें लंबित



♦ सरकार को सूचना आयुक्तों की नियुक्ति करके आरटीआई कानून को और मजबूत बनाना चाहिए. लेकिन, वे इसमें संशोधन करके इसे सरकार की कठपुतली बना रहे हैं. 

♦ सरकार सूचना आयोग एवं सूचना आयुक्तों की स्वतंत्रता छीनना चाहती है, ताकि वे सरकार के खिलाफ कोई फैसला न करें और आयुक्त किसी ऐसी जानकारी जनता को मुहैया कराने का आदेश न दें जिसे सरकार सार्वजनिक नहीं करना चाहती है. 

नई दिल्ली/दै.मू.ब्यूरो
सूचना का अधिकार कानून में संशोधन करने की कोशिश और इससे संबंधित बहसों के बीच एक सनसनीखेज खबर ने सबको चौंकाकर रख दिया है. वास्तव में यह खबर बेहद चौंका देने वाला है. क्योंकि, केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) में इस समय अपील और शिकायतों को मिलाकर कुल तकरीबन 32,000 मामले लंबित पड़े हैं. हैरान हो जायेंगे यह जानकर की जब आरटीआई को बगैर संशोधन किये ही 32 हजार से ज्यादा शिकायतें लंबित पड़े हैं तो सोचो आरटीआई को कमजोर कर देने के बाद हालात क्या होंगे. इसका अंदाजा भी लगा पाना मुश्किल हो जायेगा. 

गौरतलब है कि सीआईसी की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक 23 जुलाई 2019 तक केंद्रीय सूचना आयोग में 28,442 अपीलें और 3,209 शिकायतें लंबित थे. इस तरह सीआईसी में कुल 31,651 मामले लंबित पड़े हैं. पिछले करीब ढाई सालों में ये सर्वाधिक लंबित मामलों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोत्तरी पायी गयी है. जबकि, इससे पहले एक अप्रैल 2017 को लंबित मामलों की संख्या 26,449 थी. आरटीआई को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं और पूर्व सूचना आयुक्तों का कहना है कि सरकार की जानबूझकर लापरवाही और आयोगों में सूचना आयुक्त पदों का खाली रहना इसकी सबसे बड़ी वजह है.

बता दें कि केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग सूचना का अधिकार कानून के तहत सूचना मुहैया कराने के लिए सर्वश्रेष्ठ अपीलीय संस्थान हैं. सीआईसी में केंद्रीय सूचना आयुक्त समेत सूचना आयुक्तों के लिए कुल 11 पद हैं. लेकिन, इस समय आयोग में सात आयुक्त ही नियुक्त हैं और चार पद खाली पड़े हैं. इन चार खाली पदों को भरने के लिए सरकार ने इसी साल चार जनवरी को विज्ञापन जारी किया था. लेकिन, करीब सात महीने का वक्त बीत जाने के बाद भी अभी तक कोई नियुक्ति नहीं हुई है. जबकि, पिछले साल 26 अप्रैल 2018 को सुप्रीम कोर्ट में सूचना आयुक्तों की जल्द नियुक्ति के लिए एक याचिका दायर की गई थी. उस समय तक करीब 23,500 से ज्यादा मामले लंबित थे. यानी लंबित मामलों की संख्या में कमी आने के बजाय करीब एक साल के भीतर इसमें 8,000 और मामलों की बढ़ोतरी हो गयी. 

इस मामले में याचिकाकर्ता आरटीआई कार्यकर्ता कोमोडोर लोकेश बत्रा इस पर चिंता जाहिर करते हुए कहते हैं, ये बेहद हैरानी की बात है कि एक तरफ सरकार आरटीआई कानून को मजबूत करने का दावा करती है और दूसरी तरफ ये लोग सूचना आयुक्तों की नियुक्ति नहीं कर रहे हैं. बत्रा ने कहा, नियम के मुताबिक जैसे ही पद खाली होते हैं, उससे कुछ महीने पहले ही नियुक्ति प्रक्रिया शुरू कर दी जानी चाहिए. लेकिन, सरकार ऐसा नहीं करती है. जब तक कोई कोर्ट नहीं जाता है और वहाँ से आदेश नहीं आता, तब तक कोई नियुक्ति नहीं होती है. ये आरटीआई के प्रभाव को कम करने की कोशिश है.

वहीं आरटीआई की दिशा में काम करने वाला गैर सरकारी संगठन सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआई) की सदस्य अंजलि भारद्वाज ने कहा कि सरकार को सूचना आयुक्तों की नियुक्ति करके आरटीआई कानून को और मजबूत बनाना चाहिए. लेकिन, वे इसमें संशोधन करने इसे सरकार की कठपुतली बना रहे हैं. उन्होंने कहा, सरकार आरटीआई कानून में संशोधन करके केंद्रीय एवं राज्य सूचना आयुक्तों की सैलरी और उनका कार्यकाल खुद निर्धारित करना चाहती है. इसका मतलब बिल्कुल साफ है कि सरकार सूचना आयोग एवं सूचना आयुक्तों की स्वतंत्रता छीनना चाहती है, ताकि वे सरकार के खिलाफ कोई फैसला न करें और आयुक्त किसी ऐसी जानकारी जनता को मुहैया कराने का आदेश न दें जिसे सरकार सार्वजनिक नहीं करना चाहती है. 

इसके अलावा कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव संगठन के सदस्य और आरटीआई कार्यकर्ता वेंकटेश नायक कहते हैं कि सरकार पूरी तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया का दमन कर रही है और जनता के संवैधानिक अधिकार आरटीआई को काफी कमजोर किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि आरटीआई संशोधन विधेयक लाने से पहले जनता से कोई राय सलाह नहीं ली गई. सरकार की प्राथमिकता सूचना आयुक्तों की नियुक्ति करने की होनी चाहिए, न कि इसमें संशोधन कर इसे कमजोर बनाने की. पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त और कई सूचना आयुक्त भी आरटीआई संशोधन कानून के खिलाफ बोल रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि आयोगों में खाली पदों को भरा जाए. परन्तु सरकार मनमानी करने से बाज नहीं आ रही है.

रसातल में उच्च शिक्षा

‘‘आईआईटी-आईआईएम की मदद के लिए सरकार ने जहाँ हाँथ खींच लिए हैं वहीं दूसरी तरफ प्राइवेट सेक्टरों के लिए दरवाजे पूरी तरह से खोल दिये हैं’’ 


केन्द्र की मोदी सरकार दूसरे पारी में भी अर्नगल फैसला लेने में देरी नहीं कर रही है. जबकि, केन्द्र सरकार की इन्हीं अर्नल नीतियों के कारण न केवल शिक्षा रसातल में मिल गयी है, बल्कि देश बिल्कुल बर्बादी के कगार पर खड़ा हो चुका है. इसके बाद भी ताबडतोड़ अर्नगल फैसले करती जा रही है. नरेंद्र मोदी सरकार जो नई शिक्षा नीति ला रही है, वह किस तरह की होगी, इसका अंदाजा हाल ही संसद में पेश बजट में दिखाई देने लगा है. इसमें केंद्रीय विश्वविद्यालयों का बजट लगभग एक तिहाई कर दिया गया है, जबकि डीम्ड विश्वविद्यालयों का बजट तिगुना कर दिया गया है. इसी तरह जहाँ एक ओर आईआईटी और आईआईएम का बजट घटा दिया गया है तो वहीं दूसरी ओर नए आईआईटी और आईआईएम के लिए कोई राशि ही नहीं रखी गई है. मतलब, चुनावों से पहले नए आईआईटी और आईआईएम खोलने की जो बातें की गई थीं, वे बेमानी रह गईं. बल्कि सरकार ने आईआईटी और आईआईएम को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत प्राइवेट सेक्टरों के लिए दरवाजे खोल दिए हैं. 

मोटे तौर पर लगता है कि सरकार का सारा ध्यान निजी व्यवस्था को बढ़ावा देने पर ही है यह सरकार के रवैये से स्पष्ट हो गया है. इसका अंदाजा बजट 2019-20 को देख कर भी लगाया जा सकता है. बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उच्च शिक्षा को लेकर कोई घोषणा नहीं की.बजट दस्तावेज बताते हैं कि कई मदों पर अनुमानित खर्च घटा दिया गया है. इनमें केंद्रीय विश्वविद्यालयों को दी जाने वाली ग्रांट प्रमुख है. केंद्रीय विश्वविद्यालयों को जहाँ 2017-18 में 7286.22 करोड़ का बजटीय सपोर्ट दिया गया था. अब उसे घटाकर लगभग एक तिहाई 2865.62 करोड़ कर दिया गया है. इसके एवज में माध्यमिक एवं उच्चतर शिक्षा कोष से 1000 करोड़ और नेशनल इंवेस्टमेंट फंड से 2746.27 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. 

दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों की ग्रांट तो कम कर दी गई है, लेकिन निर्मला सीतारमण के इस बजट में डीम्ड विश्वविद्यालयों को आगे बढ़ाने के लिए 350 करोड़ का प्रावधान किया गया है जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 5 गुना है. पिछले साल के बजट में 60 करोड़ का प्रावधान किया गया था. जबकि, उससे पहले इस तरह का प्रावधान नहीं किया जाता था. साफ है कि सरकार केंद्रीय विश्वविद्यालयों के बजाय डीम्ड विश्वविद्यालयों पर मेहरबान है. यही नहीं मोदी सरकार छात्रों द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता में भी कमी कर दी है. 2017-18 में सरकार ने इस मद में कुल बजटीय सपोर्ट 1950 करोड़ वास्तविक खर्च दिखाया था. अब उसे 2018-19 में 30 करोड़ और 20 करोड़ कर दिया है. छात्रों के वित्तीय सहायता के पैटर्न में भी बदलाव किया गया है. अब उन्हें माध्यमिक एवं उच्चतर शिक्षा कोष से वित्तीय सहायता दी जाएगी, लेकिन उसका बजट भी बहुत अधिक नहीं है. उन्हें इस मद में 340 करोड़ दिए जाएंगे. शर्तें क्या होंगी, यह जानना बाकी है. लेकिन, स्टूडेंट फाइनेंशियल ऐड के कुल मद में राशि जरूर घटा दी गई है. इस मद में 2018-19 में 2600 करोड़ का प्रावधान किया गया है. जिसे, बाद में संशोधित कर 2155 करोड़ कर दिया गया और अब इस साल 2306 करोड़ का प्रावधान किया गया है. 

बता दें कि अकसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इनोवेशन की बात करते हैं और इसके लिए आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों को बढ़ावा देने की वकालत करते रहे हैं. लेकिन, बजट में कुछ और ही बात कही गई है. बजट 2017-18 में नए आईआईटी के लिए 342.91 और अगले साल 338 करोड़ का प्रावधान किया गया, लेकिन बजट 2019-20 में इसे घटाकर शून्य कर दिया गया है. इसी तरह नए आईआईएम पर 136 करोड़ का प्रावधान पिछले साल किया गया था, उसे भी शून्य कर दिया गया है. इसके अलावा आईआईटी और आईआईएम का कुल बजटीय सपोर्ट (जीबीएस) भी घटा दिया गया है. आईआईटी के लिए 2018-19 में 236 करोड़ का प्रावधान किया गया था अब उसे घटाकर 208.16 करोड़ कर दिया गया. आईआईएम के लिए 2018-19 में 828 करोड़ का प्रावधान किया गया था. इसे रिवाइज करके 200 करोड़ किया गया और 2019-20 में इसे 445.53 करोड़ कर दिया है. इतना ही नहीं, सरकार ने इस बार के बजट में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत आईआईटी और आईआईएम के संचालन की बात कही है. लेकिन, इतना तो तय है कि इससे आईआईटी और आईआईएम में प्राइवेट सेक्टर का रास्ता जरूर साफ हो गया है. संभव है कि अगले 100 दिन में सरकार की मंशा से पर्दा उठ जाएगा. 

आम चुनाव से पहले अचानक मोदी सरकार को याद आया कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के स्तर पर कुछ काम नहीं हुआ है तो फरवरी, 2019 में हुई कैबिनेट की बैठक के बाद प्रेस नोट जारी किया गया कि केंद्र सरकार ने 13 नए केंद्रीय विश्वविद्यालय के निर्माण कार्य को मंजूरी दे दी है. सरकार ने उस समय 36 महीनों में ये सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनाने की बात कही और विश्वविद्यालयों के निर्माण कार्य के लिए 3639.32 करोड़ रुपये के बजट की इजाजत दे दी. तब कहा गया कि नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों का निर्माण केंद्रीय विश्वविद्यालय कानून 2009 के तहत बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, केरल, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु में किया जाएगा. इन 11 राज्यों में एक-एक विश्वविद्यालय बनाए जाने की बात कही गई थी, वहीं जम्मू-कश्मीर में दो विश्वविद्यालय बनाए जाने की बात थी. 

फिर से चुने जाने के बाद संसद की पहली बैठक में इस बारे में सरकार से सवाल पूछा गया कि क्या सरकार की देश में 13 नए केंद्रीय विश्विविद्यालय स्थापित करने और उनकी अवसंरचनात्मक सुविधाओं हेतु 3600 करोड़ आवंटित करने की योजना है? तो नए मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने जवाब दिया कि नहीं. वर्तमान में देश में नया केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने का कोई प्रस्ताव नहीं है. केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पद खाली रहने का भी मामला कई बार उठा है. लेकिन, सरकार इसको लेकर भी गंभीर नहीं दिखाई दी है. 

इसका एक मजेदार पहलू यह भी है कि 20 मार्च, 2017 को सरकार ने लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में जानकारी दी थी कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 17,006 शिक्षकों के पद स्वीकृत हैं और इनमें से 6,141 पद खाली हैं. इसके दो साल बाद 24 जून, 2019 को जवाब दिया गया कि 1 अप्रैल, 2019 तक देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 17,834 पद स्वीकृत हैं और उनमें से 11,115 पद भरे हुए हैं. यानी 6,719 पद खाली हैं. सरकार की धोखेबाजी वाली गणित देखिए कि दो साल के दौरान 828 पद सृजित तो किए गए, बावजूद इसके शिक्षकों की खाली सीटें और बढ़ गई. उच्चतर शिक्षा के लिए एक और अहम संस्थान भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं शोध संस्थान आईआईएसईआर है. मोदी सरकार ने इस संस्थान का बजट भी घटा दिया है. 2016-17 में इसका बजट 720 करोड़ था. इसे पहले 650 करोड़ किया गया, फिर 2018-19 में 689 करोड़ कर दिया गया. इस तरह से सरकार ने शिक्षा का प्राइवेटाजेशन करके पूरी तरह से चौपट कर दिया है. 

नीट और नेक्स्ट एग्जाम एक राष्ट्रीय षड्यंत्र है



नीट का मतलब है ‘‘राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा’’ कहा जाता है. यह एक्जाम ग्रेज्युएट और पोस्टग्रेजुएट के लिए देशभर में लागू है. बहुजन विद्यार्थी विरोधी नीट और नेक्स्ट एक्जाम एक राष्ट्रीय षडयंत्र है और वो षड्यंत्र सरकार के माध्यम से मई 2013 में कांग्रेस और बीजेपी की ब्राम्हणवादी पार्टियों के जरिए अमल करके थोपने का प्लानपूर्वक षड़यंत्र बनाया गया. बहुजन विद्यार्थियों को डॉक्टर बनने से वंचित रखने का यह एक राष्ट्रीय षड्यंत्र का हिस्सा है. इस बात की जानकारी देश के 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजन समाज को नहीं है. इसलिए, इस षडयंत्र को मूलनिवासी बहुजन समाज के सामने लाने की जरूरत है. यदि ‘‘नीट एग्जाम’’ का षड्यंत्र समझना है तो सबसे पहले ‘‘नीट एग्जाम’’ के इतिहास की जानकारी होनी चाहिए. ‘‘नीट एग्जाम’’ क्या है? 


दुनिया में सबसे पहले ‘‘नीट एक्जाम’’ की शुरूआत अमेरिका में हुई थी. ‘‘नीट एग्जाम’’ की कल्पना वर्ल्ड बैंक के एक सदस्य अर्थशात्री इम्यानुअल निमिनिअस ने एक संशोधनात्मक थिसिस निबंध ‘‘पब्लिक सब्सिडाइजेशन ऑफ एज्यूकेशन एंड हेल्थ इन डेवलेपिंग कंट्री’’ नाम से लिखा और इसे एक योजना के तहत अमेरिका सहित कुछ अन्य देश की शिक्षा मंत्रालय ने वर्ल्ड बैंक के साथ भागीदारी करके कॉलेजों में लागू कर दिया. कुछ दिन बाद इसमें प्राइवेट लोगों की घूसखोरी शुरू हो गयी. जब प्राइवेट लोगों की घूसखोरी ज्यादा बढ़ गयी तो वर्ल्ड बैंक ने तत्काल प्रभाव से इसे बंद कर दिया. वर्ल्ड बैंक ने बताया इसमें बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हो सकती है. प्राइवेट कंपनी या व्यक्ति द्वारा इसका गतल इस्तमाल किया जा सकता है, इसके कई सबूत भी मिले हैं. इसलिए, इस धांधली को देखते हुए इसे बंद करने का निर्णय लिया गया. परन्तु, हैरान की बात तो तब हुई जब भारत में भी इसे शुरू करने की प्लानिंग बनाई गयी.  

भारत में ‘‘नीट’’ की शुरूआत मई, 2013 से शुरू हुई. भारत का प्रतिनिधि केतन देसाई नामक ब्राम्हण ने किया और इसे अमल करने की जिम्मेदारी वर्तमान की केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने लिया और निर्मला सीतारमण और केतन देसाई को सपोर्ट देने का काम नरेन्द्र मोदी ने किया. केतन देसाई के बारे में देखा जाय तो वह एक नंबर का बदमाश आदमी है. इसका सबूत यह है कि क्राइम ब्राँच नई दिल्ली को जब ‘‘नीट एग्जाम’’ में गड़बड़ी का पता चला तो क्राइम ब्राँच ने केतन देसाई के घर छापा डाला. छापे में उसके घर से 18 करोड़ का सोना और कैश बरामद हुई. सवाल यह है कि इतनी ज्यादा राशि कहाँ से आयी? इसका सीधा और सपाट जवाब है ‘‘नीट’’ की प्राइवेस्ट कंपनी या कॉलेज के लोगों से उसको दलाली मिली होगी. 

भारत में जब 2013 में एग्जाम ली गई तो एग्जाम के रिजल्ट के बाद साउथ इंडिया, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्य सरकारों ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दाखिल की. सवाल यह है कि आखिर ‘‘नीट एग्जाम’’ का इतने राज्य सरकारों ने विरोध क्यों किया? यह इसलिए की ‘‘नीट एग्जाम’’ में कई त्रुटियाँ हैं. ‘‘नीट एग्जाम’’ के लिए एक प्रोमेट्रिक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है. प्रोमेट्रिक सॉफ्टवेयर प्रणाली को अमेरिका में लागू करके एग्जाम ली जाती थी, उसके आधार पर भारत में भी एग्जाम को लागू किया गया. ‘‘नीट एग्जाम’’ के पहले 2009 से 2014 तक देशभर में कट आईआईएम के माध्यम से ली जाती थी. नीट एग्जाम के लिए सरकार ने आईआईएम को 240 करोड़ का टेंडर दिया था. जबकि, टीसीएस को सिर्फ 29 करोड़ में टेंडर दिया गया. इसका मतलब है कि पहले 240 करोड़ दिया और अब सिर्फ 29 करोड़ बाकी 211 करोड़ कहाँ गया? यानी 211 करोड़ का घोटाला किया गया. इसी तरह से सिस्टम को हैक किया जा सकता है. इसके अलावा सर्वर को हैक और मार्क्स बदले जा सकते हैं. इस तरह से 2014 के अंत मे आईआईएम को इस सिस्टम में गड़बड़ी और फ्रॉड होने की जानकारी मिली. इन बातों की वजह से आईआईएम ने प्रोमेट्रिक सिस्टम को 5 साल के लिए बंद करने का एलान किया. 

इधर नेशनल बोर्ड ऑफ एक्जामिनेशन (एनबीई) ने फिर वही सिस्टम प्रोमेट्रिक से ही एग्जाम करने का आग्रह किया. एनबीएस का संचालन डॉ.बिपिन बत्रा नामक ब्राम्हण ने किया और बिना टेंडर निकाले ही पास कर दिया. सब कॉन्ट्रैक्ट सीएमएस आईटी सर्विसेस को दिया गया. इस कंपनी में आईटी हैकर के जरिए एग्जाम में गड़बड़ियाँ शुरू हुई. इसके विरोध में देशभर में अनेक राज्य सुप्रीम कोर्ट गए और 170 पिटीशन 2013 के एग्जाम के विरोध में डाली गई. पिटीशन क्यो डाली गई? इसमें बताया गया यह अनलीगल है, असंवैधानिक है, पेपर लीक होते हैं, एग्जाम को हैक किया जाता है. यह नीट एग्जाम मेडिकल साइंस, इंजीनियरिंग सहित कई ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेजों में लागू किया गया था.

अब सरकार ने ‘नीट एग्जाम’ के साथ ही नेशनल एग्जिट टेस्ट भी लागू कर दिया गया है. मेडिकल शिक्षा नियामक मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया का स्थान लेने वाले नए नेशनल मेडिकल कमीशन विधेयक-2019 को केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को अपनी मंजूरी दे दी है. नए कानून में डॉक्टरों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के नाम पर एग्जिट टेस्ट का प्रावधान किया जा रहा है. 

एमबीबीएस के कुल तीन या चार साल का कोर्स पूरा करने के बाद अंतिम वर्ष में एक कॉमन परीक्षा नेशनल एक्जिट टेस्ट (नेक्स्ट) का प्रावधान किया गया है. यह परीक्षा पास करने के बाद ही डॉक्टरों को मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए लाइसेंस मिलेगा. नीट और नेक्स्ट मूलनिवासी बहुजन समाज के छात्रों के लिए कितना ज्यादा खतरनाक है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नीट टेस्ट के बाद मुश्किल से मेडिकल साइंस में प्रवेश हो पाता है. इसके बाद छात्र तीन-चार साल का कोर्स पूरा कर लिया और उसे एमबीबीएस की डिग्री भी मिल गयी हो, इसके बाद भी वह डॉक्टर नहीं बन सकता है. अब उसे डॉक्टर बनने के लिए नेशनल एग्जिट टेस्ट (नेक्स्ट टेस्ट) की परीक्षा पास करनी होगी. अगर, वह नेक्स्ट टेस्ट पास करता है तो वह डॉक्टर बन सकता है. अगर, वह नेक्स्ट टेस्ट परीक्षा पास नहीं कर पता है तो वह एमबीबीएस की डिग्री लेने के बाद भी डॉक्टर नहीं बन सकता है. इसका मतलब साफ है कि देश के 85 प्रतिशत मूलनिवासी बहुजन समाज में निर्माण होने वाले डॉक्टरों को रोकने के लिए ही मनुवादी सरकारें नीट और नेशनल एग्जिट परीक्षा लागू किये हैं.

आवाज़ कब सुनेगी गूंगी, बहरी सरकार? क्या पीड़िता को न्याय मिल सकेगा या न्याय की हार और अन्याय की जीत हो जायेगी?



‘‘जिनकी गोद में कभीबेटियाँ नहीं खेली उसने ही ‘‘बेटी बचाओ’’ का नारा दिया. मगर, यह बात कोई नहीं जान सका कि वह नारा था या चेतावनी? मगर, आज यह बात बहुत अच्छी तरह से समझ में आ चुकी है कि वो नारा नहीं, भारतीय जनता पार्टी से बेटियाँ बचाने की चेतावनी थी’’ 




उत्तर प्रदेश के रायबरेली में बीते 28 जुलाई को एक सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल बलात्कार पीड़िता की हालत नाज़ुक बनी हुई है. इधर, पीड़िता के परिजन परिजनो ने मंगलवार को उनके चाचा की परोल की मांग को लेकर लखनऊ ट्रॉमा सेंटर के बाहर धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है. उन्नाव जिले के बांगरमऊ से भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली लड़की, उनकी चाची पुष्पा और मौसी शीला अपने वकील महेंद्र सिंह के साथ 28 जुलाई को रायबरेली जेल में बंद अपने चाचा महेश सिंह से मुलाकात करने जा रही थीं. इधर बाहुबली विधायक ने प्लान बनाकर रास्ते में ही रायबरेली के गुरबख्शगंज क्षेत्र में उनकी कार को ट्रक से रौंदवा दिया. जिसमें पीड़िता की की मौसी शीला (50) ने स्थानीय अस्पताल में दम तोड़ दिया था. वहीं चाची पुष्पा (45) को लखनऊ स्थित ट्रामा सेंटर में चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया था. इस दुर्घटना में घायल पीड़ित और उनके वकील महेंद्र सिंह की हालत बेहद नाज़ुक है और वे लखनऊ स्थित केजीएमयू (किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी) ट्रॉमा सेंटर के आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखे गए हैं.


वहीं धरने पर बैठे परिजन की मांग है कि लड़की के चाचा महेश सिंह को रायबरेली जेल से परोल पर छोड़ा जाए, ताकि वह रायबरेली के गुरुबक्शगंज में ट्रक से हुई टक्कर में मारी गईं अपनी पत्नी पुष्पा और साली शीला के अंतिम संस्कार में शामिल हो सके. हादसे में घायल बलात्कार पीड़िता की बहन का आरोप है कि विधायक सेंगर के रसूख की वजह से ही उसके चाचा महेश को परोल नहीं मिल रही है. उन्होंने कहा कि जब तक परोल नहीं मिलेगी, तब तक पुष्पा और शीला का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा. इस दुर्घटना के संबंध में बीते सोमवार को भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर समेत दस नामजद और 15-20 अज्ञात लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 307 (हत्या की कोशिश), 506 (डराने धमकाने), 120 बी (आपराधिक साजिश रचने) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया रायबरेली के गुरुबक्शगंज थाने में पीड़िता के चाचा महेश सिंह की तहरीर पर सेंगर और उनके भाई सहित अन्य के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास और साजिश रचने के आरोप के तहत मामला दर्ज किया गया है.

महेश सिंह ने तहरीर में आरोप लगाया है कि जेल में बंद विधायक कुलदीप सिंह सेंगर अपने साथियों के नंबर पर फोन मिलाकर उनके घर पर जबरन बात किया करते थे और धमकी देते थे कि अगर जिंदा रहना है तो सारे मुकदमों में बयान बदल दो. मालूम हो कि इस बलात्कार मामले में उत्तर प्रदेश में उन्नाव जिले के बांगरमऊ से भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर आरोपी हैं. उन्हें पिछले साल 13 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था. फिलहाल वह और उनके भाई अतुल सेंगर जेल में बंद हैं. युवती का आरोप है कि साल 2017 में भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने उनका अपहरण कर उनके साथ बलात्कार किया था. पिछले साल उन्नाव बलात्कार मामला राष्ट्रीय स्तर पर तब सुर्खियों में आया था जब बलात्कार पीड़िता और उनकी माँ ने लखनऊ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की थी. इसके बाद पीड़िता के पिता की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी. पुलिस ने उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत हिरासत में लिया था. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में उनके शरीर पर चोट के निशान पाए जाने की बात सामने आई थी.

इसके साथ ही पिछले साल इस मामले के एक गवाह की कथित तौर पर बीमारी से मौत हो गई है. मृतक का नाम यूनुस था और बलात्कार पीड़िता के चाचा के मुताबिक यूनुस पीड़िता के पिता को भाजपा विधायक के भाई तथा अन्य लोगों द्वारा बेरहमी से पीटा जाने का गवाह था. इस संबंध में पीड़ित लड़की के चाचा ने उन्नाव के पुलिस अधीक्षक को एक पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि यूनुस के शव को पोस्टमॉर्टम कराए बगैर दफना दिया गया. उसके शव को कब्र खोदकर निकलवाया जाना चाहिए और पोस्टमॉर्टम कराया जाना चाहिए ताकि उसकी मौत का असली कारण पता लग सके. यूपी पुलिस द्वारा भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का बचाव करने के आरोपों के बाद यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था. सीबीआई ने मामले में तीन प्राथमिकियाँ दर्ज की हैं. ये मामले किशोरी के बलात्कार, उसके पिता की हत्या तथा किशोरी के पिता पर हथियार अधिनियम के तहत दर्ज मामला जिसके आधार पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया था, से जुड़े हुए हैं.

बता दें कि मालूम हो कि जिस ट्रक से टक्कर हुई उसका नंबर यूपी 71 एटी 8300 है और नंबर प्लेट ट्रक के आगे और पीछे दोनों तरफ लगे हुए हैं. हालांकि दोनों तरफ के नंबर प्लेटों पर ग्रीस पोता गया था, ताकि नंबर न दिख सके. इसके अलावा पीड़िता को मिले सुरक्षाकर्मी भी हादसे के वक्त उनके साथ नहीं थे. चौंकाने वाले खबर यह भी है कि जो पीड़िता का सुरक्षागार्ड था वहीं पीड़िता के बारे में सारी जानकारी विधायक को मुहैया कराता था. इन तथ्यों को देखते हुए हादसे की परिस्थितियों को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं उससे साबित होता है कि विधायक सेंगर ने प्लान बनाकर पीड़िता की हत्या करने की कोशिश की है. दूसरा सवाल यह है कि क्या पीड़िता को न्याय मिल सकेगा या न्याय की हार और अन्याय की जीत हो जायेगी? 

इस बीच, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा, आखिर परिवार का क्या गुनाह है? सरकार को उसकी मांगें माननी चाहिए. क्या सरकार एक बेटी को न्याय नहीं दिला सकती? अगर पीड़िता और उसके वकील की मौत हुई तो कौन जिम्मेदार होगा? इस घटना के लिये भाजपा सरकार ही जिम्मेदार है. वहीं मायावती ने ट्वीट कर कहा, स्थानीय भाजपा सांसद साक्षी महाराज द्वारा जेल में बलात्कार के आरोपी भाजपा विधायक से मिलना, यह प्रमाणित करता है कि सामूहिक बलात्कार के आरोपियों को लगातार सत्ताधारी भाजपा का संरक्षण मिल रहा है. यह इंसाफ का गला घोंटने जैसा है.

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने पीड़िता से लखनऊ स्थित अस्पताल में मुलाकात की. मालीवाल ने एक ट्वीट कर कहा है, मैं उन्नाव पीड़िता, वकील और डॉक्टर से मिली. डॉक्टर ने बताया है कि लड़की और वकील की स्थिति बहुत नाजुक है और बचने के आसार कम हैं. एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा, योगी आदित्यनाथ सरकार से अब तक परिवार से मिलने के लिए कोई नहीं आया. डीजीपी कह रहे हैं कि यह दुर्घटना थी. योगी आदित्यनाथ जी अस्पताल आकर देखिए. कुलदीप सेंगर की विधायकी छीनी जानी चाहिए. मामला उच्चतम न्यायालय में स्थानांतरित किया जाना चाहिए और 15 दिन के अंदर सेंगर को फांसी दी जानी चाहिए. आज वह बच गया तो देशभर की निर्भया हताश हो जाएंगी.
राजकुमार (संपादक, दैनिक मूलनिवासी नायक)